कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट पर आज 21 मई को दोबारा वोटिंग हो रही है। मतदान सुबह 7 बजे से शुरू हो गया है। कुल 285 पोलिंग स्टेशन बनाए गए हैं। यहां शाम 6 बजे तक वोटिंग होगी। पिछली बार 29 अप्रैल को वोटिंग हुई थी। आरोप था कि कुछ बूथ पर EVM में भाजपा के बटन पर टेप चिपका था। कई अन्य बूथों पर EVM में गड़बड़ी की खबरें आईं। इसके बाद चुनाव आयोग ने रिपोलिंग का आदेश दिया। रिजल्ट 24 मई को आएगा। बूथों पर दोगुनी सुरक्षा चुनाव आयोग ने इस बार बूथों पर दोगुनी सुरक्षा कर दी है। पहले जहां हर बूथ पर 4 जवान तैनात होते थे। इस बार आठ जवानों की ड्यूटी लगाई गई है। फालता में मुख्य मुकाबला TMC और भाजपा के बीच है। हालांकि TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने दो दिन पहले उम्मीदवारी वापस लेने का ऐलान किया। हालांकि EVM में उनका नाम और पार्टी का सिंबल रहेगा।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के तहत शनिवार को राज्य के 15 बूथों पर पुनर्मतदान (री-पोल) कराया जा रहा है। इनमें डायमंड हार्बर के 4 और मगरहाट पश्चिम के 11 बूथ शामिल हैं। मतदान सुबह 7 बजे शुरू हुआ और शाम 6 बजे तक जारी रहेगा। EVM खराबी का आरोप, वोटर्स परेशान डायमंड हार्बर के रॉयनगर प्राइमरी स्कूल स्थित बूथ नंबर 243 पर मतदाताओं ने EVM में खराबी की शिकायत की। एक वोटर ने कहा कि मशीन ठीक से काम नहीं कर रही लोगों को आधे घंटे से ज्यादा समय तक लाइन में इंतजार करना पड़ा तकनीकी टीम को मौके पर बुलाया गया हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति को जल्द सामान्य करने का दावा किया गया है। क्यों कराना पड़ा री-पोल? दरअसल, 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान इन बूथों पर: EVM से छेड़छाड़ के आरोप राजनीतिक दलों के बीच झड़प मतदान प्रक्रिया में बाधा जैसी शिकायतें सामने आई थीं। इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया। दक्षिण 24 परगना के सभी बूथ प्रभावित ये सभी 15 बूथ दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित हैं, जिसे चुनाव के लिहाज से संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और केंद्रीय बलों की तैनाती भी की गई है, ताकि मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके। रिकॉर्ड मतदान ने बढ़ाई सियासी हलचल इस बार पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड स्तर पर मतदान हुआ है: पहले चरण (23 अप्रैल): 93.19% वोटिंग दूसरे चरण (29 अप्रैल): 92.48% वोटिंग कुल 294 सीटों पर औसत मतदान: 92.84% इतने बड़े मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक दलों के बीच मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। TMC का BJP पर आरोप री-पोल के बीच शशि पांजा ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि BJP ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की ज्यादा जगहों पर री-पोल कराकर बंगाल की छवि खराब करने की साजिश रची गई TMC ने उकसावे के बावजूद संयम बनाए रखा पांजा ने यह भी दावा किया कि बीजेपी चुनावी तौर पर कमजोर स्थिति में है, इसलिए इस तरह की रणनीति अपना रही है। 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। इससे पहले री-पोल और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सियासी माहौल काफी गर्म है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना (4 मई) को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने के लिए सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर कड़ी कर दी गई है। राज्य में अक्सर चुनाव के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान में रखते हुए इस बार भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने पहले से ही व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। “राज्य के हर कोने में कानून का राज रहेगा” चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी प्रकार की हिंसा, उपद्रव या अवैध गतिविधि को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग ने कहा है कि मतगणना के दौरान और उसके बाद भी पूरे राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। 