पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सुरक्षा को लेकर अपना पहले का फैसला बदलते हुए दोनों की Z श्रेणी की सुरक्षा बहाल कर दी है। इसके साथ ही उन्हें बुलेटप्रूफ वाहन की सुविधा भी दोबारा उपलब्ध करा दी गई है। सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ समय पहले बंगला विवाद के दौरान दोनों की सुरक्षा घटा दी गई थी, जिसके बाद लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुरक्षा वापस लौटा दी थी। जानकारी के अनुसार जानकारी के अनुसार, अब दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को पहले की तरह Z कैटेगरी सुरक्षा मिलेगी। इस श्रेणी में लगभग 22 प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं। इनमें घर की सुरक्षा के लिए हथियारबंद गार्ड, 24 घंटे तैनात रहने वाले पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर (PSO), सुरक्षा वाहनों का काफिला और एक बुलेटप्रूफ कार शामिल होती है। सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य संभावित खतरों से वीआईपी व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। क्या है मामला ? दरअसल, राबड़ी देवी को सरकारी आवास खाली करने का नोटिस मिलने के बाद राज्य सरकार ने लालू परिवार की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। इसके बाद लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेज प्रताप यादव की सुरक्षा में कटौती कर दी गई थी। हालांकि, उस समय नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और सांसद मीसा भारती की सुरक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया था। सुरक्षा में कटौती के फैसले के विरोध में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने सरLकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुरक्षा लौटा दी थी। बाद में तेजस्वी यादव और मीसा भारती ने भी अपनी सुरक्षा वापस कर दी थी। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक गलियारों में काफी बयानबाजी और विवाद देखने को मिला था। अब बिहार सरकार द्वारा सुरक्षा बहाल किए जाने के बाद लालू प्रसाद और राबड़ी देवी को फिर से Z श्रेणी सुरक्षा और बुलेटप्रूफ वाहन की सुविधा मिल गई है। इसे राज्य सरकार के बदले हुए रुख के रूप में देखा जा रहा है, जबकि राजनीतिक हलकों में इस फैसले को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति का चर्चित 10 सर्कुलर रोड बंगला आखिरकार खाली हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने गुरुवार को अपने सरकारी आवास से सामान हटाना शुरू कर दिया है। लालू प्रसाद यादव के परिवार का सामान अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सरकारी आवास 1 पोलो रोड में शिफ्ट हो रहा है। पिछले कई दिनों से इस बंगले को लेकर सियासी विवाद जारी था। राजद का पावर सेंटर था दरअसल, पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड का सरकारी आवास पिछले 21 वर्षों से पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पास था। बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने यह बंगला राज्य सरकार के मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित कर दिया है। वहीं, राबड़ी देवी को बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते 39 हार्डिंग रोड स्थित दूसरा सरकारी आवास आवंटित किया गया था, लेकिन उन्होंने लंबे समय तक 10 सर्कुलर रोड खाली नहीं किया। बिहार की राजनीति में यह बंगला लंबे समय से राजद का पावर सेंटर रहा है। 