नई दिल्ली: मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp के नए यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी चिंता जताई है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने इस मामले में Meta को विस्तृत जवाब देने के लिए 9 जुलाई तक का समय दिया है। पहले कंपनी से 6 जुलाई तक जवाब मांगा गया था, लेकिन अब तीन दिन की अतिरिक्त मोहलत दी गई है। सरकार का कहना है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम से पहचान होने की सुविधा का गलत इस्तेमाल साइबर अपराधी कर सकते हैं। ऐसे में इस फीचर के सुरक्षा पहलुओं और संभावित जोखिमों पर स्पष्ट जानकारी मांगी गई है। क्या है WhatsApp का नया यूजरनेम फीचर? WhatsApp अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा फीचर ला रहा है, जिसके तहत यूजर अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना दूसरे लोगों से चैट कर सकेंगे। कंपनी के अनुसार— हर यूजर के लिए एक यूनिक यूजरनेम होगा। डिस्प्ले नेम और यूजरनेम अलग-अलग होंगे। डिस्प्ले नेम एक जैसा हो सकता है, लेकिन यूजरनेम प्रत्येक अकाउंट के लिए अलग होगा। इसका उद्देश्य यूजर्स की प्राइवेसी को बेहतर बनाना है। सरकार को क्यों है चिंता? MeitY का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर दिखाई नहीं देगा तो इससे कानून-व्यवस्था और साइबर सुरक्षा से जुड़े नए खतरे पैदा हो सकते हैं। सरकार की प्रमुख चिंताएं हैं— अपराधी फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों को निशाना बना सकते हैं। किसी की पहचान छिपाकर धोखाधड़ी और साइबर अपराध को अंजाम देना आसान हो सकता है। फर्जी प्रोफाइल और तस्वीरों का दुरुपयोग बढ़ सकता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए अपराधियों की पहचान करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। Meta से क्या जानकारी मांगी गई है? सरकार ने Meta से यूजरनेम फीचर के कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। इनमें शामिल हैं— फीचर का तकनीकी ढांचा। यूजर की पहचान सत्यापित करने की प्रक्रिया। फर्जी अकाउंट और दुरुपयोग रोकने के उपाय। साइबर अपराध की स्थिति में जांच एजेंसियों को मिलने वाली सहायता। प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था। फिलहाल फीचर लागू न करने की सलाह सरकार ने Meta से कहा है कि जब तक इस फीचर पर समीक्षा और आवश्यक चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक भारत में इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से बचा जाए। सरकार पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नया फीचर उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी समाधान उपलब्ध कराए। अब इस मामले में सभी की नजर Meta के जवाब पर है, जिसे कंपनी को 9 जुलाई तक केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तावित और मौजूदा 'यूजरनेम फीचर' को लेकर सख्त रुख अपनाया है। WhatsApp को नोटिस जारी करने के बाद अब सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने Telegram और Signal को भी नोटिस भेजकर उनके यूजरनेम सिस्टम और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों पर जवाब मांगा है। सरकार ने इन प्लेटफॉर्म्स से पूछा है कि यूजरनेम फीचर के जरिए होने वाली धोखाधड़ी, फर्जी पहचान (Impersonation) और साइबर अपराधों को रोकने के लिए उन्होंने क्या सुरक्षा इंतजाम किए हैं। Telegram और Signal से मांगा जवाब सरकार ने नोटिस में पूछा है कि दोनों प्लेटफॉर्म अपने यूजरनेम फीचर को जारी रखने के पक्ष में क्या तर्क देते हैं और यह फीचर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किस तरह काम करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, Telegram को भेजे गए नोटिस में सरकार ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि उसे यूजरनेम फीचर बनाए रखने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। गौरतलब है कि Telegram और Signal पर यूजरनेम फीचर पहले से उपलब्ध है, जिससे बिना मोबाइल नंबर साझा किए भी यूजर्स एक-दूसरे से संपर्क कर सकते हैं। WhatsApp को भी भेजा गया था नोटिस इससे पहले केंद्र सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर पर आपत्ति जताई थी। सरकार ने कहा था कि जब तक इस विषय पर विस्तृत चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को भारत में लॉन्च नहीं किया जाए। सरकार की चिंता है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम आधारित पहचान से ऑनलाइन ठगी, फर्जी प्रोफाइल और पहचान छिपाकर अपराध करने के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। आईटी नियमों के तहत मांगा जवाब सरकार ने Meta से यह भी पूछा है कि प्रस्तावित फीचर को लेकर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। नोटिस में कहा गया है कि यदि यह फीचर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना लागू किया जाता है, तो इससे साइबर अपराध और ऑनलाइन फ्रॉड का खतरा बढ़ सकता है। WhatsApp ने किया फीचर का बचाव WhatsApp ने सरकार की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि प्रस्तावित यूजरनेम फीचर में उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। कंपनी का दावा है कि इसमें फर्जी पहचान, प्रतिरूपण (Impersonation) और ऑनलाइन धोखाधड़ी को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय पहले से शामिल किए गए हैं। भारत है सबसे बड़ा बाजार भारत WhatsApp के लिए दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। देश में WhatsApp के करीब 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। वहीं, Telegram और Signal के भी लाखों सक्रिय यूजर्स हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम डिजिटल सुरक्षा, ऑनलाइन पहचान और साइबर धोखाधड़ी को रोकने के प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर पर रोक लगाए जाने के बाद स्वदेशी टेक कंपनी Zoho ने भी बड़ा फैसला लिया है। कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने घोषणा की है कि उनका मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Arattai भी यूजरनेम आधारित अकाउंट फीचर को बंद करेगा। इस कदम के साथ Arattai सरकार के निर्देशों का समर्थन करने वाला पहला भारतीय मैसेजिंग ऐप बन गया है। श्रीधर वेम्बु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि सरकार के नए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए Arattai में यूजरनेम आधारित अकाउंट की सुविधा समाप्त की जाएगी। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह बदलाव कब तक लागू होगा, लेकिन स्पष्ट किया कि कंपनी नियामकीय नियमों का पूरी तरह पालन करेगी। पहले से मौजूद था यूजरनेम फीचर Arattai में यूजरनेम के आधार पर अकाउंट बनाने और इस्तेमाल करने की सुविधा पहले से उपलब्ध थी। इस फीचर के जरिए यूजर बिना मोबाइल नंबर साझा किए दूसरे लोगों से जुड़ सकते थे। लेकिन अब कंपनी इसे चरणबद्ध तरीके से हटाने की तैयारी कर रही है। वेम्बु के इस फैसले को भारत सरकार की डिजिटल सुरक्षा और साइबर फ्रॉड रोकने की नीति के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। WhatsApp को सरकार ने क्यों रोका? हाल ही में Meta ने WhatsApp के लिए यूजरनेम फीचर पेश करने की घोषणा की थी। इस फीचर का उद्देश्य यूजर्स को अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना चैट करने की सुविधा देना था। कंपनी का दावा था कि इससे प्राइवेसी और सुरक्षा बेहतर होगी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस फीचर को लेकर गंभीर सुरक्षा चिंताएं जताईं। सरकार का मानना है कि यदि यूजरनेम सिस्टम बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के लागू किया गया, तो साइबर अपराधी बैंक, सरकारी संस्थानों, कंपनियों और प्रसिद्ध हस्तियों के नाम से फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों को धोखा दे सकते हैं। इससे फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट, वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन स्कैम जैसे मामलों में बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है। Meta से मांगी गई तकनीकी जानकारी रिपोर्ट्स के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने Meta से इस फीचर की विस्तृत तकनीकी जानकारी मांगी है। इसमें यूजरनेम सिस्टम का आर्किटेक्चर, सुरक्षा व्यवस्था, पहचान सत्यापन और धोखाधड़ी रोकने के उपायों की जानकारी शामिल है। जब तक सरकार और Meta के बीच इस विषय पर चर्चा पूरी नहीं हो जाती