China News

Dragon's Water Weapon
ब्रह्मपुत्र पर ड्रैगन का 'वाटर वेपन': सीमा से महज 50 km दूर बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा चीनी बांध, पूर्वोत्तर पर मंडराया जल संकट

नई दिल्ली, एजेंसियां। तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन के मेगा डैम प्रोजेक्ट ने नई दिल्ली को हाई अलर्ट पर कर दिया है। इस ढांचे से न केवल असम और अरुणाचल प्रदेश में कृत्रिम बाढ़ और सूखे का खतरा पैदा हो गया है, बल्कि यह भारत के लिए एक बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती भी है।   आधुनिक कूटनीति में अब नदियां और प्राकृतिक संसाधन युद्ध के नए हथियार बनते जा रहे हैं। इसका सबसे ताजा और गंभीर उदाहरण तिब्बत के पठारों से सामने आ रहा है, जहां चीन ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण शुरू कर दिया है। भारतीय सीमा (अरुणाचल प्रदेश) से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर आकार ले रहा यह भीमकाय प्रोजेक्ट अब भारत के लिए एक गहरा रणनीतिक और पर्यावरणीय सिरदर्द बन चुका है।   पूर्वोत्तर की जीवनरेखा पर 'कंट्रोल' की कोशिश तिब्बत से निकलने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी का पानी जैसे ही भारतीय सरजमीं पर दस्तक देता है, यह अरुणाचल प्रदेश में 'सियांग' और असम की घाटियों में पहुंचकर 'ब्रह्मपुत्र' के नाम से जानी जाती है। यह विशाल नदी केवल एक जलस्रोत नहीं है, बल्कि यह पूरे पूर्वोत्तर भारत की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। इस नदी के पानी पर लाखों किसानों की आजीविका और लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि निर्भर है। नदी के ऊपरी हिस्से (अपर राइपेरियन क्षेत्र) पर चीन के इस बांध के बनने का सीधा अर्थ है कि नदी के पानी का 'कंट्रोल स्विच' बीजिंग के हाथों में चला जाएगा।   बाढ़ और सूखे का दोहरा खतरा इस निर्माण ने एक दोहरे खतरे को जन्म दिया है। जानकारों और इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ी चिंता जल प्रवाह के अप्रत्याशित नियंत्रण को लेकर है। यदि चीन अपनी जरूरत के हिसाब से पानी रोकता है, तो असम और अरुणाचल में गंभीर जल संकट और सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे फसलें बर्बाद हो जाएंगी। इसके विपरीत, अगर मानसून के दौरान या किसी रणनीतिक चाल के तहत अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूर्वोत्तर राज्यों में विनाशकारी कृत्रिम बाढ़ आ सकती है। इसके अलावा, प्राकृतिक प्रवाह रुकने से हिमालय के बेहद संवेदनशील जलीय इकोसिस्टम और वनस्पतियों पर भी लंबे समय तक गहरा असर पड़ेगा।   चीन की दलील vs सैटेलाइट की गवाही चीन हमेशा से अपने इरादों पर पर्दा डालता आया है। इस बार भी बीजिंग का रटा-रटाया तर्क है कि यह महज एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है जो स्वच्छ ऊर्जा (बिजली उत्पादन) के लिए बनाया जा रहा है। लेकिन, हालिया खुफिया रिपोर्ट्स और सैटेलाइट तस्वीरों ने प्रोजेक्ट की जिस तेज रफ्तार की गवाही दी है, उसने नई दिल्ली को सतर्क कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सीमा पार बहने वाली नदियों पर बड़े निर्माण से पहले संबंधित देशों के बीच पारदर्शिता और डाटा साझा करना अनिवार्य है, लेकिन चीन इस मोर्चे पर लगातार अपनी जिम्मेदारियों से भागता रहा है।   भारत का पलटवार: कूटनीति और जमीनी तैयारी भारत सरकार इस भू-राजनीतिक खतरे को लेकर मूकदर्शक नहीं है। संसद में भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि नई दिल्ली ब्रह्मपुत्र बेसिन की हर हलचल पर पैनी नजर रखे हुए है। भारत की रणनीति दोतरफा है:   कूटनीतिक दबाव: भारत ने चीन के समक्ष स्पष्ट मांग रखी है कि वह निचले प्रवाह वाले देशों के साथ जल स्तर और प्रोजेक्ट से जुड़ी पारदर्शी जानकारी नियमित रूप से साझा करे।   जमीनी सुरक्षा: किसी भी आपात स्थिति (अचानक बाढ़ या पानी की कमी) से निपटने के लिए भारत ने पूर्वोत्तर राज्यों में अपने तंत्र को मजबूत कर दिया है। आधुनिक तकनीक की मदद से नदियों के प्रवाह की चौबीसों घंटे निगरानी की जा रही है और बाढ़ पूर्वानुमान (Early Warning System) तथा आपदा प्रबंधन ढांचे को और अधिक सुदृढ़ किया जा रहा है।   ब्रह्मपुत्र पर बन रहा यह चीनी बांध स्पष्ट करता है कि भविष्य में 'पानी' रणनीतिक कूटनीति का एक अहम हिस्सा होगा। ऐसे में भारत के सामने अपने पूर्वोत्तर राज्यों की जल सुरक्षा और लाखों नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की एक बड़ी और लंबी चुनौती है।

