Bengal polls

CAPF personnel guard West Bengal counting centre with strict QR code entry security
बंगाल काउंटिंग डे पर अभेद सुरक्षा घेरा: 700 CAPF कंपनियां तैनात, QR कोड के बिना एंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना (4 मई) को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने के लिए सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर कड़ी कर दी गई है। राज्य में अक्सर चुनाव के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान में रखते हुए इस बार भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने पहले से ही व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। “राज्य के हर कोने में कानून का राज रहेगा” चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी प्रकार की हिंसा, उपद्रव या अवैध गतिविधि को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग ने कहा है कि मतगणना के दौरान और उसके बाद भी पूरे राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। 700 CAPF कंपनियों की तैनाती, मल्टी-लेयर सिक्योरिटी सुरक्षा के मद्देनजर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की करीब 700 कंपनियों को राज्यभर में तैनात किया जा रहा है। यह तैनाती सिर्फ काउंटिंग डे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नतीजों के बाद भी संवेदनशील इलाकों में बलों की मौजूदगी बनी रहेगी। सुरक्षा व्यवस्था को तीन स्तरों में बांटा गया है: पहला घेरा: काउंटिंग सेंटर के बाहरी इलाके में, जहां भारी संख्या में केंद्रीय बल तैनात रहेंगे। दूसरा घेरा: सेंटर के प्रवेश द्वार पर, जहां पहचान और जांच की कड़ी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। तीसरा घेरा: काउंटिंग हॉल के अंदर, जहां केवल अधिकृत अधिकारी और कर्मचारी ही मौजूद रहेंगे। इसके अलावा, ‘वल्नरेबल’ और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष पेट्रोलिंग की व्यवस्था की गई है, ताकि किसी भी तरह की भीड़ या हिंसक गतिविधि को तुरंत रोका जा सके। QR कोड आधारित डिजिटल एंट्री सिस्टम इस बार सुरक्षा व्यवस्था को और आधुनिक बनाते हुए काउंटिंग सेंटर्स में प्रवेश के लिए QR-Coded Photo ID अनिवार्य कर दिया गया है। बिना इस डिजिटल पहचान पत्र के किसी भी व्यक्ति को अंदर जाने की अनुमति नहीं होगी। यह कदम फर्जी पहचान या अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 24/7 कमांड हब और हाई-टेक निगरानी चुनाव आयोग ने राज्यभर में अत्याधुनिक कमांड हब स्थापित किए हैं, जहां से चौबीसों घंटे निगरानी रखी जाएगी। सभी मतगणना केंद्रों को CCTV कैमरों से जोड़ा गया है और उनकी लाइव फीड सीधे आयोग के नियंत्रण कक्ष तक पहुंचेगी। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या सामने आने पर तुरंत एक्शन लेने के लिए क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) भी तैनात की गई है। आम जनता के लिए हेल्पलाइन और शिकायत व्यवस्था आयोग ने नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हेल्पलाइन नंबर 1800 345 0008 और ईमेल wbfreeandfairpolls@gmail.com जारी किया है। कोई भी व्यक्ति हिंसा या गड़बड़ी की सूचना दे सकता है शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी हर शिकायत पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है हाईकोर्ट की निगरानी में चुनाव प्रक्रिया कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान पूरा नागरिक और पुलिस प्रशासन चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहेगा। कोर्ट ने स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं। पोस्ट-पोल हिंसा रोकने पर विशेष फोकस पश्चिम बंगाल में पिछले चुनावों के बाद हिंसा की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार सुरक्षा एजेंसियों को पहले से ही अलर्ट मोड पर रखा गया है। संवेदनशील जिलों में फ्लैग मार्च लगातार ड्रोन और CCTV निगरानी स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों के बीच समन्वय लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में बड़ा कदम चुनाव आयोग की यह व्यापक और सख्त तैयारी इस बात का संकेत है कि इस बार किसी भी कीमत पर शांति भंग नहीं होने दी जाएगी। आयोग का उद्देश्य सिर्फ मतगणना कराना नहीं, बल्कि ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करना है, जहां हर नागरिक बिना डर के लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सके।  

surbhi मई 2, 2026 0
IPS Ajay Pal Sharma faces Supreme Court petition over alleged bias during West Bengal election duty
बंगाल चुनाव विवाद: IPS अजय पाल शर्मा पर निष्पक्षता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