और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान नहीं हो जाता, तब तक भारत में WhatsApp के यूजरनेम फीचर के रोलआउट पर रोक रहेगी। Meta ने क्या दी सफाई? Meta का कहना है कि उसने कई महत्वपूर्ण यूजरनेम पहले से ही सुरक्षित (Reserved) रखे हैं। इनमें सरकारी संस्थान, प्रमुख कंपनियां, मशहूर हस्तियां और Meta Verified अकाउंट शामिल हैं। यदि कोई सामान्य यूजर ऐसे नाम से यूजरनेम बनाने की कोशिश करता है, तो सिस्टम उसे बताएगा कि वह नाम उपलब्ध नहीं है। कंपनी का दावा है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य फर्जी अकाउंट और पहचान की चोरी को रोकना है। डिजिटल सुरक्षा पर बढ़ा फोकस WhatsApp और Arattai से जुड़े हालिया घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए सुरक्षा और पहचान सत्यापन से जुड़े नियम लगातार सख्त हो रहे हैं। सरकार चाहती है कि नए फीचर्स लॉन्च करने से पहले कंपनियां पर्याप्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करें, ताकि ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने WhatsApp के प्रस्तावित 'यूजरनेम' फीचर को लेकर सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर इस फीचर के रोलआउट पर सवाल उठाए हैं और तीन दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक उसके सभी सुरक्षा संबंधी सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक भारत में यह फीचर लॉन्च नहीं किया जा सकेगा। नोटिस में क्या कहा गया? सरकार ने अपने नोटिस में कहा है कि WhatsApp का यूजरनेम फीचर ऑनलाइन धोखाधड़ी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट और फर्जी पहचान वाले साइबर अपराधों को बढ़ावा दे सकता है। नोटिस के अनुसार, यदि लोग केवल यूजरनेम के माध्यम से संपर्क कर सकेंगे, तो साइबर अपराधियों के लिए अपनी पहचान छिपाकर लोगों को निशाना बनाना अधिक आसान हो जाएगा। कानूनी कार्रवाई की चेतावनी सरकार ने मेटा से पूछा है कि जब कंपनी को इस फीचर से संभावित साइबर अपराधों का अंदेशा है, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। मेटा को इस संबंध में लिखित और विस्तृत जवाब देने के लिए तीन दिन का समय दिया गया है। सरकार की प्रमुख चिंताएं सरकार ने नोटिस में कई संभावित जोखिमों का उल्लेख किया है। डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन स्कैम: सरकार का मानना है कि बिना फोन नंबर साझा किए केवल यूजरनेम के जरिए संपर्क की सुविधा मिलने पर साइबर अपराधियों के लिए लोगों तक पहुंचना आसान हो सकता है। फर्जी पहचान का खतरा: धोखेबाज किसी व्यक्ति, कंपनी या सरकारी संस्था से मिलते-जुलते यूजरनेम बनाकर लोगों को भ्रमित कर सकते हैं। सरकारी एजेंसियों की नकल: आशंका जताई गई है कि अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, बैंक या अन्य सरकारी अधिकारी बताकर लोगों से ठगी कर सकते हैं। यूजरनेम फीचर क्या है? WhatsApp जिस फीचर पर काम कर रहा है, उसके तहत उपयोगकर्ता अपने मोबाइल नंबर के बजाय एक यूजरनेम के जरिए दूसरों से जुड़ सकेंगे। इससे फोन नंबर साझा किए बिना बातचीत करने का विकल्प मिलेगा। यह सुविधा पहले से कई अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। भारत सरकार का मानना है कि इस फीचर को लागू करने से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपाय और पहचान सत्यापन की व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है। फिलहाल मेटा की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सरकार के जवाब की समीक्षा के बाद ही भारत में WhatsApp के यूजरनेम फीचर के भविष्य पर फैसला लिया जाएगा।
जामताड़ा, एजेंसियां। साइबर अपराध के लिए बदनाम जामताड़ा से ठगी का एक और नया तरीका सामने आया है। पुलिस ने तीन साइबर अपराधियों को गिरफ्तार कर ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो कैशबैक ऑफर और फर्जी बैंक कॉल के जरिए लोगों के बैंक खातों से पैसे उड़ा रहे थे। आरोपियों के खुलासों ने साइबर ठगी के नए और खतरनाक तरीकों की जानकारी दी है। गिरिडीह के साइबर डीएसपी अमित रविदास ने बताया कि गुप्त सूचना के आधार पर करमाटाड़ थाना क्षेत्र में छापेमारी कर समीम अंसारी (24), कैफ अंसारी (19) और मुस्तकीम अंसारी (38) को गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई के दौरान उनके पास से छह मोबाइल फोन और चार सिम कार्ड बरामद किए गए हैं। कैशबैक ऑफर के नाम पर ठगी पुलिस पूछताछ में सामने आया कि समीम और कैफ अंसारी ‘Ease My Deal’ नामक ऐप का इस्तेमाल कर लोगों के PhonePe खातों पर ₹1999 कैशबैक का आकर्षक संदेश भेजते थे। संदेश देखकर कई लोग इसे असली ऑफर समझकर लिंक पर क्लिक कर देते थे। जैसे ही पीड़ित लिंक पर क्लिक करता, उसके खाते से रकम ट्रांसफर हो जाती। ठग इस पैसे से ऑनलाइन गिफ्ट कार्ड खरीदते और बाद में उन्हें कमीशन पर बेचकर नकदी हासिल करते थे। पुलिस का कहना है कि यह तरीका तेजी से लोगों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। फर्जी SBI अधिकारी बनकर करता था कॉल गिरफ्तार तीसरा आरोपी मुस्तकीम अंसारी खुद को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का अधिकारी बताकर लोगों को फोन करता था। वह पीड़ितों को डराता था कि उनका क्रेडिट कार्ड जल्द बंद होने वाला है और उसे चालू रखने के लिए कुछ जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद वह मोबाइल में एक APK फाइल डाउनलोड करवाता था। यह फाइल जासूसी सॉफ्टवेयर की तरह काम करती थी और इंस्टॉल होते ही कार्ड नंबर, ओटीपी तथा अन्य गोपनीय जानकारियां अपराधियों तक पहुंच जाती थीं। इसके बाद खाते से रकम निकाल ली जाती थी। पुराने नेटवर्क की तलाश में पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि मुस्तकीम अंसारी पहले भी साइबर ठगी के मामलों में शामिल रह चुका है। पुलिस अब उसके पुराने नेटवर्क, सहयोगियों और इस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की तलाश कर रही है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी कैशबैक लिंक, अज्ञात ऐप या APK फाइल पर भरोसा न करें और बैंक संबंधी जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर दुनिया के सबसे प्रभावशाली खुफिया गठबंधनों में से एक Five Eyes intelligence alliance ने गंभीर चेतावनी जारी की है। गठबंधन का कहना है कि AI की अगली पीढ़ी के मॉडल आने वाले कुछ ही महीनों में वैश्विक साइबर सुरक्षा परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकते हैं। इससे साइबर हमलों की रफ्तार, दायरा और जटिलता कई गुना बढ़ सकती है। फाइव आइज की निगरानी संस्था FIORC (Five Eyes Intelligence Oversight and Review Council) ने सरकारों, व्यवसायों और कॉर्पोरेट नेतृत्व से अपील की है कि वे साइबर सुरक्षा और साइबर रेजिलिएंस (Cyber Resilience) को तत्काल प्राथमिकता दें। AI बढ़ाएगा साइबर हमलों का खतरा संयुक्त बयान में कहा गया है कि "फ्रंटियर AI सिस्टम" मौजूदा उद्योग की अपेक्षाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली साबित हो सकते हैं और साइबर हमलों तथा उनके बचाव दोनों में बुनियादी बदलाव ला सकते हैं। यह बदलाव वर्षों में नहीं, बल्कि कुछ महीनों में देखने को मिल सकता है। गठबंधन के अनुसार, AI किसी डिजिटल कमजोरी की पहचान होने और साइबर अपराधियों द्वारा उसका फायदा उठाने के बीच के समय को तेजी से कम कर रहा है, जिससे साइबर खतरों का जोखिम बढ़ रहा है। अमेरिकी फैसले के बाद जारी हुई चेतावनी यह बयान उस समय आया है, जब अमेरिका ने Anthropic द्वारा विकसित कुछ उन्नत AI सिस्टम तक विदेशी नागरिकों की पहुंच सीमित करने का फैसला किया है। यह कदम अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की सलाह पर उठाया गया है। फाइव आइज ने अपने बयान में किसी विशेष कंपनी या AI मॉडल का नाम नहीं लिया, लेकिन उसने स्पष्ट संकेत दिया कि अत्याधुनिक AI मॉडल वैश्विक साइबर सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं। केवल खतरा नहीं, सुरक्षा का अवसर भी फाइव आइज ने यह भी स्वीकार किया कि AI साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए शक्तिशाली उपकरण भी उपलब्ध करा सकता है। संगठन का कहना है कि यदि AI का उपयोग रणनीतिक और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से किया जाए तो यह साइबर हमलों की पहचान, निगरानी और प्रतिक्रिया को पहले से अधिक प्रभावी बना सकता है। नेताओं को दी ये सलाह गठबंधन ने कंपनियों के बोर्ड और वरिष्ठ अधिकारियों से कहा है कि वे: साइबर जोखिम को केवल तकनीकी समस्या न मानें। साइबर सुरक्षा को व्यापारिक जोखिम और नेतृत्व की जिम्मेदारी के रूप में देखें। सुरक्षा टीमों को पर्याप्त संसाधन और अधिकार दें। बदलते AI-आधारित खतरों के अनुसार अपनी रणनीतियों को लगातार अपडेट करें। सुरक्षा उपायों का वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण करें। 'AI भविष्य नहीं, वर्तमान की चुनौती' बयान में कहा गया, "AI भविष्य की तकनीक नहीं है, यह पहले से मौजूद है। फ्रंटियर AI के तेजी से विकास का अर्थ है कि साइबर जोखिमों को लेकर हमारी धारणाएं वर्षों नहीं, बल्कि महीनों में पुरानी पड़ सकती हैं।" फाइव आइज ने चेतावनी दी कि दुनिया को बदलते साइबर खतरों का सामना करने के लिए अभी से तैयार होना होगा, क्योंकि AI आने वाले समय में वैश्विक डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह नया रूप देने जा रहा है।