700 CAPF कंपनियों की तैनाती, मल्टी-लेयर सिक्योरिटी सुरक्षा के मद्देनजर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की करीब 700 कंपनियों को राज्यभर में तैनात किया जा रहा है। यह तैनाती सिर्फ काउंटिंग डे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नतीजों के बाद भी संवेदनशील इलाकों में बलों की मौजूदगी बनी रहेगी। सुरक्षा व्यवस्था को तीन स्तरों में बांटा गया है: पहला घेरा: काउंटिंग सेंटर के बाहरी इलाके में, जहां भारी संख्या में केंद्रीय बल तैनात रहेंगे। दूसरा घेरा: सेंटर के प्रवेश द्वार पर, जहां पहचान और जांच की कड़ी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। तीसरा घेरा: काउंटिंग हॉल के अंदर, जहां केवल अधिकृत अधिकारी और कर्मचारी ही मौजूद रहेंगे। इसके अलावा, ‘वल्नरेबल’ और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष पेट्रोलिंग की व्यवस्था की गई है, ताकि किसी भी तरह की भीड़ या हिंसक गतिविधि को तुरंत रोका जा सके। QR कोड आधारित डिजिटल एंट्री सिस्टम इस बार सुरक्षा व्यवस्था को और आधुनिक बनाते हुए काउंटिंग सेंटर्स में प्रवेश के लिए QR-Coded Photo ID अनिवार्य कर दिया गया है। बिना इस डिजिटल पहचान पत्र के किसी भी व्यक्ति को अंदर जाने की अनुमति नहीं होगी। यह कदम फर्जी पहचान या अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 24/7 कमांड हब और हाई-टेक निगरानी चुनाव आयोग ने राज्यभर में अत्याधुनिक कमांड हब स्थापित किए हैं, जहां से चौबीसों घंटे निगरानी रखी जाएगी। सभी मतगणना केंद्रों को CCTV कैमरों से जोड़ा गया है और उनकी लाइव फीड सीधे आयोग के नियंत्रण कक्ष तक पहुंचेगी। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या सामने आने पर तुरंत एक्शन लेने के लिए क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) भी तैनात की गई है। आम जनता के लिए हेल्पलाइन और शिकायत व्यवस्था आयोग ने नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हेल्पलाइन नंबर 1800 345 0008 और ईमेल wbfreeandfairpolls@gmail.com जारी किया है। कोई भी व्यक्ति हिंसा या गड़बड़ी की सूचना दे सकता है शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी हर शिकायत पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है हाईकोर्ट की निगरानी में चुनाव प्रक्रिया कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान पूरा नागरिक और पुलिस प्रशासन चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहेगा। कोर्ट ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं। पोस्ट-पोल हिंसा रोकने पर विशेष फोकस पश्चिम बंगाल में पिछले चुनावों के बाद हिंसा की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार सुरक्षा एजेंसियों को पहले से ही अलर्ट मोड पर रखा गया है। संवेदनशील जिलों में फ्लैग मार्च लगातार ड्रोन और CCTV निगरानी स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों के बीच समन्वय लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में बड़ा कदम चुनाव आयोग की यह व्यापक और सख्त तैयारी इस बात का संकेत है कि इस बार किसी भी कीमत पर शांति भंग नहीं होने दी जाएगी। आयोग का उद्देश्य सिर्फ मतगणना कराना नहीं, बल्कि ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करना है, जहां हर नागरिक बिना डर के लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सके।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के प्रचार के अंतिम दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता के बेहाला में भव्य रोड शो और जनसभा के दौरान बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने मतदाताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए घोषणा की कि यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो चुनाव परिणाम के बाद भी सात दिनों तक केंद्रीय सुरक्षा बल राज्य में तैनात रहेंगे। मतदाताओं को सुरक्षा का भरोसा अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि बंगाल में चुनाव के दौरान और उसके बाद किसी भी प्रकार की हिंसा को रोकने के लिए यह कदम उठाया जाएगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे 29 अप्रैल को बिना किसी डर के मतदान करें और लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करें। शाह ने स्पष्ट कहा कि “किसी भी गुंडे से डरने की जरूरत नहीं है।” चुनाव आयोग की तैयारियों का जिक्र गृह मंत्री ने यह भी कहा कि Election Commission of India ने मतदान को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष बनाने के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं। इसके बावजूद भाजपा सरकार बनने की स्थिति में अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखी जाएगी। रोड शो में उमड़ा जनसैलाब कोलकाता का बेहाला क्षेत्र रोड शो के दौरान पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगा नजर आया। सड़कों पर भारी संख्या में भाजपा समर्थक जुटे और ‘जय श्रीराम’ व ‘भारत माता की जय’ के नारों से माहौल गूंज उठा। अमित शाह खुले वाहन में सवार होकर लोगों का अभिवादन करते नजर आए। सियासी रणनीति का हिस्सा विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव बाद हिंसा (पोस्ट-पोल वायलेंस) का मुद्दा बंगाल की राजनीति में अहम रहा है। ऐसे में केंद्रीय बलों की सात दिनों तक तैनाती का वादा