डोनाल्ड ट्रंप

IRAN US WAR
अमेरिका की एयरस्ट्राइक से दहला ईरान, भारत के चाबहार पोर्ट पर मिसाइल अटैक

तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन डीसी, एजेंसियां।  अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी सेना ने लगातार छठी रात ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर एयरस्ट्राइक की। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, इस अभियान में लड़ाकू विमानों, ड्रोन और युद्धपोतों का इस्तेमाल करते हुए तटीय निगरानी केंद्रों, एयर डिफेंस सिस्टम, सैन्य लॉजिस्टिक्स और समुद्री सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।   चाबहार पोर्ट भी बना निशाना ईरानी मीडिया के अनुसार, हमलों के दौरान भारत के निवेश वाले चाबहार पोर्ट के मैरिटाइम कंट्रोल टावर को भी निशाना बनाया गया। बताया गया कि पिछले एक सप्ताह में इस टावर पर यह तीसरा हमला है। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने कंट्रोल टावर को हुए नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, जबकि अमेरिकी रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया पर टावर की तस्वीर साझा की है।   ईरान की चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा ईरान ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि जमीनी हमला किया गया तो अमेरिकी सैनिकों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य बंद करने के लिए तैयार रहने का संकेत दिए जाने की भी खबरें हैं। उधर, कुवैत और बहरीन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन हमलों की भी जानकारी सामने आई है।   तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर असर तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड भी लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ गया। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है। एहतियात के तौर पर भारत ने इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों की नई तैनाती फिलहाल रोक दी है।   इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान में अमेरिका महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर रहा है। वहीं, ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने हालिया हमलों में 40 लोगों की मौत और 300 से अधिक लोगों के घायल होने का दावा किया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव से पश्चिम एशिया में अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक चिंताएं और गहरा गई हैं।

abhishek singh जुलाई 17, 2026 0
Trumph Ultimatum
ईरान को ट्रंप का अल्टीमेटम, बोले- 'बात नहीं मानी तो पावर प्लांट और पुल होंगे निशाने पर'

वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान जल्द बातचीत की मेज पर नहीं लौटता, तो अमेरिका अगले चरण में ईरान के पावर प्लांट, पुल और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएगा। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई तब तक जारी रहेगी, जब तक ईरान समझौते के लिए तैयार नहीं हो जाता।   'समझौता करो, नहीं तो हालात और खराब होंगे'   एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, "अगले हफ्ते हालात उनके लिए और खराब होंगे। हम उनके सभी पावर प्लांट और पुलों को निशाना बनाएंगे, अगर वे बातचीत के लिए नहीं आते।" उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिकी प्रतिनिधि अभी भी ईरानी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब फैसला तेहरान को करना होगा।   होर्मुज संकट के बीच बढ़ा तनाव   ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए नौसैनिक नाकेबंदी फिर से लागू की है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इस घटनाक्रम से वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।   अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी चिंता   ट्रंप के इस बयान के बाद कई देशों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि यदि ऊर्जा ढांचे और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले होते हैं, तो पश्चिम एशिया का संकट और गहरा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

abhishek singh जुलाई 15, 2026 0
Donald Trump Netnyahu
ट्रंप और नेतन्याहू जल्द करेंगे मुलाकात, पश्चिम एशिया में सुरक्षा और ईरान पर होगी अहम चर्चा

वॉशिंगटन,एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फोन पर बातचीत के दौरान जल्द अमेरिका में मुलाकात करने पर सहमति जताई है। दोनों नेताओं के बीच होने वाली बैठक में ईरान, पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और क्षेत्रीय सहयोग प्रमुख मुद्दे रहेंगे।   ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा रहेगा मुख्य एजेंडा   सूत्रों के अनुसार, बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और हाल के तनावपूर्ण घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा होगी। दोनों देश पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर भी विचार करेंगे।   अमेरिका-इजरायल संबंधों को मिलेगी नई दिशा   हाल के सप्ताहों में दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद की खबरें सामने आई थीं, लेकिन ताजा बातचीत के बाद दोनों नेताओं ने रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। माना जा रहा है कि यह बैठक क्षेत्रीय कूटनीति और भविष्य की संयुक्त रणनीति तय करने में अहम साबित हो सकती है।

abhishek singh जुलाई 4, 2026 0
America Jobs
अमेरिका में सुस्त पड़ा जॉब मार्केट, जून में सिर्फ 57 हजार नई नौकरियां

वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका में रोजगार बाजार की रफ्तार लगातार धीमी होती नजर आ रही है। जून 2026 में देश में केवल 57 हजार नई नौकरियां जुड़ीं, जो बाजार की अपेक्षाओं से काफी कम हैं। ताजा रोजगार आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऊंची महंगाई, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और व्यापार नीतियों के कारण कंपनियां नई भर्तियों को लेकर सतर्क हो गई हैं।   ट्रेड और टैरिफ नीतियों का असर विशेषज्ञों के अनुसार, आयात शुल्क और व्यापार से जुड़ी नीतियों के कारण कई कंपनियों की लागत बढ़ी है। इससे निवेश और नई भर्ती की रफ्तार प्रभावित हुई है। विपक्षी दलों ने भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक और व्यापारिक नीतियों पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि इन फैसलों का असर रोजगार बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है।   बेरोजगारी दर घटी, लेकिन तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं जून में अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.3 प्रतिशत से घटकर 4.2 प्रतिशत हो गई। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट पूरी तरह सकारात्मक संकेत नहीं है। बड़ी संख्या में लोगों ने नौकरी की तलाश ही छोड़ दी है, जिसके कारण वे आधिकारिक बेरोजगारों की सूची से बाहर हो गए। इसी वजह से बेरोजगारी दर कम दिखाई दे रही है।   श्रम भागीदारी पांच साल के निचले स्तर पर लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट घटकर 61.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वहीं 25 से 54 वर्ष आयु वर्ग की श्रम भागीदारी भी घटकर 83.3 प्रतिशत रह गई है। यह संकेत देता है कि रोजगार बाजार में सक्रिय लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है।   टेक सेक्टर में जारी है छंटनी जहां निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र में कुछ नई नौकरियां पैदा हुई हैं, वहीं टेक सेक्टर में छंटनी का दौर जारी है। मेटा, माइक्रोसॉफ्ट समेत कई कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में निवेश बढ़ाने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं। कमजोर रोजगार आंकड़ों ने अब अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के सामने भी ब्याज दरों को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है।

abhishek singh जुलाई 3, 2026 0
Donald Trumph Narendra MODI
2027 की शुरुआत में भारत आ सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का बड़ा बयान

वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वर्ष 2027 की शुरुआत में भारत का दौरा कर सकते हैं। इस संभावना का संकेत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ संबंधों को और मजबूत करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा की तैयारी कर रहा है।   व्यापार समझौते को मिल सकता है अंतिम रूप   मार्को रुबियो ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) पर बातचीत अंतिम चरण में है। उम्मीद है कि आने वाले महीनों में इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी और राष्ट्रपति ट्रंप की संभावित भारत यात्रा के दौरान इस पर बड़ा ऐलान हो सकता है।   भारत-अमेरिका रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती   विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह यात्रा होती है, तो दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  (AI) और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग और मजबूत होगा। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत की पहली आधिकारिक यात्रा होगी।   जी-7 बैठक के बाद बढ़ी कूटनीतिक सक्रियता   हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। इसके बाद व्यापार समझौते और रणनीतिक साझेदारी पर बातचीत में भी तेजी आई है।   अभी आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं   हालांकि, व्हाइट हाउस या भारत सरकार की ओर से ट्रंप की यात्रा की अंतिम तारीख या आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं किया गया है। फिलहाल अमेरिकी प्रशासन ने केवल इतना कहा है कि यात्रा की तैयारी पर काम चल रहा है और समय तय होने पर औपचारिक घोषणा की जाएगी।

abhishek singh जून 28, 2026 0
Donald Trumph
डोनाल्ड ट्रंप की 100% टैरिफ चेतावनी से बढ़ी वैश्विक चिंता, भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

मुंबई, एजेंसियां। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों को 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है, जो अमेरिकी टेक कंपनियों पर डिजिटल सर्विसेज टैक्स (Digital Services Tax - DST) लागू करेंगे। इस बयान के बाद वैश्विक व्यापार जगत में नई हलचल शुरू हो गई है। फिलहाल यह चेतावनी मुख्य रूप से यूरोपीय देशों को लेकर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नीति व्यापक रूप से लागू होती है तो भारत जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।   क्या है डिजिटल सर्विसेज टैक्स?   डिजिटल सर्विसेज टैक्स (DST) वह कर है, जिसे कुछ देश बड़ी डिजिटल कंपनियों—जैसे Google, Meta, Amazon और Apple—की स्थानीय डिजिटल आय पर लगाते हैं। अमेरिका लंबे समय से ऐसे टैक्स का विरोध करता रहा है और इसे अमेरिकी कंपनियों के साथ भेदभावपूर्ण मानता है।   ट्रंप ने क्या कहा?   ट्रंप ने कहा कि यदि कोई देश अमेरिकी टेक कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लागू करता है, तो अमेरिका उस देश से आने वाले सामान पर 100% तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ऐसा कदम मौजूदा व्यापार समझौतों से ऊपर माना जाएगा।   भारत पर क्या होगा असर?   भारत फिलहाल इस चेतावनी का सीधा लक्ष्य नहीं है, लेकिन इसका असर कई तरीकों से पड़ सकता है: यदि अमेरिका इस नीति का दायरा बढ़ाता है, तो भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं पर दबाव बढ़ सकता है। भारतीय आईटी और टेक कंपनियों के लिए वैश्विक कारोबारी माहौल अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार तनाव बढ़ने पर वैश्विक सप्लाई चेन और निवेश प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर भारतीय निर्यातकों पर भी पड़ सकता है। शेयर बाजार में टेक और निर्यात से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।   विशेषज्ञ क्या मानते हैं?   अर्थशास्त्रियों का कहना है कि फिलहाल भारत के लिए तत्काल खतरे की स्थिति नहीं है, क्योंकि ट्रंप की ताज़ा चेतावनी मुख्य रूप से यूरोपीय देशों के डिजिटल टैक्स को लेकर है। हालांकि यदि यह विवाद आगे बढ़ता है, तो वैश्विक व्यापार पर इसका व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।

abhishek singh जून 27, 2026 0
US President Donald Trump meets NATO Secretary General Mark Rutte amid tensions over support for Iran-related military action.
पैसा नहीं, वफादारी चाहिए... ईरान युद्ध में साथ न देने पर NATO पर भड़के ट्रंप, मार्क रूटे ने दिया जवाब

  वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने पर नाटो सहयोगी देशों पर नाराजगी जताई है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपने सहयोगियों से आर्थिक मदद नहीं, बल्कि वफादारी और राजनीतिक समर्थन की उम्मीद थी। उनके इस बयान पर नाटो महासचिव Mark Rutte ने यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि गठबंधन के सदस्य अमेरिका के साथ खड़े रहे हैं और उन्होंने सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने जताई नाराजगी व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में नाटो प्रमुख मार्क रूटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका ने अपने दम पर कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सैन्य सहायता की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों की ओर से समर्थन का संकेत मिलना महत्वपूर्ण था। ट्रंप ने कहा कि यदि यूरोपीय देश यह कहते कि वे अमेरिका के साथ खड़े हैं या किसी भी तरह मदद के लिए तैयार हैं, तो यह गठबंधन की एकजुटता का संदेश होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्हें सहयोगियों से निराशा हाथ लगी। स्पेन, इटली, ब्रिटेन और जर्मनी पर साधा निशाना बैठक के दौरान ट्रंप ने कई नाटो देशों की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ सदस्य देश सुरक्षा के लाभ तो उठाना चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने विशेष रूप से स्पेन, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करते हुए कहा कि कई देश रक्षा सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारियों को लेकर अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रहे हैं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि कुछ सहयोगी देशों को लगता है कि वे बिना पर्याप्त योगदान दिए भी अमेरिकी सुरक्षा छतरी का लाभ ले सकते हैं। “हमें पैसे नहीं, वफादारी चाहिए” एक पत्रकार के सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सहयोगी देशों के धन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना अमेरिका के पास है और उसे आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रंप ने कहा कि उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए आगे आए, तो बदले में उसे राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिले। उन्होंने कहा कि यूरोप में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिक वहां के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूद हैं। नाटो प्रमुख मार्क रूटे ने किया सहयोगियों का बचाव ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए नाटो महासचिव मार्क रूटे ने कहा कि यूरोपीय देशों ने अमेरिका का समर्थन किया है और ईरान की परमाणु गतिविधियों से पैदा होने वाला खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था। रूटे ने कहा कि अभियान के दौरान यूरोप स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि यूरोपीय आधारभूत ढांचे और एयरबेस का उपयोग अमेरिकी अभियानों के लिए किया गया, जिससे मिशन को रणनीतिक सहायता मिली। रक्षा खर्च में बढ़ोतरी को बताया ‘ट्रंप ट्रिलियन’ मार्क रूटे ने दावा किया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद से यूरोपीय देशों और कनाडा ने रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी की है। उन्होंने इस अतिरिक्त निवेश को “ट्रंप ट्रिलियन” का नाम देते हुए कहा कि सहयोगी देश धीरे-धीरे सुरक्षा बोझ साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रूटे के अनुसार, यूरोप और कनाडा ने रक्षा क्षेत्र में लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश किया है। इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरणों के ऑर्डर दिए गए हैं। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी बयानबाजी ट्रंप और रूटे के बीच यह सार्वजनिक मतभेद ऐसे समय सामने आया है, जब नाटो का अगला शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को Ankara में आयोजित होने वाला है। सम्मेलन में गठबंधन के 32 सदस्य देशों के नेता भाग लेंगे और रक्षा खर्च, सामूहिक सुरक्षा तथा वैश्विक संकटों पर चर्चा करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान नाटो के भीतर रक्षा जिम्मेदारियों और अमेरिका की भूमिका को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से तेज कर सकते हैं।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
US President Donald Trump speaks during a meeting amid debate over India’s tariff policies and trade relations.
भारत के टैरिफ आंकड़ों पर अपने ही मंत्री से भिड़े ट्रंप, बोले- मुझे झूठे नंबर मत दिखाइए

  वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बीच भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए जाने वाले टैरिफ को लेकर तीखी बहस होने का दावा किया गया है। एक नई किताब में किए गए खुलासे के अनुसार, ट्रंप अमेरिकी सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से संतुष्ट नहीं थे और उनका मानना था कि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर घोषित आंकड़ों से कहीं अधिक शुल्क वसूलता है। नई किताब में हुआ खुलासा यह दावा न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की नई किताब "Regime Change: Inside the Imperial Presidency of Donald Trump" में किया गया है। किताब के अनुसार, ट्रंप भारत की टैरिफ नीति को लेकर लंबे समय से संदेह जताते रहे थे और कई बार अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों को खारिज कर चुके थे। सरकारी आंकड़ों को बताया ‘बकवास’ रिपोर्ट के मुताबिक, एक बैठक के दौरान वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के आधिकारिक आंकड़े ट्रंप के सामने रखे। इन आंकड़ों में भारत द्वारा लगाए जाने वाले शुल्क का विवरण दिया गया था। ट्रंप इन आंकड़ों से सहमत नहीं हुए। किताब में दावा किया गया है कि उन्होंने अधिकारियों से कहा कि उन्हें “गलत और भ्रामक जानकारी” दी जा रही है। ट्रंप का मानना था कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर 175 प्रतिशत या उससे भी अधिक टैरिफ लगाता है, जबकि आधिकारिक आंकड़े इससे काफी कम थे। भारत को कहा गया था ‘टैरिफ का महाराजा’ किताब के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी भारत को दुनिया के सबसे ऊंचे आयात शुल्क लगाने वाले देशों में गिनते थे। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कथित तौर पर भारत को “टैरिफ का महाराजा” तक कहा था। व्हाइट हाउस के आंकड़ों के मुताबिक, भारत कृषि उत्पादों पर औसतन 37 प्रतिशत तक शुल्क लगाता रहा है, जबकि कुछ ऑटोमोबाइल उत्पादों पर यह दर 100 प्रतिशत से अधिक भी रही है। टैरिफ विवाद से बढ़ा व्यापारिक तनाव भारत की टैरिफ नीति को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच ट्रंप प्रशासन ने अपने तथाकथित “लिबरेशन डे” अभियान के तहत भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला किया। बाद में रूस से तेल खरीदने के मुद्दे को लेकर भी भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाए गए। इन कदमों के बाद भारतीय उत्पादों पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ गया। व्यापार वार्ता पर भी पड़ा असर टैरिफ विवाद का असर भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं पर भी देखने को मिला। कई प्रस्तावित प्रतिनिधिमंडलीय दौरों को स्थगित करना पड़ा और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की गति धीमी पड़ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में व्यापारिक मतभेदों ने रणनीतिक साझेदारी को भी प्रभावित किया था, हालांकि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश करते रहे। फरवरी 2026 में बनी समझौते की रूपरेखा लंबी बातचीत के बाद फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमत हुए। समझौते के तहत कई उत्पादों पर शुल्क कम करने और व्यापारिक बाधाओं को दूर करने पर सहमति बनी। इसके साथ ही अमेरिका ने भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ को हटाने की घोषणा की। फिलहाल दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के लिए आगे की बातचीत कर रहे हैं। क्या है इस खुलासे का महत्व? किताब में किए गए दावे यह संकेत देते हैं कि ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत की व्यापार नीति को लेकर व्हाइट हाउस के भीतर भी मतभेद और असहमति मौजूद थी। यह खुलासा ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका अपने आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
US Senate passes resolution limiting President Donald Trump’s authority for military action against Iran.
ईरान युद्ध पर ट्रंप को झटका, अमेरिकी संसद में सैन्य कार्रवाई रोकने का प्रस्ताव पास

  अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सीमित करने और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण लगाने की मांग की गई है। खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। सीनेट में 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव अमेरिकी सीनेट में युद्ध शक्तियों (War Powers) से जुड़े इस प्रस्ताव के पक्ष में 50 वोट पड़े, जबकि 48 सांसदों ने इसका विरोध किया। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सीनेटरों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। वहीं, दो रिपब्लिकन सांसद मतदान के समय अनुपस्थित रहे। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना किसी बड़े सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाने से रोकने की मंशा से लाया गया है। प्रस्ताव के पारित होने को ट्रंप प्रशासन की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए एक राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी मिला समर्थन इससे पहले अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी यह प्रस्ताव पारित हो चुका है। वहां इसके समर्थन में 215 वोट पड़े, जबकि विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया। हाउस में भी चार रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया था। ट्रंप की पार्टी में बढ़ी असहमति रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कई सांसदों का मानना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति को व्यापक सैन्य कार्रवाई का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर ट्रंप समर्थक नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। क्या ट्रंप पर पड़ेगा कोई असर? हालांकि यह प्रस्ताव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसका तत्काल कानूनी प्रभाव सीमित है। यह एक ‘कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन’ है, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती और यह सीधे कानून का रूप भी नहीं लेता। व्हाइट हाउस ने प्रस्ताव को प्रतीकात्मक बताते हुए कहा है कि इसका प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को इस तरह के प्रस्तावों से सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत तक पहुंच सकता है मामला संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति और कांग्रेस की युद्ध संबंधी शक्तियों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। ऐसे में यदि इस प्रस्ताव को लेकर टकराव बढ़ता है तो मामला अदालतों तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस पहले ही इस तरह के प्रस्तावों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा चुका है। ईरान के साथ जारी है कूटनीतिक बातचीत यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल के हफ्तों में कई दौर की वार्ताएं हुई हैं और कूटनीतिक प्रयास तेज हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी संसद का यह संदेश संकेत देता है कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मध्य पूर्व में किसी नए सैन्य संघर्ष से बचने के पक्ष में है। अमेरिकी राजनीति में बढ़ी हलचल विश्लेषकों का मानना है कि प्रस्ताव के पक्ष में रिपब्लिकन सांसदों का मतदान ट्रंप के लिए केवल राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति का संकेत भी है। आने वाले दिनों में ईरान नीति और सैन्य शक्तियों के मुद्दे पर अमेरिका की राजनीति में बहस और तेज होने की संभावना है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
US Senate votes on proposal to limit President Trump's military powers regarding Iran conflict.
ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप प्रशासन को झटका, अमेरिकी सीनेट ने सीमित करने वाले प्रस्ताव को दी मंजूरी

  अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान में राष्ट्रपति की स्वतंत्र कार्रवाई पर नियंत्रण सुनिश्चित करना है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित शांति समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कूटनीतिक प्रयासों में भी जुटा हुआ है। 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव मंगलवार को हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 50 और विरोध में 48 वोट पड़े। दिलचस्प बात यह रही कि राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों—रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी—ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इस मतदान ने अमेरिकी राजनीति में ईरान नीति को लेकर दोनों दलों के भीतर मौजूद मतभेदों को भी उजागर कर दिया। प्रतिनिधि सभा से भी मिल चुकी है मंजूरी इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। वहां यह प्रस्ताव 215-208 वोटों से पारित हुआ था। हाउस में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर इसका समर्थन किया था। प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी आलोचना करते हुए समर्थक सांसदों को निशाने पर लिया था। क्या है इस प्रस्ताव का उद्देश्य? यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच युद्ध संबंधी शक्तियों के संतुलन से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति किसी बड़े सैन्य संघर्ष में देश को शामिल करने से पहले कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त करें। अमेरिका में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि सैन्य कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में कांग्रेस की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि युद्ध संबंधी निर्णयों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बना रहे। क्या ट्रंप प्रशासन पर पड़ेगा कोई असर? राजनीतिक रूप से यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसका प्रभाव सीमित है। यह एक "कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन" है, जिसे कानून का दर्जा प्राप्त नहीं होता और न ही इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस प्रस्ताव का प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश है। व्हाइट हाउस ने बताया प्रतीकात्मक कदम व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने प्रस्ताव को महज राजनीतिक अभिव्यक्ति बताया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर इसका कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले पहले की तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे। प्रशासन ने यह भी दावा किया कि वर्तमान में ईरान के साथ किसी सक्रिय सैन्य संघर्ष की स्थिति नहीं है और हालिया युद्धविराम के बाद तनाव में कमी आई है। कांग्रेस में बढ़ रही सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता सीनेट में हुए इस मतदान ने संकेत दिया है कि कांग्रेस के कई सदस्य मध्य पूर्व में संभावित सैन्य तनाव को लेकर चिंतित हैं। सांसदों का एक वर्ग मानता है कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के बड़े सैन्य कदम उठाने से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका लंबे संघर्ष में उलझ सकता है। इसी वजह से हाल के महीनों में ईरान से जुड़े युद्ध शक्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस में कई बार बहस और मतदान हो चुके हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता पर बनी हुई है नजर सीनेट के इस फैसले के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल में हुई वार्ताओं को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सीनेट का यह प्रस्ताव भले ही कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिकी संसद का एक बड़ा वर्ग ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई पर अधिक राजनीतिक और संसदीय निगरानी चाहता है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
US federal court building as a judge strikes down a controversial voter database created under the Trump administration.
US Election Controversy: ट्रंप सरकार को अदालत से झटका, वोटर डेटा डेटाबेस को गैर-कानूनी करार

  वॉशिंगटन: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा कानूनी झटका लगा है। एक संघीय अदालत ने उस विवादित डेटाबेस को समाप्त करने का आदेश दिया है, जिसमें लाखों अमेरिकी नागरिकों की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की गई थी। अदालत ने इसे गैर-कानूनी बताते हुए कहा कि इससे नागरिकों की निजता और मतदान के अधिकार दोनों को खतरा पैदा हुआ है। अमेरिकी जिला जज स्पार्कल सूकनानन ने अपने फैसले में कहा कि संघीय सरकार ने जानबूझकर अमेरिकी नागरिकों के गोपनीयता अधिकारों का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि जब वोट देने जैसे बुनियादी अधिकार खतरे में हों, तब अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती। राज्यों द्वारा वोटर लिस्ट से नाम हटाने का आरोप अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने इस डेटाबेस का इस्तेमाल योग्य अमेरिकी नागरिकों को वोटर सूची से हटाने के लिए किया। जज के अनुसार, सरकार ने नागरिकता संबंधी ऐसे डेटा का उपयोग किया, जिसकी विश्वसनीयता पर पहले से सवाल मौजूद थे। फैसले में कहा गया कि यह मामला दो बुनियादी संवैधानिक अधिकारों—निजता के अधिकार और मतदान के अधिकार—से जुड़ा है और दोनों की रक्षा करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। क्या है विवादित डेटाबेस? यह मामला 'सिस्टेमैटिक एलियन वेरिफिकेशन फॉर एंटाइटलमेंट्स' (SAVE) प्रणाली से जुड़ा है, जिसे अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) संचालित करता है। इसका उपयोग नागरिकता और आव्रजन स्थिति की पुष्टि के लिए किया जाता है। सितंबर 2025 में मतदान अधिकार और गोपनीयता से जुड़े कई संगठनों, जिनका नेतृत्व 'लीग ऑफ वूमेन वोटर्स' कर रहा था, ने इस प्रणाली में किए गए बदलावों को चुनौती देते हुए अदालत में मुकदमा दायर किया था। ट्रंप के कार्यकारी आदेश से बढ़ा विवाद मार्च 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत संघीय चुनावों में वोटर पंजीकरण के लिए नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना अनिवार्य किया गया था। आदेश में संघीय एजेंसियों को राज्यों के लिए नागरिकता सत्यापन प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली में नागरिकता सत्यापन के नियम पर्याप्त रूप से लागू नहीं किए जा रहे हैं। लीग ऑफ वूमेन वोटर्स की प्रतिक्रिया फैसले का स्वागत करते हुए 'लीग ऑफ वूमेन वोटर्स' ने कहा कि अदालत ने सरकार की चुनावी प्रक्रिया में गैर-कानूनी हस्तक्षेप की कोशिश को विफल कर दिया है। संगठन के अनुसार, यह डेटाबेस लाखों अमेरिकियों की संवेदनशील जानकारी को एक जगह इकट्ठा कर रहा था, जिससे वे अनुचित जांच और गैर-कानूनी तरीके से वोटर सूची से हटाए जाने के जोखिम का सामना कर सकते थे। यह फैसला अमेरिका में चुनावी पारदर्शिता, मतदाता अधिकारों और नागरिकों की गोपनीयता को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
Donald Trump speaks to reporters after criticizing UK Prime Minister Keir Starmer’s policies following his resignation.
ब्रिटेन के PM कीर स्टार्मर के इस्तीफे पर ट्रंप का तंज, बोले- 'पवनचक्कियों और गलत नीतियों ने उन्हें नुकसान पहुंचाया'

