शिमला। हिमाचल प्रदेश में मिड-डे मील वर्कर्स ने सोमवार को अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदेशव्यापी हड़ताल की, जिसके चलते सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए मिड-डे मील तैयार नहीं हो सका। सीटू (CITU) से संबद्ध मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन के बैनर तले हजारों कर्मचारियों ने शिमला में टालैंड से सचिवालय तक रोष रैली निकालकर केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। कई स्कूलों में शिक्षकों ने अपने स्तर पर बच्चों के भोजन की व्यवस्था की।
हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें पूरे वर्ष काम करने के बावजूद केवल सीमित अवधि का भुगतान मिलता है। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले के अनुरूप 12 महीने का वेतन देने, हरियाणा की तर्ज पर 7,000 रुपये मासिक मानदेय, ग्रेच्युटी, पेंशन और नियमित सेवा नीति लागू करने की मांग उठाई। साथ ही आंगनबाड़ी कर्मचारियों की तरह अवकाश सुविधा देने की भी मांग की गई।
यूनियन का आरोप है कि पिछले 17 वर्षों में केंद्र सरकार ने उनके मानदेय में कोई वृद्धि नहीं की। वहीं राज्य सरकार भी कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान को लेकर गंभीर नहीं है। उनका कहना है कि कई बार तीन-तीन महीने तक वेतन नहीं मिलता और भुगतान भी किस्तों में किया जाता है। इसके अलावा साल में तीन बार अनिवार्य मेडिकल जांच का खर्च भी कर्मचारियों को स्वयं वहन करना पड़ता है।
मिड-डे मील वर्कर्स ने 25 विद्यार्थियों की न्यूनतम संख्या की शर्त समाप्त करने की भी मांग की है। उनका कहना है कि छात्र संख्या कम होने पर कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं, जिससे उनकी आजीविका प्रभावित होती है।
यूनियन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और व्यापक एवं उग्र किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य और मत्स्य पालन राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा मंजूर किया गया। राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बाद छोड़ा पद जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा सदस्य के रूप में कार्यकाल समाप्त हो गया था। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, संसद सदस्य नहीं रहने की स्थिति में उन्हें केंद्रीय मंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया। कौन हैं जॉर्ज कुरियन? 65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह 1980 में पार्टी की स्थापना के समय से ही भाजपा से जुड़े हुए हैं और लंबे समय से संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। राजनीति के अलावा उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता (वकील) के रूप में भी कार्य किया है। अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के दौरान उन्हें केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य और मत्स्य पालन राज्य मंत्री बनाया गया था। वह केंद्र सरकार में ईसाई समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे। दोबारा राज्यसभा नहीं भेजे गए जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद पार्टी ने उन्हें दोबारा उच्च सदन के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केरल में पार्टी के अपेक्षित प्रदर्शन नहीं करने और बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजने का फैसला नहीं लिया गया। रवनीत सिंह बिट्टू भी नहीं बने उम्मीदवार गौरतलब है कि 18 जून को हुए राज्यसभा चुनावों में केंद्र सरकार के दो मंत्रियों- जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इसके बाद जॉर्ज कुरियन का मंत्री पद से हटना तय माना जा रहा था। जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के बाद अब केंद्र सरकार में उनके विभागों की जिम्मेदारियों को लेकर नई नियुक्तियों और फेरबदल पर नजरें टिकी हुई हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड की जांच तेज हो गई है। मंगलवार को विशेष जांच दल (एसआईटी) और फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम घटनास्थल पर पहुंची और साक्ष्य जुटाने के लिए पूरी इमारत को सील कर दिया। हादसे में 15 छात्रों की दर्दनाक मौत के बाद प्रशासन हर पहलू की गहन जांच कर रहा है। शुरुआती जांच में एसी के कंप्रेसर फटने और शॉर्ट सर्किट को आग लगने की संभावित वजह माना जा रहा है, हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। सात दिन में रिपोर्ट सौंपेगी एसआईटी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गठित एसआईटी में संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और एडीजी जोन प्रवीण कुमार शामिल हैं। टीम को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने भी अलग से पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है। चार अधिकारी निलंबित, चार आरोपी गिरफ्तार प्राथमिक जांच में लापरवाही सामने आने पर बिजली विभाग, फायर विभाग और एलडीए के चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। वहीं पुलिस ने इमारत मालिक, पेट शॉप संचालक, एनीमेशन सेंटर संचालक और एक किरायेदार समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है। दो अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। वेयरहाउस से शुरू हुई थी आग सोमवार दोपहर अलीगंज स्थित बहुमंजिला इमारत के प्रथम तल पर बने वेयरहाउस में आग लगने की सूचना मिली थी। देखते ही देखते आग पूरी बिल्डिंग में फैल गई। दूसरी और तीसरी मंजिल पर कोचिंग सेंटर, एनीमेशन ट्रेनिंग सेंटर और गेमिंग जोन संचालित थे, जहां कई छात्र फंस गए। 15 छात्रों की मौत, कई घायल दमकल, पुलिस और एसडीआरएफ की टीमों ने घंटों तक रेस्क्यू अभियान चलाया, लेकिन तब तक 15 छात्रों की जान जा चुकी थी। कई छात्र गंभीर रूप से झुलस गए, जबकि जान बचाने के लिए इमारत से कूदने वाले नौ छात्रों का इलाज अस्पताल में चल रहा है। हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है।
लखनऊ: राजधानी लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के बाद अब इमारत से जुड़े पुराने दस्तावेज और प्रशासनिक कार्रवाई गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस इमारत में यह दर्दनाक हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के आरोप में ध्वस्तीकरण (डिमोलिशन) का आदेश जारी किया गया था। दो महीने से भी कम समय के भीतर यह आदेश वापस ले लिया गया, जिसके बाद प्रस्तावित कार्रवाई रोक दी गई। 1980 में हुआ था भवन का आवंटन अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी मूल रूप से 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत रामेश्वर सहाय के पुत्र विजय कुमार को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था। 4 नवंबर 1980 को अनुबंध निष्पादित होने के बाद भवन का कब्जा उन्हें सौंप दिया गया। बाद में वर्ष 2005 में विक्रय विलेख के माध्यम से यह भवन विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दोनों ने यह संपत्ति वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दी। 7 अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने दोनों खरीदारों के पक्ष में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की। लगभग 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था। अवैध निर्माण पर दर्ज हुआ था मुकदमा दस्तावेजों के अनुसार, बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की शिकायत सामने आई। इसके बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने वीरेंद्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद विहित प्राधिकारी ने 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के विरुद्ध ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को यह आदेश निरस्त कर दिया गया और इमारत के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई रोक दी गई। अब उठ रहे बड़े सवाल अलीगंज अग्निकांड के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि 2016 में अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया गया था, तो आखिर किन परिस्थितियों में उसे वापस लिया गया? क्या उस समय नियमों की अनदेखी हुई? क्या प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही बरती गई? इन सवालों के जवाब अब जांच एजेंसियों और प्रशासनिक रिपोर्ट पर निर्भर करेंगे। इस बीच, हादसे में 15 लोगों की मौत ने भवन सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है।