मतदाताओं में विश्वास बढ़ाने और मतदान प्रतिशत बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने ममता बनर्जी से फोन पर बात कर उन्हें पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया। आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल ने कहा कि ममता बनर्जी देश के लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण और कठिन लड़ाई लड़ रही हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए यह जानकारी साझा की। भाजपा और केंद्र पर लगाए गंभीर आरोप केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार विभिन्न संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने दावा किया कि इन सबके बावजूद आगामी चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ेगा। केजरीवाल ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुटता जरूरी है। ममता की रैली को अनुमति न मिलने पर विवाद यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग ने भवानीपुर में ममता बनर्जी की प्रस्तावित रैली को अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के बाद तृणमूल कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि एक मुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्हें अपने ही क्षेत्र में रैली की इजाजत नहीं दी गई, जबकि प्रधानमंत्री की रैलियों को जल्दी मंजूरी मिल जाती है। चुनावी माहौल हुआ गरम पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला इस बार बेहद दिलचस्प हो गया है। 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान दो चरणों में होगा—पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा 142 सीटों पर बाद में आयोजित होगा। मतगणना 4 मई को होगी। सत्ता के लिए कड़ा मुकाबला राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में है। ऐसे में केजरीवाल का यह समर्थन चुनावी समीकरणों को और दिलचस्प बना सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को शांतिपूर्ण और पारदर्शी बनाने के लिए निर्वाचन आयोग ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू की है। इस बार लक्ष्य साफ है फर्जी मतदान (प्रॉक्सी वोटिंग) और चुनावी हिंसा पर पूरी तरह रोक लगाना। इसके लिए पारंपरिक सुरक्षा के साथ आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। 100 मीटर की ‘लक्ष्मण रेखा’ और डबल वेरिफिकेशन हर मतदान केंद्र के चारों ओर 100 मीटर का नो-एंट्री ज़ोन बनाया जाएगा। इस क्षेत्र में केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही प्रवेश मिलेगा। सीमा पर दो वेरिफिकेशन डेस्क लगाए जाएंगे, जहां बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच करेंगे। दोहरी जांच के बाद ही किसी को बूथ तक जाने की अनुमति होगी, जिससे दबाव में वोटिंग और फर्जी पहचान के मामलों पर रोक लगेगी। AI और बॉडी कैम से निगरानी चुनाव में पहली बार बड़े पैमाने पर Artificial Intelligence का उपयोग किया जा रहा है। एआई-सक्षम कैमरे किसी भी असामान्य भीड़ या संदिग्ध गतिविधि को तुरंत पहचानकर कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजेंगे। इसके अलावा, केंद्रीय बलों और माइक्रो-ऑब्जर्वर्स को बॉडी-वॉर्न कैमरों से लैस किया जाएगा, जिससे हर गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा। आसपास के सरकारी सीसीटीवी कैमरों की निगरानी भी केंद्रीय स्तर पर होगी। ASD लिस्ट और वोटर पर्चियों पर सख्ती अनुपस्थित, स्थानांतरित और मृत (ASD) मतदाताओं की सूची को अपडेट किया गया है। अगर कोई संदिग्ध मतदाता वोट डालने आता है, तो उसकी पहचान की कई स्तरों पर जांच होगी। साथ ही, BLO को घर-घर जाकर वोटर पर्चियां बांटने का निर्देश दिया गया है। अंतिम 72 घंटे: ‘स्पेशल 100’ प्लान मतदान से पहले के आखिरी 72 घंटों के लिए विशेष सुरक्षा योजना लागू की गई है। इसमें त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र और जागरूकता अभियान शामिल हैं, ताकि चुनावी अपराधों को रोका जा सके और मतदाता सुरक्षित माहौल में अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।
पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों कैबिनेट विस्तार को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव खत्म होते ही मुख्यमंत्री Samrat Choudhary अपनी कैबिनेट का विस्तार कर सकते हैं। इससे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। चुनाव के बाद होगा बड़ा फैसला सूत्रों के अनुसार, अभी भाजपा के कई बड़े नेता बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं। जैसे ही चुनावी प्रक्रिया पूरी होगी, बिहार में कैबिनेट विस्तार को अंतिम रूप दिया जा सकता है। फिलहाल सरकार का कामकाज मुख्यमंत्री के साथ उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Choudhary और Bijendra Prasad Yadav संभाल रहे हैं। 36 मंत्रियों की सीमा संवैधानिक नियमों के तहत बिहार में अधिकतम 36 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं। ऐसे में: जातीय संतुलन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व राजनीतिक समीकरण इन सभी को साधना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। कुछ मंत्रियों की हो सकती है छुट्टी कैबिनेट विस्तार के दौरान कुछ पुराने चेहरों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। कमजोर प्रदर्शन वाले मंत्रियों पर गाज गिर सकती है नए चेहरों को मौका देकर सरकार संदेश देना चाहती है जवाबदेही और प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाएगी भाजपा का बढ़ सकता है दबदबा इस बार कैबिनेट में एक बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि भाजपा की हिस्सेदारी बढ़े। कई अहम विभाग अभी मुख्यमंत्री के पास हैं विस्तार के बाद इनका बंटवारा सहयोगी दलों में होगा इससे सत्ता संतुलन में बदलाव देखने को मिल सकता है। सहयोगी दलों की भी अहम भूमिका मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले कुछ नाम सहयोगी दलों पर निर्भर करेंगे: Upendra Kushwaha अपने खेमे से नाम तय करेंगे Chirag Paswan के पास LJP (रामविलास) कोटे का फैसला रहेगा बिहार कैबिनेट विस्तार सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश भी होगा। इससे यह तय होगा कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति किस दिशा में जाएगी और किन चेहरों पर सरकार भरोसा जताती है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पूर्व पार्षद निर्मल दत्त को वोटरों को कथित रूप से धमकाने और चुनाव को प्रभावित करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। बुधवार को उन्हें विधाननगर कोर्ट में पेश किया गया, जहां अदालत ने उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। शिकायत के बाद हुई कार्रवाई मामले की शुरुआत मंगलवार को हुई, जब भाजपा प्रत्याशी शरदबत मुखर्जी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्मल दत्त वोटरों को डराकर मतदान को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने विधाननगर पुलिस कमिश्नर से भी मुलाकात की थी। शिकायत के आधार पर विधाननगर दक्षिण थाने की पुलिस ने दत्ताबाद इलाके से निर्मल दत्त को गिरफ्तार किया। सुजीत बोस के करीबी बताए जाते हैं निर्मल दत्त को राज्य मंत्री सुजीत बोस का करीबी माना जाता है, जो विधाननगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दत्त की पत्नी भी विधाननगर नगर निगम के वार्ड संख्या 38 से तृणमूल कांग्रेस की पार्षद हैं। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में इस्लामपुर में एक रैली के दौरान चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यदि तृणमूल के एक नेता को गिरफ्तार किया जाता है, तो उनकी जगह सौ अन्य नेता खड़े हो जाएंगे। वायरल वीडियो से बढ़ा विवाद बताया जा रहा है कि 13 अप्रैल को सॉल्टलेक में हुई एक बैठक का वीडियो वायरल होने के बाद मामला गरमा गया। इस वीडियो में निर्मल दत्त कथित तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि अगर किसी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि एक मोबाइल ऐप के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया है। इस बयान के सामने आने के बाद भाजपा प्रत्याशी ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। पहले भी लग चुके हैं आरोप यह पहली बार नहीं है जब निर्मल दत्त विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उन पर सॉल्टलेक के दत्ताबाद इलाके में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लग चुका है। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच में जुटी है और आगे की कार्रवाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार की जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव इस बार सिर्फ विकास या वादों का मुद्दा नहीं, बल्कि कुछ लोगों के लिए अपनी पहचान साबित करने की लड़ाई बन गया है। Murshidabad जिले के छह लोगों की कहानी इस सच्चाई को उजागर करती है, जिन्हें पिछले साल कथित तौर पर बांग्लादेशी बताकर सीमा पार भेज दिया गया था। वोट नहीं, पहचान की पुष्टि मिनारुल शेख जैसे लोग इस बार वोट सिर्फ सरकार चुनने के लिए नहीं, बल्कि यह साबित करने के लिए कर रहे हैं कि वे भारतीय नागरिक हैं। आठ महीने की लंबी कानूनी प्रक्रिया और कई सुनवाई के बाद उन्हें फिर से वोटर स्लिप मिली। उनका कहना है कि यह वोट उनके सम्मान और पहचान का जवाब है। डर और संघर्ष की कहानी मुर्शिदाबाद के इन परिवारों के लिए यह चुनाव भावनात्मक और दर्दभरा है। महाराष्ट्र में काम करने गए इन लोगों को पकड़ा गया और बांग्लादेशी