सोशल मीडिया पर चर्चा में रही "कॉकरोच जनता पार्टी" को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख Sunil Ambekar ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह सभी विचारों, भावनाओं और मतों को अपने भीतर समाहित कर सकता है। नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आंबेकर ने कहा कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हैं और लोगों को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। लोकतंत्र में हर विचार के लिए जगह: आंबेकर कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर पूछे गए सवाल पर आंबेकर ने कहा कि भारत में पारदर्शी चुनाव, स्वतंत्र मीडिया और खुली अभिव्यक्ति की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में अलग-अलग विचारों और चर्चाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विभिन्न मुद्दे उठना स्वाभाविक है और उन्हें सुलझाने के लिए संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं। 'जेन-Z' को देश और संविधान पर भरोसा आंबेकर ने कहा कि भारत का 'जेन-Z' यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी युवा पीढ़ी बेहद आशावादी है। उनके अनुसार, देश के युवाओं का भारत और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा विश्वास है। उन्होंने कहा कि युवा संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर अपनी बात रखते हैं और लोकतांत्रिक माध्यमों से बदलाव में विश्वास करते हैं। RSS ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जताया भरोसा RSS नेता ने कहा कि भारत की जनता, लोकतांत्रिक संस्थाएं और राजनीतिक व्यवस्था मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि देश का लोकतंत्र हर नागरिक की आवाज और भावनाओं को समायोजित करने की क्षमता रखता है। आंबेकर के मुताबिक, मीडिया स्वतंत्र है, राजनीतिक दल सक्रिय हैं और किसी भी संस्था को कमजोर नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान से संवाद पर भी रखी राय पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर RSS सरकार्यवाह Dattatreya Hosabale के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि संघ हमेशा लोगों के बीच संवाद का समर्थक रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारों के बीच औपचारिक वार्ता राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय का विषय है, लेकिन लोगों के बीच संपर्क और संवाद जारी रहना चाहिए। उनका मानना है कि व्यापार, सामाजिक संपर्क और संवाद से दोनों देशों के संबंधों में सुधार की संभावना बनी रहती है। विभाजन पर RSS का पुराना रुख दोहराया आंबेकर ने कहा कि RSS ऐतिहासिक रूप से भारत के विभाजन का विरोध करता रहा है। उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय संगठन अधिक मजबूत स्थिति में होता तो देश का विभाजन टाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि संघ आज भी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को अपनी प्राथमिकता मानता है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के लिए गुरुवार सुबह से मतदान जारी है। सुबह 7 बजे शुरू हुई वोटिंग में मतदाताओं का उत्साह साफ नजर आ रहा है। चुनाव आयोग के मुताबिक, सुबह 9 बजे तक राज्यभर में 17.69% मतदान दर्ज किया गया, जबकि राजधानी चेन्नई में यह आंकड़ा 16.51% रहा। शुरुआती रुझानों से संकेत मिल रहे हैं कि इस बार भी मतदाता बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। फिल्मी सितारों ने बढ़ाया मतदान का उत्साह साउथ सुपरस्टार Rajinikanth चेन्नई के स्टेला मैरिस कॉलेज स्थित मतदान केंद्र पर पहुंचे और वोट डालने के बाद लोगों से लोकतंत्र के इस पर्व में भाग लेने की अपील की। वहीं अभिनेता Dhanush ने भी कामराजर रोड कॉर्पोरेशन स्कूल बूथ पर मतदान कर युवाओं को खास संदेश दिया कि वे बढ़-चढ़कर वोटिंग करें। इसके अलावा अभिनेता अजित कुमार और गौतम राम कार्तिक जैसे कई अन्य फिल्मी चेहरों ने भी मतदान कर लोगों को प्रेरित किया। राजनीतिक नेताओं ने भी निभाई जिम्मेदारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता P. Chidambaram ने शिवगंगा जिले के कराईकुडी में वोट डाला और लोगों से लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदान करने की अपील की। बीजेपी नेता Khushbu Sundar ने चेन्नई में मतदान के बाद कहा कि जनता को हर सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है, इसलिए घर से बाहर निकलकर वोट जरूर करें। 5.73 करोड़ मतदाता, 4,000 से अधिक उम्मीदवार इस बार राज्य की 234 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में मतदान हो रहा है। करीब 5.73 करोड़ मतदाता 4,023 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। चुनाव प्रचार 21 अप्रैल को समाप्त हो गया था और अब सभी की नजरें मतदान प्रतिशत और नतीजों पर टिकी हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम चुनाव को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष बनाने के लिए पूरे राज्य में करीब 1.40 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। मतदान से पहले सभी बूथों पर मॉक पोल के जरिए ईवीएम मशीनों की जांच की गई, ताकि किसी तरह की तकनीकी समस्या न आए। कब आएंगे नतीजे? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की मतगणना 4 मई को होगी। इसके बाद यह साफ हो जाएगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथों में जाएगी। फिलहाल, शुरुआती मतदान रुझान लोकतंत्र के प्रति लोगों की जागरूकता और उत्साह को दर्शा रहे हैं।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने गुरुवार को तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं से बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की। उन्होंने मतदान को “पवित्र लोकतांत्रिक कर्तव्य” बताते हुए खासकर युवाओं और महिलाओं से रिकॉर्ड संख्या में वोट डालने का आग्रह किया। युवाओं और महिलाओं से खास अपील प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अलग-अलग संदेश जारी करते हुए कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के मतदाता पूरे उत्साह के साथ अपने अधिकार का उपयोग करें और रिकॉर्ड मतदान सुनिश्चित करें। इसी तरह, पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने चुनाव को “लोकतंत्र का उत्सव” बताया और लोगों से बिना किसी डर के मतदान करने की अपील की। दोनों राज्यों में कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गुरुवार सुबह से मतदान शुरू हो गया। चुनाव आयोग की देखरेख में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित हो सके। तमिलनाडु में सभी 234 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में वोटिंग हो रही है, जबकि पश्चिम बंगाल में चुनाव दो चरणों में आयोजित किए जा रहे हैं। पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान जारी है। चुनाव आयोग की तैयारी और प्रक्रिया Election Commission of India के अनुसार, मतदान से पहले सभी बूथों पर मॉक पोल कराए गए ताकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की जांच हो सके। पहले चरण में कुल 1,478 उम्मीदवार मैदान में हैं। मतदान प्रक्रिया शाम 6 बजे तक जारी रहेगी, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। लोकतंत्र के पर्व में भागीदारी का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि ज्यादा से ज्यादा मतदान देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करता है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे इस “लोकतंत्र के पर्व” में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
कोलकाता/नई दिल्ली: Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल के एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) मामले में बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद मतदाता इस बार भी वोट डाल सकेंगे, भले ही फैसला मतदान से ठीक पहले क्यों न आया हो।क्या है पूरा मामला? West Bengal में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान: करीब 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए लंबित सूची में 50 लाख नाम शामिल इनमें से 27 लाख नाम हटाए जा चुके हैं बड़ी संख्या में लोगों ने ट्रिब्यूनल में अपील की है पहले नियम यह था कि अगर किसी का नाम बाद में सूची में जुड़ भी जाए, तो वह फ्रीज हो चुकी वोटर लिस्ट के कारण वोट नहीं डाल सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? Supreme Court of India ने स्पष्ट किया: अगर ट्रिब्यूनल चुनाव से 2 दिन पहले भी फैसला देता है, तो भी वोट देने का अधिकार मिलेगा जरूरत पड़ने पर पूरक (Supplementary) वोटर लिस्ट जारी की जाएगी चुनाव आयोग को इस फैसले को लागू करना होगा यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जो कोर्ट को “पूर्ण न्याय” के लिए विशेष अधिकार देता है।चुनाव पर क्या होगा असर? पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल यानी 21 और 27 अप्रैल तक जिन मामलों का निपटारा होगा, उन मतदाताओं को वोट देने का मौका मिलेगा। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं Mamata Banerjee सरकार ने इस फैसले का स्वागत किया TMC सांसद काकली घोष दस्तीदार ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया CPM नेता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि यह आम लोगों की कानूनी लड़ाई की जीत है क्यों है यह फैसला अहम? यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि: इससे लाखों लोगों का मताधिकार सुरक्षित हुआ चुनाव प्रक्रिया में न्याय और समानता सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कोर्ट ने दिखाया कि जरूरत पड़ने पर वह कानूनी तकनीकी अड़चनों को दरकिनार कर सकता है सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे उन लोगों को भी वोट देने का मौका मिलेगा, जो अब तक सिस्टम की वजह से बाहर हो रहे थे। इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