abhishek singh जून 17, 2026 0
Five Eyes alliance warns of alleged Chinese espionage through fake online job recruitment schemes.
फर्जी जॉब ऑफर बना जासूसी का हथियार? ‘फाइव आइज’ ने चीन पर लगाए गंभीर आरोप

  दुनिया के सबसे प्रभावशाली खुफिया गठबंधन ‘फाइव आइज’ ने चीन पर एक नए प्रकार के जासूसी अभियान चलाने का आरोप लगाया है। गठबंधन का दावा है कि चीनी एजेंट पेशेवर नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी नौकरी के विज्ञापन पोस्ट कर पश्चिमी देशों के सरकारी अधिकारियों, सैन्य कर्मियों और विशेषज्ञों से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। क्या है ‘फाइव आइज’ गठबंधन? Five Eyes दुनिया का प्रमुख खुफिया सहयोग मंच माना जाता है, जिसमें United States, United Kingdom, Australia, Canada और New Zealand शामिल हैं। इन देशों की सुरक्षा एजेंसियां आपस में खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं। हाल ही में जारी संयुक्त सुरक्षा चेतावनी में गठबंधन ने कहा कि चीन की खुफिया इकाइयां ऑनलाइन भर्ती अभियानों के जरिए संवेदनशील जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं। फर्जी कंपनियों और नकली भर्तियों का कथित नेटवर्क खुफिया एजेंसियों के अनुसार, चीनी एजेंट खुद को मानव संसाधन सलाहकार, रिसर्च फर्म या थिंक टैंक के प्रतिनिधि के रूप में पेश करते हैं। ये संस्थाएं पहली नजर में पूरी तरह वैध दिखाई देती हैं और अक्सर खुद को चीन से बाहर स्थित संगठन बताती हैं। उनका उद्देश्य भरोसा जीतकर संभावित लक्ष्यों तक पहुंच बनाना होता है। इंटरव्यू और रिसर्च असाइनमेंट के नाम पर जुटाई जाती है जानकारी रिपोर्ट के अनुसार, उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया के दौरान विश्लेषणात्मक रिपोर्ट या रिसर्च नोट तैयार करने को कहा जाता है। शुरुआत में इसके बदले मामूली भुगतान किया जाता है, लेकिन बाद में अधिक संवेदनशील जानकारियों के लिए बड़ी रकम की पेशकश की जाती है। वर्चुअल इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवारों से सरकारी नीतियों, सैन्य गतिविधियों, सुरक्षा ढांचे और रणनीतिक मामलों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। आगे चलकर बातचीत एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर स्थानांतरित कर दी जाती है। किन लोगों को बनाया जा रहा है लक्ष्य? फाइव आइज के अनुसार, इस कथित अभियान के प्रमुख निशाने हैं: सुरक्षा मंजूरी प्राप्त अधिकारी सैन्य और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी पत्रकार और मीडिया पेशेवर शिक्षाविद एवं शोधकर्ता थिंक टैंक विशेषज्ञ सरकारी संस्थानों से जुड़े कर्मचारी एजेंसियों का कहना है कि सामान्य दिखने वाली जानकारी भी व्यापक खुफिया विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कई मामलों में जांच और कार्रवाई का दावा गठबंधन ने कहा कि कई लोग अनजाने में ऐसे नेटवर्क के संपर्क में आ चुके हैं। कुछ मामलों में सुरक्षा जांच शुरू हुई, सुरक्षा मंजूरी रद्द की गई और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी की गई। ब्रिटेन के सुरक्षा मंत्री Dan Jarvis ने सरकारी और सैन्य कर्मचारियों से ऑनलाइन संपर्कों को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। चीन ने आरोपों को बताया निराधार इन आरोपों पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। China के अधिकारियों ने फाइव आइज के दावों को झूठा और राजनीतिक प्रेरित बताया है। चीन का कहना है कि उस पर लगाए जा रहे आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और पश्चिमी देश उसे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। चीनी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि फाइव आइज स्वयं दुनिया के सबसे बड़े खुफिया नेटवर्कों में से एक है। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल यह पहली बार नहीं है जब चीन पर पेशेवर नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए जानकारी जुटाने के आरोप लगे हैं। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी MI5 पहले भी चेतावनी दे चुकी है कि संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को ऑनलाइन भर्ती अभियानों के माध्यम से निशाना बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में जासूसी के तरीके तेजी से बदल रहे हैं और नौकरी के प्रस्ताव, शोध सहयोग तथा परामर्श कार्य जैसे साधन अब खुफिया गतिविधियों के नए माध्यम बनते जा रहे हैं।  

