पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee ने पहली बार पार्टी नेताओं और उम्मीदवारों के साथ बड़ी बैठक की। कोलकाता के कालीघाट स्थित आवास पर हुई इस बैठक में उन्होंने साफ कहा कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। बैठक में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee भी मौजूद रहे। ममता बनर्जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से हार से निराश न होने और संगठन को दोबारा मजबूत करने की अपील की। ‘तृणमूल कांग्रेस कभी नहीं झुकेगी’ ममता बनर्जी ने बैठक में कहा,“जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, उन्हें जाने दीजिए। मैं पार्टी को नए सिरे से खड़ा करूंगी। जो लोग पार्टी में बने रहेंगे, उनसे कहती हूं कि क्षतिग्रस्त पार्टी कार्यालयों का पुनर्निर्माण कीजिए, उन्हें रंगिए और फिर से खोलिए। जरूरत पड़ी तो मैं खुद भी उन्हें रंग दूंगी।” उन्होंने आगे कहा कि तृणमूल कांग्रेस कभी झुकेगी नहीं और पार्टी फिर से जनता के बीच मजबूती से खड़ी होगी। बंगाल में TMC को मिली बड़ी हार इस बार पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। आजादी के बाद पहली बार Suvendu Adhikari के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में सरकार बनाई। 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस केवल 80 सीटों तक सिमट गई। वहीं ममता बनर्जी को भी अपनी भवानीपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में भी शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें नंदीग्राम सीट से हराया था। ‘जनादेश लूटा गया’ बैठक में ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों पर भी सवाल उठाए। सूत्रों के अनुसार उन्होंने कहा कि जनता के जनादेश को छीना गया है और पार्टी कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने की कोशिश की गई। अभिषेक बनर्जी ने बढ़ाया उम्मीदवारों का मनोबल तृणमूल कांग्रेस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया। पार्टी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “हमारे उम्मीदवारों ने लगातार धमकियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद साहस के साथ चुनाव लड़ा।” TMC के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती राज्य की सत्ता गंवाने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठन को बचाए रखना और नेताओं के संभावित पलायन को रोकना सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में पार्टी के भीतर बड़े बदलाव और संगठनात्मक फेरबदल देखने को मिल सकते हैं।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार शुभेंदु अधिकारी एक बड़े ‘टारगेट अचीवर’ के रूप में उभरे हैं। नंदीग्राम के बाद अब भवानीपुर में भी उन्होंने ममता बनर्जी को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो उनकी पिछली नंदीग्राम जीत (1956 वोट) से कहीं ज्यादा है। जीत के बाद भावुक हुए शुभेंदु अपनी जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने इसे भाजपा कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यह जीत उन 300 कार्यकर्ताओं की है, जिन्होंने राजनीतिक हिंसा में अपनी जान गंवाई। उन्होंने समर्थकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें हिंदू, जैन और सिख समुदायों का भरपूर समर्थन मिला, जिससे यह जीत संभव हो सकी। मोदी-शाह को दिया श्रेय शुभेंदु अधिकारी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विशेष आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया था। वहीं, अमित शाह ने भी जीत के बाद प्रतिक्रिया देते हुए भवानीपुर की जनता को बधाई दी और इसे बदलाव का संकेत बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाजपा की जीत पर कहा कि “बंगाल बदल गया है, एक नए युग की शुरुआत हुई है।” भाजपा कार्यकर्ताओं में जश्न शुभेंदु अधिकारी की जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कोलकाता सहित कई इलाकों में जश्न का माहौल रहा और समर्थक सड़कों पर उतरकर खुशी मनाते नजर आए। राजनीतिक संदेश साफ भवानीपुर जैसी सीट पर जीत को भाजपा के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है। यह न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की मजबूती को दिखाता है, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों का भी संकेत देता है।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार ऐतिहासिक नतीजे सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाने की ओर निर्णायक बढ़त बना ली है। 