ICANN Domestic Root Servers: डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने वैश्विक इंटरनेट संस्था ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) से भारत में मुख्य रूट सर्वर स्थापित करने की मांग की है। इस कदम का उद्देश्य देश की इंटरनेट सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता को कम करना है। भारत ने क्यों उठाई रूट सर्वर की मांग? इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार वाले देशों में शामिल भारत के पास अपना मजबूत और सुरक्षित इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए। उनका मानना है कि घरेलू रूट सर्वर से देश की डिजिटल संप्रभुता को और मजबूती मिलेगी। क्या होते हैं रूट सर्वर? रूट सर्वर इंटरनेट की बुनियादी संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। जब कोई यूजर किसी वेबसाइट को खोलता है या ईमेल भेजता है, तो डोमेन नेम सिस्टम (DNS) के जरिए रूट सर्वर उस वेबसाइट का सही पता खोजने में मदद करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो रूट सर्वर इंटरनेट की "डायरेक्टरी" की तरह काम करते हैं, जो यूजर्स को सही वेबसाइट तक पहुंचाने में सहायता करते हैं। फिलहाल कहां मौजूद हैं ये सर्वर? वर्तमान में ICANN के नेटवर्क से जुड़े प्रमुख रूट सर्वरों की मौजूदगी अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, मिस्र और केन्या जैसे देशों में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और ICANN के बीच इस विषय पर बातचीत जारी है। बताया जा रहा है कि भारत को सभी 13 मुख्य रूट सर्वरों को मिरर करने वाले करीब 18 सर्वरों का एक पूरा क्लस्टर मिल सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से जटिल और लंबी मानी जा रही है। क्या होंगे इसके फायदे? यदि भारत में रूट सर्वर स्थापित होते हैं, तो इसके कई महत्वपूर्ण लाभ सामने आ सकते हैं: इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता कम होगी। साइबर हमलों और मैलवेयर खतरों से निपटने में तेजी आएगी। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के स्तर पर ही संभावित खतरों को रोका जा सकेगा। देश के महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। तकनीकी निवेश और डिजिटल इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा। भारत डिजिटल रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा। वैश्विक स्तर पर संतुलित इंटरनेट ढांचे की जरूरत रिपोर्ट्स के मुताबिक, सचिव एस. कृष्णन ने इस बात पर भी जोर दिया है कि इंटरनेट का बुनियादी ढांचा दुनिया भर में संतुलित तरीके से वितरित होना चाहिए। उनका मानना है कि भारत में रूट सर्वर स्थापित होने से न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि तकनीकी नवाचार और निवेश के नए अवसर भी पैदा होंगे। अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इसे भारत की डिजिटल संप्रभुता और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।
नई दिल्ली: देश में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को तकनीक के जरिए और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में गृह मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को 'अभिज्ञान (Abhigyan) ऐप' लॉन्च किया, जो पुलिसकर्मियों को रियल टाइम में संदिग्धों की पहचान करने और उनके आपराधिक रिकॉर्ड तक तुरंत पहुंचने की सुविधा देगा। यह नया सिस्टम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित किया गया है और इसे देश के विशाल फिंगरप्रिंट डेटाबेस NAFIS (National Automated Fingerprint Identification System) से जोड़ा गया है। अंगूठे का निशान लगाते ही सामने आएगा पूरा रिकॉर्ड अभिज्ञान ऐप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पुलिसकर्मी अब किसी संदिग्ध व्यक्ति के फिंगरप्रिंट लेकर सीधे अपने स्मार्टफोन पर उसका आपराधिक इतिहास जांच सकेंगे। इसके लिए व्यक्ति को थाने ले जाने की जरूरत नहीं होगी। यह सिस्टम करीब 1.3 करोड़ आरोपियों, दोषियों और संदिग्धों के राष्ट्रीय डेटाबेस से जुड़ा हुआ है, जिससे कुछ ही सेकंड में जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। सड़क पर ही हो सकेगी जांच नई तकनीक के जरिए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सड़क पर, चेकिंग के दौरान या किसी अभियान में मौके पर ही बायोमेट्रिक सत्यापन कर सकेंगी। डेमो के दौरान यह दिखाया गया कि फिंगरप्रिंट का मिलान मात्र 35 सेकंड में हो जाता है। इससे फरार अपराधियों और वांटेड आरोपियों की पहचान पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से की जा सकेगी। पहले सिर्फ थानों तक सीमित थी सुविधा अब तक फिंगरप्रिंट मिलान की सुविधा देशभर के पुलिस थानों और जिला मुख्यालयों में स्थापित लगभग 1,556 वर्कस्टेशनों तक सीमित थी। किसी व्यक्ति के फिंगरप्रिंट की जांच के लिए उसे संबंधित केंद्र तक ले जाना पड़ता था। अभिज्ञान ऐप आने के बाद यह पूरी प्रक्रिया मोबाइल आधारित और रियल टाइम हो जाएगी। इसके अलावा ऐप में टू-स्टेप ऑथेंटिकेशन जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी दी गई है। NAFIS डेटाबेस में मौजूद हैं लाखों अपराधियों के रिकॉर्ड राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस में विभिन्न प्रकार के अपराधों से जुड़े लाखों रिकॉर्ड मौजूद हैं। इनमें नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और जेल रिकॉर्ड से संबंधित बड़ी संख्या में डेटा शामिल है। टेक्नोलॉजी से अपराधियों को सजा दिलाने पर जोर अभिज्ञान ऐप लॉन्च करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केवल अपराधियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि समयबद्ध तरीके से उन्हें सजा दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि फिंगरप्रिंट, डीएनए, मोबाइल टावर डेटा, फेस रिकॉग्निशन और आईरिस स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने से मजबूत चार्जशीट तैयार करने और अपराधियों को कड़ी सजा दिलाने में मदद मिलेगी। यह पहल देश की पुलिस व्यवस्था को आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
डिजिटल दुनिया में साइबर हमलों के तरीके लगातार बदल रहे हैं और अब एक नया खतरा सुरक्षा एजेंसियों की चिंता का कारण बन गया है। अमेरिकी जांच एजेंसी FBI ने “Kali365” नाम के एक खतरनाक फिशिंग प्लेटफॉर्म को लेकर चेतावनी जारी की है। यह प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से Microsoft 365 यूजर्स को निशाना बना रहा है और सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह पारंपरिक मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (MFA) सुरक्षा को भी बायपास करने में सक्षम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस हमले को अंजाम देने के लिए किसी व्यक्ति का साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ होना भी जरूरी नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह तैयार फिशिंग टूल्स के साथ उपलब्ध कराया जा रहा है। क्या है Kali365? Kali365 एक “फिशिंग-एज-ए-सर्विस” (PhaaS) प्लेटफॉर्म है, जिसे साइबर अपराधियों के इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है। यह सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल पर काम करता है और हमलावरों को फिशिंग अभियान चलाने के लिए तैयार टूल्स उपलब्ध कराता है। इस प्लेटफॉर्म में कई उन्नत सुविधाएं शामिल हैं, जैसे: एआई आधारित ईमेल टेम्पलेट्स ऑटोमेटेड फिशिंग कैंपेन रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम संभावित शिकारों की निगरानी इन सुविधाओं की मदद से साइबर हमले पहले की तुलना में ज्यादा प्रभावी और आसान हो गए हैं। कैसे काम करता है यह हमला? Kali365 पारंपरिक फिशिंग तकनीकों से थोड़ा अलग तरीके से काम करता है। यूजर्स को ऐसा ईमेल भेजा जाता है जो किसी