Deepshikha जून 5, 2026 0
China coal mine blast
चीन की कोयला खदान में भीषण विस्फोट, 82 मजदूरों की मौत

बीजिंग, एजेंसियां। चीन के उत्तरी शांक्सी प्रांत में स्थित एक कोयला खदान में हुए भीषण गैस विस्फोट ने पूरे देश को झकझोर दिया है। सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दर्दनाक हादसे में अब तक कम से कम 82 मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य मजदूर अभी भी खदान के अंदर फंसे हुए हैं। हादसा शुक्रवार शाम चांगझी शहर की लिउशेन्यू कोयला खदान में हुआ, जहां बड़ी संख्या में श्रमिक भूमिगत खनन कार्य में जुटे थे।   प्रारंभिक जानकारी के अनुसार प्रारंभिक जानकारी के अनुसार विस्फोट इतना तेज था कि खदान के अंदर अफरा-तफरी मच गई। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने पहले आठ लोगों की मौत और कई मजदूरों के फंसे होने की जानकारी दी थी, लेकिन राहत और बचाव कार्य आगे बढ़ने के साथ मृतकों की संख्या बढ़कर 82 हो गई। बताया जा रहा है कि हादसे के समय करीब 247 मजदूर खदान के भीतर मौजूद थे।   राहत और बचाव अभियान जारी हादसे के तुरंत बाद स्थानीय प्रशासन, आपदा राहत बल और बचाव दल मौके पर पहुंच गए। बचावकर्मी लगातार खदान के अंदर फंसे मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। गैस और धुएं के कारण राहत अभियान में काफी मुश्किलें आ रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि कई मजदूरों से अब भी संपर्क नहीं हो पाया है।   हादसे की जांच शुरू चीन सरकार ने इस घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। शुरुआती आशंका है कि खदान के अंदर गैस रिसाव के कारण विस्फोट हुआ। प्रशासन ने खदान प्रबंधन से सुरक्षा मानकों को लेकर जवाब मांगा है। इस हादसे के बाद एक बार फिर चीन की खदानों में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

Unknown मई 23, 2026 0
Vladimir Putin and Xi Jinping meeting in Beijing amid growing discussions on global power shifts and new world order.
ट्रंप के बाद पुतिन की चीन यात्रा: क्या बीजिंग बन रहा है नए वर्ल्ड ऑर्डर का केंद्र?

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हाई-प्रोफाइल चीन यात्रा खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin का बीजिंग दौरा वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या China खुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में नए वैश्विक शक्ति केंद्र के तौर पर स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक पुतिन दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर मंगलवार को चीन पहुंचेंगे। यह दौरा चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के निमंत्रण पर हो रहा है। क्रेमलिन ने भी इस यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों नेता रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा सहयोग, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा करेंगे। ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद क्यों अहम है पुतिन का दौरा? ट्रंप ने 13 से 15 मई तक चीन का दौरा किया था। करीब एक दशक में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा थी। इस दौरान ट्रंप के साथ अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों के कई सीईओ भी मौजूद थे। हालांकि यात्रा के बाद कोई बड़ा व्यापारिक समझौता सामने नहीं आया। इसी के कुछ दिनों बाद पुतिन का चीन जाना कई रणनीतिक संकेत दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग अब खुद को ऐसी शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है जो अमेरिका और रूस दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद बनाए रख सके। चीन-रूस साझेदारी लगातार मजबूत रूस और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गहरे हुए हैं। दोनों देशों ने फरवरी 2022 में “असीमित रणनीतिक साझेदारी” (No Limits Partnership) की घोषणा की थी। यह समझौता रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के ठीक पहले हुआ था। युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, लेकिन चीन ने न तो रूस की खुलकर आलोचना की और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों का समर्थन किया। इसके उलट दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग बढ़ता गया। रॉयटर्स के अनुसार, पुतिन और शी जिनपिंग पिछले कुछ वर्षों में 40 से अधिक बार मुलाकात कर चुके हैं। पिछले साल दोनों देशों ने “पावर ऑफ साइबेरिया 2” गैस पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने पर भी समझौता किया था, जिससे रूस की ऊर्जा आपूर्ति चीन की ओर और बढ़ेगी। क्या बदल रहा है वैश्विक शक्ति संतुलन? विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया धीरे-धीरे “मल्टीपोलर वर्ल्ड” यानी बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। अब केवल अमेरिका ही वैश्विक राजनीति का केंद्र नहीं रह गया है। चीन, रूस, भारत और खाड़ी देशों जैसी शक्तियां भी अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को प्रभावित कर रही हैं। चीन की रणनीति केवल सैन्य या आर्थिक ताकत तक सीमित नहीं है। बीजिंग: BRICS और SCO जैसे मंचों के जरिए प्रभाव बढ़ा रहा है डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बड़े निवेश कर रहा है AI, चिप्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है चीन के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हालांकि चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ी है, लेकिन बीजिंग के सामने कई मुश्किलें भी हैं। ताइवान मुद्दा, पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी टकराव, आर्थिक सुस्ती और सप्लाई चेन शिफ्ट जैसी चुनौतियां चीन के लिए बड़ी परीक्षा बनी हुई हैं। इसके अलावा रूस के साथ अत्यधिक नजदीकी भी चीन के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, क्योंकि इससे पश्चिमी देशों के साथ उसका तनाव और बढ़ सकता है। नया वर्ल्ड ऑर्डर या नई शक्ति प्रतिस्पर्धा? पुतिन की चीन यात्रा और ट्रंप के हालिया दौरे ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया अब तेजी से बदलते भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुकी है। चीन खुद को केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि नए वैश्विक संतुलन की धुरी के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि दुनिया पूरी तरह चीन केंद्रित हो गई है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति अधिक प्रतिस्पर्धी, बहुध्रुवीय और रणनीतिक गठबंधनों पर आधारित होने वाली है।  

