पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच मोजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के नए सुप्रीम लीडर एक घातक एयरस्ट्राइक में गंभीर रूप से घायल हो गए थे और अब भी उनका इलाज जारी है। इसके बावजूद वह देश के अहम फैसलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एयरस्ट्राइक में लगीं गंभीर चोटें सूत्रों के अनुसार, 28 फरवरी को तेहरान में सुप्रीम लीडर के परिसर पर हुए हमले में मोजतबा खामेनेई बुरी तरह घायल हो गए थे। इस हमले में उनके पिता अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो गई थी, जबकि परिवार के कई अन्य सदस्य भी मारे गए। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि: उनके चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं, जिससे चेहरा विकृत हो गया एक या दोनों पैरों में गंभीर चोट लगी, यहां तक कि एक पैर खोने की आशंका जताई गई वह अभी भी रिकवरी के दौर में हैं पर्दे के पीछे से संभाल रहे कमान शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद मोजतबा खामेनेई मानसिक रूप से सक्रिय बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह: ऑडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं युद्ध और कूटनीतिक फैसलों में भागीदारी कर रहे हैं अमेरिका के साथ वार्ता जैसे अहम मुद्दों पर अपनी राय दे रहे हैं हालांकि, 8 मार्च को सुप्रीम लीडर बनने के बाद से अब तक उनकी कोई सार्वजनिक तस्वीर या वीडियो सामने नहीं आया है, जिससे उनकी स्थिति को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। सत्ता संतुलन में बदलाव के संकेत विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की सत्ता संरचना में इस समय बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। देश में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका और प्रभाव पहले से ज्यादा मजबूत होता दिख रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, मोजतबा खामेनेई को अपने पिता जैसी पकड़ बनाने में समय लग सकता है और फिलहाल सत्ता कई केंद्रों में बंटी हुई नजर आ रही है। वार्ता पर भी असर यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है। ऐसे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व की स्थिति वार्ता के परिणाम को भी प्रभावित कर सकती है। अनिश्चितता और सवाल सरकारी स्तर पर अब तक उनकी सेहत को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है। वहीं, सोशल मीडिया पर उनकी स्थिति को लेकर कई तरह की अटकलें और सवाल उठ रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बेहद संवेदनशील मोड़ पर पश्चिम एशिया में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। एक ओर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान में ताजा हमला कर दिया है। इस हमले में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई है, जिससे क्षेत्र में शांति प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान के नबातीह क्षेत्र के मेफादौन कस्बे में एक रिहायशी इमारत को निशाना बनाया। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में दो सप्ताह के संघर्षविराम (सीजफायर) को स्थायी रूप देने के लिए बातचीत की उम्मीदें जताई जा रही थीं। वार्ता पर मंडराया संकट इस पूरे घटनाक्रम ने इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर डाल दिया है। ईरान का दावा है कि हालिया सीजफायर में लेबनान भी शामिल था, जबकि इजरायल और अमेरिका इस दावे को खारिज करते रहे हैं। यही मतभेद अब शांति वार्ता के एजेंडे का सबसे बड़ा विवाद बनता दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, लेबनान को लेकर बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने पहले वार्ता में शामिल होने से हिचक दिखाई थी। हालांकि, इजरायल द्वारा बातचीत के संकेत देने के बाद ईरान वार्ता के लिए तैयार हुआ। 14 अप्रैल को नई उम्मीद इस बीच, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने घोषणा की है कि 14 अप्रैल से इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत शुरू हो सकती है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में होने की संभावना है। जंग का बड़ा असर 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद से लेबनान में हालात बेहद खराब हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 1,900 लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है और वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। क्या आगे बढ़ेगी शांति प्रक्रिया? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकती, तो अमेरिका-ईरान वार्ता का सकारात्मक परिणाम निकलना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र स्थिरता की ओर बढ़ेगा या फिर एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर लौटेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता से ठीक पहले एक भावनात्मक और तनावपूर्ण दृश्य सामने आया, जिसने पूरे कूटनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया। ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf जब इस्लामाबाद पहुंचे, तो वे केवल वार्ता के एजेंडे के साथ नहीं, बल्कि मीनाब हमले में मारे गए मासूम बच्चों की यादों को भी अपने साथ लेकर आए। मीनाब हमले का दर्द फिर आया सामने फरवरी में ईरान के मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए भीषण हमले में 165 से अधिक बच्चियों की मौत हो गई थी। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब, जब शांति वार्ता की कोशिशें तेज हुई हैं, ईरान ने इस दर्दनाक घटना को फिर से दुनिया के सामने रखा है। इस्लामाबाद की यात्रा के दौरान गालिबाफ अपने साथ उन बच्चों की तस्वीरें, खून से सने स्कूल बैग और जूते लेकर पहुंचे। विमान में इन सामानों को सीटों पर रखकर वे उन्हें लगातार निहारते रहे। यह दृश्य न केवल व्यक्तिगत शोक का प्रतीक था, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी था कि ईरान इस त्रासदी को भूला नहीं है। वार्ता से पहले भावनात्मक संदेश या रणनीतिक संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल संवेदनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी हो सकता है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि शांति वार्ता सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि उन जख्मों को भी संबोधित करने की प्रक्रिया है, जो युद्ध ने छोड़े हैं। ईरान ने इस हमले के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि अमेरिका की ओर से इस दावे को खारिज करते हुए कहा गया कि निशाना सैन्य ठिकाने थे, न कि स्कूल। क्या आसान होगी शांति की राह? इस बीच, Donald Trump प्रशासन की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान जल्द से जल्द समझौते की दिशा में आगे बढ़े। लेकिन गालिबाफ की यह पहल साफ संकेत देती है कि तेहरान बिना ठोस आश्वासन और न्याय के किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक असर ईरान-अमेरिका के बीच जारी यह टकराव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद में हो रही वार्ता बेहद अहम मानी जा रही है। हालांकि, मीनाब हमले की यादें और उससे जुड़ा दर्द यह साफ कर रहा है कि शांति की राह आसान नहीं होगी। यह वार्ता केवल कूटनीति नहीं, बल्कि भावनाओं, विश्वास और न्याय के बीच संतुलन की परीक्षा भी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।