15 दिनों का समय दिया गया था सरकार की ओर से बंगला खाली करने के लिए राबड़ी देवी को 15 दिनों का समय दिया गया था, जिसकी समय-सीमा 15 जून को समाप्त हो गई। इसके बाद 16 जून को उन्होंने लालू प्रसाद यादव के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए सरकार को समय बढ़ाने के लिए पत्र लिखा था। हालांकि अब 18 जून से बंगले से सामान हटाने का काम शुरू हो गया है और ट्रकों व अन्य वाहनों के जरिए सामान 1 पोलो रोड स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास में पहुंचाया जा रहा है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए कल 19 जून को चुनाव होंगे। इसमें दो सीटों के लिए तीन प्रत्याशी मैदान में हैं। इसलिए गुरुवार को वोटिंग होगी। बीजेपी के समर्थन से परिमल नाथवानी के निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने से मुकाबला रोचक बन गया है। नाथवानी 755 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। राजनीतिक गलियारे में माना जा रहा है कि वह ‘हिसाब-किताब’ करके मैदान में डटे हैं। उनके इस गणित को कांग्रेस हॉर्स ट्रेडिंग का नाम दे रही है। तेजस्वी के 4 विधायक सबसे अहम इंडी ब्लॉक के पास 56 विधायक हैं। अगर सब एकजुट रहे तो उनकी दोनों सीटों पर जीत तय है। नाथवानी या कांग्रेस के प्रणव झा जीतेंगे यह तेजस्वी के चार विधायक तय करेंगे। एक सीट जीतने के लिए चाहिए 28 विधायक राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 विधायक चाहिए। इंडी ब्लॉक के पास 56 विधायक हैं। इसके अनुसार सभी ने वोट दिए और कोई क्रॉस वोटिंग नहीं हुई, तो गठबंधन के दोनों उम्मीदवार जीत जाएंगे। लेकिन, भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी की मौजूदगी ने इस खेल को इतना सीधा और आसान नहीं रहने दिया है। क्या है संख्या बल? झारखंड में विधानसभा की कुल 81 सीटें हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 28 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोटों की जरूरत है। इंडिया ब्लॉक में शामिल झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और भाकपा माले के 2 विधायक हैं। दूसरी ओर NDA में भाजपा के 21, आजसू के 1, जेडीयू के 1 और LJP (R) के 1 विधायक हैं। कुल संख्या 24 हुई। इस हिसाब से NDA को चार विधायकों की जरूरत है। झामुमो के बैजनाथ राम की जीत पक्की हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली पार्टी झामुमो के उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत पक्की मानी जा रही है। उन्हें 28 वोट चाहिए और पार्टी के पास 34 विधायक हैं। मतलब जरूरत से 6 अधिक। इंडिया ब्लॉक की ओर से दूसरे उम्मीदवार कांग्रेस के प्रणव झा हैं। इनका मुकाबला परिमल नाथवानी से है। क्यों तेजस्वी यादव के हाथ आई जीत दिलाने की ताकत? कांग्रेस के प्रणव झा को जीत तभी मिलेगी, जब उन्हें झामुमो के बचे हुए 6, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और भाकपा माले के 2 विधायक वोट दें। दूसरी ओर नाथवानी को NDA के 24 विधायकों का वोट मिलना तय माना जा रहा है। ऐसे में इंडी ब्लॉक की पार्टियों के चार विधायक टूट जाते हैं और नाथवानी के समर्थन में वोट कर देते हैं, तो उनकी जीत हो जाएगी। बिहार में बीजेपी कर चुकी खेला तेजस्वी यादव की पार्टी राजद के चार विधायक हैं। इनके पास ताकत है कि नाथवानी या प्रणव में से किसी एक को जीत दिला दें। बिहार में भाजपा ने मार्च में हुए राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के विधायकों को तोड़कर पहले ही उदाहरण पेश कर दिया है। इधर, कांग्रेस के नेताओं ने पटना में तेजस्वी यादव से मुलाकात की है। उनसे राज्यसभा चुनाव में राजद के चारों विधायकों के वोट कांग्रेस उम्मीदवार को दिलाने की अपील की। क्या बिहार का बदला झारखंड में ले सकते हैं तेजस्वी? मार्च में बिहार में राज्यसभा की 5 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। सत्ताधारी गठबंधन NDA के पास 4 प्रत्याशी को जीत दिलाने लायक संख्या बल था। वहीं, विपक्ष की सभी पार्टियों के विधायक वोट देते तो महागठबंधन की ओर से राजद के उम्मीदवार ए़डी सिंह जीत सकते थे। 