अमेरिका की पूर्व नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर (DNI) तुलसी गबार्ड एक नई विवादित रिपोर्ट के कारण चर्चा में आ गई हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गबार्ड के राजनीतिक करियर, सार्वजनिक बयानों और नीतिगत रुख पर हवाई स्थित एक आध्यात्मिक संगठन से जुड़े लोगों का लंबे समय तक प्रभाव रहा। यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब गबार्ड ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दिया है और ट्रंप प्रशासन अमेरिकी खुफिया तंत्र में व्यापक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। 25 हजार दस्तावेजों और ईमेल के आधार पर जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह जांच लगभग 25,000 पन्नों के आंतरिक दस्तावेजों, ईमेल और अन्य रिकॉर्ड पर आधारित है। इन दस्तावेजों को रेबेका साल्ट्जबर्ग नामक पूर्व राजनीतिक सहयोगी ने उपलब्ध कराया, जो कभी गबार्ड के चुनाव अभियान और साइंस ऑफ आइडेंटिटी फाउंडेशन (SIF) दोनों से जुड़ी रही थीं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि SIF संस्थापक क्रिस बटलर के करीबी सहयोगियों ने विभिन्न समय पर गबार्ड के सलाहकारों के साथ मिलकर उनके राजनीतिक संदेश, नीतिगत रुख और रणनीतियों को प्रभावित किया। राजनीतिक बयानों और दस्तावेजों में समानता का दावा जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि SIF से जुड़े कुछ दस्तावेजों में दिए गए सुझाव बाद में गबार्ड के सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक गतिविधियों में दिखाई दिए। रिपोर्ट के अनुसार, एक ईमेल में इस्लामिक स्टेट से जुड़े विदेशी लड़ाकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सुझाव दिया गया था और कुछ समय बाद गबार्ड ने कांग्रेस में इसी विषय से संबंधित एक विधेयक पेश किया। रिपोर्ट में सीरिया और पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर भी इसी तरह की समानताओं का दावा किया गया है। सोशल मीडिया अभियान पर भी उठे सवाल रिपोर्ट में यह आरोप भी लगाया गया है कि क्रिस बटलर के समर्थकों से जुड़े कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स गबार्ड की राजनीतिक छवि को मजबूत करने और उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। जांच में दावा किया गया है कि 2014 से 2016 के बीच कांग्रेस सदस्य के रूप में गबार्ड द्वारा उठाए गए कई मुद्दे और तर्क SIF से जुड़े दस्तावेजों में मौजूद विचारों से मेल खाते थे। कौन हैं क्रिस बटलर? 78 वर्षीय क्रिस बटलर हवाई स्थित साइंस ऑफ आइडेंटिटी फाउंडेशन के संस्थापक हैं। 1970 के दशक में स्थापित यह संगठन योग, आध्यात्मिकता और वैदिक दर्शन से जुड़े विचारों को बढ़ावा देता है। वर्षों से संगठन को लेकर कई विवाद भी सामने आते रहे हैं। कुछ पूर्व सदस्यों ने आरोप लगाया है कि संगठन में सख्त अनुशासन और पदानुक्रम व्यवस्था थी तथा बटलर का अनुयायियों के निजी जीवन और निर्णयों पर गहरा प्रभाव रहता था। गबार्ड के प्रवक्ता ने आरोपों को नकारा रिपोर्ट सामने आने के बाद तुलसी गबार्ड के प्रवक्ता ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। वहीं, क्रिस बटलर के करीबी सहयोगियों ने भी दावा किया कि जिन दस्तावेजों का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है, वे सीधे बटलर द्वारा तैयार नहीं किए गए थे। वॉशिंगटन पोस्ट का कहना है कि उसके विश्लेषण में कई ऐसे संकेत मिले हैं जो दस्तावेजों और संबंधित निर्देशों को बटलर के प्रभाव से जोड़ते हैं। कोविड विवाद को लेकर भी चर्चा में रहीं गबार्ड हाल के दिनों में तुलसी गबार्ड कोविड-19 की उत्पत्ति से जुड़े अपने बयानों को लेकर भी सुर्खियों में रही हैं। पद छोड़ने से पहले उन्होंने कुछ दस्तावेज और जानकारियां सार्वजनिक की थीं, जिनमें उन्होंने महामारी से जुड़े निर्णयों और अमेरिकी स्वास्थ्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। अमेरिकी मीडिया के कुछ हिस्सों ने उनके इन दावों पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि उपलब्ध दस्तावेजों से उनके आरोप पूरी तरह साबित नहीं होते। DNI कार्यालय में शुरू हुआ बड़ा पुनर्गठन गबार्ड के इस्तीफे के बाद ट्रंप प्रशासन ने खुफिया विभाग में बड़े स्तर पर बदलाव शुरू कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई राजनीतिक नियुक्त अधिकारियों को हटाने और कार्यालय के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही गबार्ड के कार्यकाल के दौरान कार्यालय में लगाए गए कई चित्र और अन्य प्रतीकात्मक व्यवस्थाएं भी हटाई जा रही हैं। विलियम पुल्टे को मिली अंतरिम जिम्मेदारी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गबार्ड के पद छोड़ने के बाद विलियम पुल्टे को कार्यवाहक नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर नियुक्त किया है। बताया जा रहा है कि पद संभालने के तुरंत बाद उन्होंने खुफिया तंत्र के पुनर्गठन और कर्मचारियों की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विश्लेषकों का मानना है कि तुलसी गबार्ड को लेकर सामने आई यह नई रिपोर्ट और खुफिया विभाग में जारी पुनर्गठन आने वाले समय में अमेरिकी राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विमर्श को और तेज कर सकते हैं।