surbhi मई 18, 2026 0
Rescue teams inspect damaged buildings after deadly earthquake struck Guangxi region in southern China.
चीन में भूकंप से तबाही: 2 लोगों की मौत, कई घायल, 13 इमारतें क्षतिग्रस्त

China के दक्षिणी क्षेत्र ग्वांग्शी में सोमवार तड़के आए तेज भूकंप ने भारी तबाही मचाई। रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.2 मापी गई। भूकंप के कारण कई इमारतों को नुकसान पहुंचा है, जबकि अब तक 2 लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, भूकंप के झटकों के बाद इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया और हजारों लोग घरों से बाहर निकल आए। 13 इमारतें तबाह, कई लोग घायल चीनी सरकारी मीडिया China Central Television की रिपोर्ट के अनुसार, भूकंप से कम से कम 13 इमारतें क्षतिग्रस्त या तबाह हो गईं। अधिकारियों ने बताया कि कई लोग घायल हुए हैं, हालांकि अधिकांश घायलों की स्थिति गंभीर नहीं है। घायलों में से चार लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। राहत एजेंसियों को आशंका है कि कुछ लोग अभी भी क्षतिग्रस्त इमारतों के भीतर फंसे हो सकते हैं। 7 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया भूकंप के बाद प्रशासन ने तेजी से राहत और बचाव अभियान शुरू किया। अब तक 7 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। आपदा प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं की टीमें लगातार प्रभावित इलाकों में तलाशी अभियान चला रही हैं। प्रशासन ने लोगों से क्षतिग्रस्त इमारतों से दूर रहने की अपील की है। रेल यातायात प्रभावित भूकंप के बाद इलाके में रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा है। चीनी रेलवे अधिकारियों ने बताया कि पटरियों और पुलों की सुरक्षा जांच की जा रही है, जिसके चलते कुछ ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि बिजली, पानी, गैस सप्लाई और सड़क यातायात फिलहाल सामान्य रूप से चल रहे हैं। आफ्टरशॉक को लेकर अलर्ट स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग ने क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों ने लोगों से सतर्क रहने और संभावित आफ्टरशॉक को लेकर सावधानी बरतने की अपील की है।  

surbhi मई 18, 2026 0
US trade representative discusses China, Iran and Strait of Hormuz amid rising global tensions.
US का दावा: ‘ईरान को मदद नहीं देगा चीन’, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने किया बड़ा खुलासा