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए भाजपा 190 से अधिक सीटों पर जीत या बढ़त के साथ सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। करीब 15 साल से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ी गई इस लड़ाई में कई दिग्गज नेता अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी के जनाधार में गिरावट साफ नजर आई। कैसे बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण 2011 में जहां भाजपा का खाता तक नहीं खुला था, वहीं 2016 में उसने 3 सीटें जीतीं और 2021 में 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी। इस बार पार्टी ने 40% से ज्यादा वोट शेयर हासिल कर ग्रामीण, आदिवासी और औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इन इलाकों में भाजपा की बड़ी बढ़त चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा ने उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती इलाकों में शानदार प्रदर्शन किया। इन क्षेत्रों में पार्टी को भारी जनसमर्थन मिला, जबकि टीएमसी शहरी इलाकों और कुछ पारंपरिक सीटों तक सिमटती नजर आई। भाजपा की जीत के बड़े कारण भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे कई अहम वजहें रहीं। पार्टी का मजबूत संगठन, आक्रामक चुनाव प्रचार और बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इसके प्रमुख कारण बने। इसके अलावा सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों में गहरी पैठ बनाना भी भाजपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। सत्ता विरोधी लहर और विपक्ष की कमजोर रणनीति ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। टीएमसी की हार के कारण तृणमूल कांग्रेस की हार के पीछे सत्ता विरोधी माहौल, संगठनात्मक कमजोरी और नेताओं के खिलाफ बढ़ता असंतोष प्रमुख कारण रहे। कई मंत्री अपने ही क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर साबित हुई। कल्याणकारी योजनाएं भी इस बार मतदाताओं को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सकीं। नया राजनीतिक अध्याय शुरू इस चुनाव परिणाम के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। वामपंथ और कांग्रेस के बाद टीएमसी का दौर खत्म होता दिख रहा है और अब भाजपा के नेतृत्व में राज्य में नई राजनीतिक दिशा तय होती नजर आ रही है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
सुबह से ही कई जिलों में तनावपूर्ण माहौल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान के दौरान बुधवार सुबह से ही कई इलाकों में हिंसा, तोड़फोड़ और EVM में गड़बड़ी की खबरें सामने आईं। नदिया, हावड़ा, शांतिपुर और भांगर जैसे क्षेत्रों में मतदान के शुरुआती घंटों में ही माहौल तनावपूर्ण हो गया। यह चुनाव राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विवाद के बीच हो रहा है, जिसने पहले से ही राजनीतिक तापमान बढ़ा रखा है। चापड़ा में BJP एजेंट पर हमले का आरोप नदिया जिले के चापड़ा में बीजेपी ने आरोप लगाया कि उसके पोलिंग एजेंट मोशारेफ मीर पर तृणमूल समर्थकों ने हमला किया। बताया गया कि उन्हें लोहे की रॉड से पीटा गया, जिससे वह घायल हो गए। उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। बीजेपी उम्मीदवार सैकत सरकार ने घटना के लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। हावड़ा में EVM खराब, मतदान प्रभावित हावड़ा के एक मतदान केंद्र पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में तकनीकी खराबी की शिकायत मिली। इसके कारण कुछ समय के लिए मतदान प्रक्रिया बाधित रही। हालांकि, चुनाव अधिकारियों ने जल्द ही समस्या का समाधान कर मतदान दोबारा शुरू करा दिया। EVM को लेकर विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच पहले से ही तीखी बहस चलती रही है। एंटाली में प्रियंका तिबरेवाल की अधिकारियों से बहस कोलकाता के एंटाली विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी उम्मीदवार प्रियंका तिबरेवाल की मतदान केंद्र पर चुनाव अधिकारियों और सुरक्षा बलों से तीखी बहस हो गई। उनके पोलिंग एजेंट को बूथ से बाहर निकाले जाने पर विवाद बढ़ गया। प्रियंका ने आरोप लगाया कि मतदान केंद्र के भीतर पक्षपातपूर्ण गतिविधियां हो रही थीं। शांतिपुर और भांगर में भी तनाव शांतिपुर में बीजेपी के चुनावी कैंप में तोड़फोड़ की खबर आई। वहीं, दक्षिण 24 परगना के भांगर में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश से रोके जाने का आरोप लगा। इन घटनाओं ने कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ममता बनर्जी ने केंद्रीय बलों पर लगाए गंभीर आरोप मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्रीय सुरक्षा बलों पर बीजेपी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बाहरी पर्यवेक्षक और केंद्रीय बल मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ममता ने कहा, "वोट मतदाता डालेंगे, सुरक्षा बल नहीं। इस तरह चुनाव नहीं कराए जा सकते।" 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92.88 प्रतिशत मतदान हुआ था। दूसरे और अंतिम चरण के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। राज्य की राजनीति में इस बार ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच सीधी और बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।