  वॉशिंगटन/लंदन: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने कहा कि ऊर्जा नीति, आव्रजन (इमिग्रेशन) और अमेरिका के साथ संबंधों को संभालने के तरीके ने स्टार्मर को राजनीतिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया। ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "मुझे लगता है कि वह एक अच्छे इंसान हैं, लेकिन उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने खुद उन्हें नुकसान पहुंचाया।" 'पवनचक्कियों के चक्कर में खुद को नुकसान पहुंचाया' ट्रंप ने ब्रिटेन की ऊर्जा नीति पर निशाना साधते हुए कहा कि स्टार्मर सरकार ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने के बजाय पर्यावरणीय कारणों से उत्तरी सागर (North Sea) में तेल और गैस संसाधनों के दोहन को सीमित कर दिया। उन्होंने कहा, "ब्रिटेन अपनी अधिकांश ऊर्जा खरीदता है। जानते हैं कहां से? नॉर्वे से। और नॉर्वे को तेल कहां से मिलता है? उत्तरी सागर से। ब्रिटेन के पास इसका बेहतर हिस्सा है, लेकिन वे पवनचक्कियों और पर्यावरणीय नीतियों के कारण उसे छोड़ना चाहते हैं।" ट्रंप ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी नीतियों ने ब्रिटेन को ऊर्जा के मामले में कमजोर बनाया है। नाटो और ईरान मुद्दे पर भी जताई नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि स्टार्मर एक तरह से उनके मित्र थे, लेकिन उन्होंने नाटो और ईरान से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका का पर्याप्त समर्थन नहीं किया। ट्रंप ने दावा किया कि साइप्रस स्थित ब्रिटिश सैन्य अड्डे के उपयोग को लेकर दोनों नेताओं के बीच मतभेद पैदा हो गए थे। उन्होंने कहा, "उन्होंने कहा कि हम द्वीप पर उतरने की अनुमति नहीं दे सकते। ऐसा पहली बार हुआ था। आखिरकार वे मान गए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।" ट्रंप के मुताबिक, इस मामले ने भी स्टार्मर की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया। पहले ही कर चुके थे इस्तीफे की भविष्यवाणी डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने पहले ही अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कीर स्टार्मर के इस्तीफे की भविष्यवाणी कर दी थी। उनका कहना था कि ब्रिटेन में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और सरकार की नीतियों से जनता की नाराजगी स्टार्मर के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही थी। दबाव के बीच दिया इस्तीफा कीर स्टार्मर ने सोमवार को लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। उन्होंने कहा है कि नए नेता और प्रधानमंत्री के चयन तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। पिछले कुछ महीनों में लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष, स्थानीय और क्षेत्रीय चुनावों में खराब प्रदर्शन तथा लगातार गिरती लोकप्रियता ने स्टार्मर पर दबाव बढ़ा दिया था। एंडी बर्नहैम बन सकते हैं नए प्रधानमंत्री ब्रिटेन की राजनीति में अब सबसे ज्यादा चर्चा अनुभवी लेबर नेता और ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर एंडी बर्नहैम के नाम को लेकर हो रही है। माना जा रहा है कि संसद में उनकी वापसी के बाद वे प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार बन सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो पिछले एक दशक में ब्रिटेन को सातवां प्रधानमंत्री मिल सकता है, जो देश की राजनीति में बढ़ती अस्थिरता को भी दर्शाता है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
US President Donald Trump speaks to reporters, warning Iran to comply with the interim agreement signed with Washington.
अगर ईरान समझौते से मुकरा, तो जो करना पड़ेगा वो करूंगा; ट्रंप की खुली चेतावनी

  वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते का पालन नहीं करता है, तो वाशिंगटन सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ईरान का रवैया ठीक नहीं रहा, तो वह वही करेंगे जो आवश्यक होगा। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान अपने समझौते पर खरा नहीं उतरता या उसका व्यवहार सही नहीं रहता है, तो मुझे जो करना पड़ेगा, मैं वह करूंगा।" उनके इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते के बाद ट्रंप का सख्त संदेश गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ महीने पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में ईरान के हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की स्थिति में पहुंचा दिया था। समझौते के बावजूद ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि वाशिंगटन ईरान के हर कदम पर कड़ी निगरानी रखेगा और किसी भी उल्लंघन पर कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है। अमेरिकी किसानों को मिलेगा फायदा ट्रंप ने कहा कि ईरान की जो धनराशि पहले से रोकी गई थी, उसका इस्तेमाल केवल अमेरिका से खाद्य उत्पाद खरीदने के लिए किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था से अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ट्रंप ने कहा, "वह सारा पैसा भोजन की खरीद के रूप में वापस अमेरिका आ रहा है। ईरान की आबादी 9.1 करोड़ है और वे अपने लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए जो पैसा जारी किया जा रहा है, वह सीधे हमारे किसानों के पास जाएगा।" युद्ध के बाद गहरा मानवीय और आर्थिक संकट ईरान, इजरायल और लेबनान में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में भारी मानवीय संकट पैदा कर दिया है। युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों के कारण हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समझौते के भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते की सफलता काफी हद तक दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की आशंका है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
US Vice President JD Vance speaks after Switzerland talks, announcing Iran's willingness to allow IAEA inspectors back into nuclear facilities.
अमेरिका ने ईरानी तेल प्रतिबंधों में दी अस्थायी ढील, वेंस बोले- परमाणु निरीक्षण के लिए तैयार हुआ तेहरान

  वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। यदि यह सहमति औपचारिक रूप लेती है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी फिर से शुरू हो सकेगी। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस कदम को दोनों देशों के बीच जारी वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अगस्त तक ईरानी तेल निर्यात को मिली राहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय की ओर से जारी छूट के तहत अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री, परिवहन और कुछ वित्तीय गतिविधियों को सीमित अनुमति दी गई है। यह हाल के वर्षों में ईरान को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक रियायतों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रही है। वेंस का दावा- अमेरिकी किसानों को भी होगा फायदा जेडी वेंस ने कहा कि यदि भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी किया जाता है, तो उसका एक हिस्सा अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यदि ईरानी संपत्तियां मुक्त होती हैं, तो इससे अमेरिकी किसानों को लाभ मिलेगा और ईरानी लोगों की खाद्य जरूरतें पूरी करने में भी मदद मिलेगी।" वेंस ने यह भी संकेत दिया कि आगामी 60 दिनों के दौरान तकनीकी स्तर की वार्ताएं जारी रहेंगी, जिनका उद्देश्य एक स्थायी समझौते तक पहुंचना है। IAEA निरीक्षण को लेकर उठे सवाल वेंस के दावों पर कई विशेषज्ञों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि IAEA निरीक्षण की व्यवस्था पहले से ही 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का हिस्सा थी, जिसे 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समाप्त कर दिया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पहल पुराने ढांचे को ही नए स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश है। वार्ता के दौरान दिखा तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई वार्ता के दौरान कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अस्थायी रूप से बैठक छोड़ने की चेतावनी दी थी। उपराष्ट्रपति वेंस के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटे और वार्ता आगे बढ़ सकी। पाकिस्तान और कतर ने निभाई अहम भूमिका पूरी बातचीत के दौरान पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दोनों देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बनाए रखने और संभावित समझौते की दिशा में माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इजरायल समर्थक खेमे में बढ़ी चिंता ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील और परमाणु निगरानी को लेकर चल रही वार्ता ने अमेरिका के इजरायल समर्थक राजनीतिक वर्ग में चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत से ईरान को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
US President Donald Trump speaks after Switzerland talks, warning Iran over compliance with the interim peace agreement.
60 दिन की राहत, लेकिन सख्त चेतावनी भी; डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को किया आगाह

  वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच हुई तनावपूर्ण वार्ता के एक दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने साफ कहा कि यदि ईरान अंतरिम शांति समझौते के तहत किए गए वादों का पालन नहीं करता है, तो अमेरिका सख्त जवाबी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता या उसका रवैया ठीक नहीं रहता, तो हम वही करेंगे जो जरूरी होगा।" उनके इस बयान को तेहरान के लिए स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। पहले दौर की वार्ता में दिखा था तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की बातचीत के दौरान भी तनाव देखने को मिला। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर ट्रंप की टिप्पणी पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने नाराजगी जताई और कुछ समय के लिए वार्ता कक्ष छोड़कर बाहर चला गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए अंतरिम समझौते के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे थे। जेडी वेंस बोले- मजबूत समझौते की नींव पड़ी शुरुआती तनाव के बावजूद वार्ता बाद में पटरी पर लौटती दिखाई दी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरानी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत ने अंतिम समझौते के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। ईरान ने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि वार्ता का दायरा उसके परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) तक बढ़ा दिया गया है। ईरान को आर्थिक राहत, प्रतिबंधों में मिली छूट अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को सीमित आर्थिक राहत देने का फैसला किया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय (US Treasury Department) ने 21 अगस्त तक कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट प्रदान की है। इस फैसले के बाद ईरान को तेल और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात की अनुमति मिल गई है। साथ ही उसे इन निर्यातों के बदले भुगतान प्राप्त करने की भी मंजूरी दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रतिबंधों से जूझ रही ईरानी अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में हुई बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित की गई। दोनों देशों ने पिछले सप्ताह हुए अंतरिम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए 60 दिनों का रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई है। इस रोडमैप का उद्देश्य स्थायी समझौते की दिशा में आगे बढ़ना, क्षेत्रीय तनाव कम करना और लंबित विवादित मुद्दों का समाधान निकालना है। दोनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। 60 दिन की राहत, लेकिन दबाव बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा दी गई 60 दिनों की राहत ईरान को आर्थिक और कूटनीतिक अवसर प्रदान करती है, लेकिन ट्रंप की चेतावनी यह भी स्पष्ट करती है कि वाशिंगटन समझौते के उल्लंघन पर कठोर रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में आने वाले दो महीने अमेरिका-ईरान संबंधों और मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
US President Donald Trump speaks as he issues a fresh warning to Iran amid ongoing peace talks in Switzerland.
ट्रंप ने ईरान को दी खुली चेतावनी, कहा- लेबनान में प्रॉक्सी नहीं रोके तो होगा और भीषण हमला