भरोसेमंद क्लाउड सर्विस या डॉक्यूमेंट शेयरिंग प्लेटफॉर्म जैसा दिखाई देता है। ईमेल में एक डिवाइस कोड दिया जाता है और यूजर को Microsoft लॉगिन पेज पर जाकर उसे दर्ज करने के लिए कहा जाता है। जब यूजर ऐसा करता है, तो वह अनजाने में हमलावर के डिवाइस को अपने अकाउंट तक पहुंच की अनुमति दे देता है। इसके बाद हमलावर OAuth टोकन हासिल कर लेते हैं और Outlook, Teams, OneDrive जैसी सेवाओं तक पहुंच बना सकते हैं, वह भी बिना दोबारा पासवर्ड या MFA की आवश्यकता के। MFA होने के बावजूद क्यों खतरनाक है यह हमला? आमतौर पर लोग मानते हैं कि मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन उनके अकाउंट को पूरी तरह सुरक्षित बना देता है, लेकिन Kali365 सीधे पासवर्ड चुराने की बजाय OAuth टोकन को निशाना बनाता है। इसी कारण कई मामलों में पासवर्ड बदलने के बाद भी हमलावर अकाउंट तक पहुंच बनाए रख सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे हमलों की पहचान करना पारंपरिक फिशिंग की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो सकता है। FBI ने यूजर्स को क्या सलाह दी? FBI ने Microsoft 365 उपयोगकर्ताओं और संगठनों को अपनी सुरक्षा सेटिंग्स की समीक्षा करने की सलाह दी है। एजेंसी ने कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां अपनाने की सिफारिश की है: डिवाइस कोड आधारित ऑथेंटिकेशन को सीमित करें। Conditional Access Policy लागू करें। लॉगिन गतिविधियों की नियमित निगरानी करें। संदिग्ध ईमेल और अनजान डिवाइस लॉगिन पर नजर रखें। असामान्य अकाउंट गतिविधियों को तुरंत जांचें। विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और नियमित सुरक्षा ऑडिट ही ऐसे हमलों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। साइबर अपराध का नया बिजनेस मॉडल बन रहा है PhaaS Kali365 का मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि साइबर अपराध अब एक संगठित उद्योग का रूप ले रहा है। “Phishing-as-a-Service” मॉडल के तहत जटिल हैकिंग टूल्स को आसान सब्सक्रिप्शन सेवाओं में बदला जा रहा है। इससे कम तकनीकी जानकारी रखने वाले लोग भी बड़े स्तर पर साइबर हमले करने में सक्षम हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में पहचान आधारित साइबर हमलों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आज के डिजिटल दौर में WhatsApp हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग अलर्ट से लेकर निजी बातचीत तक, लगभग हर जरूरी जानकारी इसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहती है। ऐसे में अगर आपका WhatsApp अकाउंट हैक हो जाए, तो यह बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है। इसी को देखते हुए दिल्ली पुलिस की IFSO (Intelligence Fusion and Strategic Operations) यूनिट के जॉइंट सीपी रजनीश गुप्ता ने एक वीडियो के जरिए हैक हुए WhatsApp अकाउंट को वापस पाने का तरीका बताया है। क्यों जरूरी है ##21# कोड? दिल्ली पुलिस के अनुसार, अगर किसी हैकर ने कॉल या मैसेज फॉरवर्डिंग के जरिए आपके OTP अपने डिवाइस पर प्राप्त करने की व्यवस्था कर रखी है, तो सबसे पहले उस फॉरवर्डिंग को बंद करना जरूरी है। इसके लिए अपने फोन में: ##21# डायल करने की सलाह दी गई है। यह USSD कोड कई मामलों में सक्रिय कॉल फॉरवर्डिंग सेटिंग्स को बंद करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि अलग-अलग ऑपरेटर और डिवाइस के अनुसार इसका प्रभाव अलग हो सकता है। इसलिए इसे सुरक्षा के अतिरिक्त कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। WhatsApp अकाउंट वापस पाने के लिए अपनाएं ये स्टेप्स 1. सबसे पहले ##21# डायल करें इससे संभावित कॉल या मैसेज फॉरवर्डिंग बंद हो सकती है और OTP गलत व्यक्ति तक पहुंचने का खतरा कम हो सकता है। 2. Meta के शिकायत फॉर्म पर जाएं WhatsApp सपोर्ट फॉर्म खोलें। 3. "Are you a law enforcement officer?" पर "No" चुनें 4. अपना मोबाइल नंबर दर्ज करें देश के कोड के साथ अपना WhatsApp नंबर दो बार भरें। 5. "My account has been hacked" विकल्प चुनें 6. समस्या का विवरण लिखें बताएं कि आपका अकाउंट हैक हो गया है और आप लॉगिन नहीं कर पा रहे हैं। 7. अपना नाम और ईमेल आईडी भरें 8. Electronic Signature में अपना नाम दर्ज कर फॉर्म सबमिट करें इसके बाद क्या होगा? फॉर्म सबमिट करने के बाद Meta आपकी शिकायत की समीक्षा करेगा। सत्यापन पूरा होने पर हैकर के डिवाइस से आपका WhatsApp अकाउंट लॉगआउट किया जा सकता है। इसके बाद आप OTP की मदद से दोबारा अपने अकाउंट में लॉगिन कर सकेंगे। Facebook और Instagram के लिए भी उपलब्ध है सुविधा अगर आपका Facebook या Instagram अकाउंट हैक हो गया है, तो Meta इन प्लेटफॉर्म्स के लिए भी अलग रिकवरी फॉर्म उपलब्ध कराता है। सुरक्षा के लिए इन बातों का रखें ध्यान WhatsApp में टू-स्टेप वेरिफिकेशन जरूर ऑन करें। किसी के साथ OTP साझा न करें। अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें। संदिग्ध कॉल या मैसेज मिलने पर तुरंत सतर्क हो जाएं। अपने ईमेल अकाउंट की सुरक्षा भी मजबूत रखें।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल नंबर सिर्फ कॉल करने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह बैंकिंग, यूपीआई, ईमेल और सोशल मीडिया अकाउंट्स की सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुका है। ऐसे में अगर आपने मोबाइल नंबर बदल लिया है, लेकिन अपने जरूरी अकाउंट्स में नया नंबर अपडेट नहीं किया, तो यह एक बड़ा सुरक्षा जोखिम बन सकता है। दरअसल, टेलीकॉम कंपनियां लंबे समय तक बंद पड़े नंबरों को स्थायी रूप से निष्क्रिय नहीं रखतीं। निर्धारित अवधि के बाद वही नंबर किसी नए ग्राहक को जारी कर दिया जाता है। ऐसे में आपका पुराना नंबर किसी और के पास पहुंच सकता है और इससे आपकी निजी जानकारी खतरे में पड़ सकती है। पुराना नंबर किसी और को मिलने पर क्या हो सकता है? अगर आपके बैंक खाते, ईमेल, यूपीआई ऐप या सोशल मीडिया प्रोफाइल अभी भी पुराने नंबर से जुड़े हुए हैं, तो नए नंबर धारक को आपके लिए आने वाले OTP, पासवर्ड रीसेट लिंक और अन्य महत्वपूर्ण संदेश प्राप्त हो सकते हैं। इससे कोई व्यक्ति आपके अकाउंट तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है और आपकी संवेदनशील जानकारी जोखिम में पड़ सकती है। टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन भी बन सकता है जोखिम अधिकांश लोग अकाउंट सुरक्षा के लिए टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) का इस्तेमाल करते हैं। इसमें लॉगिन के समय मोबाइल नंबर पर एक सुरक्षा कोड भेजा जाता है। लेकिन अगर वह नंबर अब आपके पास नहीं है और किसी दूसरे व्यक्ति को जारी हो चुका है, तो वही कोड उसके मोबाइल पर पहुंच सकता है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, केवल SMS आधारित सुरक्षा पर निर्भर रहना अब पहले जितना सुरक्षित नहीं माना जाता। अकाउंट हैकिंग का बढ़ रहा खतरा हर साल दुनिया भर में लाखों मोबाइल नंबर दोबारा जारी किए जाते हैं। ऐसे में पुराने नंबरों से जुड़े अकाउंट साइबर अपराधियों के लिए आसान लक्ष्य बन सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति के पास आपका पुराना नंबर पहुंच गया और उसने आपके ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट का पासवर्ड रीसेट करने की प्रक्रिया शुरू की, तो जरूरी सुरक्षा संदेश उसी के फोन पर जा सकते हैं। नंबर बदलने के बाद तुरंत करें ये काम यदि आपने हाल ही में नया मोबाइल नंबर लिया है, तो इन प्लेटफॉर्म पर तुरंत नंबर अपडेट करें— बैंक खाते और नेट बैंकिंग सेवाएं यूपीआई और डिजिटल पेमेंट ऐप्स ईमेल अकाउंट व्हाट्सऐप इंस्टाग्राम फेसबुक अन्य जरूरी ऑनलाइन सेवाएं ध्यान रखें कि केवल नया नंबर जोड़ना काफी नहीं है। पुराने नंबर को पूरी तरह हटाना भी जरूरी है। SMS OTP के बजाय अपनाएं सुरक्षित विकल्प साइबर विशेषज्ञ अब ऑथेंटिकेटर ऐप्स के इस्तेमाल की सलाह दे रहे हैं। ये ऐप मोबाइल नंबर पर निर्भर नहीं होते और डिवाइस के भीतर ही सुरक्षा कोड तैयार करते हैं। इसके साथ ही अकाउंट रिकवरी सेटिंग्स की भी जांच करनी चाहिए, क्योंकि कई बार पुराना नंबर बैकअप संपर्क के रूप में सेव रह जाता है। अभी जांच करना क्यों है जरूरी? मोबाइल नंबर का दोबारा आवंटन टेलीकॉम कंपनियों की सामान्य प्रक्रिया है और यह भविष्य में भी जारी रहेगी। इसलिए अगर आपने कभी नंबर बदला है, तो एक बार सभी महत्वपूर्ण अकाउंट्स की जांच जरूर करें। एक छोटी सी लापरवाही आपके बैंक खाते, निजी जानकारी और सोशल मीडिया प्रोफाइल की सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल Google ने एक बार फिर कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले दो सप्ताह के दौरान कंपनी ने अपने क्लाउड डिवीजन और साइबर सिक्योरिटी से जुड़ी कई टीमों में कर्मचारियों की संख्या घटाई है। इस कदम ने टेक सेक्टर में नौकरी की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। क्लाउड और थ्रेट इंटेलिजेंस टीम हुई प्रभावित मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, छंटनी का असर गूगल क्लाउड की कई इकाइयों पर पड़ा है। इनमें कंपनी का गूगल थ्रेट इंटेलिजेंस ग्रुप (GTIG) भी शामिल है, जो वैश्विक साइबर हमलों और हैकिंग गतिविधियों पर शोध कर रिपोर्ट तैयार करता है। यह टीम साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में गूगल की महत्वपूर्ण इकाइयों में गिनी जाती है। इसके अलावा, साइबर सिक्योरिटी कंपनी Mandiant से जुड़े कुछ कर्मचारियों को भी नौकरी गंवानी पड़ी है। गूगल ने वर्ष 2022 में Mandiant का लगभग 5.4 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था, जिससे कंपनी ने साइबर सुरक्षा क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की थी। कर्मचारियों ने सोशल मीडिया पर साझा किया अनुभव छंटनी की पुष्टि उस समय और मजबूत हुई जब प्रभावित कर्मचारियों में से कुछ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर पोस्ट साझा की। एक कर्मचारी ने बताया कि उनकी पूरी टीम में कई लोगों को नौकरी से निकाला गया है। उन्होंने आगे कहा कि कुछ समय का ब्रेक लेने के बाद वे नई नौकरी की तलाश शुरू करेंगे। AI पर बढ़ा फोकस, बदले जा रहे संसाधन सूत्रों के अनुसार, गूगल अपने संसाधनों को तेजी से विकसित हो रहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षेत्र की ओर स्थानांतरित कर रहा है। कंपनी का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI उसके कारोबार का प्रमुख आधार बनने वाला है। इसी कारण कुछ विभागों में कर्मचारियों की संख्या कम कर संसाधनों का पुनर्गठन किया जा रहा है। कंपनी ने क्या कहा? गूगल के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी समय-समय पर अपने आंतरिक ढांचे की समीक्षा करती है ताकि ग्राहकों और व्यवसाय की बदलती जरूरतों के अनुरूप खुद को बेहतर बना सके। हालांकि कंपनी ने यह नहीं बताया है कि कुल कितने कर्मचारियों को निकाला गया है। टेक सेक्टर में जारी है पुनर्गठन विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित तकनीकों के बढ़ते प्रभाव के कारण दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां अपने कार्यबल और निवेश रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं। गूगल की यह ताजा छंटनी भी उसी व्यापक बदलाव का हिस्सा मानी जा रही है, जहां कंपनियां पारंपरिक क्षेत्रों से संसाधन हटाकर AI और ऑटोमेशन पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
दुनिया के सबसे प्रभावशाली खुफिया गठबंधन ‘फाइव आइज’ ने चीन पर एक नए प्रकार के जासूसी अभियान चलाने का आरोप लगाया है। गठबंधन का दावा है कि चीनी एजेंट पेशेवर नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी नौकरी के विज्ञापन पोस्ट कर पश्चिमी देशों के सरकारी अधिकारियों, सैन्य कर्मियों और विशेषज्ञों से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। क्या है ‘फाइव आइज’ गठबंधन? Five Eyes दुनिया का प्रमुख खुफिया सहयोग मंच माना जाता है, जिसमें United States, United Kingdom, Australia, Canada और New Zealand शामिल हैं। इन देशों की सुरक्षा एजेंसियां आपस में खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं। हाल ही में जारी संयुक्त सुरक्षा चेतावनी में गठबंधन ने कहा कि चीन की खुफिया इकाइयां ऑनलाइन भर्ती अभियानों के जरिए संवेदनशील जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं। फर्जी कंपनियों और नकली भर्तियों का कथित नेटवर्क खुफिया एजेंसियों के अनुसार, चीनी एजेंट खुद को मानव संसाधन सलाहकार, रिसर्च फर्म या थिंक टैंक के प्रतिनिधि के रूप में पेश करते हैं। ये संस्थाएं पहली नजर में पूरी तरह वैध दिखाई देती हैं और अक्सर खुद को चीन से बाहर स्थित संगठन बताती हैं। उनका उद्देश्य भरोसा जीतकर संभावित लक्ष्यों तक पहुंच बनाना होता है। इंटरव्यू और रिसर्च असाइनमेंट के नाम पर जुटाई जाती है जानकारी रिपोर्ट के अनुसार, उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया के दौरान विश्लेषणात्मक रिपोर्ट या रिसर्च नोट तैयार करने को कहा जाता है। शुरुआत में इसके बदले मामूली भुगतान किया जाता है, लेकिन बाद में अधिक संवेदनशील जानकारियों के लिए बड़ी रकम की पेशकश की जाती है। वर्चुअल इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवारों से सरकारी नीतियों, सैन्य गतिविधियों, सुरक्षा ढांचे और रणनीतिक मामलों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। आगे चलकर बातचीत एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर स्थानांतरित कर दी जाती है। किन लोगों को बनाया जा रहा है लक्ष्य? फाइव आइज के अनुसार, इस कथित अभियान के प्रमुख निशाने हैं: सुरक्षा मंजूरी प्राप्त अधिकारी सैन्य और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी पत्रकार और मीडिया पेशेवर शिक्षाविद एवं शोधकर्ता थिंक टैंक विशेषज्ञ सरकारी संस्थानों से जुड़े कर्मचारी एजेंसियों का कहना है कि सामान्य दिखने वाली जानकारी भी व्यापक खुफिया विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कई मामलों में जांच और कार्रवाई का दावा गठबंधन ने कहा कि कई लोग अनजाने में ऐसे नेटवर्क के संपर्क में आ चुके हैं। कुछ मामलों में सुरक्षा जांच शुरू हुई, सुरक्षा मंजूरी रद्द की गई और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी की गई। ब्रिटेन के सुरक्षा मंत्री Dan Jarvis ने सरकारी और सैन्य कर्मचारियों से ऑनलाइन संपर्कों को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। चीन ने आरोपों को बताया निराधार इन आरोपों पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। China के अधिकारियों ने फाइव आइज के दावों को झूठा और राजनीतिक प्रेरित बताया है। चीन का कहना है कि उस पर लगाए जा रहे आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और पश्चिमी देश उसे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। चीनी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि फाइव आइज स्वयं दुनिया के सबसे बड़े खुफिया नेटवर्कों में से एक है। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल यह पहली बार नहीं है जब चीन पर पेशेवर नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए जानकारी जुटाने के आरोप लगे हैं। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी MI5 पहले भी चेतावनी दे चुकी है कि संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को ऑनलाइन भर्ती अभियानों के माध्यम से निशाना बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में जासूसी के तरीके तेजी से बदल रहे हैं और नौकरी के प्रस्ताव, शोध सहयोग तथा परामर्श कार्य जैसे साधन अब खुफिया गतिविधियों के नए माध्यम बनते जा रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भारत को एक महत्वपूर्ण वैश्विक अवसर मिला है। अमेरिकी AI कंपनी Anthropic ने अपने अत्याधुनिक और बेहद गोपनीय साइबर सुरक्षा मॉडल ‘मायथॉस’ (Mythos) की टेस्टिंग के लिए भारत को चुना है। खास बात यह है कि इस परियोजना में शामिल 15 देशों में भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अमेरिका का औपचारिक सैन्य संधि सहयोगी नहीं है, जबकि चीन को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इस फैसले को लेकर विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ इसे भारत की तकनीकी ताकत और वैश्विक भरोसे का प्रमाण मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे भारत को एक बड़े टेस्टिंग ग्राउंड के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बता रहे हैं। क्या है प्रोजेक्ट ग्लासविंग? मायथॉस को एंथ्रोपिक की महत्वाकांक्षी पहल ‘प्रोजेक्ट ग्लासविंग’ के तहत विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर सिस्टम में मौजूद कमजोरियों और सुरक्षा खामियों को साइबर अपराधियों से पहले पहचानना है। दावा किया जा रहा है कि मायथॉस जटिल सॉफ्टवेयर सिस्टम में छिपी कमियों को इंसानी विशेषज्ञों की तुलना में कहीं अधिक तेजी और सटीकता से खोज सकता है। शुरुआती परीक्षणों में इस AI ने कई प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउजरों में मौजूद सुरक्षा खामियों की पहचान की है। क्यों खास है मायथॉस? मायथॉस को सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसकी पहुंच केवल— सरकारी संस्थानों बड़ी तकनीकी कंपनियों प्रमुख वित्तीय संस्थानों तक सीमित रखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक सुरक्षित बना सकती है। हालांकि दूसरी ओर यह चिंता भी जताई जा रही है कि यदि ऐसी तकनीक गलत हाथों में पहुंच जाए तो इसका दुरुपयोग भी संभव है। किन देशों को मिला टेस्टिंग का मौका? भारत के अलावा जिन देशों को मायथॉस की टेस्टिंग में शामिल किया गया है, उनमें शामिल हैं— फ्रांस जर्मनी इटली स्विट्जरलैंड नीदरलैंड स्पेन बेल्जियम स्वीडन कनाडा जापान दक्षिण कोरिया ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड इनमें अधिकांश देश अमेरिका के औपचारिक सुरक्षा सहयोगी हैं। ऐसे में भारत का इस सूची में शामिल होना विशेष महत्व रखता है। भारत को क्यों चुना गया? विशेषज्ञों के अनुसार भारत के चयन के पीछे कई बड़े कारण हैं— दुनिया का विशाल सॉफ्टवेयर टैलेंट पूल तेजी से विकसित हो रहा डिजिटल भुगतान नेटवर्क बड़ा बैंकिंग और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर विशाल डिजिटल उपभोक्ता आधार भारत में मिलने वाला व्यावहारिक अनुभव वैश्विक स्तर पर AI मॉडल को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञों की दो अलग-अलग राय इस फैसले पर तकनीकी जगत दो हिस्सों में बंटा दिखाई दे रहा है। पहला पक्ष: भारत के लिए बड़ी उपलब्धि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की सबसे उन्नत AI और साइबर सुरक्षा परियोजनाओं में शामिल होना भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और वैश्विक भरोसे को दर्शाता है। उनका कहना है कि इससे भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को अत्याधुनिक AI सिस्टम के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। दूसरा पक्ष: क्या भारत सिर्फ टेस्टिंग ग्राउंड है? दूसरी ओर कुछ आलोचकों का मानना है कि एंथ्रोपिक भारत के विशाल डिजिटल इकोसिस्टम और डेटा वातावरण का उपयोग अपने AI मॉडल को और बेहतर बनाने के लिए कर सकता है। उनके अनुसार भारत को केवल एक परीक्षण बाजार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे तकनीक के विकास और स्वामित्व में भी अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए। एंथ्रोपिक में भारतीय प्रतिभा की बड़ी भूमिका भारत और एंथ्रोपिक के संबंध केवल इस परियोजना तक सीमित नहीं हैं। कंपनी के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) Rahul Patil भारतीय मूल के हैं। कंपनी ने टोक्यो के बाद अपना दूसरा वैश्विक कार्यालय Bengaluru में स्थापित किया है। एंथ्रोपिक के सीईओ Dario Amodei ने पिछले वर्ष भारत के प्रधानमंत्री से मुलाकात कर विभिन्न क्षेत्रों में AI के उपयोग पर चर्चा की थी। हाल के महीनों में भारत में डेवलपर्स के बीच Claude Code जैसे AI टूल्स का उपयोग तेजी से बढ़ा है। क्या मायथॉस भारत के लिए अवसर है या चुनौती? मायथॉस की टेस्टिंग में भारत की भागीदारी निश्चित रूप से देश की तकनीकी क्षमता और वैश्विक महत्व को दर्शाती है। हालांकि इसके साथ डेटा सुरक्षा, तकनीकी स्वायत्तता और विदेशी AI कंपनियों की भूमिका जैसे सवाल भी जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस अवसर को केवल टेस्टिंग तक सीमित रखता है या इसे अपनी AI रणनीति को मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल करता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को संवेदनशील तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप में अमेरिकी-ईरानी कारोबारी जमशीद घोमी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने वर्षों तक अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए नेटवर्किंग और साइबर सुरक्षा से जुड़े उपकरण ईरान तक पहुंचाए। संघीय अधिकारियों के अनुसार, 63 वर्षीय घोमी कैलिफोर्निया के न्यूपोर्ट कोस्ट के निवासी हैं और तेहरान स्थित तकनीकी कंपनी फराज परदाज रायानेह (FPR) के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करने का आरोप अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, घोमी पर इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) समेत कई संघीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने बिना आवश्यक सरकारी अनुमति के संवेदनशील अमेरिकी तकनीक ईरान भेजने के लिए एक संगठित तंत्र तैयार किया था। यूएई बना कथित ट्रांजिट हब अभियोजन पक्ष के अनुसार, उपकरणों को सीधे ईरान भेजने के बजाय पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित कंपनियों और बिचौलियों तक पहुंचाया जाता था। वहां से उन्हें आगे ईरान भेजा जाता था। अधिकारियों का मानना है कि इस तरीके का इस्तेमाल वास्तविक खरीदारों और अंतिम उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने के लिए किया गया। ऑनलाइन खरीदारी से शुरू हुआ ऑपरेशन जांच में सामने आया है कि शुरुआती दौर में कथित तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल भुगतान सेवाओं के माध्यम से बड़ी मात्रा में तकनीकी उपकरण खरीदे गए। बाद में अमेरिकी सप्लायरों से सीधे खरीदारी की गई और कई कंपनियों का उपयोग कर लेनदेन की वास्तविक प्रकृति को छिपाने का प्रयास किया गया। भारी मात्रा में हार्डवेयर भेजने का दावा संघीय जांच एजेंसियों का आरोप है कि कई वर्षों के दौरान बड़ी मात्रा में तकनीकी हार्डवेयर दुबई के रास्ते ईरान पहुंचाया गया। जांचकर्ताओं के अनुसार, शिपिंग रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित रूप से गलत जानकारी दर्ज कर अंतिम गंतव्य को छिपाया गया। रक्षा और परमाणु संस्थानों तक पहुंचे उपकरण अदालती दस्तावेजों में दावा किया गया है कि भेजे गए कुछ उपकरण ईरान के परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों तक पहुंचे। अभियोजकों के अनुसार, इन संस्थाओं को नेटवर्किंग, संचार और एन्क्रिप्शन तकनीक उपलब्ध कराई गई हो सकती है। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। पैसों के लेनदेन की भी जांच अमेरिकी एजेंसियां इस मामले से जुड़े वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही हैं। आरोप है कि धन के प्रवाह को छिपाने के लिए शेल कंपनियों, जटिल कारोबारी संरचनाओं और कथित फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया। साथ ही आय और कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी को लेकर भी जांच जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया है। विभाग का कहना है कि संवेदनशील तकनीक को प्रतिबंधित देशों तक पहुंचने से रोकना उसकी प्राथमिकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में आगे भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। अदालत में साबित होंगे आरोप जमशीद घोमी के खिलाफ आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। यदि अदालत में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें अमेरिकी संघीय कानूनों के तहत लंबी जेल की सजा हो सकती है। कानूनी सिद्धांतों के अनुसार अदालत में दोष साबित होने तक उन्हें निर्दोष माना जाएगा।
रांची। आजकल के डिजिटल ज़माने में WhatsApp सिर्फ chatting app नहीं, बल्कि personal chats, photos, documents और banking OTP तक का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में अगर आपका WhatsApp account hack हो जाए, तो privacy और security दोनों खतरे में पड़ सकती हैं। सवाल यह है कि WhatsApp hack हुआ है या नहीं, इसका पता कैसे लगाएं? आइए आसान भाषा में इसे समझते हैं। WhatsApp Account Hack होने के क्या संकेत हैं? 1. Unknown Devices Logged In दिखना अगर WhatsApp Web या linked devices में कोई अनजान device दिखाई दे, तो यह एक warning sign हो सकता है। 2. OTP Message बिना वजह आना अगर बार-बार आपको verification code या OTP message आ रहे हैं, तो इससे यह पता चलता है कि कोई आपका account access करने की कोशिश कर रहा है। 3. Messages अपने आप Read या Send होना अगर आपने message नहीं भेजा लेकिन chat में activity दिख रही है, तो account compromise हो सकता है। 4. अचानक Logout हो जाना WhatsApp अगर बार-बार logout हो रहा है या re-login मांग रहा है, तो सावधानी बरतने की जरूरत है। 5. Unknown Status या Profile Changes Profile photo, about section या status अपने आप बदलना suspicious activity का एक संकेत हो सकता है। WhatsApp Account Hack हुआ है तो क्या करें? तुरंत सभी linked devices logout करें Two-step verification ON करें WhatsApp PIN सेट करें Password और email security check करें Suspicious apps uninstall करें Account access वापस पाने के लिए re-verify करें Linked Devices कैसे Check करें? WhatsApp खोलें → Settings → Linked Devices → Unknown devices remove करें। Two-Step Verification क्यों जरूरी है? यह extra security layer जोड़ता है, जिससे सिर्फ OTP मिलने से account access करना मुश्किल हो जाता है। WhatsApp Account को Hack होने से कैसे बचायें ? OTP किसी अंजान व्यक्ति से share न करें Unknown links पर click न करें Fake APK files install न करें Public Wi-Fi पर login करने से बचे App को regularly update करें