कोलकाता में गरमाया सियासी माहौल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है और इसे “धांधली” के जरिए अंजाम दिया जा रहा है। ममता बनर्जी ने यहां तक कहा कि चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त ऑब्जर्वर “आतंकियों जैसा व्यवहार” कर रहे हैं, जिससे राजनीतिक विवाद और तेज हो गया है। BJP पर “इलेक्शन रिगिंग” का आरोप कोलकाता में TMC पार्षद असीम बोस से मुलाकात के दौरान ममता बनर्जी ने दावा किया कि भाजपा चुनाव में गड़बड़ी कर रही है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बलों का इस्तेमाल डराने और दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। केंद्रीय बलों पर गंभीर आरोप मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्रीय सुरक्षा बल TMC नेताओं और कार्यकर्ताओं के घरों में जबरन प्रवेश कर रहे हैं और लोगों को डराने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इसी तरह की एक घटना देर रात TMC पार्षद असीम बोस के घर पर हुई, जिसके बाद वह उनसे मिलने पहुंचीं। चुनाव आयोग के ऑब्जर्वर्स पर विवादित बयान ममता बनर्जी ने Election Commission of India के ऑब्जर्वर्स पर भी गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका व्यवहार निष्पक्षता के विपरीत दिखाई दे रहा है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में तनाव और बढ़ गया है। विपक्षी दलों ने ममता के आरोपों को चुनावी माहौल बिगाड़ने वाला बताया है, जबकि TMC ने अपने रुख का बचाव किया है। चुनाव के माहौल में ममता बनर्जी के इन आरोपों ने सियासी टकराव को और तेज कर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि चुनाव आयोग और भाजपा इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
फाल्टा में मतदान के बीच हाई वोल्टेज ड्रामा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान फाल्टा सीट पर मंगलवार को उस समय राजनीतिक तापमान बढ़ गया, जब चुनाव ड्यूटी पर तैनात IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा ने तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी जहांगीर खान को कड़ी चेतावनी दी। मतदाताओं को धमकाने की शिकायत मिलने के बाद शर्मा खुद मौके पर पहुंचे। अजय पाल शर्मा को यूपी के चर्चित "एनकाउंटर स्पेशलिस्ट" के तौर पर जाना जाता है। फिलहाल उन्हें पश्चिम बंगाल चुनाव में पुलिस ऑब्जर्वर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। "शिकायत मिली तो सख्त कार्रवाई होगी" स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि जहांगीर खान और उनके समर्थक मतदाताओं पर दबाव बना रहे हैं। शिकायत मिलने पर शर्मा सीधे उनके आवास पहुंचे। जहांगीर खान उस समय घर पर मौजूद नहीं थे। इसके बाद उन्होंने परिजनों को स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा, "जहांगीर को बता दीजिए, अगर किसी ने बदमाशी की या वोटरों को डराने-धमकाने की कोशिश की, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बाद में शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।" सुरक्षा घेरे पर भी उठे सवाल निरीक्षण के दौरान अजय पाल शर्मा ने जहांगीर खान के आवास पर 14 पुलिसकर्मियों को तैनात पाया। जब उन्होंने स्थानीय एसपी से जानकारी मांगी, तो पता चला कि उम्मीदवार को Y श्रेणी सुरक्षा के तहत केवल 10 जवान मंजूर किए गए थे। अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती पर शर्मा ने तत्काल स्पष्टीकरण तलब किया। BJP ने सराहा, TMC ने उठाए सवाल इस कार्रवाई के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई। बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने अजय पाल शर्मा की कार्रवाई की प्रशंसा करते हुए कहा कि चुनाव में डर और दबाव की राजनीति अब नहीं चलेगी। वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने शर्मा की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। पार्टी ने आरोप लगाया कि उनकी नियुक्ति राजनीतिक उद्देश्य से की गई है। अखिलेश यादव भी कूदे मैदान में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी अपने "परीक्षित एजेंटों" को चुनाव पर्यवेक्षक बनाकर बंगाल भेज रही है। उन्होंने दावा किया कि ऐसे प्रयास सफल नहीं होंगे। चुनाव आयोग की नज़र इस घटना ने पश्चिम बंगाल चुनाव में निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ दी है। चुनाव आयोग ने साफ किया है कि मतदाताओं को प्रभावित करने या डराने की किसी भी कोशिश पर सख्त कार्रवाई होगी। राज्य में मतदान के बीच यह मामला अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता सामने आई है। भांगड़ विधानसभा क्षेत्र में एक बार फिर बम से भरा बोरा बरामद होने के बाद केंद्र सरकार ने मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) को सौंप दी है। यह घटना मतदान से ठीक पहले सामने आने के कारण राजनीतिक और सुरक्षा दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। क्या है पूरा मामला? ताजा घटना उत्तर काशीपुर थाना क्षेत्र के मझेरैत इलाके की है, जहां एक परित्यक्त घर से बमों से भरा बोरा मिला। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बमों को निष्क्रिय किया और इलाके में तलाशी अभियान चलाया। इसके बाद उसी क्षेत्र में एक और जगह से कुल 9 नए बम बरामद किए गए, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया। NIA जांच का आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय, जिसकी जिम्मेदारी Amit Shah के पास है, ने इस मामले में बड़ी साजिश की आशंका जताते हुए NIA जांच के आदेश दिए हैं। चुनाव आयोग ने भी इसे गंभीरता से लेते हुए राज्य पुलिस को विशेष अभियान चलाने और दोषियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए हैं। आरोप-प्रत्यारोप तेज इस घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। Indian Secular Front (ISF) ने आरोप लगाया है कि All India Trinamool Congress (TMC) के कार्यकर्ताओं ने इलाके में अशांति फैलाने के लिए बम छिपाए थे। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है कि ISF कार्यकर्ताओं ने ही पार्टी को बदनाम करने के लिए यह साजिश रची है। इलाके में तनाव, सुरक्षा बढ़ाई गई लगातार बम बरामद होने की घटनाओं से भांगड़ और आसपास के इलाकों में तनाव का माहौल है। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए केंद्रीय बलों के साथ-साथ स्थानीय पुलिस को तैनात किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के दौरान इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए जांच एजेंसियों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