हंगरी की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। 16 साल से सत्ता में काबिज Viktor Orbán को इस बार करारी हार का सामना करना पड़ा है। संसदीय चुनाव में Péter Magyar की ‘तिस्जा’ (Tisza) पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया है। करीब 97% वोटों की गिनती के बाद सामने आए नतीजों के मुताबिक, तिस्जा पार्टी ने 199 सदस्यीय संसद में 138 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। पार्टी को कुल 53.6% वोट मिले, जबकि ओर्बन की ‘फिडेज’ (Fidesz) पार्टी 55 सीटों और 37.8% वोटों पर सिमट गई। 16 साल का ओर्बन युग खत्म Viktor Orbán साल 2010 से लगातार सत्ता में थे इस बार उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज हुई हार के बाद ओर्बन ने परिणाम को “दर्दनाक” बताया अब विपक्ष में बैठकर राजनीति करने की बात कही बुडापेस्ट में नतीजों के बाद लोगों ने सड़कों और मेट्रो स्टेशनों पर जश्न मनाया। इस चुनाव में 77% से ज्यादा मतदान हुआ, जो हाल के वर्षों में एक रिकॉर्ड माना जा रहा है। कौन हैं पीटर मैग्योर? Péter Magyar हंगरी की राजनीति में तेजी से उभरे नए चेहरे हैं। उम्र: 45 साल पेशा: वकील पहले ओर्बन सरकार का हिस्सा रह चुके हैं 2024 में विवाद के बाद अलग होकर नई पार्टी बनाई उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, न्यायपालिका में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने के वादों के साथ चुनाव लड़ा। चुनावी गणित (Election Breakdown) कुल सीटें: 199 तिस्जा पार्टी: 138 सीटें (53.6% वोट) फिडेज पार्टी: 55 सीटें (37.8% वोट) युवाओं का समर्थन ओर्बन को बेहद कम मिला 18–29 उम्र वर्ग के केवल 8% वोट वैश्विक राजनीति पर असर Viktor Orbán को लंबे समय से Vladimir Putin और Donald Trump का करीबी माना जाता था। उनकी हार को राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी राजनीति के लिए झटका माना जा रहा है रूस और अमेरिका के कुछ राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं चुनाव से पहले JD Vance ने भी समर्थन देने की कोशिश की थी यूरोपियन यूनियन के साथ नए रिश्ते पीटर मैग्योर ने अपनी जीत के बाद स्पष्ट किया कि उनकी सरकार European Union के साथ मजबूत संबंध बनाएगी। EU से रुके हुए फंड को वापस लाने की कोशिश यूरोपियन पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऑफिस में शामिल होने की योजना लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का वादा नई सरकार का एजेंडा भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न्यायपालिका और सरकारी संस्थाओं में सुधार पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना पुराने अधिकारियों से इस्तीफे की मांग मैग्योर ने संकेत दिए हैं कि वे जल्द ही वारसॉ, वियना और ब्रुसेल्स का दौरा करेंगे ताकि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जा सके। ओर्बन पर लगे आरोप ओर्बन सरकार पर पिछले वर्षों में कई आरोप लगते रहे: मीडिया की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना EU के नियमों से टकराव यही कारण रहा कि इस बार जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट किया। क्यों हुई ओर्बन की हार? विशेषज्ञों के अनुसार: युवाओं का समर्थन कम होना भ्रष्टाचार के आरोप EU के साथ खराब संबंध लंबे समय तक सत्ता में रहने की थकान इन सभी कारणों ने मिलकर सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया।
दुर्गापुर: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच जहां राज्य के कई हिस्सों से हिंसा और तनाव की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं दुर्गापुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने लोकतंत्र की असली भावना को उजागर कर दिया। दुर्गापुर कोर्ट परिसर में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के उम्मीदवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर राजनीतिक शिष्टाचार की मिसाल पेश की। जब आमने-सामने आए सियासी प्रतिद्वंदी घटना शुक्रवार दोपहर की है, जब दुर्गापुर पूर्व से भाजपा प्रत्याशी चंद्रशेखर बनर्जी अपने समर्थकों के साथ प्रचार कर रहे थे। उसी दौरान सीपीएम के प्रत्याशी सिमंत चटर्जी, प्रभास साईं और प्रवीर मंडल भी वहां पहुंचे। आमतौर पर ऐसे मौके पर नारेबाजी या तनाव देखने को मिलता है, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल अलग था। सभी उम्मीदवारों ने हाथ मिलाया और गले मिलकर सौहार्द का संदेश दिया। आम लोगों के लिए बना मिसाल इस दृश्य को देखकर कोर्ट परिसर में मौजूद वकील और आम लोग हैरान रह गए। चुनावी माहौल में इस तरह का सौहार्दपूर्ण व्यवहार लोगों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। पूर्व मेयर का ‘गुरु मंत्र’ इस दौरान दुर्गापुर नगर निगम के पूर्व मेयर रथिन रॉय ने भाजपा उम्मीदवार चंद्रशेखर बनर्जी को सलाह देते हुए कहा कि: “राजनीति बिना हिंसा के होनी चाहिए, समाज को बांटने की नहीं, जोड़ने की जिम्मेदारी हमारी है।” उनकी इस बात पर मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन जताया, हालांकि कुछ लोगों ने इसे चुनावी रणनीति भी बताया। उम्मीदवारों का साझा संदेश सभी प्रत्याशियों ने एक सुर में कहा कि: लोकतंत्र में शांति और शिष्टाचार जरूरी है चुनावी प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होनी चाहिए समाज में एकता और भाईचारा बनाए रखना ही राजनीति का उद्देश्य है क्यों खास है यह घटना? बंगाल चुनावों में अक्सर हिंसा और तनाव की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे में दुर्गापुर की यह तस्वीर राजनीतिक परिपक्वता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बनकर सामने आई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।