16 मार्च 2026 को मतदान हुए, नतीजे चौंकाने वाले आए। कांग्रेस के तीन विधायक गायब रहे। राजद के एक विधायक भी वोट डालने नहीं आए। इसके चलते एनडीए के 5वें उम्मीदवार को जीत मिल गई। बिहार में कांग्रेस के 6 विधायक हैं, इनमें से 3 ने राजद उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि क्या तेजस्वी बिहार में मिली हार का बदला झारखंड में कांग्रेस उम्मीदवार को हराकर ले सकते हैं। राहुल गांधी ने तीन बार हेमंत सोरेन से बात की ऐसा न हो इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व भी एक्टिव है। राहुल गांधी ने हेमंत सोरेन से तीन बार बात की है। बिहार में कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह के माध्यम से कांग्रेस नेतृत्व की बात तेजस्वी यादव से हुई है। दूसरी ओर एक चर्चा यह भी है कि NDA में भी टूट हो सकती है। विधायक सरयू राय की नाराजगी की खबर आती रहती है। परिमल को जिताने के लिए NDA के पास 2 ऑप्शन 1- RJD के चारों विधायकों को तोड़ लें। ऐसा करने पर NDA के 24 और राजद के 4 विधायक मिलकर 28 हो जाएंगे। वह कांग्रेस या भाकपा माले के विधायकों को अपने साथ लाने की कोशिश कर सकते हैं। उन्हें किसी तरह चार विधायकों का वोट चाहिए। 2- दूसरा विकल्प है कि 10 विधायकों को वोट नहीं देने या इस तरह मतदान करने के लिए मना लें कि उनके वोट रद्द हो जाएं। ऐसे में कुल वैध वोटों की संख्या 71 हो जाएगी। जीत के लिए जरूरी संख्या बल गिरकर 24 हो जाएगा।
पटना, एजेंसियां। बिहार में सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि लाभार्थियों के खातों में पहुंचने के साथ ही राजनीति गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने पेंशन भुगतान के लिए आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) से 3662 करोड़ रुपये निकाले जाने पर राज्य सरकार को घेरते हुए बिहार की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को भ्रामक और राजनीतिक बयानबाजी करार दिया है। 94 लाख से अधिक लाभार्थियों को मिली पेंशन बुधवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 94.29 लाख सामाजिक सुरक्षा पेंशनधारियों के बैंक खातों में 1100-1100 रुपये की राशि हस्तांतरित की। इस अवसर पर उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि हर महीने की 10 तारीख तक लाभार्थियों के खातों में पेंशन राशि समय पर पहुंचनी चाहिए। तेजस्वी ने पूछा- क्या बिहार आर्थिक संकट में है? कैबिनेट द्वारा आकस्मिकता निधि से 3662 करोड़ रुपये निकालने की मंजूरी के बाद तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर सरकार को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि इस निधि का उपयोग सामान्यतः प्राकृतिक आपदा, आपात स्थिति या अप्रत्याशित संकट के समय किया जाता है। ऐसे में नियमित पेंशन भुगतान के लिए इस फंड का इस्तेमाल राज्य की आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़े करता है। तेजस्वी ने दावा किया कि कई विकास योजनाओं का भुगतान लंबित है, ठेकेदारों के बिल अटके हुए हैं और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर भी असर पड़ रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से राज्य की वास्तविक आर्थिक स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की। भाजपा ने बताया संवैधानिक प्रक्रिया तेजस्वी के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि आकस्मिकता निधि से राशि लेना पूरी तरह संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया है। बाद में इस राशि का बजटीय समायोजन कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि बिहार की अर्थव्यवस्था मजबूत है और विकास कार्य लगातार जारी हैं। राजनीतिक बहस तेज पेंशन भुगतान को लेकर शुरू हुई यह बहस अब बिहार की आर्थिक स्थिति और सरकार की वित्तीय नीति पर केंद्रित हो गई है। विपक्ष जहां इसे आर्थिक संकट का संकेत बता रहा है, वहीं सरकार और भाजपा इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हुए विपक्ष पर भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और गर्मा सकता है।