United States के व्यापार प्रतिनिधि Jamieson Greer ने दावा किया है कि China ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वह Iran की मदद नहीं करेगा। एबीसी न्यूज को दिए इंटरव्यू में ग्रीर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का मुख्य फोकस इस बात पर था कि चीन, ईरान के समर्थन में कोई कदम न उठाए। ग्रीर ने कहा, “हमें चीन की ओर से इसकी प्रतिबद्धता मिली है और उन्होंने इसकी पुष्टि भी की है।” होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी बयान ग्रीर ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने चीन से Strait of Hormuz को दोबारा खोलने के लिए किसी सैन्य हस्तक्षेप की मांग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि चीन खुद भी इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को खुला रखना चाहता है, क्योंकि इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ता है। ग्रीर के मुताबिक, “राष्ट्रपति ट्रंप चीन की सैन्य मदद नहीं चाहते। अमेरिका सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहता है कि चीन, अमेरिका द्वारा उठाए जा रहे कदमों में बाधा न बने।” ट्रंप-शी जिनपिंग बातचीत में टैरिफ मुद्दा नहीं उठा हाल के महीनों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव और टैरिफ विवाद चर्चा में रहे हैं। हालांकि ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उनकी और Xi Jinping के बीच हुई बातचीत में टैरिफ का मुद्दा नहीं उठा। ग्रीर ने इस पर कहा कि व्यापार वार्ता जरूर हुई थी, लेकिन वह शीर्ष नेताओं के स्तर पर नहीं थी। उन्होंने बताया कि अमेरिका की ओर से उन्होंने, वित्त मंत्री Scott Bessent और उनकी टीम ने चीनी अधिकारियों के साथ टैरिफ समेत कई मुद्दों पर चर्चा की। ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ बनाने पर विचार ग्रीर ने यह भी बताया कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक नियमों और विवादों को व्यवस्थित करने के लिए ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ बनाने पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि चीन ने कई अमेरिकी मीट निर्यात इकाइयों से आयात फिर शुरू करने, कुछ बायोटेक मामलों की समीक्षा करने और 200 Boeing विमानों की खरीद पर सहमति जताई है। हालांकि चीन की ओर से अब तक इन समझौतों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने पर जोर ग्रीर ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच कई “ठोस कदम” पहले ही शुरू हो चुके हैं और सबसे अहम बात यह है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक स्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका-चीन संबंध आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकते हैं।  

surbhi मई 18, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping walking through Zhongnanhai Garden while admiring blooming roses in Beijing.
चीन के गुलाबों के मुरीद हुए ट्रंप, जिनपिंग के साथ गार्डन में टहलते दिखे अमेरिकी राष्ट्रपति

Donald Trump के चीन दौरे का एक खास वीडियो सामने आया है, जिसमें वह चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ बीजिंग के मशहूर झोंगनानहाई गार्डन में घूमते नजर आ रहे हैं। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच हल्की-फुल्की बातचीत भी हुई, जिसने सबका ध्यान खींच लिया। गुलाब देखकर प्रभावित हुए ट्रंप गार्डन में टहलते वक्त ट्रंप वहां लगे खूबसूरत गुलाबों को देखकर काफी प्रभावित दिखे। उन्होंने कहा कि उन्होंने इतने सुंदर गुलाब पहले कभी नहीं देखे। इस पर शी जिनपिंग ने मुस्कुराते हुए मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि वह ट्रंप को इन गुलाबों के बीज भेजेंगे। दोनों नेताओं के बीच हुई यह बातचीत कैमरे में कैद हो गई, जिसका वीडियो न्यूज एजेंसी PTI ने जारी किया है। कई अहम मुद्दों पर हुई बातचीत चीन दौरे के दौरान ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय संबंधों से लेकर वैश्विक मुद्दों तक पर विस्तृत चर्चा हुई। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों नेताओं ने कई नए साझा समझौतों पर भी सहमति जताई है। बताया गया है कि दोनों नेताओं ने गुरुवार को दो अलग-अलग दौर की बैठकें कीं, जिनमें व्यापार, रणनीतिक सहयोग और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। साथ में किया लंच बैठकों के अलावा ट्रंप और शी जिनपिंग ने साथ में लंच भी किया। दोनों नेताओं के बीच दिखी गर्मजोशी को हाल के महीनों में अमेरिका-चीन संबंधों में आई नरमी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। तीन दिवसीय दौरे का आखिरी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप शुक्रवार को अपनी तीन दिवसीय चीन यात्रा समाप्त कर लौटेंगे। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापार, टैरिफ और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर तनाव बना हुआ था। ऐसे में इस मुलाकात को वैश्विक राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meeting in Beijing amid rising focus on US-China relations
ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात से बदलेगा ग्लोबल समीकरण? अमेरिका-चीन की बढ़ती नज़दीकी पर भारत की नजर