निष्पक्ष चुनाव पर उठे सवाल पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन पर निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने उन्हें पद से हटाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका, चुनाव आयोग पर कार्रवाई का दबाव यह जनहित याचिका आदित्य दास नामक याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल की गई है। इसमें चुनाव आयोग से अपील की गई है कि अजय पाल शर्मा को उनके पद से हटाया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपनी भूमिका के अनुरूप निष्पक्षता नहीं बरती और मतदाताओं पर प्रभाव डालने या उन्हें डराने-धमकाने जैसा व्यवहार किया। वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद इस पूरे मामले की शुरुआत उस वायरल वीडियो से हुई, जिसमें अजय पाल शर्मा को फाल्टा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान को कथित तौर पर चेतावनी देते हुए देखा गया। वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई और उनके आचरण पर सवाल उठने लगे। निष्पक्ष चुनाव को लेकर उठी मांग याचिका में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे अधिकारियों को हटाया जाए, जिन पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। हालांकि, इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। कौन हैं IPS अजय पाल शर्मा? अजय पाल शर्मा 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें कड़े और सख्त पुलिसिंग के लिए जाना जाता है और उनकी छवि अक्सर ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ और ‘यूपी के सिंघम’ के रूप में देखी जाती है। वर्तमान में उन्हें पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया गया है। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज इस मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि कुछ अधिकारियों की नियुक्ति राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी हो सकती है। वहीं टीएमसी की ओर से भी इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए जा रहे हैं।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Massive voter turnout in West Bengal election sparks battle between Mamata Banerjee and Narendra Modi
बंगाल में बंपर वोटिंग: क्या ममता की वापसी या मोदी का मिशन पूरा?

West Bengal विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान ने सियासी पारा चरम पर पहुंचा दिया है। करीब 92 फीसदी मतदान ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता इस बार चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है–क्या यह वोटिंग सत्ता परिवर्तन का संकेत है या फिर Mamata Banerjee एक बार फिर वापसी करेंगी? या Narendra Modi का बंगाल फतह का सपना पूरा होगा? रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाई धड़कनें पहले चरण में 152 सीटों पर लगभग 91.78 फीसदी मतदान हुआ। पिछले चुनाव की तुलना में यह करीब 9 फीसदी अधिक है। इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। टीएमसी और बीजेपी दोनों इसे अपने पक्ष में बता रही हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में एक पुरानी कहावत है–"ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं होता।" क्या SIR बना गेमचेंजर? इस बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। मृतक, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट वोटरों के नाम हटने से कुल मतदाताओं की संख्या कम हुई। ऐसे में मतदान प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ऊपर गया। यानी सिर्फ प्रतिशत देखकर नतीजों का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। इतिहास क्या कहता है? 2011 में भारी मतदान के बीच ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत किया था। लेकिन 2016 और 2021 में मतदान कम होने के बावजूद टीएमसी सत्ता में लौटी। दूसरी ओर, 1984 में रिकॉर्ड मतदान के बावजूद कांग्रेस ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में सफल रही थी। वहीं 1989 में अपेक्षाकृत कम मतदान के बावजूद सत्ता बदल गई। मतलब साफ है–वोटिंग प्रतिशत अकेला पैमाना नहीं है। ममता के लिए क्या है चुनौती? ममता बनर्जी की सरकार को 15 साल पूरे हो चुके हैं। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। हालांकि, लक्ष्मी भंडार, मुफ्त राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएं अभी भी टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई हैं। खासकर महिला वोटरों में ममता की पकड़ मजबूत मानी जा रही है। बीजेपी की उम्मीदें क्यों बढ़ीं? बीजेपी पहली बार बंगाल में पूर्ण बहुमत का सपना देख रही है। पार्टी हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोध, NRC, घुसपैठ और केंद्र की योजनाओं को लेकर आक्रामक अभियान चला रही है। अगर बीजेपी को जीतना है, तो उसे हिंदू वोटों का भारी ध्रुवीकरण करना होगा। साथ ही, उसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत प्रदर्शन करना होगा। मुस्लिम वोट निर्णायक बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है। यदि यह वोट एकजुट होकर टीएमसी के पक्ष में जाता है, तो बीजेपी की राह कठिन हो सकती है। लेकिन अगर Asaduddin Owaisi या अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाते हैं, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो जाएगा। ज्यादा वोटिंग का असली मतलब इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मतदाता उत्साहित है। वह बदलाव भी चाहता हो सकता है, और मौजूदा सरकार को बचाने के लिए भी निकल सकता है। वोटिंग का उछाल लोकतंत्र के लिए शानदार संकेत है, लेकिन नतीजों की गारंटी नहीं। आखिर बाजी किसके हाथ? फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। ममता बनर्जी के पास मजबूत संगठन, महिला वोट बैंक और कल्याणकारी योजनाओं का सहारा है। वहीं बीजेपी के पास मोदी फैक्टर, आक्रामक प्रचार और सत्ता विरोधी माहौल का भरोसा। 4 मई को ही तय होगा कि बंगाल में फिर "दीदी" का जादू चलेगा या "मोदी मैजिक" इतिहास रचेगा। अभी के लिए इतना तय है–बंगाल की लड़ाई बेहद रोमांचक और कांटे की है।  