पटना, एजेंसियां। बिहार विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में टिकट वितरण को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम ने एमएलसी टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस बीच तेज प्रताप यादव भी उनके समर्थन में सामने आए हैं और पार्टी के रवैये पर सवाल उठाए हैं। तेज प्रताप ने जताई नाराजगी तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर शिवचंद्र राम का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि शिवचंद्र राम वर्षों से पार्टी और समाज के लिए समर्पित भाव से काम करते रहे हैं। संत रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और समाज को जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तेज प्रताप ने कहा कि उनके साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया, वह निराशाजनक और निंदनीय है। सामाजिक न्याय की राजनीति में सभी वर्गों को सम्मान और उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भावुक हुए शिवचंद्र राम एमएलसी चुनाव के लिए आरजेडी उम्मीदवार के नामांकन के बाद शिवचंद्र राम की नाराजगी सार्वजनिक हो गई। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वे भावुक होकर रो पड़े। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें विधान परिषद भेजने का आश्वासन दिया था, लेकिन अंतिम समय में उनका नाम सूची से बाहर कर दिया गया। उन्होंने बताया कि इस घटनाक्रम से वे मानसिक रूप से बेहद आहत हैं। दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा बना चर्चा का केंद्र शिवचंद्र राम ने अपने इस्तीफे में दलित और रविदास समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि समाज के लोगों को उनसे बड़ी उम्मीदें थीं और टिकट नहीं मिलने से उनमें निराशा फैल गई है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल संगठनात्मक पद छोड़ा है, पार्टी नहीं। उन्होंने आरजेडी नेतृत्व से दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाने की मांग की। वहीं उन्होंने लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। राज्य सुरक्षा समिति की बैठक के बाद जारी आदेश के अनुसार दोनों नेताओं की Z+ श्रेणी की सुरक्षा वापस ले ली गई है। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें विशेष सुरक्षा व्यवस्था मिलती रहेगी। नई सुरक्षा व्यवस्था में क्या मिलेगा? सरकार के नए आदेश के मुताबिक लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को अब बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस के 2 से 8 जवान हाउस गार्ड के रूप में उपलब्ध रहेंगे। इसके अलावा पटना जिला बल के दो बॉडीगार्ड, बुलेटप्रूफ वाहन, एचक्यूआरटी पायलट और पुलिस एस्कॉर्ट की सुविधा भी जारी रहेगी। राबड़ी देवी की सुरक्षा में महिला अंगरक्षक की तैनाती भी बनी रहेगी। तेजस्वी यादव की सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की सुरक्षा व्यवस्था पहले की तरह बरकरार रखी गई है। उन्हें Y+ श्रेणी की सुरक्षा मिलती रहेगी। इस सुरक्षा व्यवस्था के तहत बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस के चार जवान, पटना जिला बल के छह बॉडीगार्ड, वाहन और एस्कॉर्ट सुविधा पहले की तरह उपलब्ध रहेंगे। तेज प्रताप यादव की सुरक्षा में कटौती लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की सुरक्षा में कटौती की गई है। अब तक उन्हें A श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त थी, लेकिन नए आदेश के बाद उनकी श्रेणी समाप्त कर दी गई है। अब उनकी सुरक्षा के लिए केवल एक व्यक्तिगत अंगरक्षक तैनात रहेगा। परिवार के अन्य सदस्यों की सुरक्षा यथावत राज्य सुरक्षा समिति के आदेश के अनुसार लालू परिवार के अन्य सदस्यों की सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। राज्यसभा सांसद मीसा भारती को तीन अंगरक्षक और राजश्री यादव को एक अंगरक्षक की सुविधा पहले की तरह मिलती रहेगी। सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
बिहार विधानसभा में आज होने वाला फ्लोर टेस्ट मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के लिए औपचारिकता हो सकता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav के लिए यह किसी बड़ी राजनीतिक परीक्षा से कम नहीं है। असली सवाल सरकार के बहुमत का नहीं, बल्कि RJD और महागठबंधन की एकजुटता का है। पिछले झटकों ने बढ़ाई चिंता तेजस्वी यादव के लिए चिंता की वजह भी साफ है। पिछले फ्लोर टेस्ट और राज्यसभा चुनाव में RJD के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग या पाला बदलकर महागठबंधन को बड़ा झटका दिया था। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे थे। 