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बंगाल चुनाव : “वोट नहीं, पहचान की लड़ाई है ” – मुर्शिदाबाद के लोगों का दर्दनाक सच

Anjali Kumari अप्रैल 13, 2026 0
Bengal Elections
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कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव इस बार सिर्फ विकास या वादों का मुद्दा नहीं, बल्कि कुछ लोगों के लिए अपनी पहचान साबित करने की लड़ाई बन गया है। Murshidabad जिले के छह लोगों की कहानी इस सच्चाई को उजागर करती है, जिन्हें पिछले साल कथित तौर पर बांग्लादेशी बताकर सीमा पार भेज दिया गया था।

 

वोट नहीं, पहचान की पुष्टि


मिनारुल शेख जैसे लोग इस बार वोट सिर्फ सरकार चुनने के लिए नहीं, बल्कि यह साबित करने के लिए कर रहे हैं कि वे भारतीय नागरिक हैं। आठ महीने की लंबी कानूनी प्रक्रिया और कई सुनवाई के बाद उन्हें फिर से वोटर स्लिप मिली। उनका कहना है कि यह वोट उनके सम्मान और पहचान का जवाब है।

 

 डर और संघर्ष की कहानी


मुर्शिदाबाद के इन परिवारों के लिए यह चुनाव भावनात्मक और दर्दभरा है। महाराष्ट्र में काम करने गए इन लोगों को पकड़ा गया और बांग्लादेशी करार देकर सीमा पार भेज दिया गया। बाद में पुलिस जांच में उनकी नागरिकता साबित हुई और उन्हें वापस लाया गया, लेकिन उस घटना का डर आज भी कायम है।

 

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप


इस मुद्दे ने चुनावी माहौल को भी गरमा दिया है। Trinamool Congress (TMC) ने इसे केंद्र सरकार की नीतियों से जोड़ते हुए आलोचना की है, जबकि Bharatiya Janata Party (BJP) ने आरोपों को खारिज किया है और घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बताया है।

 

वोटर लिस्ट पर भी सवाल


स्थानीय लोगों में डर इस वजह से भी बढ़ा है क्योंकि जिले से लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। कई परिवारों को आशंका है कि उनके साथ भी ऐसा हो सकता है, जिससे उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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नारी शक्ति वंदन कानून पर पीएम का बयान, विपक्ष की भूमिका का किया जिक्र

नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने ‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’ में महिला आरक्षण कानून को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि Nari Shakti Vandan Adhiniyam को 2023 में सभी दलों ने सर्वसम्मति से पारित किया था और विपक्ष ने विशेष रूप से इसे 2029 तक लागू करने की मांग की थी।    21वीं सदी का बड़ा फैसला दिल्ली के Vigyan Bhawan में आयोजित कार्यक्रम में पीएम मोदी ने इस कानून को 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम लंबे समय से महसूस की जा रही महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को पूरा करता है।   महिलाओं की भागीदारी से बढ़ेगी जवाबदेही प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से निर्णय प्रक्रिया में संवेदनशीलता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है। उन्होंने यह भी बताया कि पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भूमिका इसका सफल उदाहरण है।    “आशीर्वाद लेने आया हूं” कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वह यहां किसी को उपदेश देने नहीं, बल्कि देश की महिलाओं का आशीर्वाद लेने आए हैं। उन्होंने महिलाओं के योगदान को देश के विकास में अहम बताया और कहा कि यह कानून उनके सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम है।    सामाजिक न्याय की दिशा में पहल पीएम मोदी के अनुसार, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि एक समतामूलक समाज बनाने की दिशा में प्रयास है, जहां सामाजिक न्याय केवल नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता बने।

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कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट? देवेंद्र फडणवीस का बड़ा दावा- चुनाव न जिता पाने के कारण राहुल गांधी को हटाने की तैयारी

मुंबई, एजेंसियां। देश की राजनीति में इन दिनों बयानों के तीर तेजी से चल रहे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने रविवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ एक बड़ा दावा कर सियासी हलचल तेज कर दी है। फडणवीस का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर अब राहुल गांधी को नेतृत्व से हटाने की भूमिका तैयार की जा रही है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि लगातार मिल रही चुनावी हार के कारण पार्टी के भीतर ही उनके नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं और एक ऐसा माहौल बन रहा है जहां उन्हें पद से मुक्त करने पर विचार किया जा सकता है।   राहुल गांधी के नेतृत्व पर फडणवीस का प्रहार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा कि राहुल गांधी इस समय केवल अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा प्रबल हो रही है कि राहुल गांधी पार्टी के लिए चुनावी जीत सुनिश्चित करने में पूरी तरह असमर्थ रहे हैं। फडणवीस ने आरोप लगाया कि अपनी विफलताओं और नेतृत्व को लेकर उठ रहे आंतरिक विरोध से ध्यान भटकाने के लिए राहुल गांधी लगातार केंद्र सरकार और विचारधारा पर हमलावर रहते हैं। उन्होंने राहुल के हालिया बयानों को उनके राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की एक कोशिश करार दिया।   संविधान की रक्षा और आरएसएस पर राहुल का पलटवार दूसरी ओर, राहुल गांधी ने भी दिल्ली के मंडी हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) पर तीखा हमला किया। 14 अप्रैल को मनाई जाने वाली डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती से पहले आयोजित 'रन फॉर आंबेडकर, रन फॉर कॉन्स्टीट्यूशन' मैराथन को संबोधित करते हुए उन्होंने गंभीर आरोप लगाए। राहुल ने कहा कि भाजपा और संघ की विचारधारा संविधान को समाप्त करना चाहती है।   उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि आंबेडकर जी का सबसे बड़ा संदेश संविधान ही था, जिसके बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। राहुल गांधी ने दावा किया कि सत्ताधारी दल के लोग भले ही आंबेडकर जी की प्रतिमा के सामने नतमस्तक हों, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य समाज में समानता को खत्म करना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी लड़ाई देश के संविधान को मजबूत करने और उसकी रक्षा करने के लिए जारी रहेगी।   प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी की दुर्लभ मुलाकात इन सियासी हमलों के बीच शनिवार को एक ऐसा वाकया भी सामने आया, जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। महान समाज सुधारक ज्योतिराव फुले की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच औपचारिक मुलाकात हुई। आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने वाले इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच यह बातचीत काफी चर्चा में रही।   कार्यक्रम के दौरान जब प्रधानमंत्री फुले की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने पहुंचे, तो वहां खड़े गणमान्य व्यक्तियों की पंक्ति में राहुल गांधी भी शामिल थे। पीएम मोदी ने वहां रुककर राहुल गांधी से करीब 1 मिनट तक बातचीत की। हालांकि, इस संक्षिप्त संवाद का विषय क्या था, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस शिष्टाचार के गहरे मायने तलाशे जा रहे हैं।   वर्तमान में जिस तरह से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संविधान और नेतृत्व को लेकर बहस छिड़ी हुई है, उससे आगामी राजनीतिक समीकरणों के और भी दिलचस्प होने की उम्मीद है। जहां एक ओर भाजपा चुनावी प्रदर्शन को आधार बनाकर हमलावर है, वहीं कांग्रेस संविधान की रक्षा को अपना प्रमुख एजेंडा बनाकर जनता के बीच जा रही है।

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