TeamPCP Hacker Group: दुनिया भर में साइबर सुरक्षा एजेंसियों और टेक कंपनियों की चिंता बढ़ाने वाला हैकर समूह TeamPCP तेजी से सुर्खियों में आ रहा है। पिछले कुछ महीनों में इस समूह ने सैकड़ों ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर और डेवलपर टूल्स को संक्रमित कर बड़े पैमाने पर सप्लाई चेन हमले किए हैं। हाल ही में GitHub पर हुए डेटा ब्रीच के पीछे भी इसी समूह का हाथ माना जा रहा है, जिसने टेक इंडस्ट्री में नई चिंता पैदा कर दी है। GitHub डेटा ब्रीच के बाद चर्चा में आया TeamPCP कोड होस्टिंग प्लेटफॉर्म GitHub ने हाल ही में पुष्टि की कि उसके हजारों आंतरिक रिपॉजिटरी साइबर हमले की चपेट में आ गए। जांच में सामने आया कि एक डेवलपर ने VS Code का संक्रमित एक्सटेंशन इंस्टॉल कर लिया था, जिसके जरिए हैकर्स को सिस्टम तक पहुंच मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 3,800 आंतरिक रिपॉजिटरी प्रभावित हुईं। हालांकि कंपनी का कहना है कि ग्राहकों का डेटा सुरक्षित रहा, लेकिन इस घटना ने ओपन-सोर्स इकोसिस्टम की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर कौन है TeamPCP? TeamPCP की शुरुआत 2025 के अंत में हुई थी। शुरुआत में यह समूह क्लाउड सिस्टम की कमजोरियों और वेब डेवलपमेंट टूल्स में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर बॉटनेट नेटवर्क तैयार करता था। बाद में इसने अपनी गतिविधियों का विस्तार करते हुए सॉफ्टवेयर सप्लाई चेन अटैक को मुख्य हथियार बना लिया। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह समूह मुख्य रूप से आर्थिक लाभ के लिए काम करता है। हैकर्स डेटा चोरी करने, फिरौती मांगने और संवेदनशील जानकारी बेचने जैसे कामों में शामिल बताए जाते हैं। कैसे काम करता है TeamPCP का नेटवर्क? TeamPCP का तरीका बेहद खतरनाक और जटिल माना जाता है। यह सबसे पहले किसी लोकप्रिय ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर या डेवलपर टूल तक पहुंच बनाता है। इसके बाद उस सॉफ्टवेयर में मालवेयर कोड जोड़ दिया जाता है। जब डेवलपर्स या कंपनियां उस संक्रमित सॉफ्टवेयर को डाउनलोड करती हैं, तो उनके सिस्टम में भी मालवेयर पहुंच जाता है। इसके जरिए हैकर्स लॉगिन क्रेडेंशियल, एक्सेस टोकन और अन्य संवेदनशील जानकारी चुरा लेते हैं। बाद में इन्हीं जानकारियों का इस्तेमाल करके और अधिक सॉफ्टवेयर को संक्रमित किया जाता है। 'Mini Shai-Hulud' वर्म बना सबसे बड़ा हथियार रिपोर्ट्स के अनुसार TeamPCP ने अपने कई हमलों को ऑटोमेट करने के लिए "Mini Shai-Hulud" नामक सेल्फ-प्रोपेगेटिंग वर्म का इस्तेमाल किया है। यह वर्म एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम तक खुद फैल सकता है और संक्रमित नेटवर्क का दायरा लगातार बढ़ाता रहता है। साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इसी तकनीक की वजह से TeamPCP बहुत कम समय में सैकड़ों सॉफ्टवेयर पैकेज को प्रभावित करने में सफल रहा। OpenAI, GitHub और कई बड़ी कंपनियां बन चुकी हैं शिकार TeamPCP का नाम कई हाई-प्रोफाइल साइबर हमलों से जोड़ा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार यह समूह GitHub के अलावा OpenAI, Mercor, Mistral, Checkmarx और TanStack जैसी तकनीकी कंपनियों को भी निशाना बना चुका है। साइबर सुरक्षा फर्मों का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में TeamPCP ने 20 से अधिक बड़े सप्लाई चेन अटैक किए हैं, जिनमें 500 से ज्यादा सॉफ्टवेयर पैकेज संक्रमित हुए। इन हमलों का असर दुनिया भर की सैकड़ों कंपनियों पर पड़ा है। संगठनों को कैसे रहना चाहिए सुरक्षित? विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों को अपने सुरक्षा मानकों को और मजबूत करना होगा। नियमित रूप से एक्सेस टोकन बदलना, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन लागू करना और किसी भी नए सॉफ्टवेयर अपडेट को जांच के बाद ही इंस्टॉल करना जरूरी है। इसके अलावा ओपन-सोर्स पैकेज डाउनलोड करते समय स्रोत की विश्वसनीयता की जांच करना और संदिग्ध गतिविधियों की लगातार निगरानी करना भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बढ़ता खतरा, बढ़ती चुनौती TeamPCP ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक साइबर हमले केवल किसी एक कंपनी को नहीं बल्कि पूरे सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। जैसे-जैसे दुनिया ओपन-सोर्स तकनीकों पर अधिक निर्भर होती जा रही है, वैसे-वैसे ऐसे सप्लाई चेन हमलों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में TeamPCP जैसी संगठित हैकर टीमों से निपटना टेक इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होगा।
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में “डिजिटल अरेस्ट” के जरिए 74 वर्षीय बुजुर्ग महिला से 24 करोड़ रुपये की ठगी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। Karnataka State Cyber Command ने इस बड़े साइबर फ्रॉड रैकेट का भंडाफोड़ करते हुए छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी खुद को Central Bureau of Investigation (CBI) और Enforcement Directorate (ED) के वरिष्ठ अधिकारी बताकर महिला को लगातार डराते रहे और करीब दो महीने तक डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रखा। दो महीने तक डराकर वसूले करोड़ों रुपये जांच में सामने आया कि आरोपियों ने 10 फरवरी से 24 अप्रैल 2026 के बीच महिला को बार-बार पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। इस दौरान महिला ने 26 अलग-अलग ट्रांजैक्शन के जरिए करीब 24 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए। पुलिस के अनुसार, यह रकम देशभर के 10 बैंकों में मौजूद 23 फर्जी बैंक खातों में भेजी गई थी। ये आरोपी हुए गिरफ्तार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान इस प्रकार हुई है: N. Shivagnanam - इरोड, तमिलनाडु Akkach Mallik - मुंबई Palak Bhai Patel - अहमदाबाद Amit Narendra Patel - अहमदाबाद Om Prakash Rajput - नई दिल्ली Gaurav Kumar - बिहार बैंक अलर्ट से खुला मामला धोखाधड़ी का खुलासा 24 अप्रैल को हुआ, जब एक बैंक ने संदिग्ध लेनदेन की जानकारी साइबर कमांड यूनिट को दी। इसके बाद पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप कर पीड़िता को समझाया और आगे रकम ट्रांसफर होने से रोका। कार्रवाई के दौरान करीब 3 करोड़ रुपये की अतिरिक्त ठगी रोकी गई। पुलिस ने कई बैंक खातों को फ्रीज भी किया। 4 करोड़ रुपये बचाए, कई खाते फ्रीज बेंगलुरु स्थित साइबर कमांड के पुलिस महानिदेशक Pranab Mohanty ने बताया कि जांच के दौरान एनआरसीपी पोर्टल की मदद से कई खातों को फ्रीज किया गया। उन्होंने कहा कि अब तक 4 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सुरक्षित की गई है और अदालत के आदेशों के जरिए करीब 1.5 करोड़ रुपये की रिकवरी भी हुई है। क्या होता है डिजिटल अरेस्ट? पुलिस के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का तेजी से बढ़ता तरीका है। इसमें जालसाज खुद को पुलिस, CBI, ED या अदालत के अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो या ऑडियो कॉल पर डराते हैं। आरोपी पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस चुका है और गिरफ्तारी से बचने के लिए तुरंत पैसे ट्रांसफर करने होंगे। कई मामलों में पीड़ितों को घंटों या दिनों तक लगातार निगरानी में रखा जाता है।
