कोलकाता/हुगली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह हुगली नदी के तट पर समय बिताया। अपने बंगाल दौरे के दौरान पीएम मोदी ने न सिर्फ लोगों और नाविकों से मुलाकात की, बल्कि उन्होंने फोटोग्राफी में भी हाथ आजमाया। उन्होंने इस अनुभव की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा कीं।
पीएम मोदी सुबह हुगली नदी पहुंचे, जहां उन्होंने मॉर्निंग वॉक कर रहे लोगों और स्थानीय नाविकों से बातचीत की। उन्होंने नाविकों की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि उनका परिश्रम बेहद प्रेरणादायक है। इस दौरान उन्होंने नदी के किनारे खड़े होकर कई तस्वीरें भी लीं, जिसमें उनकी फोटोग्राफी में रुचि देखने को मिली।
प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि गंगा का बंगाल की संस्कृति और आत्मा में विशेष स्थान है। उन्होंने इसे सभ्यता की शाश्वत चेतना से जोड़ते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पीएम मोदी ने कहा कि यह दौरा मां गंगा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर था।
पीएम मोदी ने अपने संदेश में पश्चिम बंगाल के विकास और बंगाली समाज की समृद्धि के लिए काम करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। पीएम मोदी राज्य में भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
पूरे चुनावी प्रक्रिया के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम माना जा रहा है, जहां वे लगातार जनता से संवाद कर रहे हैं और पार्टी के प्रचार को मजबूत कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल जितना कारगार है उतना ही खतरनाक भी। आज कल इन्हीं प्लेटफॉर्म के जरिए मासूम नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा ही एक मामला महाराष्ट्र के अमरावती में सामने आया है, जिसने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए मासूम लड़कियों को निशाना बनाकर किए गए इस संगीन अपराध ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग हो रही है। क्या है मामला पुलिस के मुताबिक, मोहम्मद अयाज नाम के एक युवक को गिरफ्तार किया गया है, जिस पर आरोप है कि उसने सोशल मीडिया ऐप्स, खासकर व्हाट्सएप और स्नैपचैट के माध्यम से नाबालिग लड़कियों से संपर्क साधा और उन्हें बहलाकर अपने जाल में फंसाया। शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि आरोपी ने करीब 180 लड़कियों का यौन शोषण किया और 350 से अधिक आपत्तिजनक वीडियो बनाये। पुलिस ने उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया है, जिसमें भारी मात्रा में संवेदनशील सामग्री पाई गई है। फिलहाल आरोपी को सात दिनों की पुलिस हिरासत में भेजा गया है। पुलिस जुटी जांच मे पुलिस की कार्रवाई में अब तक कुछ अन्य पीड़ितों की पहचान भी हुई है, जिनमें कई महिलाओं के फोटो और वीडियो बरामद किए गए हैं। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि इस संवेदनशील मामले में अफवाहों से बचें और जांच में सहयोग करें. फिलहाल पुलिस आरोपी के डिजिटल नेटवर्क और संपर्कों की गहन पड़ताल कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस अपराध में और कौन-कौन शामिल है। नेटवर्क खंगाल रहीं जांच एजेंसिया जांच एजेंसियां अब इस मामले को सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित मानकर नहीं चल रहीं, बल्कि इसे एक संभावित संगठित नेटवर्क के रूप में भी खंगाल रही हैं। साइबर एक्सपर्ट्स की मदद से आरोपी के मोबाइल, सोशल मीडिया अकाउंट्स और क्लाउड डेटा की फॉरेंसिक जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये आपत्तिजनक वीडियो अन्य प्लेटफॉर्स्ि पर साझा या बेचे तो नहीं गए। इसके साथ ही पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या आरोपी के साथ और लोग जुड़े थे, जो लड़कियों को फंसाने या कंटेंट फैलाने में उसकी मदद कर रहे थे। इस पूरे घटनाक्रम ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उत्तर प्रदेश Uttar Pradesh Anti-Terrorism Squad ने बड़ी कार्रवाई करते हुए नोएडा से दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी के अनुसार, दोनों आरोपी पाकिस्तान स्थित गैंगस्टर्स और खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े नेटवर्क के संपर्क में थे और भारत में आतंकी गतिविधियों की साजिश रच रहे थे। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान तुषार चौहान उर्फ हिजबुल्ला अली खान और समीर खान के रूप में हुई है। दोनों की उम्र करीब 20 वर्ष बताई जा रही है। सोशल मीडिया से हो रहा था रेडिकलाइजेशन ATS के मुताबिक, पाकिस्तानी गैंगस्टर्स शहजाद भट्टी और आबिद जट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए भारतीय युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेल रहे थे। इन युवाओं को संवेदनशील स्थानों की रेकी, टारगेटेड हमले और स्लीपर सेल तैयार करने के लिए उकसाया जा रहा था। हथियार और मोबाइल बरामद छापेमारी के दौरान आरोपियों के पास से 32 बोर की पिस्टल, पांच जिंदा कारतूस, एक चाकू और दो मोबाइल फोन बरामद किए गए। ATS को मोबाइल फोन से कई अहम डिजिटल सबूत भी मिले हैं। बड़ी साजिश का खुलासा पूछताछ में सामने आया है कि तुषार को कथित तौर पर ग्रेनेड हमले और टारगेटेड हत्या जैसे काम सौंपे गए थे। इसके बदले उसे लाखों रुपये और दुबई के रास्ते पाकिस्तान भेजने का लालच दिया गया था। वहीं, समीर खान को कथित तौर पर "TTH" लिखने, नए लोगों को जोड़ने और नेटवर्क विस्तार की जिम्मेदारी दी गई थी। UAPA समेत कई धाराओं में केस दोनों आरोपियों के खिलाफ लखनऊ में UAPA, आर्म्स एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। ATS अब उनके नेटवर्क और अन्य सहयोगियों की तलाश में जुटी है। एजेंसी का कहना है कि इस कार्रवाई से एक बड़ी आतंकी साजिश को समय रहते नाकाम कर दिया गया।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोटक महिंद्रा बैंक और नगर निगम पंचकूला से जुड़े कथित 145 करोड़ रुपये के घोटाले में बड़ी कार्रवाई की है। मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के तहत एजेंसी ने हरियाणा और पंजाब के कई शहरों में एक साथ छापेमारी की। 12 ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई ईडी ने बुधवार को चंडीगढ़, पंचकूला, जीरकपुर, डेराबस्सी और पटियाला जिले के राजपुरा में कुल 12 परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया। इस दौरान एजेंसी ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, बिक्री-खरीद समझौते और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े अहम सबूत बरामद किए। 145 करोड़ रुपये के गबन का आरोप ईडी के मुताबिक, यह मामला पंचकूला नगर निगम के करीब 145 करोड़ रुपये के सरकारी फंड के गबन से जुड़ा है। जांच एजेंसी का दावा है कि बैंक अधिकारियों, नगर निगम कर्मियों और निजी व्यक्तियों ने मिलकर सुनियोजित साजिश के तहत इस घोटाले को अंजाम दिया। फर्जी दस्तावेजों से खोले गए बैंक खाते जांच में सामने आया है कि नगर निगम पंचकूला के नाम पर फर्जी और जाली दस्तावेजों के जरिए अनधिकृत बैंक खाते खोले गए। इसके बाद असली खातों से सरकारी धन को इन फर्जी खातों में ट्रांसफर किया गया। रियल एस्टेट में लगाया गया पैसा ईडी के अनुसार, गबन की गई रकम को कई कंपनियों और व्यक्तियों के जरिए घुमाया गया। बाद में यह पैसा निजी लोगों और रियल एस्टेट फर्मों तक पहुंचाया गया। नगर निगम को धोखा देने के लिए 145 करोड़ रुपये से अधिक के फर्जी फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें भी जारी की गईं। ACB की FIR के बाद शुरू हुई जांच यह जांच पंचकूला एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की गई। मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। जांच में और खुलासों की संभावना ईडी का कहना है कि छापेमारी के दौरान मिले दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच की जा रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।