West Bengal विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान ने सियासी पारा चरम पर पहुंचा दिया है। करीब 92 फीसदी मतदान ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता इस बार चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है–क्या यह वोटिंग सत्ता परिवर्तन का संकेत है या फिर Mamata Banerjee एक बार फिर वापसी करेंगी? या Narendra Modi का बंगाल फतह का सपना पूरा होगा? रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाई धड़कनें पहले चरण में 152 सीटों पर लगभग 91.78 फीसदी मतदान हुआ। पिछले चुनाव की तुलना में यह करीब 9 फीसदी अधिक है। इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। टीएमसी और बीजेपी दोनों इसे अपने पक्ष में बता रही हैं। लेकिन चुनावी राजनीति में एक पुरानी कहावत है–"ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं होता।" क्या SIR बना गेमचेंजर? इस बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। मृतक, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट वोटरों के नाम हटने से कुल मतदाताओं की संख्या कम हुई। ऐसे में मतदान प्रतिशत स्वाभाविक रूप से ऊपर गया। यानी सिर्फ प्रतिशत देखकर नतीजों का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। इतिहास क्या कहता है? 2011 में भारी मतदान के बीच ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत किया था। लेकिन 2016 और 2021 में मतदान कम होने के बावजूद टीएमसी सत्ता में लौटी। दूसरी ओर, 1984 में रिकॉर्ड मतदान के बावजूद कांग्रेस ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में सफल रही थी। वहीं 1989 में अपेक्षाकृत कम मतदान के बावजूद सत्ता बदल गई। मतलब साफ है–वोटिंग प्रतिशत अकेला पैमाना नहीं है। ममता के लिए क्या है चुनौती? ममता बनर्जी की सरकार को 15 साल पूरे हो चुके हैं। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। हालांकि, लक्ष्मी भंडार, मुफ्त राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएं अभी भी टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई हैं। खासकर महिला वोटरों में ममता की पकड़ मजबूत मानी जा रही है। बीजेपी की उम्मीदें क्यों बढ़ीं? बीजेपी पहली बार बंगाल में पूर्ण बहुमत का सपना देख रही है। पार्टी हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोध, NRC, घुसपैठ और केंद्र की योजनाओं को लेकर आक्रामक अभियान चला रही है। अगर बीजेपी को जीतना है, तो उसे हिंदू वोटों का भारी ध्रुवीकरण करना होगा। साथ ही, उसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत प्रदर्शन करना होगा। मुस्लिम वोट निर्णायक बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है। यदि यह वोट एकजुट होकर टीएमसी के पक्ष में जाता है, तो बीजेपी की राह कठिन हो सकती है। लेकिन अगर Asaduddin Owaisi या अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाते हैं, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो जाएगा। ज्यादा वोटिंग का असली मतलब इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मतदाता उत्साहित है। वह बदलाव भी चाहता हो सकता है, और मौजूदा सरकार को बचाने के लिए भी निकल सकता है। वोटिंग का उछाल लोकतंत्र के लिए शानदार संकेत है, लेकिन नतीजों की गारंटी नहीं। आखिर बाजी किसके हाथ? फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। ममता बनर्जी के पास मजबूत संगठन, महिला वोट बैंक और कल्याणकारी योजनाओं का सहारा है। वहीं बीजेपी के पास मोदी फैक्टर, आक्रामक प्रचार और सत्ता विरोधी माहौल का भरोसा। 4 मई को ही तय होगा कि बंगाल में फिर "दीदी" का जादू चलेगा या "मोदी मैजिक" इतिहास रचेगा। अभी के लिए इतना तय है–बंगाल की लड़ाई बेहद रोमांचक और कांटे की है।
कोलकाता/हुगली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह हुगली नदी के तट पर समय बिताया। अपने बंगाल दौरे के दौरान पीएम मोदी ने न सिर्फ लोगों और नाविकों से मुलाकात की, बल्कि उन्होंने फोटोग्राफी में भी हाथ आजमाया। उन्होंने इस अनुभव की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा कीं। हुगली तट पर पीएम मोदी का दौरा और जनता से संवाद पीएम मोदी सुबह हुगली नदी पहुंचे, जहां उन्होंने मॉर्निंग वॉक कर रहे लोगों और स्थानीय नाविकों से बातचीत की। उन्होंने नाविकों की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि उनका परिश्रम बेहद प्रेरणादायक है। इस दौरान उन्होंने नदी के किनारे खड़े होकर कई तस्वीरें भी लीं, जिसमें उनकी फोटोग्राफी में रुचि देखने को मिली। सोशल मीडिया पर साझा की भावनाएं प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि गंगा का बंगाल की संस्कृति और आत्मा में विशेष स्थान है। उन्होंने इसे सभ्यता की शाश्वत चेतना से जोड़ते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पीएम