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा वैश्विक राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है। करीब नौ वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति Beijing पहुंचा है। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और भारत के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं दिख रही, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अमेरिका की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर, भारत और China के बीच भी सीमाई और रणनीतिक मुद्दों को लेकर भरोसे की कमी बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच बढ़ती नरमी और सकारात्मक संकेतों को भारत बेहद ध्यान से देख रहा है। तनाव के बाद दिखी नरमी पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव जारी था। इसके बावजूद ट्रंप ने शी जिनपिंग को “महान नेता” और “मित्र” कहकर संबंधों में नरमी का संकेत दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब टकराव के बजाय स्थिर संबंधों की दिशा में बढ़ना चाहती हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर भारत के खिलाफ नहीं माना जा रहा, लेकिन इसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। भारत के लिए क्यों अहम है यह समीकरण? भारत लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलने की नीति अपनाता रहा है। भारत की कोशिश रहती है कि उसके किसी भी देश से रिश्ते दूसरे देश के खिलाफ न दिखें। India के लिए अमेरिका और चीन दोनों ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। तकनीक, रक्षा, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे कई क्षेत्रों में भारत की दोनों देशों पर अलग-अलग स्तर पर निर्भरता भी है। भारत लगातार बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और “मल्टीपोलर एशिया” की बात करता रहा है। लेकिन मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और एशिया में चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा करती है। एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ और रणनीतिक मामलों के जानकार Ashley Tellis ने पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ट्रंप की नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितताएं भारत को असहज करती हैं और इससे अमेरिका के साथ गहरी साझेदारी को लेकर भारत की सतर्कता बढ़ती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रणनीतिक हिचकिचाहट केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पुरानी विदेश नीति और खुद महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है। टेलिस के मुताबिक, चीन की बढ़ती ताकत और उसका आक्रामक रुख भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी भारत की आवश्यकता बनी रहेगी, क्योंकि अकेले भारत के लिए चीन का संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत के सामने संतुलन की चुनौती विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका और चीन के संबंधों में स्थिरता आती है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी पड़ सकता है। भारत को ऐसे माहौल में अपनी विदेश नीति को बेहद संतुलित और व्यावहारिक तरीके से आगे बढ़ाना होगा। फिलहाल नई दिल्ली की नजर इस बात पर है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल कूटनीतिक नरमी तक सीमित रहती है या आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meeting in Beijing during high-level US-China diplomatic talks
बीजिंग में ट्रंप-शी जिनपिंग की अहम बैठक, चीन बोला- ‘विरोधी नहीं, सहयोगी बनें अमेरिका और चीन’

व्यापार, ईरान और ताइवान मुद्दे पर हुई बड़ी बातचीत Donald Trump और Xi Jinping के बीच गुरुवार को बीजिंग में हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता हुई। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब वैश्विक स्तर पर व्यापार तनाव, ईरान संकट और भू-राजनीतिक अस्थिरता तेजी से बढ़ रही है। बैठक की शुरुआत बीजिंग के Great Hall of the People में औपचारिक स्वागत समारोह के साथ हुई। इस दौरान सैन्य सम्मान दिया गया और बच्चों ने चीन तथा अमेरिका के झंडे लहराकर दोनों नेताओं का स्वागत किया। ट्रंप ने की शी जिनपिंग की तारीफ वार्ता की शुरुआत में ट्रंप ने शी जिनपिंग की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध पहले से बेहतर दिशा में बढ़ रहे हैं। ट्रंप ने कहा, “आप एक महान नेता हैं। लोग शायद मुझे यह कहते हुए पसंद न करें, लेकिन मैं फिर भी कहता हूं।” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और चीन के रिश्ते “पहले से ज्यादा मजबूत” हो सकते हैं। वहीं शी जिनपिंग ने भी नरम रुख अपनाते हुए कहा कि चीन और अमेरिका को “प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार” बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थिर चीन-अमेरिका संबंध पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद हैं और टकराव दोनों देशों को नुकसान पहुंचाएगा। व्यापार और टैरिफ विवाद पर फोकस बैठक में व्यापार और टैरिफ विवाद प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच लगाए गए जवाबी टैरिफ से वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ है। दोनों पक्ष फिलहाल एक अस्थायी व्यापार समझौते को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वैश्विक बाजार भी इस बैठक पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश पर पड़ सकता है। ईरान युद्ध और तेल संकट पर भी चर्चा ईरान-इजरायल संघर्ष और Hormuz Strait में बढ़ते तनाव को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर अपना प्रभाव इस्तेमाल कर क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद करे। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है। AI, सेमीकंडक्टर और ताइवान भी एजेंडे में दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर तकनीक और ताइवान मुद्दे को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि इन विषयों पर भी शिखर वार्ता में विस्तृत चर्चा हुई। ट्रंप के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio, रक्षा मंत्री Pete Hegseth, कारोबारी Elon Musk और Nvidia CEO Jensen Huang भी चीन पहुंचे हैं। वैश्विक बाजारों की नजर इस बैठक पर विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक से किसी बड़े समझौते की संभावना भले कम हो, लेकिन दोनों देश तनाव को और बढ़ने से रोकने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस वार्ता का असर वैश्विक राजनीति, व्यापार और बाजारों पर देखने को मिल सकता है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meet in Beijing for high-stakes talks on trade and global tensions
ट्रंप-शी जिनपिंग की बड़ी बैठक शुरू, व्यापार, ईरान युद्ध और ताइवान पर दुनिया की नजर