surbhi अप्रैल 24, 2026 0
Pm modi west bengal visit
बंगाल दौरे पर पीएम मोदी ने हुगली में फोटोग्राफी कर खींचा सबका ध्यान

कोलकाता/हुगली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह हुगली नदी के तट पर समय बिताया। अपने बंगाल दौरे के दौरान पीएम मोदी ने न सिर्फ लोगों और नाविकों से मुलाकात की, बल्कि उन्होंने फोटोग्राफी में भी हाथ आजमाया। उन्होंने इस अनुभव की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा कीं।   हुगली तट पर पीएम मोदी का दौरा और जनता से संवाद पीएम मोदी सुबह हुगली नदी पहुंचे, जहां उन्होंने मॉर्निंग वॉक कर रहे लोगों और स्थानीय नाविकों से बातचीत की। उन्होंने नाविकों की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि उनका परिश्रम बेहद प्रेरणादायक है। इस दौरान उन्होंने नदी के किनारे खड़े होकर कई तस्वीरें भी लीं, जिसमें उनकी फोटोग्राफी में रुचि देखने को मिली।   सोशल मीडिया पर साझा की भावनाएं प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि गंगा का बंगाल की संस्कृति और आत्मा में विशेष स्थान है। उन्होंने इसे सभ्यता की शाश्वत चेतना से जोड़ते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पीएम मोदी ने कहा कि यह दौरा मां गंगा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर था।   विकास और समृद्धि का संदेश पीएम मोदी ने अपने संदेश में पश्चिम बंगाल के विकास और बंगाली समाज की समृद्धि के लिए काम करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।   चुनावी माहौल में बढ़ी गतिविधि गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। पीएम मोदी राज्य में भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।   4 मई को आएंगे नतीजे पूरे चुनावी प्रक्रिया के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम माना जा रहा है, जहां वे लगातार जनता से संवाद कर रहे हैं और पार्टी के प्रचार को मजबूत कर रहे हैं।

Unknown अप्रैल 24, 2026 0
Women voters at polling booth in West Bengal showing identity for verification during elections
बंगाल चुनाव में सख्त पहचान नियम: संदेह होने पर घूंघट-बुर्का हटाकर दिखाना होगा चेहरा, हर बूथ पर महिला कर्मी तैनात