35 विधायकों को साथ रखना चुनौती इस समय महागठबंधन के पास सिर्फ 35 विधायक हैं। ऐसे में एक भी विधायक का टूटना विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है। तेजस्वी के सामने सरकार गिराने से ज्यादा अपनी टीम को एकजुट रखने की चुनौती है। सम्राट की जीत तय, तेजस्वी की साख दांव पर Samrat Choudhary के नेतृत्व वाली NDA सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है। ऐसे में फ्लोर टेस्ट का नतीजा लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन अगर महागठबंधन के सभी विधायक एकजुट रहते हैं, तो यह तेजस्वी के लिए बड़ी राजनीतिक जीत होगी। बिहार की राजनीति को मिलेगा बड़ा संदेश अगर इस बार भी कोई विधायक पाला बदलता है, तो इसका असर सिर्फ आज के फ्लोर टेस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह 2026 और आगे की बिहार राजनीति में तेजस्वी की रणनीति और पकड़ पर भी सवाल खड़े करेगा। इसलिए कहा जा रहा है कि यह सरकार का नहीं, बल्कि तेजस्वी यादव की साख का फ्लोर टेस्ट है।
बिहार के राज्यसभा चुनाव में सियासी खेल आखिरी वक्त में पूरी तरह पलट गया। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के उम्मीदवार एडी सिंह को हार का सामना करना पड़ा, जबकि NDA ने अप्रत्याशित तरीके से बाजी अपने नाम कर ली। इस हार के पीछे पार्टी के भीतर की रणनीतिक कमजोरी और नेतृत्व की जल्दबाजी को बड़ा कारण माना जा रहा है। नतीजों से पहले ही साफ हो गई थी तस्वीर चुनाव के नतीजे आने से पहले ही यह लगभग तय हो गया था कि तेजस्वी यादव के इकलौते उम्मीदवार की राह मुश्किल हो चुकी है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जिस तरह से विधायकों का समर्थन टूटता गया, उससे संकेत मिल गए थे कि परिणाम RJD के पक्ष में नहीं जाएगा। रणनीति में चूक और ‘जल्दबाजी’ बनी बड़ी वजह विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव ने चुनाव प्रबंधन में वही गलती दोहराई, जो पहले भी उनके लिए भारी पड़ चुकी है। AIMIM विधायकों का समर्थन मिलने के बाद उन्होंने जीत लगभग तय मान ली थी, लेकिन अंतिम समय में समीकरण बदल गए। इससे पहले भी विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने समय से पहले सरकार बनाने का दावा कर दिया था, जो बाद में उनके खिलाफ गया। इस बार भी कुछ वैसी ही स्थिति देखने को मिली। विधायकों का ‘गच्चा’, RJD को नहीं था अंदाजा RJD को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसके अपने एक विधायक और कांग्रेस के तीन विधायकों ने साथ नहीं दिया। पार्टी को इस तरह की अंदरूनी टूट की उम्मीद नहीं थी, जिससे पूरा गणित बिगड़ गया। राजनीतिक गलियारों में इसे NDA की सटीक रणनीति और विपक्ष की कमजोर पकड़ के रूप में देखा जा रहा है। फैसल रहमान की भूमिका पर उठे सवाल ढाका से RJD विधायक फैसल रहमान का समर्थन न मिलना भी चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। सवाल उठ रहा है कि खुद को मुस्लिम समुदाय का बड़ा चेहरा बताने वाले तेजस्वी यादव अपने ही विधायक को साथ रखने में क्यों असफल रहे। सूत्रों के अनुसार, फैसल रहमान की विधायकी को लेकर कानूनी चुनौती और कम अंतर से जीत जैसे कारण उनके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस की अनुपस्थिति से बिगड़ा खेल इस चुनाव में कांग्रेस के कुछ विधायकों की गैरहाजिरी भी RJD के लिए भारी पड़ी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखी, जिससे विपक्ष की पूरी रणनीति कमजोर पड़ गई। NDA की चाल के आगे RJD बेबस जहां RJD अपने समीकरण को लेकर आश्वस्त दिख रही थी, वहीं NDA ने आखिरी वक्त में ऐसी रणनीति अपनाई कि पूरा खेल बदल गया। इसे राजनीतिक ‘चेकमेट’ की तरह देखा जा रहा है, जहां विपक्ष को संभलने का मौका ही नहीं मिला। भविष्य की राजनीति पर असर यह हार सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि RJD की रणनीति और नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है। आने वाले चुनावों में तेजस्वी यादव के लिए यह एक बड़ी सीख मानी जा रही है कि केवल समर्थन जुटाना ही नहीं, बल्कि उसे अंत तक बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।