मोदी ने कहा कि यह दौरा मां गंगा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर था। विकास और समृद्धि का संदेश पीएम मोदी ने अपने संदेश में पश्चिम बंगाल के विकास और बंगाली समाज की समृद्धि के लिए काम करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे। चुनावी माहौल में बढ़ी गतिविधि गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। पीएम मोदी राज्य में भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 4 मई को आएंगे नतीजे पूरे चुनावी प्रक्रिया के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। ऐसे में पीएम मोदी का यह दौरा राजनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम माना जा रहा है, जहां वे लगातार जनता से संवाद कर रहे हैं और पार्टी के प्रचार को मजबूत कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदाताओं ने लोकतंत्र के प्रति अभूतपूर्व उत्साह दिखाया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में रिकॉर्ड 92.72 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो स्वतंत्रता के बाद राज्य का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत बताया जा रहा है। वहीं, तमिलनाडु में भी 85.14 प्रतिशत मतदान के साथ नया रिकॉर्ड बना। बंगाल में इतिहास का सबसे बड़ा मतदान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे अधिक रहा। राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान कराया गया। मतदान केंद्रों पर सुबह से ही लंबी कतारें देखने को मिलीं और लोगों ने बढ़-चढ़कर अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। तमिलनाडु में एक चरण में संपन्न हुआ मतदान तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में मतदान कराया गया। राज्य में 85.14 प्रतिशत मतदान ने राजनीतिक दलों के साथ-साथ चुनाव आयोग को भी उत्साहित किया है। महिला, युवा और बुजुर्ग मतदाताओं की बड़ी भागीदारी इस चुनाव की खासियत रही। PM मोदी का TMC पर तीखा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में भारी मतदान को "परिवर्तन का जनादेश" करार दिया। उन्होंने कहा कि 4 मई को मतगणना के साथ ही पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 15 साल पुराने "सिंडिकेट सिस्टम" और "महा जंगलराज" की समाप्ति हो जाएगी। पीएम ने विश्वास जताया कि जनता बदलाव का मन बना चुकी है। दूसरे चरण की तैयारी तेज पश्चिम बंगाल में बाकी 142 सीटों पर दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा। वहीं, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी समेत सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. एस.एस. संधू और डॉ. विवेक जोशी ने मतदान प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए रखी। दोनों राज्यों के सभी मतदान केंद्रों पर लाइव वेबकास्टिंग की व्यवस्था की गई थी, जिससे निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान सुनिश्चित किया जा सके। अमित शाह ने संभाला मोर्चा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मतदान के दौरान पश्चिम बंगाल में मौजूद रहे। उन्होंने साल्ट लेक स्थित बीजेपी के चुनाव नियंत्रण कक्ष का दौरा किया और पार्टी नेताओं के साथ चुनावी स्थिति की समीक्षा की।
दुर्गापुर: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच जहां राज्य के कई हिस्सों से हिंसा और तनाव की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं दुर्गापुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने लोकतंत्र की असली भावना को उजागर कर दिया। दुर्गापुर कोर्ट परिसर में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के उम्मीदवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर राजनीतिक शिष्टाचार की मिसाल पेश की। जब आमने-सामने आए सियासी प्रतिद्वंदी घटना शुक्रवार दोपहर की है, जब दुर्गापुर पूर्व से भाजपा प्रत्याशी चंद्रशेखर बनर्जी अपने समर्थकों के साथ प्रचार कर रहे थे। उसी दौरान सीपीएम के प्रत्याशी सिमंत चटर्जी, प्रभास साईं और प्रवीर मंडल भी वहां पहुंचे। आमतौर पर ऐसे मौके पर नारेबाजी या तनाव देखने को मिलता है, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल अलग था। सभी उम्मीदवारों ने हाथ मिलाया और गले मिलकर सौहार्द का संदेश दिया। आम लोगों के लिए बना मिसाल इस दृश्य को देखकर कोर्ट परिसर में मौजूद वकील और आम लोग हैरान रह गए। चुनावी माहौल में इस तरह का सौहार्दपूर्ण व्यवहार लोगों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। पूर्व मेयर का ‘गुरु मंत्र’ इस दौरान दुर्गापुर नगर निगम के पूर्व मेयर रथिन रॉय ने भाजपा उम्मीदवार चंद्रशेखर बनर्जी को सलाह देते हुए कहा कि: “राजनीति बिना हिंसा के होनी चाहिए, समाज को बांटने की नहीं, जोड़ने की जिम्मेदारी हमारी है।” उनकी इस बात पर मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन जताया, हालांकि कुछ लोगों ने इसे चुनावी रणनीति भी बताया। उम्मीदवारों का साझा संदेश सभी प्रत्याशियों ने एक सुर में कहा कि: लोकतंत्र में शांति और शिष्टाचार जरूरी है चुनावी प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होनी चाहिए समाज में एकता और भाईचारा बनाए रखना ही राजनीति का उद्देश्य है क्यों खास है यह घटना? बंगाल चुनावों में अक्सर हिंसा और तनाव