West Bengal में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर Election Commission of India (ECI) ने पहचान सत्यापन के नियमों को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि मतदान के दौरान किसी भी मतदाता को पहचान छिपाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर किसी की पहचान पर जरा सा भी संदेह होता है, तो उसे अपना चेहरा दिखाना अनिवार्य होगा–चाहे वह घूंघट में हो या बुर्का में। यह फैसला चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है, क्योंकि पिछले चुनावों में फर्जी मतदान को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। क्या हैं नए नियम? चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार: मतदान केंद्र पर आने वाले हर मतदाता की पहचान की पुष्टि की जाएगी अगर कोई मतदाता चेहरा ढककर आता है और पहचान को लेकर संदेह होता है, तो उसे चेहरा दिखाना होगा महिला मतदाताओं की पहचान केवल महिला अधिकारी द्वारा ही जांची जाएगी किसी भी परिस्थिति में पहचान सत्यापन से छूट नहीं दी जाएगी आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होगा और इसका उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है। महिला कर्मियों की अहम भूमिका इस प्रक्रिया को संवेदनशील तरीके से लागू करने के लिए आयोग ने खास इंतजाम किए हैं: हर मतदान केंद्र पर कम से कम एक महिला कर्मचारी की तैनाती अनिवार्य की गई है जहां जरूरत होगी, महिला अधिकारी अलग से जाकर पहचान सत्यापन करेंगी इससे महिला मतदाताओं की गरिमा और निजता (privacy) बनी रहेगी क्यों जरूरी हुआ यह कदम? चुनाव आयोग के मुताबिक, कई बार देखा गया है कि: कुछ लोग नकली पहचान के साथ वोट डालने की कोशिश करते हैं घूंघट या बुर्का का इस्तेमाल पहचान छिपाने के लिए किया जाता है इससे फर्जी मतदान (Bogus Voting) की संभावना बढ़ जाती है इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने इस बार सख्ती बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि हर वोट असली मतदाता द्वारा ही डाला जाए। पहले भी हो चुका है विवाद यह मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले Bihar के चुनावों में भी घूंघट और बुर्का में पहचान सत्यापन को लेकर विवाद हुआ था। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी वहीं चुनाव आयोग ने इसे चुनाव की निष्पक्षता के लिए जरूरी बताया था इस बार बंगाल में पहले से ही स्पष्ट नियम जारी कर दिए गए हैं, ताकि मतदान के दिन किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने। संवेदनशील माने जा रहे हैं ज्यादातर बूथ चुनाव आयोग के अनुसार: राज्य के अधिकांश मतदान केंद्र संवेदनशील श्रेणी में आते हैं करीब 8,500 बूथों को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया गया है पहले चरण में होने वाले मतदान के लिए 1,500 बूथों पर अतिरिक्त सुरक्षा दी जा रही है यह आंकड़े बताते हैं कि इस बार चुनाव को लेकर प्रशासन काफी सतर्क है। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कई अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं: सभी प्रमुख मतदान केंद्रों पर CCTV कैमरे लगाए जाएंगे केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाएगी मतदान केंद्रों के अंदर और बाहर कड़ी निगरानी रखी जाएगी भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के कई असर हो सकते हैं: फर्जी मतदान पर रोक लगेगी चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी मतदाताओं का भरोसा मजबूत होगा

surbhi अप्रैल 20, 2026 0
West Bengal map
बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में दागी और धनी उम्मीदवारों का दबदबा, BJP के 70% प्रत्याशी दागी, TMC सबसे अमीर

कोलकाता: Association for Democratic Reforms (ADR) की ताजा रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों में दागी और करोड़पति प्रत्याशियों का दबदबा साफ दिखाई दे रहा है। 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले ADR और पश्चिम बंगाल इलेक्शन वॉच द्वारा 1,475 उम्मीदवारों के हलफनामों के विश्लेषण में सामने आया कि: कुल 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं 294 उम्मीदवारों पर गंभीर आरोप (हत्या, हत्या का प्रयास, दुष्कर्म आदि) इनमें 19 पर हत्या और 98 पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज दागी उम्मीदवारों में BJP सबसे आगे पार्टीवार आंकड़े भी काफी चौंकाने वाले हैं: BJP: 70% (152 में से 106 उम्मीदवार दागी) TMC: 43% उम्मीदवारों पर केस CPI(M): 43% Congress: 26% 66 सीटें ‘रेड अलर्ट’ घोषित रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण की 152 सीटों में से 66 सीटों को ‘रेड अलर्ट’ घोषित किया गया है। इन सीटों पर तीन या उससे अधिक उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। धनबल में TMC सबसे आगे सिर्फ बाहुबल ही नहीं, धनबल के मामले में भी चुनाव काफी भारी दिख रहा है: उम्मीदवारों की औसत संपत्ति: 1.34 करोड़ रुपये TMC उम्मीदवार सबसे अमीर, औसत संपत्ति 5.70 करोड़ रुपये कुल 309 उम्मीदवार (21%) करोड़पति महिला प्रतिनिधित्व अब भी कम रिपोर्ट में महिला भागीदारी को लेकर निराशाजनक तस्वीर सामने आई है: कुल 1,478 उम्मीदवारों में सिर्फ 167 महिलाएं (11%) टिकट वितरण में महिलाओं को अब भी सीमित अवसर कब होगी वोटिंग? West Bengal की 294 विधानसभा सीटों के लिए मतदान दो चरणों में होगा: पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल नतीजे: 4 मई ADR की रिपोर्ट ने एक बार फिर चुनावी राजनीति में “विनिंग एबिलिटी” को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर सवाल खड़े किए हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस बार साफ छवि को प्राथमिकता देते हैं या फिर धनबल और बाहुबल का असर बरकरार रहता है।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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