करार देकर सीमा पार भेज दिया गया। बाद में पुलिस जांच में उनकी नागरिकता साबित हुई और उन्हें वापस लाया गया, लेकिन उस घटना का डर आज भी कायम है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप इस मुद्दे ने चुनावी माहौल को भी गरमा दिया है। Trinamool Congress (TMC) ने इसे केंद्र सरकार की नीतियों से जोड़ते हुए आलोचना की है, जबकि Bharatiya Janata Party (BJP) ने आरोपों को खारिज किया है और घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बताया है। वोटर लिस्ट पर भी सवाल स्थानीय लोगों में डर इस वजह से भी बढ़ा है क्योंकि जिले से लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। कई परिवारों को आशंका है कि उनके साथ भी ऐसा हो सकता है, जिससे उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
कोलकाता, एजेंसियां। Asaduddin Owaisi की पार्टी All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen ने पश्चिम बंगाल में बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए Humayun Kabir की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) से अपना गठबंधन खत्म कर लिया है। यह निर्णय कबीर के एक कथित वीडियो के सामने आने के बाद लिया गया, जिससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। AIMIM ने बयान से बनाई दूरी AIMIM ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह ऐसे किसी भी बयान से खुद को अलग रखती है, जिसमें मुसलमानों की ईमानदारी पर सवाल उठाया गया हो। पार्टी ने साफ किया कि कबीर के बयान से मुस्लिम समुदाय को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं, इसलिए गठबंधन जारी रखना संभव नहीं है। अब अकेले चुनाव लड़ेगी AIMIM पार्टी ने घोषणा की है कि वह आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी और किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। यह फैसला चुनाव से ठीक पहले आया है, जिससे राज्य की राजनीतिक समीकरणों पर असर पड़ सकता है। मुस्लिम समुदाय के मुद्दों को बनाया केंद्र AIMIM ने इस मौके पर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को भी उठाया। पार्टी का कहना है कि राज्य में मुसलमान सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं और दशकों से सत्ता में रही पार्टियां उनके लिए ठोस काम नहीं कर पाई हैं। चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल पश्चिम बंगाल की 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए मतदान 23 और 29 अप्रैल को होगा, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। ऐसे में चुनाव से पहले गठबंधन टूटने से राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कबीर पहले ही TMC से हो चुके हैं अलग गौरतलब है कि All India Trinamool Congress से अलग होने के बाद हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी बनाई थी। अब AIMIM से गठबंधन टूटने के बाद उनके सामने चुनावी चुनौती और बढ़ गई है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पूर्व टीएमसी नेता हुमांयु कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया है। बुधवार को दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की। भाजपा का हमला इस गठबंधन पर भाजपा नेता दिलीप घोष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “ओवैसी लंबे समय से बंगाल में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। कई पार्टियां अन्य राज्यों में सफल रही हैं, लेकिन बंगाल के लोग किसी को आसानी से स्वीकार नहीं करते। यहां काम करना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है, तभी जनता अपनाती है।” ओवैसी का जवाब भाजपा के आरोपों पर ओवैसी ने पलटवार करते हुए कहा, “बंगाल के लोगों का यहां दम घुट रहा है। उन्हें एक नए विकल्प की जरूरत है और हम उन्हें वही विकल्प देने आए हैं।” उन्होंने दावा किया कि उनका गठबंधन राज्य में बदलाव की राजनीति को आगे बढ़ाएगा और जनता को नया विकल्प देगा। चुनावी समीकरण पर असर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि AIMIM और आम जनता उन्नयन पार्टी का गठबंधन कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है, जिसका असर सीधे तौर पर सत्तारूढ़ टीएमसी और भाजपा दोनों पर पड़ सकता है। तमिलनाडु में चुनाव बहिष्कार का ऐलान इधर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के थिरुप्पराईथुराई गांव में 50 से ज्यादा परिवारों ने विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे पिछले 16 साल से बुनियादी सुविधाओं-बिजली, पानी और शौचालय-के बिना जीवन बिता रहे हैं। उनका आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए इस बार उन्होंने वोट न देने का फैसला किया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।