की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे में दुर्गापुर की यह तस्वीर राजनीतिक परिपक्वता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बनकर सामने आई है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सतह पर भले ही Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) की पकड़ मजबूत दिखती हो, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद सामने आए आंकड़े चुनावी समीकरण में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक माहौल तक सीमित नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न और सीट-दर-सीट मुकाबले को भी प्रभावित कर सकता है। सबसे बड़ा झटका मतदाता सूची में हुए बदलाव से जुड़ा है। SIR प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख नाम हटाए गए हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत हटाव छह जिलों-मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, और उत्तर-दक्षिण 24 परगना-से हुआ है। ये सभी क्षेत्र पारंपरिक रूप से TMC के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। ऐसे में इस बड़े बदलाव ने चुनावी तस्वीर को पहले से ज्यादा अनिश्चित बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषण यह भी बताता है कि TMC का वोट शेयर भले ही अधिक हो, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा कुछ खास क्षेत्रों तक सीमित है, खासकर मुस्लिम बहुल सीटों में। इन सीटों पर भारी जीत का अंतर मिलता है, लेकिन यही “अतिरिक्त वोट” अन्य सीटों पर कोई खास फायदा नहीं दे पाते। इसके उलट Bharatiya Janata Party (BJP) का वोट राज्यभर में अपेक्षाकृत समान रूप से फैला हुआ है, जिससे उसे करीबी मुकाबलों में बढ़त मिल सकती है। आंकड़ों के अनुसार, TMC के पास 114 सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर 10 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि BJP के पास केवल 35 सीटें इस श्रेणी में आती हैं। 2024 के आंकड़ों के आधार पर TMC के लगभग 55.8 लाख वोट “वेस्टेड” माने जा रहे हैं, जबकि BJP के लिए यह संख्या काफी कम-करीब 11.9 लाख-है। इसका सीधा मतलब है कि BJP के वोट ज्यादा “इफेक्टिव” साबित हो सकते हैं। हालांकि BJP के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मतुआ समुदाय से जुड़े शरणार्थी वोट बैंक में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है, खासकर उन 55 सीटों पर जहां यह समुदाय प्रभावशाली है। लेकिन उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे इलाकों में अपेक्षाकृत कम कटौती BJP के लिए राहत की बात हो सकती है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि करीब 58 करीबी सीटों पर सिर्फ 1.92 लाख वोटों का झुकाव चुनावी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। यानी अब यह चुनाव कुल वोट प्रतिशत से ज्यादा, सीट-दर-सीट मार्जिन का खेल बन गया है। इसके अलावा, राज्य में महिला मतदाताओं के अनुपात में गिरावट (959 से घटकर 950 प्रति 1000 पुरुष) भी एक नया फैक्टर बनकर उभरा है, जो Mamata Banerjee के लिए चिंता का विषय हो सकता है। कुल मिलाकर, एंटी-इंकम्बेंसी, मतदाता सूची में बदलाव और वोटों का असमान वितरण-ये तीनों कारक मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला अब पहले से कहीं ज्यादा खुला और दिलचस्प हो गया है। अब देखना होगा कि यह आंकड़ों का गणित वास्तविक चुनावी नतीजों में कितना बदलता है।
पश्चिम बंगाल की चुनावी हलचल के बीच Election Commission of India और Trinamool Congress के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया। बुधवार को हुई एक अहम बैठक महज 7 मिनट में खत्म हो गई, जब टीएमसी सांसद Derek O'Brien और मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar के बीच तीखी बहस हो गई। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान डेरेक ओब्रायन ने CEC पर ऊंची आवाज में सवाल उठाए और उन्हें बोलने से रोक दिया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि बैठक बीच में ही खत्म करनी पड़ी। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि बैठक के दौरान गरिमा बनाए रखने की अपील की गई, लेकिन माहौल शांत नहीं हो सका। टीएमसी का आरोप-‘हमें कहा गया GET LOST’ वहीं, टीएमसी ने आयोग के दावों को खारिज करते हुए गंभीर आरोप लगाए। डेरेक ओब्रायन ने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनके प्रतिनिधिमंडल से “यहां से निकल जाओ” यानी “GET LOST” कहा, जिसके बाद वे बैठक से बाहर आ गए। पार्टी के अन्य नेताओं, जिनमें सांसद साकेत गोखले भी शामिल हैं, ने भी इस दावे का समर्थन किया। मतदाता सूची को लेकर विवाद की जड़ दरअसल, यह बैठक पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बुलाई गई थी। टीएमसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे गरीब, अल्पसंख्यक और बंगाली मतदाता प्रभावित हो रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान के तहत अब तक लगभग 90 लाख से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 11.85% है। हालांकि, अंतिम सूची अभी जारी नहीं हुई है। आरोप-प्रत्यारोप तेज बैठक के बाद टीएमसी ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला जारी रखा। डेरेक ओब्रायन ने सीईसी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आयोग निष्पक्ष नहीं है और “वोट चोरी” की कोशिश कर रहा है। वहीं, चुनाव आयोग ने इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। यह पहली बार नहीं है जब टीएमसी ने CEC को लेकर नाराजगी जताई हो। इससे पहले भी पार्टी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को और गरमा दिया है, जहां चुनाव से पहले संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच टकराव खुलकर सामने आ रहा है।