बीजिंग में शुरू हुई हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता Donald Trump और Xi Jinping के बीच गुरुवार को बीजिंग में दो दिवसीय अहम बैठक शुरू हुई। इस वार्ता में व्यापार समझौते, ईरान युद्ध और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप ने इस बैठक को “अब तक की सबसे बड़ी समिट” बताया और शी जिनपिंग को महान नेता और अपना मित्र कहा। भव्य स्वागत के साथ हुई मुलाकात बैठक की शुरुआत बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई, जहां ट्रंप का भव्य स्वागत किया गया। दोनों नेताओं ने रेड कार्पेट पर हाथ मिलाया और गर्मजोशी से बातचीत की। चीनी सैनिकों की परेड और बच्चों द्वारा अमेरिकी-चीनी झंडे लहराने के बीच यह मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी रही। व्यापार समझौता सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका और चीन के बीच पिछले कई महीनों से जारी व्यापार तनाव इस बैठक का सबसे अहम मुद्दा माना जा रहा है। पिछले साल दोनों देशों के बीच एक अस्थायी व्यापार समझौता हुआ था, जिसके तहत अमेरिका ने चीन पर भारी टैरिफ लगाने का फैसला टाल दिया था। अब अमेरिका चाहता है कि चीन अपने बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए ज्यादा खोले। ट्रंप के साथ इस दौरे पर कई बड़े कारोबारी भी पहुंचे हैं, जिनमें Elon Musk और Jensen Huang शामिल हैं। ईरान युद्ध पर भी चर्चा बैठक में मध्य पूर्व का तनाव भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले ताकि युद्ध और तनाव कम किया जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ईरान के खिलाफ खुलकर कदम उठाने से बच सकता है, क्योंकि तेहरान को वह अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है। ताइवान पर बढ़ सकता है तनाव Taiwan को अमेरिकी हथियारों की बिक्री भी बैठक में संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। चीन ने हाल ही में अमेरिका के प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के रक्षा पैकेज का विरोध किया है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान चीन का हिस्सा है और बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। ट्रंप पर घरेलू दबाव इस यात्रा को ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है। मध्य पूर्व युद्ध और बढ़ती महंगाई के कारण उनकी लोकप्रियता प्रभावित हुई है। ऐसे में चीन दौरे को उनकी बड़ी कूटनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन विशेषज्ञों का कहना है कि 2017 की तुलना में अब अमेरिका-चीन संबंधों का समीकरण काफी बदल चुका है। पहले जहां चीन अमेरिका को प्रभावित करने की कोशिश करता था, अब अमेरिका खुद चीन की वैश्विक ताकत को खुलकर स्वीकार करता दिख रहा है। दोनों नेताओं के बीच आने वाले दिनों में कई दौर की बातचीत और औपचारिक कार्यक्रम होने हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meeting in Beijing amid Iran war and rising US-China tensions
ईरान युद्ध के बीच चीन जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग से होगी अहम मुलाकात

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इस महीने चीन के दौरे पर जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से होगी। चीन के विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि ट्रंप 13 मई से 15 मई तक चीन में रहेंगे। बीजिंग में होगी अहम बैठक जानकारी के मुताबिक, Donald Trump बुधवार शाम बीजिंग पहुंचेंगे। गुरुवार को उनका औपचारिक स्वागत और द्विपक्षीय बैठक होगी। यात्रा शुक्रवार को समाप्त होगी। व्हाइट हाउस की चीफ डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी Anna Kelly ने बताया कि इस यात्रा का उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। ईरान युद्ध समेत कई मुद्दों पर चर्चा अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप और Xi Jinping के बीच कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी। इनमें: Iran से जुड़ा तनाव और युद्ध ताइवान मुद्दा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) परमाणु हथियार नियंत्रण महत्वपूर्ण खनिज समझौते जैसे विषय शामिल हैं। युद्ध के कारण टली थी यात्रा यह दौरा पहले साल की शुरुआत में प्रस्तावित था, लेकिन Iran और अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। अब यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस दौरे के जरिए चीन के साथ संवाद बढ़ाकर वैश्विक तनाव कम करने की कोशिश कर सकते हैं। चीन की टेक्नोलॉजी पर अमेरिका सख्त ट्रंप के चीन दौरे से पहले अमेरिका में चीनी टेक्नोलॉजी कंपनियों को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में अमेरिका ने ईरान से कथित संबंधों के आरोप में कई चीनी कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग ने चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया, जिनमें तीन चीन की हैं। इन कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराकर पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को मदद पहुंचाई। तेल खरीद को लेकर भी बढ़ा विवाद अमेरिका ने हाल ही में ईरान से कच्चा तेल खरीदने के आरोप में कुछ चीनी रिफाइनरियों पर भी प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद चीन ने अपनी कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन न करने का संकेत दिया। Ministry of Foreign Affairs of the People's Republic of China ने कहा कि वह एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और चीनी कंपनियों तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। क्यों अहम मानी जा रही है यह यात्रा? विशेषज्ञों के मुताबिक, यह दौरा सिर्फ अमेरिका-चीन संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति, व्यापार और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी पड़ सकता है। दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और सुरक्षा हालात लगातार दबाव में हैं।  