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त आव्रजन नीतियों को एक और कानूनी झटका लगा है। अमेरिकी संघीय अदालत ने एच-1बी वीजा के तहत विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना को अवैध घोषित कर दिया है। इस फैसले से अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है। अदालत के फैसले के बाद फिलहाल वह नियम लागू नहीं हो सकेगा, जिसके तहत नए एच-1बी वीजा आवेदन पर कंपनियों को भारी अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ता। चूंकि एच-1बी वीजा धारकों में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, इसलिए इस निर्णय को भारत के हजारों आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य कुशल कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने योजना को बताया संविधान के खिलाफ अमेरिकी जिला न्यायालय के न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का नया शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। अदालत ने माना कि यह कदम संविधान में निर्धारित शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय के जरिए इतनी बड़ी वित्तीय बाध्यता लागू नहीं की जा सकती, जब तक कि उसके लिए विधायी मंजूरी न हो। क्या था ट्रंप प्रशासन का प्रस्ताव? ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में घोषणा की थी कि नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करेंगी और स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। व्हाइट हाउस का दावा था कि एच-1बी कार्यक्रम का कुछ कंपनियों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है और कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी नागरिकों के अवसर प्रभावित किए जा रहे हैं। कंपनियों पर कई गुना बढ़ जाता आर्थिक बोझ इस नियम के लागू होने से पहले एच-1बी वीजा से जुड़ी सामान्य फीस और अन्य शुल्क मिलाकर कंपनियों को लगभग 2,000 से 5,000 डॉलर तक खर्च करना पड़ता था। नया नियम लागू होने की स्थिति में यह लागत सीधे 1 लाख डॉलर से अधिक हो जाती, जिससे विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करना अधिकांश कंपनियों के लिए बेहद महंगा हो जाता। विशेषज्ञों का मानना था कि इससे तकनीकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों पर गंभीर असर पड़ सकता था। राज्यों और उद्योग संगठनों ने दी थी चुनौती इस नीति को कैलिफोर्निया सहित 20 डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों ने अदालत में चुनौती दी थी। राज्यों का तर्क था कि राष्ट्रपति अकेले इस तरह का शुल्क नहीं लगा सकते और इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है। इसके अलावा कई उद्योग संगठनों, विश्वविद्यालयों और कारोबारी संस्थाओं ने भी इस फैसले का विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे पहले से मौजूद कुशल कर्मचारियों की कमी और बढ़ सकती है। छह महीने पहले आया था अलग फैसला दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले इसी मुद्दे पर एक अन्य संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया था। उस समय अदालत ने माना था कि राष्ट्रपति को ऐसे कदम उठाने का अधिकार प्राप्त है। बाद में अमेरिकी न्यायपालिका के अन्य फैसलों और संवैधानिक व्याख्याओं के आधार पर अदालत ने इस मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाया और अतिरिक्त शुल्क को अवैध करार दिया। भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों अहम है फैसला? एच-1बी वीजा अमेरिका में रोजगार पाने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य वीजा माना जाता है। हर साल जारी होने वाले एच-1बी वीजा में सबसे बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की होती है। भारत के आईटी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां इसी कार्यक्रम के माध्यम से अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं। इसके अलावा हजारों भारतीय इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, डॉक्टर, वित्त विशेषज्ञ और शोधकर्ता भी इसी वीजा के जरिए अमेरिका में काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लागू हो जाता, तो भारतीय पेशेवरों की भर्ती पर सीधा असर पड़ता और कई कंपनियां नए आवेदनों से बचतीं। अमेरिका में कितने लोग H-1B