Iran अब केवल तेल और समुद्री व्यापार ही नहीं, बल्कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क को भी रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी समुद्री इंटरनेट और डेटा केबलों पर नियंत्रण और शुल्क लगाने के संकेत दिए हैं। इस कदम ने दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों, बैंकिंग सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन केबलों पर किसी तरह का असर पड़ा तो वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक, क्लाउड सेवाएं, ऑनलाइन कारोबार और वित्तीय लेनदेन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। गूगल-माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों पर शुल्क लगाने की तैयारी ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, Google, Microsoft, Meta और Amazon जैसी कंपनियों को भविष्य में होर्मुज स्ट्रेट के नीचे गुजरने वाली इंटरनेट केबलों के इस्तेमाल के लिए शुल्क देना पड़ सकता है। ईरान के सैन्य प्रवक्ता Ebrahim Zolfaqhari ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संकेत दिए कि समुद्री इंटरनेट केबलों पर शुल्क लगाया जा सकता है। डिजिटल युद्ध की तरफ बढ़ रहा ईरान? विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान अब अपनी भौगोलिक स्थिति को रणनीतिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की पश्चिम एशिया विशेषज्ञ दीना एसफंदियारी के अनुसार, तेहरान दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि यदि उस पर हमला हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। समुद्र के नीचे बिछी सबसी केबलें वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क की रीढ़ मानी जाती हैं। यूरोप, एशिया और खाड़ी देशों के बीच डेटा ट्रांसफर, बैंकिंग सिस्टम, क्लाउड कंप्यूटिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन गेमिंग और AI सेवाओं का बड़ा हिस्सा इन्हीं केबलों के जरिए संचालित होता है। भारत समेत एशियाई देशों पर पड़ सकता है असर रिपोर्ट्स के अनुसार, Strait of Hormuz एशिया और यूरोप के बीच एक अहम डिजिटल कॉरिडोर बन चुका है। अगर यहां इंटरनेट केबलों में बाधा आती है तो भारत की IT और आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसके अलावा खाड़ी देशों के तेल और गैस निर्यात से जुड़े डिजिटल सिस्टम, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क और शेयर बाजारों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इंटरनेट स्पीड कम होने से कहीं बड़ा खतरा वित्तीय लेनदेन और वैश्विक डेटा ट्रैफिक में रुकावट का हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दे रहा ईरान ईरानी मीडिया का दावा है कि यह योजना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून UNCLOS के तहत तैयार की जा रही है। इस कानून के मुताबिक, कोई भी तटीय देश अपनी समुद्री सीमा में आने वाली केबलों पर कुछ नियम लागू कर सकता है। ईरान स्वेज नहर का उदाहरण देकर यह तर्क दे रहा है कि रणनीतिक जलमार्गों से आर्थिक लाभ कमाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य और स्वेज नहर की कानूनी स्थिति पूरी तरह समान नहीं है। पहले भी निशाने पर आ चुकी हैं समुद्री केबलें समुद्र के नीचे बिछी संचार केबलों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने जर्मनी की टेलीग्राफ केबल काट दी थी। हाल ही में 2024 में Houthi Movement से जुड़े हमलों में लाल सागर की तीन इंटरनेट केबल क्षतिग्रस्त हो गई थीं, जिससे क्षेत्रीय इंटरनेट ट्रैफिक का करीब 25 प्रतिशत प्रभावित हुआ था। हालांकि आधुनिक नेटवर्क में वैकल्पिक रूट मौजूद होते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े स्तर पर किसी केबल नेटवर्क को नुकसान पहुंचने पर वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
Meta Platforms ने WhatsApp यूजर्स के लिए एक नया प्राइवेसी फीचर पेश किया है, जिसका नाम Incognito Chat रखा गया है। इस फीचर का उद्देश्य यूजर्स को Meta AI के साथ ज्यादा सुरक्षित और निजी बातचीत का अनुभव देना है। कंपनी के CEO Mark Zuckerberg ने हाल ही में इस फीचर की घोषणा की। Meta का दावा है कि यह नया मोड AI चैट्स को पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित बनाएगा और बातचीत खत्म होते ही मैसेज अपने आप गायब हो जाएंगे। चैट खत्म होते ही डिलीट हो जाएंगे मैसेज Meta के अनुसार, Incognito Chat में की गई बातचीत सामान्य क्लाउड सर्वर पर प्रोसेस नहीं होगी। इसके बजाय, इसे एक सिक्योर और एन्क्रिप्टेड सिस्टम के जरिए संभाला जाएगा। कंपनी का कहना है कि न तो Meta और न ही कोई बाहरी व्यक्ति इन चैट्स को पढ़ सकेगा। सबसे अहम बात यह है कि AI से हुई बातचीत सेशन खत्म होते ही अपने आप डिलीट हो जाएगी और सर्वर पर स्टोर नहीं होगी। यह फीचर उन यूजर्स के लिए खास माना जा रहा है जो AI चैट्स के दौरान अपनी निजी जानकारी को लेकर चिंतित रहते हैं। क्या है Private Processing टेक्नोलॉजी? Meta ने बताया कि Incognito Chat फीचर उसकी Private Processing टेक्नोलॉजी पर आधारित है। इस तकनीक को पिछले साल WhatsApp के AI फीचर्स के साथ पेश किया गया था। इस सिस्टम में यूजर्स की रिक्वेस्ट सामान्य सर्वर पर प्रोसेस होने के बजाय Trusted Execution Environments (TEE) नाम के एन्क्रिप्टेड और आइसोलेटेड सिस्टम में प्रोसेस होती है। इसका फायदा यह है कि किसी भी थर्ड पार्टी को यूजर डेटा तक पहुंच नहीं मिल पाती और चैट की गोपनीयता बनी रहती है। Meta का दावा है कि यह फीचर दूसरे AI प्लेटफॉर्म्स से अलग है, क्योंकि कई AI सेवाएं यूजर्स की बातचीत को लंबे समय तक स्टोर करके रखती हैं। किन यूजर्स को मिलेगा यह फीचर? कंपनी के मुताबिक, Incognito Chat फीचर को फिलहाल धीरे-धीरे Android और iOS यूजर्स के लिए रोलआउट किया जा रहा है। इस फीचर का इस्तेमाल करने के लिए यूजर्स को अपना WhatsApp ऐप लेटेस्ट वर्जन में अपडेट करना होगा। हालांकि शुरुआती चरण में यह सुविधा केवल चुनिंदा अकाउंट्स पर उपलब्ध होगी। Meta ने यह भी कहा है कि फीचर की उपलब्धता यूजर के क्षेत्र और अकाउंट टाइप के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। जिन यूजर्स को यह अपडेट मिलेगा, उन्हें Meta AI के साथ प्राइवेट बातचीत के लिए अलग विकल्प दिखाई देगा। सुरक्षा को लेकर Meta का दावा Meta का कहना है कि उसकी Private Processing टेक्नोलॉजी की जांच कई स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी कंपनियों ने की है। इनमें NCC Group और Trail of Bits जैसी कंपनियां शामिल हैं। कंपनी के मुताबिक, इन सुरक्षा परीक्षणों में यह पाया गया कि सिस्टम यूजर्स की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा के लिए मजबूत सिक्योरिटी मानकों का पालन करता है।
देश के बैंकिंग सेक्टर की साइबर सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार सतर्क हो गई है। वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने गुरुवार को बैंकों के प्रमुखों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर Anthropic के अत्याधुनिक AI मॉडल Claude Mythos से उत्पन्न संभावित खतरों पर चर्चा की। क्या है Claude Mythos? Anthropic द्वारा विकसित Claude Mythos को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बेहद शक्तिशाली AI मॉडल माना जा रहा है। दावा है कि यह हजारों ऐसी सुरक्षा खामियों का पता लगा सकता है, जिन्हें मानव विशेषज्ञ भी नहीं खोज पाए। इसकी क्षमताओं को देखते हुए कंपनी ने इसे आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं कराया है। क्यों बढ़ी चिंता? रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ अनधिकृत यूजर्स Claude Mythos तक पहुंच बनाने में सफल रहे। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इसका दुरुपयोग कर साइबर अपराधी बैंकिंग नेटवर्क, वित्तीय संस्थानों और अन्य महत्वपूर्ण सिस्टम को निशाना बना सकते हैं। वित्त मंत्री ने क्या कहा? बैठक में निर्मला सीतारमण ने कहा कि Claude Mythos से उत्पन्न खतरा अभूतपूर्व है और इससे निपटने के लिए उच्च स्तर की सतर्कता, तैयारी और समन्वय आवश्यक है। उन्होंने बैंकों को अपने आईटी सिस्टम मजबूत करने और ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस पर जोर वित्त मंत्रालय ने बैंकों, Indian Computer Emergency Response Team और अन्य एजेंसियों के बीच रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस साझा करने के लिए मजबूत तंत्र विकसित करने की सलाह दी है। इससे किसी भी संभावित साइबर हमले का तेजी से पता लगाया जा सकेगा। RBI और IBA भी सक्रिय भारतीय रिजर्व बैंक और Indian Banks' Association को भी इस जोखिम का आकलन करने को कहा गया है। साथ ही, IBA को सभी बैंकों के लिए एक समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। वैश्विक स्तर पर भी चिंता Claude Mythos को लेकर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका समेत कई देशों में भी चिंता बढ़ी है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन और वॉल स्ट्रीट के बड़े बैंक भी इस AI मॉडल से जुड़े जोखिमों का आकलन कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।