हजारीबाग: झारखंड के हजारीबाग जिले के बरकट्ठा प्रखंड में गुरुवार को एक दर्दनाक हादसा हो गया। बंद पड़े एक अवैध पत्थर खदान में नहाने के दौरान 13 वर्षीय बच्चे की डूबने से मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे गांव में मातम का माहौल है।
मृतक की पहचान धरहरा बदाही गांव निवासी सौरभ कुमार के रूप में हुई है, जो संतोष कुमार का पुत्र था। बताया जा रहा है कि गुरुवार दोपहर करीब तीन बजे सौरभ अपने कुछ दोस्तों के साथ ग्राम पंचरुखी तिलैया स्थित महाबर पहाड़ के पास बंद पड़े पत्थर खदान में जमा पानी में नहाने गया था। इसी दौरान वह गहरे पानी में चला गया और डूब गया।
घटना के बाद वहां मौजूद अन्य बच्चों ने शोर मचाया और तुरंत गांव जाकर सौरभ के परिजनों को सूचना दी। खबर मिलते ही परिवार के लोग और ग्रामीण घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जुट गई। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर बच्चे को खोजने की कोशिश की, लेकिन खदान में भरे गहरे पानी और खतरनाक हालात के कारण उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
घटना की सूचना मिलते ही बरकट्ठा थाना पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। पुलिस और ग्रामीणों ने मिलकर खदान में डूबे बच्चे की तलाश शुरू की। खदान में काफी गहराई तक पानी भरा होने के कारण शव को बाहर निकालने में काफी परेशानी हो रही थी। समाचार लिखे जाने तक शव को बाहर निकालने के प्रयास जारी थे।
इस दर्दनाक घटना के बाद सौरभ के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। बताया जा रहा है कि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। बेटे की मौत की खबर सुनते ही उसकी मां बेसुध हो गई, वहीं परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव में भी शोक का माहौल बना हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार सौरभ पढ़ाई में भी अच्छा था और परिवार की उम्मीदों का सहारा था।
ग्रामीणों ने बताया कि सौरभ के पिता संतोष कुमार मजदूरी के लिए गुजरात में रहते हैं और करीब दस से पंद्रह दिन पहले ही काम के सिलसिले में वहां गए थे। बेटे की मौत की सूचना उन्हें फोन पर दी गई है।
घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि बंद पड़े अवैध खदानों को सुरक्षित किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की दर्दनाक घटनाओं को रोका जा सके।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
दुमका। दुमका स्थित बासुकिनाथ धाम में बुधवार को श्रद्धा और भक्ति का अनूठा दृश्य देखने को मिला। शिवगंगा कुंड की सफाई के दौरान वर्षों से जलमग्न रहने वाले स्वयंभू पाताल महादेव (पाताल बाबा) के दर्शन होने पर हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए उमड़ पड़े। ज्येष्ठ माह के अधिकमास की दशमी तिथि पर दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे भक्तों ने कतारबद्ध होकर बाबा के दर्शन किए और सुख-समृद्धि की कामना की। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ विशेष पूजन पाताल बाबा के प्रकट होने के बाद मंदिर के पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार और षोडशोपचार विधि से विशेष पूजा-अर्चना एवं भव्य श्रृंगार किया। सुरक्षा व्यवस्था के बीच श्रद्धालुओं ने शिवगंगा कुंड में उतरकर जलार्पण किया। भक्तों का कहना था कि यह दुर्लभ अवसर वर्षों बाद मिला है, क्योंकि शिवगंगा में जल भर जाने के बाद पाताल महादेव फिर लंबे समय तक जलमग्न हो जाते हैं। 300 वर्ष पुरानी है पाताल बाबा की मान्यता स्थानीय मान्यताओं के अनुसार शिवगंगा कुंड की तलहटी में स्थित स्वयंभू शिवलिंग का इतिहास लगभग 300 वर्ष पुराना है। श्रद्धालु इन्हें ‘पाताल बाबा’ के नाम से जानते हैं। यह शिवलिंग सामान्यतः पूरे वर्ष जल में डूबा रहता है और केवल सफाई या जलस्तर कम होने पर ही दर्शन देता है। लोगों की मान्यता है कि वर्षों तक पानी में रहने के बावजूद बाबा पर चढ़ाए गए बिल्वपत्र, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री सुरक्षित रहती है और खराब नहीं होती, जिसे श्रद्धालु भगवान की दिव्य महिमा मानते हैं। हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजा धाम पाताल बाबा के दर्शन के साथ-साथ प्रसिद्ध बाबा फौजदारीनाथ मंदिर में भी दिनभर भक्तों की भारी भीड़ रही। श्रद्धालुओं ने भोलेनाथ को बेलपत्र, भांग, धतूरा और पुष्प अर्पित किए। महाआरती के दौरान शंखनाद, डमरू और घंटियों की गूंज से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से बासुकिनाथ धाम का वातावरण पूरी तरह शिवमय नजर आया।