  Donald Trump Iran Warning: मध्य पूर्व में शांति बहाली की कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को सीधे सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देकर तनाव बढ़ा दिया है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दी धमकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक सख्त पोस्ट साझा करते हुए कहा कि ईरान को लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित सशस्त्र गुटों और प्रॉक्सी संगठनों को तुरंत हिंसक गतिविधियां रोकने के लिए कहना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, "यदि ईरान ने अपने भारी भुगतान पाने वाले प्रॉक्सी संगठनों को तबाही मचाने से नहीं रोका, तो अमेरिका फिर से बड़ा हमला करेगा। यह हमला पिछले सप्ताह की कार्रवाई से भी कहीं अधिक भीषण होगा।" शांति वार्ता के बीच बढ़ा कूटनीतिक दबाव ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण वार्ता चल रही है। इस बैठक में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप की नई चेतावनी ने इस शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ईरान पर अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। लेबनान में ईरान समर्थित गुटों को लेकर अमेरिका चिंतित अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि ईरान लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित संगठनों, विशेष रूप से हिज्बुल्लाह, के जरिए क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करता है। वॉशिंगटन का मानना है कि इन संगठनों की गतिविधियां न केवल इजरायल बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए चुनौती हैं। ट्रंप ने अपने संदेश में स्पष्ट संकेत दिया कि यदि ईरान ने इन समूहों पर नियंत्रण नहीं किया, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। वार्ता पर पड़ सकता है असर विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ शांति वार्ता और दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी, दोनों मिलकर अमेरिका-ईरान संबंधों को और जटिल बना सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान ट्रंप की चेतावनी पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या स्विट्जरलैंड में जारी वार्ता किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाती है। मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ट्रंप का यह बयान एक बार फिर इस क्षेत्र की नाजुक स्थिति को उजागर करता है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
US Vice President JD Vance attends peace talks with Iranian delegates in Switzerland amid efforts to ease Middle East tensions.
अमेरिका ने ईरान के सामने रखी दोस्ती की बड़ी शर्त, मिडिल ईस्ट में शांति के लिए स्विट्जरलैंड में मंथन जारी

  बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में स्थायी शांति बहाल करने के उद्देश्य से स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच अहम शांति वार्ता शुरू हो गई है। इस बातचीत में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। बैठक के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता को "ऐतिहासिक अवसर" करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका, ईरान के साथ अपने संबंधों को नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए तैयार है। ईरान के सामने अमेरिका की बड़ी शर्त जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका, ईरान के साथ संबंध सामान्य करने और दोस्ती का नया अध्याय शुरू करने को तैयार है, लेकिन इसके लिए तेहरान को दो महत्वपूर्ण शर्तों को स्थायी रूप से स्वीकार करना होगा— क्षेत्र में अस्थिरता और संघर्ष फैलाने वाली नीतियों का त्याग। परमाणु हथियार हासिल करने की महत्वाकांक्षा को हमेशा के लिए छोड़ना। वेंस ने कहा कि यदि ईरान इन दोनों मुद्दों पर सकारात्मक और स्थायी कदम उठाता है, तो वाशिंगटन उसके साथ रिश्तों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार है। होर्मुज जलडमरूमध्य और परमाणु मुद्दे पर प्रगति का दावा अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने जैसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक लक्ष्यों की दिशा में पहले ही महत्वपूर्ण प्रगति हो चुकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह वार्ता मध्य पूर्व में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए रास्ते खोलेगी। पाकिस्तान की मध्यस्थता की सराहना जेडी वेंस ने इस शांति वार्ता को संभव बनाने में पाकिस्तान की भूमिका की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की कूटनीतिक कोशिशों ने अमेरिका और ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वेंस ने आसिम मुनीर को "एक महान सैन्य नेता और कुशल राजनयिक" बताया। भारतीय पत्नी और पाकिस्तानी जनरल का किया जिक्र हल्के-फुल्के अंदाज में जेडी वेंस ने कहा कि उनकी जिंदगी में दो बेहद महत्वपूर्ण लोग हैं—एक उनकी भारतीय मूल की पत्नी उषा वेंस और दूसरे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर। उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में उनकी जनरल मुनीर के साथ लगातार बातचीत हुई है और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के प्रयासों में उनका सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। मिडिल ईस्ट में शांति और ऊर्जा सुरक्षा पर नजर वेंस ने उम्मीद जताई कि स्विट्जरलैंड में जारी यह वार्ता मध्य पूर्व में तनाव कम करने, तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता सफल रहती है, तो न केवल क्षेत्रीय संघर्ष कम हो सकते हैं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
Rising tensions over the Indus Waters Treaty spark concerns for Pakistan's economy and regional stability.
सिंधु जल समझौते पर बढ़ा तनाव, पाकिस्तान ने दी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी; अर्थव्यवस्था पर गहराया संकट

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि यदि उनके देश की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर जल संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत द्वारा पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित किए जाने के फैसले का असर पाकिस्तान के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों पर दिखाई देने लगा है। क्या है विवाद की वजह? अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 के सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह फैसला लागू रहेगा। हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल के उस बयान के बाद पाकिस्तान की चिंता और बढ़ गई, जिसमें संकेत दिया गया था कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के उपयोग को लेकर भारत अपनी रणनीति मजबूत कर सकता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर क्यों है असर? सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। देश की लगभग 80 प्रतिशत खेती इसी जल स्रोत पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र— पाकिस्तान की GDP में लगभग 23 प्रतिशत योगदान देता है। कुल कार्यबल के 40 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका का आधार है। कपास और टेक्सटाइल उद्योग पर बढ़ी चिंता पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र है। देश के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इसी सेक्टर से आता है और इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। कपास की खेती के लिए सिंधु नदी का पानी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इसका असर कपास उत्पादन और उससे जुड़े पूरे टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा से जुड़े मुद्दे दक्षिण एशिया में संवेदनशील विषय हैं और दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भूमिका अहम मानी जाती है।  

surbhi जून 22, 2026 0
US President Donald Trump speaks as tensions rise over Iran and the strategic Strait of Hormuz during talks in Switzerland.
'होर्मुज बंद हुआ तो अपने देश नहीं लौट पाओगे', ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा अमेरिका-ईरान तनाव

  वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही महत्वपूर्ण वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी सैन्य चेतावनी दी है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को बंद करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ट्रंप के इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान को ट्रंप की सीधी चेतावनी फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर तुम होर्मुज बंद करने की कोशिश करोगे, तो अपने देश तक भी वापस नहीं पहुंच पाओगे।" उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त चेतावनियों में से एक माना जा रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बाधित नहीं होने देगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का सख्त रुख ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता विफल हो जाती है, तो वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीधे नियंत्रण स्थापित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, "जरूरत पड़ी तो हम होर्मुज का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं।" ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ऐसी स्थिति में अमेरिका वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स या टोल लगाने का कदम उठा सकता है। जहाजों पर 20 प्रतिशत तक टोल लगाने की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि ईरान समझौते के रास्ते पर नहीं आता है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर उनके तेल कार्गो के मूल्य का लगभग 20 प्रतिशत तक टोल लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लेबनान और हिज्बुल्लाह का भी किया जिक्र ट्रंप ने ईरान से लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह पर नियंत्रण रखने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ाने वाली गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए और ईरान को अपने सहयोगी समूहों की गतिविधियों को नियंत्रित करना होगा। स्विट्जरलैंड में जारी है अहम वार्ता अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण बातचीत चल रही है। हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान के बाद इन वार्ताओं के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप की चेतावनी केवल ईरान पर दबाव बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर अमेरिकी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने का भी संकेत है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
Iranian and American delegations at the Bürgenstock resort in Switzerland amid tense nuclear and regional security talks.
कैमरे चलते रहे, ईरानी प्रतिनिधिमंडल उठकर चला गया; जेडी वेंस देखते रह गए, स्विट्जरलैंड वार्ता की शुरुआत में बढ़ा तनाव

  बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): अमेरिका और ईरान के बीच रविवार (21 जून) को स्विट्जरलैंड में शुरू हुई बहुप्रतीक्षित वार्ता की शुरुआत ही तनावपूर्ण माहौल में हुई। बातचीत शुरू होने से पहले ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित संयुक्त फोटो सेशन और हाथ मिलाने के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसके कुछ देर बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई की नई चेतावनी पर नाराजगी जताते हुए ईरानी प्रतिनिधिमंडल बैठक स्थल से बाहर निकल गया। इस घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा तेज हो गई है। बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में हुई पहली बैठक अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का पहला दौर स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में आयोजित किया गया। बैठक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। पाकिस्तान और कतर इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। यह वार्ता हाल ही में हुए 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' (MoU) के तहत शुरू हुई है, जिसके अनुसार अगले 60 दिनों तक दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत होगी। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानी है। हाथ मिलाने और फोटो सेशन से ईरान का इनकार ईरानी समाचार एजेंसी के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और आयोजकों ने बातचीत शुरू होने से पहले दोनों पक्षों के नेताओं के बीच हाथ मिलाने और संयुक्त फोटो सेशन की व्यवस्था की थी। ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ तथा विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। दोनों नेता निर्धारित फोटो सेशन से पहले ही बैठक कक्ष से बाहर निकल गए। कैमरे में कैद हुआ पूरा घटनाक्रम सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कमरे से बाहर निकलने से ठीक पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से संक्षिप्त बातचीत की। इसके बाद वह अचानक मुड़े और पूरे ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक कक्ष से बाहर चले गए। यह पूरा घटनाक्रम कैमरे में रिकॉर्ड हो गया, जिससे वार्ता की शुरुआत में ही दोनों पक्षों के बीच मौजूद अविश्वास और तनाव उजागर हो गया। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ी नाराजगी सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई संबंधी हालिया बयान ने ईरानी पक्ष की नाराजगी बढ़ा दी। ईरान का मानना है कि कूटनीतिक बातचीत के दौरान इस तरह की सार्वजनिक चेतावनियां वार्ता के माहौल को प्रभावित करती हैं और आपसी भरोसे को कमजोर करती हैं। आगे की बातचीत पर दुनिया की नजर शुरुआती तनाव के बावजूद दोनों पक्षों के बीच वार्ता प्रक्रिया पूरी तरह बंद नहीं हुई है। मध्यस्थ देशों पाकिस्तान और कतर की कोशिश है कि बातचीत का अगला दौर सकारात्मक माहौल में आगे बढ़े। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में शुरू हुई यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।  

Deepshikha जून 22, 2026 0
Indian women's cricket team reacts after losing to South Africa in the Women's T20 World Cup 2026.
महिला टी20 वर्ल्ड कप 2026: टीम इंडिया पर मंडराया बाहर होने का खतरा, दक्षिण अफ्रीका से हार के बाद बिगड़े समीकरण

नई दिल्ली: महिला टी20 वर्ल्ड कप 2026 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मिली हार ने भारतीय टीम की सेमीफाइनल की राह मुश्किल कर दी है। पाकिस्तान और नीदरलैंड्स को हराकर शानदार शुरुआत करने वाली टीम इंडिया तीसरे मुकाबले में प्रोटियाज टीम के सामने टिक नहीं सकी। अब सिर्फ एक हार ने ग्रुप-1 के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। ग्रुप-1 में कैसी है स्थिति? ग्रुप-1 में ऑस्ट्रेलिया लगातार तीन जीत के साथ शीर्ष पर है। भारत ने तीन मैचों में दो जीत हासिल की हैं और फिलहाल दूसरे स्थान पर मौजूद है। दक्षिण अफ्रीका और बांग्लादेश के अंक समान हैं, लेकिन बेहतर नेट रन रेट के कारण अफ्रीकी टीम को बढ़त हासिल है। वहीं पाकिस्तान और नीदरलैंड्स की लगातार तीन हार के बाद उनकी नॉकआउट की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी हैं। भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता? आईसीसी के नियमों के अनुसार प्रत्येक ग्रुप से सिर्फ दो टीमें ही नॉकआउट चरण में पहुंचेंगी। भारत को अब अपने बचे हुए मुकाबले बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने हैं। अगर भारतीय टीम बांग्लादेश को हराने में सफल रहती है लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हार जाती है, तो उसके कुल 6 अंक होंगे। दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के सामने बांग्लादेश और नीदरलैंड्स जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीमें हैं। यदि प्रोटियाज टीम दोनों मुकाबले जीत लेती है, तो वह 8 अंकों के साथ सेमीफाइनल में जगह बना सकती है और भारत बाहर हो सकता है। हालांकि अगर ऑस्ट्रेलिया अपने आगामी मैचों में हारती है या अन्य परिणाम भारत के पक्ष में जाते हैं, तो टीम इंडिया के लिए उम्मीदें बनी रह सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच का हाल भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 159 रन का लक्ष्य रखा था। जवाब में दक्षिण अफ्रीका ने अनुभवी बल्लेबाज मारिजाम काप की शानदार 81 रन की पारी की बदौलत लक्ष्य को 5 गेंद शेष रहते और 6 विकेट से हासिल कर लिया। मैच के दौरान राधा यादव ने मारिजाम काप के दो अहम कैच छोड़े, जब वह 27 और 66 रन के निजी स्कोर पर थीं। यही चूक अंत में भारतीय टीम पर भारी पड़ गई। अब टीम इंडिया के लिए हर मुकाबला करो या मरो जैसा बन गया है और सेमीफाइनल की उम्मीदों को जिंदा रखने के लिए अगले मैचों में जीत बेहद जरूरी होगी।  

surbhi जून 22, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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