मुंबई, एजेंसियां। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर पंजाब की राजनीति गरमा गई है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी इस फिल्म का प्रदर्शन पंजाब के हर गांव और कोने में करेगी। यह फिल्म पहले ‘पंजाब ’95’ नाम से बनाई गई थी और 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर बिना किसी कट के रिलीज हुई थी। हालांकि, दो दिन बाद ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया, जिसके बाद विवाद और गहरा गया।
सुखबीर सिंह बादल ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह फिल्म कांग्रेस शासन के दौरान सिख समुदाय पर हुए कथित अत्याचारों और जसवंत सिंह खालरा के संघर्ष को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को उस दौर के इतिहास से परिचित कराने के लिए अकाली दल राज्यभर में फिल्म का प्रदर्शन करेगा। बादल ने आरोप लगाया कि उस समय हुए घटनाक्रम को दबाने की कोशिश की जा रही है और उनकी पार्टी ऐसा नहीं होने देगी।
फिल्म के ओटीटी से हटाए जाने को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज किया, जिनमें केंद्र सरकार या भाजपा पर फिल्म हटवाने का आरोप लगाया गया था। उन्होंने कहा कि यह मामला राजनीतिक रंग देने की कोशिश है और फिल्म में दिखाया गया दौर कांग्रेस शासन का था।
इस बीच पंजाब भाजपा ने बताया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म को ओटीटी से हटाने के मामले की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है।
हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। खालरा ने 1984 से 1994 के दौरान पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के मामलों की जांच की थी। वर्ष 1995 में उनके लापता होने के बाद 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को उनके अपहरण और हत्या का दोषी ठहराया गया था।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। वेब सीरीज 'मिर्जापुर' में बीना त्रिपाठी के दमदार किरदार से लोकप्रिय हुईं अभिनेत्री रसिका दुग्गल ने खुलासा किया है कि यह भूमिका उन्हें बेहद नाटकीय परिस्थितियों में मिली थी। उन्होंने बताया कि एक साधारण-सा मैसेज उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यदि उन्होंने वह पहल नहीं की होती, तो संभव है कि यह किरदार उनके हाथ से निकल जाता। रसिका ने एक बातचीत में बताया रसिका ने एक बातचीत में बताया कि फिल्म 'मंटो' उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट रही, क्योंकि उस समय वह लगातार रिजेक्शन का सामना कर रही थीं। उन्होंने कहा कि 'किस्सा' और 'मंटो' के बीच लंबे अंतराल में उन्हें पर्याप्त काम नहीं मिला। इस दौरान कई बार उनके मन में यह सवाल उठता था कि आगे का रास्ता क्या होगा और नए अवसर कैसे मिलेंगे। इसी बीच उन्हें पता चला कि निर्देशक करण अंशुमान एक नई वेब सीरीज पर काम कर रहे हैं। शुरुआत में रसिका को लगा कि यदि निर्देशक उन्हें कास्ट करना चाहेंगे तो स्वयं संपर्क करेंगे। हालांकि, एक दोस्त की सलाह पर उन्होंने करण अंशुमान को मैसेज भेज दिया। रसिका के मुताबिक, एक मिनट के भीतर जवाब आया और मुलाकात तय हो गई। मुलाकात के दौरान करण मुलाकात के दौरान करण अंशुमान ने बताया कि उन्होंने पहले संपर्क इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें लगा था कि 'मंटो' में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ काम करने के बाद रसिका शायद केवल फिल्मों में ही रुचि रखेंगी। लेकिन जब रसिका ने बीना त्रिपाठी का किरदार पढ़ा, तो वह बेहद उत्साहित हो गईं। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें लगातार यह डर बना रहा कि कहीं निर्माताओं का फैसला बदल न जाए। रीडिंग के दौरान भी वह इस बात को लेकर नर्वस रहती थीं कि क्या वह इस चुनौतीपूर्ण भूमिका के साथ पूरा न्याय कर पाएंगी। वर्क फ्रंट की बात करें तो रसिका दुग्गल एक बार फिर 'मिर्जापुर: द मूवी' में बीना त्रिपाठी के किरदार में नजर आएंगी। यह फिल्म 4 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी और दर्शकों के बीच इसे लेकर पहले से ही काफी उत्साह है।
भुवनेश्वर, एजेंसियां। भगवान जगन्नाथ के जीवन और परंपराओं पर आधारित फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज़ कानूनी विवाद में फंस गई है। रिलीज़ से ठीक पहले ओडिशा हाईकोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके बाद फिल्म के निर्माता राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। इस मामले पर अब देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई होने की उम्मीद है। हाईकोर्ट ने क्यों लगाई रोक? फिल्म के खिलाफ दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि इसमें भगवान जगन्नाथ और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं के कुछ दृश्य और प्रस्तुतिकरण विवादित हैं, जिससे श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। इन दलीलों को देखते हुए ओडिशा हाईकोर्ट ने अंतिम निर्णय तक फिल्म की रिलीज़ पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट पहुंचे निर्माता हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिल्म के निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मेकर्स का कहना है कि फिल्म ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तथ्यों