पर काम कर रहे हैं? उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में अमेरिका में लगभग 7.30 लाख एच-1बी वीजा धारक कार्यरत हैं। इनके अलावा करीब 5.50 लाख आश्रित सदस्य, जिनमें पति-पत्नी और बच्चे शामिल हैं, भी अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिकी कानून के तहत निजी क्षेत्र के लिए हर वर्ष 65,000 एच-1बी वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या उससे उच्च डिग्री प्राप्त करने वाले आवेदकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा निर्धारित हैं। आगे क्या होगा? अदालत के इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन की योजना पर तत्काल प्रभाव से रोक लग गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है। यदि मामला अपील में जाता है, तो एच-1बी वीजा को लेकर कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रह सकती है। फिलहाल अदालत के फैसले ने विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों और अमेरिका में अवसर तलाश रहे हजारों भारतीय पेशेवरों को बड़ी राहत दी है।
Tulsi Gabbard ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। गबार्ड ने कहा कि उनके पति Abraham Williams को हड्डियों के कैंसर की बेहद दुर्लभ बीमारी का पता चला है, जिसके बाद उन्होंने परिवार को प्राथमिकता देने का फैसला लिया। वह 30 जून तक डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) के पद पर बनी रहेंगी। ओवल ऑफिस में ट्रंप को दी जानकारी रिपोर्ट्स के मुताबिक Tulsi Gabbard ने शुक्रवार को ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति Donald Trump से मुलाकात कर अपने इस्तीफे की जानकारी दी। अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि इस कठिन समय में वह अपने पति के साथ रहना चाहती हैं और सार्वजनिक जीवन से कुछ समय के लिए पीछे हटना जरूरी है। पति को बताया सबसे बड़ा सहारा गबार्ड ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में उनके पति हर कठिन दौर में उनके साथ खड़े रहे। उन्होंने कहा कि सैन्य सेवा, चुनावी राजनीति और अमेरिकी खुफिया तंत्र की जिम्मेदारी संभालने तक हर चुनौती में Abraham Williams उनका सबसे बड़ा सहारा रहे। इसी वजह से वह उन्हें इस मुश्किल दौर में अकेला नहीं छोड़ सकतीं। ट्रंप ने की पुष्टि, नए कार्यवाहक DNI का ऐलान Donald Trump ने भी उनके इस्तीफे की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि गबार्ड अपने पति के इलाज और देखभाल के लिए पद छोड़ रही हैं। ट्रंप ने उम्मीद जताई कि अब्राहम जल्द स्वस्थ होंगे। साथ ही उन्होंने घोषणा की कि Aaron Lucas को कार्यवाहक DNI बनाया जाएगा। अमेरिकी नेताओं ने जताई संवेदना अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने गबार्ड को “सच्ची देशभक्त” बताते हुए कहा कि परिवार हमेशा पहले आता है। वहीं Lindsey Graham समेत कई नेताओं ने उनके परिवार के लिए प्रार्थना की। ईरान की प्रतिक्रिया ने खींचा ध्यान इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा ईरान की प्रतिक्रिया को लेकर हुई। Embassy of Iran in Armenia ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि तुलसी गबार्ड कई बार ईरान को लेकर ऐसी बातें कहती थीं जो ट्रंप प्रशासन को पसंद नहीं आती थीं। पोस्ट में उनके पति के जल्द स्वस्थ होने की कामना भी की गई। साथ ही दावा किया गया कि गबार्ड “कभी-कभी अमेरिका के हित में बोलती थीं, न कि इजरायल के प्रभाव में।” कौन हैं तुलसी गबार्ड? 43 वर्षीय Tulsi Gabbard अमेरिकी राजनीति की चर्चित हस्तियों में गिनी जाती हैं। वह अमेरिकी कांग्रेस में पहुंचने वाली पहली हिंदू नेता रही हैं। उनका जन्म अमेरिकन समोआ में हुआ था, लेकिन उनकी मां हिंदू धर्म से प्रभावित थीं और उन्होंने अपने बच्चों के नाम भारतीय परंपराओं से प्रेरित रखे। इसी वजह से भारत और भारतीय समुदाय के बीच तुलसी गबार्ड की खास पहचान रही है। कार्यकाल में लिए कई बड़े फैसले DNI रहते हुए गबार्ड ने अमेरिकी खुफिया तंत्र में कई बड़े बदलाव किए। उन्होंने: एजेंसी का आकार कम किया कई आंतरिक ढांचागत सुधार किए DEI (डाइवर्सिटी, इक्विटी और इंक्लूजन) कार्यक्रमों को खत्म किया लाखों सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक करवाए इन दस्तावेजों में 2016 अमेरिकी चुनाव में रूस हस्तक्षेप जांच और Assassination of John F. Kennedy से जुड़ी फाइलें भी शामिल थीं। ट्रंप प्रशासन में लगातार इस्तीफे गबार्ड का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन में लगातार बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। हाल के महीनों में कई वरिष्ठ अधिकारियों के इस्तीफे और बर्खास्तगी के बाद अब तुलसी गबार्ड का जाना भी अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।