surbhi मई 11, 2026 0
Chinese President Xi Jinping during anti-corruption crackdown involving former defense ministers in China
चीन में भ्रष्टाचार पर बड़ा एक्शन, दो पूर्व रक्षा मंत्रियों को मौत की सजा

China में राष्ट्रपति Xi Jinping की सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा और सख्त कदम उठाते हुए देश के दो पूर्व रक्षा मंत्रियों को मौत की सजा सुनाई है। चीन की सैन्य अदालत ने पूर्व रक्षा मंत्री Wei Fenghe और Li Shangfu को भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों में दोषी करार दिया है। चीनी सरकारी मीडिया Xinhua News Agency के अनुसार दोनों नेताओं को “दो साल की राहत” के साथ मौत की सजा सुनाई गई है। चीन में इसका मतलब यह होता है कि अगर दोषी जेल में अच्छा व्यवहार करता है तो बाद में उसकी सजा को उम्रकैद में बदला जा सकता है। अदालत ने क्या कहा? रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने पाया कि: Wei Fenghe ने रक्षा मंत्री रहते हुए बड़े पैमाने पर रिश्वत ली। Li Shangfu रिश्वत लेने और देने दोनों मामलों में दोषी पाए गए। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने सेना और रक्षा सौदों से जुड़े मामलों में अपने पद का दुरुपयोग किया और निजी फायदे के लिए भ्रष्टाचार किया। 2024 में पार्टी से निकाले गए थे दोनों नेता चीन की सत्तारूढ़ Chinese Communist Party ने वर्ष 2024 में दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इसके बाद उनके खिलाफ सैन्य जांच शुरू हुई थी। दोनों नेता राष्ट्रपति Xi Jinping की सरकार में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे और केंद्रीय सैन्य आयोग के सदस्य भी रह चुके थे। यह आयोग चीन की सेना पर सर्वोच्च नियंत्रण रखता है। कौन हैं वेई फेंगहे और ली शांगफू? वेई फेंगहे Wei Fenghe वर्ष 2018 से 2023 तक चीन के रक्षा मंत्री रहे। उन्हें मिसाइल और रॉकेट तकनीक का विशेषज्ञ माना जाता था। उन्होंने चीन की अत्यंत महत्वपूर्ण रॉकेट फोर्स का भी नेतृत्व किया था। ली शांगफू Li Shangfu एक एयरोस्पेस इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने वेई फेंगहे के बाद रक्षा मंत्री का पद संभाला था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। ली शांगफू भी चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की रॉकेट फोर्स से जुड़े रहे थे, जिसे चीन की सामरिक सैन्य ताकत का अहम हिस्सा माना जाता है। शी जिनपिंग की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति राष्ट्रपति Xi Jinping ने 2012 में सत्ता संभालने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” अभियान शुरू किया था। इस अभियान के तहत: हजारों सरकारी अधिकारियों पर कार्रवाई हुई कई वरिष्ठ सैन्य जनरलों को हटाया गया दस लाख से ज्यादा अधिकारियों को अलग-अलग मामलों में सजा दी जा चुकी है विशेषज्ञों का मानना है कि चीन में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सत्ता पर नियंत्रण मजबूत करने की रणनीति का भी हिस्सा है। क्यों अहम है यह फैसला? दो पूर्व रक्षा मंत्रियों को मौत की सजा मिलना चीन की राजनीति और सेना में बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। यह दिखाता है कि: चीन सेना में भ्रष्टाचार को लेकर सख्ती बढ़ा रहा है शीर्ष नेताओं को भी कार्रवाई से छूट नहीं मिलेगी रक्षा और सैन्य ढांचे में अंदरूनी सफाई अभियान जारी है विशेषज्ञों के अनुसार चीन की रॉकेट फोर्स और रक्षा प्रतिष्ठान में हाल के वर्षों में कई बड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि बीजिंग अपनी सैन्य व्यवस्था को पूरी तरह नियंत्रित और अनुशासित रखना चाहता है।  

surbhi मई 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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anjali kumari जून 24, 2026 0