पर आधारित है तथा इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। उन्होंने सर्वोच्च अदालत से हाईकोर्ट के आदेश पर तत्काल राहत देने की मांग की है। फिल्म इंडस्ट्री की नजर सुनवाई पर इस मामले पर फिल्म जगत और दर्शकों की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि कोर्ट राहत देता है तो फिल्म की रिलीज़ का रास्ता साफ हो सकता है, जबकि रोक बरकरार रहने की स्थिति में इसकी रिलीज़ आगे टल सकती है। फैसले से तय होगी रिलीज़ की राह फिलहाल 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज़ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर है। अदालत के अगले आदेश के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि फिल्म तय तारीख पर सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी या नहीं।
नई दिल्ली: हॉलीवुड के दिग्गज फिल्म निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन एक बार फिर अपनी नई फिल्म 'द ओडिसी' को लेकर चर्चा में हैं। यह बहुप्रतीक्षित फिल्म 17 जुलाई 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। जटिल कहानियों को शानदार सिनेमाई अनुभव में बदलने वाले नोलन को आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली फिल्म निर्माताओं में गिना जाता है। पिछले 28 वर्षों में उन्होंने केवल 13 फिल्में निर्देशित की हैं, लेकिन उनकी लगभग हर फिल्म ने आलोचकों और दर्शकों दोनों का दिल जीता है। उनकी फिल्मों ने दुनिया भर में 6.1 बिलियन डॉलर (करीब ₹51,000 करोड़) से अधिक की कमाई की है। यही वजह है कि क्रिस्टोफर नोलन दुनिया के सबसे सफल और सबसे ज्यादा कमाई करने वाले निर्देशकों में शामिल हैं। क्रिस्टोफर नोलन का शानदार सफर 30 जुलाई 1970 को जन्मे क्रिस्टोफर एडवर्ड नोलन ब्रिटिश-अमेरिकी फिल्म निर्देशक, लेखक और निर्माता हैं। वे अपनी अनोखी कहानी कहने की शैली, समय के साथ खेलने वाली पटकथाओं और गहरी मनोवैज्ञानिक फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। नोलन अब तक दो ऑस्कर, दो बाफ्टा और एक गोल्डन ग्लोब पुरस्कार जीत चुके हैं। उन्हें कई बार ऑस्कर, बाफ्टा और गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित भी किया गया है। वर्ष 2015 में टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया था, जबकि 2024 में उन्हें ब्रिटेन की ओर से 'नाइट' की उपाधि से सम्मानित किया गया। सबसे ज्यादा कमाई करने वाली 5 फिल्में द डार्क नाइट राइजेज (2012) – ₹9,070 करोड़ द डार्क नाइट (2008) – ₹8,390 करोड़ ओपेनहाइमर (2023) – ₹8,160 करोड़ इंसेप्शन (2010) – ₹6,990 करोड़ इंटरस्टेलर (2014) – ₹6,460 करोड़ क्रिस्टोफर नोलन की 10 सबसे बेहतरीन फिल्में 1. द डार्क नाइट (2008) IMDb रेटिंग: 9.1 बैटमैन और जोकर की टक्कर पर आधारित यह सुपरहीरो फिल्म आज भी दुनिया की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। हीथ लेजर का जोकर आज भी सिनेमा इतिहास के सबसे यादगार किरदारों में शामिल है। 2. इंसेप्शन (2010) IMDb रेटिंग: 8.8 सपनों की दुनिया और वास्तविकता के बीच घूमती यह साइंस-फिक्शन थ्रिलर नोलन की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है। इसकी कहानी और क्लाइमैक्स आज भी दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। 3. इंटरस्टेलर (2014) IMDb रेटिंग: 8.7 मानव सभ्यता के भविष्य, अंतरिक्ष यात्रा और भावनाओं को जोड़ती यह फिल्म विज्ञान और भावनात्मक कहानी का बेहतरीन मिश्रण है। इसे आधुनिक दौर की सर्वश्रेष्ठ साइंस-फिक्शन फिल्मों में गिना जाता है। 4. द प्रेस्टिज (2006) IMDb रेटिंग: 8.5 दो जादूगरों की प्रतिस्पर्धा, जुनून और बदले की कहानी पर आधारित यह साइकोलॉजिकल थ्रिलर अपने अप्रत्याशित अंत के लिए मशहूर है। 5. द डार्क नाइट राइजेज (2012) IMDb रेटिंग: 8.4 बैटमैन ट्रिलॉजी का शानदार समापन। इस फिल्म में बैटमैन का सामना खतरनाक विलेन बेन से होता है, जो पूरे गोथम शहर को तबाह करने की योजना बनाता है। 6. मेमेंटो (2000) IMDb रेटिंग: 8.4 शॉर्ट-टर्म मेमोरी लॉस से जूझ रहे एक व्यक्ति की कहानी, जो अपनी पत्नी के हत्यारे की तलाश में है। इसकी नॉन-लीनियर कहानी इसे सिनेमा की सबसे अनोखी फिल्मों में शामिल करती है। 7. बैटमैन बिगिन्स (2005) IMDb रेटिंग: 8.2 बैटमैन की शुरुआत की कहानी दिखाने वाली यह फिल्म सुपरहीरो शैली को एक नया आयाम देने के लिए जानी जाती है। 8. ओपेनहाइमर (2023) IMDb रेटिंग: 8.2 परमाणु बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के जीवन पर आधारित यह फिल्म नोलन के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही। इसने कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते। 9. डनकर्क (2017) IMDb रेटिंग: 7.8 द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म युद्ध के भयावह माहौल और सैनिकों के संघर्ष को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाती है। 10. फॉलोइंग (1998) IMDb रेटिंग: 7.4 नोलन की पहली फीचर फिल्म, जिसने उनके अनोखे निर्देशन और कहानी कहने की शैली की झलक दुनिया को दिखाई। पूरी फिल्मोग्राफी फॉलोइंग (1998) मेमेंटो (2000) इंसोम्निया (2002) बैटमैन बिगिन्स (2005) द प्रेस्टिज (2006) द डार्क नाइट (2008) इंसेप्शन (2010) द डार्क नाइट राइजेज (2012) इंटरस्टेलर (2014) डनकर्क (2017) टेनेट (2020) ओपेनहाइमर (2023) द ओडिसी (2026)