पश्चिम बंगाल की सियासत में चुनावी सरगर्मी के बीच Abhishek Banerjee ने भाजपा और प्रधानमंत्री Narendra Modi पर तीखा हमला बोला है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ने चुनावी रैलियों में धर्म की राजनीति को “छलावा” करार देते हुए इसे जनता को गुमराह करने की रणनीति बताया। कोलकाता और उत्तर बंगाल के कई इलाकों-नाटाबाड़ी, जलपाईगुड़ी और कुमारग्राम-में जनसभाओं को संबोधित करते हुए बनर्जी ने कहा कि यह चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि “विकास बनाम दमन” की सीधी लड़ाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा धर्म को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। धार्मिक राजनीति पर सवाल Abhishek Banerjee ने प्रधानमंत्री मोदी के कूचबिहार दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि वे मदनमोहन मंदिर तक दर्शन करने नहीं गए, जिससे उनकी धार्मिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठता है। बनर्जी ने इसे “राजनीतिक दिखावा” बताया और कहा कि भाजपा का धर्म से वास्तविक जुड़ाव नहीं, बल्कि चुनावी लाभ से है। ‘डबल इंजन सरकार’ पर निशाना तृणमूल नेता ने भाजपा के “डबल इंजन सरकार” के नारे को भी आड़े हाथों लिया। उनका आरोप था कि भाजपा के सांसद और विधायक जनता से कटे हुए हैं और चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र के विकास के लिए कोई ठोस काम नहीं किया गया। उन्होंने नारायणी बटालियन, एम्स, केंद्रीय विश्वविद्यालय और पर्यटन विकास जैसी अधूरी परियोजनाओं का मुद्दा उठाया। राज्य सरकार की योजनाओं का जिक्र Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए उन्होंने सड़क, पुल, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक योजनाओं का हवाला दिया। ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘खाद्य साथी’, ‘युवा साथी’ और ‘बांग्लार बाड़ी’ जैसी योजनाओं को आम जनता के लिए लाभकारी बताया। चाय बागान मजदूरों के लिए बड़ा वादा जलपाईगुड़ी की रैली में बनर्जी ने चाय बागान मजदूरों की दैनिक मजदूरी ₹250 से बढ़ाकर ₹300 करने का वादा दोहराया। इसके साथ ही किसानों के लिए सस्ते बीज, कोल्ड स्टोरेज और ₹30,000 करोड़ के कृषि निवेश की घोषणा भी की गई। महंगाई और केंद्र पर आरोप महंगाई को बड़ा मुद्दा बताते हुए उन्होंने गैस, पेट्रोल, खाद और जरूरी वस्तुओं के बढ़ते दामों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही नागरिकता और अन्य मुद्दों के जरिए लोगों को डराने का आरोप भी लगाया। बनर्जी ने अपने भाषण के अंत में कहा कि यह चुनाव “पहचान और अधिकार” की लड़ाई है और जनता लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी। उन्होंने विश्वास जताया कि राज्य में चौथी बार तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनेगी।
कोलकाता: Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी को उनके पद से हटा दिया। आयोग ने नंदिनी चक्रवर्ती की जगह दुष्यंत नरियाला को राज्य का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है। वहीं संघमित्रा घोष को गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग का नया प्रधान सचिव बनाया गया है। चुनाव आयोग के आदेश के मुताबिक ये नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिश चुनाव आयोग का कहना है कि यह फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक स्तर पर इस तरह का फेरबदल राज्य की राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। चुनावी प्रचार में प्रमुख मुद्दे बंगाल में इस बार चुनाव प्रचार कई बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बंगाली अस्मिता’ का सवाल। सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा पर लगातार बंगाली पहचान पर हमले का आरोप लगाती रही हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता अवैध घुसपैठ और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल की रैलियों में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। मतुआ समुदाय और वोट बैंक की राजनीति राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाला मतुआ समुदाय भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय के समर्थन से भाजपा को कई सीटों पर फायदा मिला था, जबकि तृणमूल कांग्रेस भी इस वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी है। मतदाता सूची में बड़े बदलाव चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद लगभग 63.66 लाख नाम हटाए जाने की खबर ने भी राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इससे राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में हुए इन बदलावों से कई क्षेत्रों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। Election Commission of India ने राज्य में दो चरणों में मतदान कराने का ऐलान किया है, जिसके बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा राज्य की सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बरकरार रखने की कोशिश में है। ऐसे में इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। पहला चरण: कड़ा मुकाबला 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होगा। अगर 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार माना जाए तो इन सीटों में से लगभग 92 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिली थी, जो करीब 60.5 प्रतिशत के बराबर है। वहीं भाजपा ने 59 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जो लगभग 38.8 प्रतिशत हिस्सेदारी बनती है, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। यह इलाका राजनीतिक रूप से मिश्रित माना जाता है। उत्तर, पश्चिम और मध्य पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में तृणमूल और भाजपा दोनों का प्रभाव रहा है। यही वजह है कि इस चरण को भाजपा के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माना जा रहा है, जहां पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। दूसरा चरण: TMC का मजबूत गढ़ दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा, जिसमें 142 सीटों पर मतदान होना है। इन सीटों में से लगभग 123 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, जो करीब 86.6 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाता है। इसके मुकाबले भाजपा को केवल 18 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह क्षेत्र तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। यहीं से ममता बनर्जी को लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी दिलाने में बड़ी मदद मिली थी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्लेषकों का मानना है कि दूसरे चरण में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती तृणमूल के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाना होगा। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है, जिससे पार्टी की पकड़ मजबूत बनी हुई है। दो हिस्सों में बंटा चुनावी मैदान दो चरणों में होने वाला यह चुनाव पश्चिम बंगाल को लगभग दो अलग-अलग चुनावी मैदानों में बांटता नजर आ रहा है। पहले चरण में जहां मुकाबला कड़ा दिखाई देता है, वहीं दूसरे चरण में तृणमूल कांग्रेस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति और चुनावी अभियान इन्हीं चरणों के हिसाब से तय होने की संभावना है।
आगामी West Bengal Legislative Assembly Election को लेकर Bharatiya Janata Party ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में राज्य की आधे से अधिक सीटों पर उम्मीदवारों के नाम लगभग तय कर लिए गए हैं और पहली सूची जल्द जारी की जा सकती है। बताया जा रहा है कि करीब 160 सीटों के उम्मीदवारों के नाम तय किए जा चुके हैं। संभावना है कि कोलकाता में प्रधानमंत्री Narendra Modi की बड़ी रैली के बाद पार्टी आधिकारिक तौर पर अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी कर दे। कई बड़े नेताओं को मिल सकता है टिकट सूत्रों के अनुसार पहली सूची में राज्य बीजेपी के कई प्रमुख नेताओं के नाम शामिल होंगे। इनमें विधानसभा में विपक्ष के नेता Suvendu Adhikari और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष Dilip Ghosh जैसे बड़े चेहरे शामिल हो सकते हैं। पार्टी कुछ पूर्व सांसदों को भी विधानसभा चुनाव में उतारने की योजना बना रही है। हालांकि इस बार रणनीति के तहत मौजूदा सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने से परहेज किया गया है। उम्मीदवार चयन में लिया गया जमीनी फीडबैक पार्टी नेताओं के मुताबिक इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा सावधानी से की गई है। करीब एक महीने से चल रही इस प्रक्रिया के दौरान जमीनी स्तर से फीडबैक लिया गया और विभिन्न सर्वेक्षणों के जरिए संभावित उम्मीदवारों की लोकप्रियता का आकलन किया गया। उम्मीदवार तय करते समय संगठन के प्रति निष्ठा, अनुशासन और जीतने की क्षमता को प्रमुख मानदंड बनाया गया है। जमीनी नेताओं पर दांव सूत्रों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण में स्थानीय और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को भी ध्यान में रखा गया है। पार्टी ने यह भी तय किया है कि इस बार दलबदल कर आए नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा। पिछले चुनाव की तुलना में इस रणनीति में बदलाव किया गया है। इसके अलावा बीजेपी ने इस बार फिल्म या टीवी इंडस्ट्री के चर्चित चेहरों को टिकट देने से भी परहेज किया है और उनकी जगह जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से जुड़े नेताओं पर भरोसा जताया है। बाकी सीटों पर जल्द होगा फैसला पार्टी सूत्रों के अनुसार शेष सीटों के उम्मीदवारों के चयन के लिए केंद्रीय चुनाव समिति की एक और बैठक जल्द बुलाई जा सकती है। इसके बाद बाकी सीटों की सूची भी जारी की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बीजेपी पश्चिम बंगाल में संगठन आधारित चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है, जिसमें स्थानीय नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क को प्राथमिकता दी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।