रांची। झारखंड में बुधवार, 10 जून से बालू खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश के तहत राज्य की सभी नदियों से 15 अक्टूबर 2026 तक बालू उत्खनन नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही राज्य के सभी 444 बालू घाट अगले चार महीनों के लिए बंद कर दिए गए हैं। इस निर्णय का सबसे अधिक असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। निर्माण कार्यों की रफ्तार पर पड़ेगा असर बालू खनन बंद होने के बाद अब सरकारी और निजी निर्माण कार्य पहले से जमा स्टॉक और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर रहेंगे। राजधानी रांची सहित कई जिलों में मकान, सड़क, पुल और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए प्रतिदिन बड़ी मात्रा में बालू की आवश्यकता होती है। ऐसे में आने वाले दिनों में इसकी उपलब्धता चुनौती बन सकती है। कीमतों में बढ़ोतरी के संकेत प्रतिबंध लागू होने से पहले ही बाजार में बालू की कीमतों में बढ़ोतरी के संकेत मिलने लगे थे। कई इलाकों में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा अतिरिक्त दर वसूली की शिकायतें सामने आई हैं। वहीं, ठेकेदारों और कारोबारियों ने संभावित संकट को देखते हुए बड़े पैमाने पर बालू का भंडारण भी किया है। 35 घाटों की योजना अधूरी, केवल 14 से हुआ उठाव राज्य सरकार ने मानसून प्रतिबंध से पहले 35 बालू घाटों को चालू करने की योजना बनाई थी, ताकि पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराया जा सके। हालांकि पर्यावरणीय स्वीकृति और अन्य प्रक्रियाओं में देरी के कारण केवल 14 घाटों से ही नियमित बालू उठाव शुरू हो पाया। वर्तमान में रांची, दुमका, गोड्डा, पूर्वी सिंहभूम, रामगढ़ और हजारीबाग के कुछ घाटों से ही खनन हो रहा था। अवैध खनन और कालाबाजारी पर प्रशासन सख्त प्रतिबंध अवधि में अवैध उत्खनन और कालाबाजारी की आशंका को देखते हुए प्रशासन सतर्क हो गया है। रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने खनन विभाग को विशेष निगरानी रखने का निर्देश दिया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अवैध खनन, परिवहन या भंडारण करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। चार महीने तक लागू यह प्रतिबंध बालू बाजार और निर्माण गतिविधियों की दिशा तय करेगा।
रांची। झारखंड के पाकुड़ जिले में एक दर्दनाक सड़क हादसे में बारातियों से भरी बस पलट गई, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई जबकि 33 लोग घायल हो गए। यह दुर्घटना अमड़ापाड़ा प्रखंड के मालीपाड़ा गांव के पास देर रात करीब एक बजे हुई। हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी और चीख-पुकार मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। मृतकों की पहचान 64 वर्षीय ओलेन मुर्मू और 16 वर्षीय राजेश टुडू के रूप में हुई है। हादसे में घायल हुए सभी लोगों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज जारी है। बारात से लौटते समय हुआ हादसा जानकारी के अनुसार, महेशपुर प्रखंड के परियारदाहा गांव से एक बारात गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी गांव गई थी। बारात से लौटते समय अमड़ापाड़ा-सिंगारसी मुख्य सड़क पर मालीपाड़ा गांव के निकट चालक का वाहन पर नियंत्रण बिगड़ गया, जिसके बाद बस सड़क किनारे पलट गई। प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों के अनुसार बस तेज रफ्तार में चल रही थी। अचानक संतुलन बिगड़ने से बस पलट गई और कई यात्री सीटों तथा बस के अन्य हिस्सों के नीचे दब गए। हादसे के बाद स्थानीय लोगों और पुलिस ने मिलकर यात्रियों को बाहर निकाला। पांच गंभीर घायलों को किया गया रेफर अमड़ापाड़ा थाना प्रभारी अनूप रोशन भेंगरा ने बताया कि दुर्घटना में 33 महिलाएं और पुरुष घायल हुए हैं। सभी को पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। इनमें से पांच लोगों की हालत गंभीर होने के कारण उन्हें बेहतर इलाज के लिए दुमका अस्पताल रेफर किया गया है। हालांकि चिकित्सकों के अनुसार सभी घायल फिलहाल खतरे से बाहर हैं। पुलिस की तत्परता से बचीं कई जानें स्थानीय ग्रामीणों ने पुलिस की त्वरित कार्रवाई की सराहना की है। लोगों का कहना है कि ग्रामीणों के पहुंचने से पहले ही पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई थी और घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीणों के अनुसार यदि समय पर राहत कार्य नहीं होता तो मृतकों की संख्या और बढ़ सकती थी। पुलिस हादसे के कारणों की जांच में जुटी हुई है।