नई दिल्ली, एजेंसियां। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में टूट जारी है। पार्टी के एक और राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बड़ाईक ने इस्तीफा दे दिया। पिछले चार दिनों में तीन राज्यसभा सांसद ममता को छोड़कर जा चुके हैं। कल यानी 10 जून को सुष्मिता देव ने रिजाइन किया था। 8 जून को सुखेंदु शेखर रे ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी छोड़ी थी।
अब तक TMC के लोकसभा में 28 में से 20 और राज्यसभा में 13 में से 3 सांसद यानी कुल 23 सांसद टूट चुके हैं। वहीं, बंगाल के 80 में से 58 TMC विधायक अलग गुट बना चुके हैं।
इन विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने के लिए स्पीकर को पत्र दिया था। ऋतब्रत ने बुधवार को दावा किया कि हमारे पास 64 विधायक हैं। बाकी के 6 विधायक भी स्पीकर को चिट्ठी सौंपेंगे।
बीते बुधवार को बगावत करने वाले लोकसभा सांसदों की लिस्ट सामने आई है।
बारासात- काकोली घोष, दस्तीदारघाटाल- दीपक अधिकारी (देव), कूचबिहार- जगदीश चंद्र बसुनिया, झाड़ग्राम- कालीपद सोरेन, जांगीपुर- खलीलुर रहमान,
मेदिनीपुर- जून मालिया, बहरामपुर- यूसुफ पठान, बांकुड़ा- अरूप चक्रवर्ती, मुर्शिदाबाद- अबू ताहेर खान, बर्धमान पूर्व- डॉ. शर्मिला सरकार, बैरकपुर- पार्थ भौमिक,
आसनसोल- शत्रुघ्न सिन्हा, मथुरापुर- बापी हलदार, बोलपुर- असित कुमार माल, जादवपुर- सायोनी घोष, बीरभूम- शताब्दी रॉय, कोलकाता दक्षिण- माला रॉय,
हुगली- रचना बनर्जी एवं आरामबाग- मिताली बाग।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मतभेद उस समय खुलकर सामने आ गए जब पार्टी के वरिष्ठ सांसद और जाने-माने वकील कल्याण बनर्जी ने सांसद अभिषेक बनर्जी के किसी भी कानूनी मामले की पैरवी करने से इनकार कर दिया। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी का व्यवहार अत्यधिक घमंडी है और इसी कारण उन्होंने उनसे जुड़े सभी मामलों से खुद को अलग करने का फैसला किया है। मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की सीआईडी द्वारा भेजे गए समन को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। यह समन विधायकों के हस्ताक्षर मिलान (सिग्नेचर मिसमैच) मामले से संबंधित बताया जा रहा है। साथ ही याचिका में गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से अंतरिम राहत की मांग की गई है। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक की ओर से वकील अयान भट्टाचार्य अदालत में पेश हुए। कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में भी अभिषेक बनर्जी के किसी कानूनी प्रकरण में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने स्वयं अदालत में मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी, जिसके बाद सुनवाई की तारीख तय हुई। लेकिन बाद में उन्हें जानकारी मिली कि उनकी जगह किसी अन्य वकील को नियुक्त किया गया है। वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में अभिषेक बनर्जी की भूमिका रही है, फिर भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। कल्याण बनर्जी ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेने का आग्रह करेंगे। उन्होंने कहा कि चार दशक से अधिक समय से कानूनी पेशे में रहने के बाद वह किसी भी प्रकार के अपमानजनक या अहंकारी व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे। इस बयान के बाद टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी गुट ने अपनी ताकत बढ़ने का दावा किया है। बागी गुट के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थन वाले विधायकों की संख्या बढ़कर 64 हो गई है। साथ ही उन्होंने टीएमसी के कांग्रेस में विलय से जुड़े सभी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। बागी खेमे ने बढ़ते समर्थन का किया दावा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि कुछ समय पहले तक उनके साथ 58 विधायक थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 64 हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही एक और विधायक उनके गुट में शामिल हो सकता है। उनके मुताबिक, बागी गुट को केवल विधायकों का ही नहीं बल्कि कई सांसदों, जिला स्तर के नेताओं और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का भी समर्थन प्राप्त है। "असली तृणमूल कांग्रेस हमारे साथ" विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनका गुट ही तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं और पार्टी के झंडे तथा विचारधारा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।" ममता-सोनिया मुलाकात के बाद तेज हुईं राजनीतिक चर्चाएं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद टीएमसी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई थीं। इसके अलावा टीएमसी नेता Abhishek Banerjee और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बैठकों ने भी दोनों दलों के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों को हवा दी थी। रीतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का उनके गुट की राजनीतिक दिशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाएगा नया समर्थन पत्र बागी गुट अब अपनी संख्या बल को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, गुट जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को नया समर्थन पत्र सौंप सकता है, जिसमें उनके साथ खड़े विधायकों की अद्यतन संख्या दर्ज होगी। लोकसभा में NDA को समर्थन जारी रहेगा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थक सांसद लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका रुख पहले की तरह कायम रहेगा और वर्तमान परिस्थितियों में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। टीएमसी के सामने गहराता संगठनात्मक संकट राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने 28 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकियों को लेकर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार के विलय या राजनीतिक समझौते का हिस्सा नहीं बनने जा रहा और खुद को ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है।
कोलकोता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक और बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। वह इस सप्ताह पार्टी छोड़ने वाली दूसरी राज्यसभा सांसद बन गई हैं। उनके इस्तीफे से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ असम में भी टीएमसी के संगठन को बड़ा नुकसान माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सुष्मिता देव ने बुधवार सुबह राज्यसभा के सभापति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके साथ ही उन्होंने असम टीएमसी अध्यक्ष पद समेत संगठन में अपनी सभी जिम्मेदारियों से भी खुद को अलग कर लिया। हिमंता सरमा से मुलाकात के बाद बढ़ीं अटकलें इस्तीफे के तुरंत बाद सुष्मिता देव की मुलाकात असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वास शर्मा से हुई। इस मुलाकात के बाद उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपने अगले राजनीतिक कदम को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी यह मुलाकात असम की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है। कांग्रेस से टीएमसी में आई थीं सुष्मिता देव 53 वर्षीय सुष्मिता देव ने वर्ष 2021 में कांग्रेस छोड़कर टीएमसी का दामन थामा था। वह असम के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री Santosh Mohan Dev की बेटी हैं। वह कांग्रेस की महिला इकाई 'ऑल इंडिया महिला कांग्रेस' की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं और असम के सिलचर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। लगातार बढ़ रही हैं टीएमसी की मुश्किलें सुष्मिता देव का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब टीएमसी पहले से ही आंतरिक असंतोष और बगावत की खबरों से जूझ रही है। इससे पहले राज्यसभा सांसद सुखेंदु शिखर रॉय भी पार्टी से इस्तीफा देने की घोषणा कर चुके हैं। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में पार्टी विधायकों के एक वर्ग द्वारा नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जताने और कुछ सांसदों के अलग रुख अपनाने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे इस्तीफे टीएमसी के लिए संगठनात्मक चुनौती बन सकते हैं और आने वाले दिनों में पार्टी को अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।