रांची। झारखंड में 30 जून से चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बीच चुनाव आयोग ने मतदाताओं की कई महत्वपूर्ण शंकाओं का समाधान किया है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए नया रंगीन फोटो देना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, रिकॉर्ड को अद्यतन रखने और नए ईपीआईसी (मतदाता पहचान पत्र) पर नई तस्वीर प्राप्त करने के लिए हाल का पासपोर्ट साइज रंगीन फोटो देने की सलाह दी गई है। चुनाव आयोग के अनुसार चुनाव आयोग के अनुसार, गणना प्रपत्र (Enumeration Form) में फिलहाल वही तस्वीर छपी है, जो पहले से आयोग के रिकॉर्ड में उपलब्ध है। कई मतदाताओं की तस्वीरें काफी पुरानी होने के कारण उन्हें नई फोटो देने का अनुरोध किया जा रहा है। यदि कोई मतदाता घर पर मौजूद नहीं है या नौकरी, पढ़ाई अथवा अन्य कारणों से राज्य से बाहर है, तो उसके परिवार का कोई सदस्य हाल की रंगीन फोटो चिपकाकर फॉर्म जमा कर सकता है। बीमार या किसी अन्य कारण से लाइव फोटो नहीं दे पाने वाले मतदाताओं के लिए भी यही सुविधा उपलब्ध रहेगी। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाताओं को दो क्यूआर-कोड आधारित गणना प्रपत्र दिए जा रहे हैं, जो प्रत्येक मतदाता के लिए अलग-अलग और पूर्व-भरे हुए हैं। ऐसे में किसी अन्य व्यक्ति का फॉर्म इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यदि पहली प्रति भरते समय खराब हो जाए, तो दूसरी प्रति की फोटो कॉपी लेकर उसे पहली प्रति के रूप में दोबारा भरा जा सकता है। अगर दोनों प्रतियां गलती हो जाएं, तो मतदाता ईसीआईनेट (ECINet) ऐप के माध्यम से ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं। चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अपील की जिन मतदाताओं को ऑनलाइन आवेदन करने में कठिनाई हो, वे अपने बीएलओ की मदद से संबंधित निर्वाचन निबंधन पदाधिकारी (ERO) से नई प्रति प्राप्त कर सकते हैं। चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि वे फॉर्म भरते समय सावधानी बरतें और समय पर प्रक्रिया पूरी करें, ताकि मतदाता सूची अद्यतन करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। कोलकाता स्थित पार्टी के राज्य मुख्यालय पर बागी गुट के नियंत्रण के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शुक्रवार को पार्टी कार्यालय पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद परिसर में तनाव बढ़ गया। स्थिति को देखते हुए मौके पर CRPF और कोलकाता पुलिस के जवान तैनात किए गए। बागी गुट ने जताया मुख्यालय पर दावा बताया जा रहा है कि बागी गुट ने नई दिल्ली में चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम, फंड और चुनाव चिह्न पर दावा पेश करने के एक दिन बाद यह कदम उठाया। ऋतब्रत बनर्जी अपने समर्थक नेताओं के साथ पार्टी कार्यालय पहुंचे और वहां लगे पुराने साइनबोर्ड हटाकर नया बैनर लगा दिया। बागी गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया चेयरमैन घोषित करने का भी दावा किया। बागी नेताओं का कहना है कि कार्यालय का पुराना किराया समझौता समाप्त हो चुका था और नई वर्किंग कमेटी के तहत नया समझौता किया गया है। उनका दावा है कि कार्यालय पर उनका वैध अधिकार है, हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने से इनकार किया। ममता गुट ने लगाया अवैध कब्जे का आरोप मुख्यालय पर कब्जे की खबर के बाद ममता बनर्जी समर्थक नेताओं ने इसे अवैध कार्रवाई बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने आरोप लगाया कि बागी गुट को केंद्रीय सुरक्षा बलों का संरक्षण मिल रहा है। वहीं टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी इस कार्रवाई को अदालत और जनता दोनों के सामने चुनौती देगी। अब चुनाव आयोग के फैसले पर निगाहें कोलकाता पुलिस ने स्पष्ट किया है कि कार्यालय के स्वामित्व और लीज से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही वहां नियमित राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति दी जाएगी। इस बीच चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर अपने-अपने दावे और जवाब दाखिल करने को कहा है। अब इस विवाद का अगला बड़ा फैसला चुनाव आयोग के रुख पर निर्भर करेगा।
पटना, एजेंसियां। चुनाव आयोग ने बिहार की हाई-प्रोफाइल सीट मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है। आयोग के अनुसार, इस सीट पर 30 जुलाई 2026 को मतदान होगा, जबकि 3 अगस्त को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे। बांकीपुर सीट भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की सीट मानी जाती है और इस उपचुनाव पर पूरे राज्य की राजनीतिक नजरें टिकी हैं। नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद विधायक पद से इस्तीफा देने के कारण रिक्त हुई थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने इस सीट पर उपचुनाव का कार्यक्रम जारी किया है। जानिए पूरा चुनाव कार्यक्रम चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, 6 जुलाई को अधिसूचना जारी होगी। 13 जुलाई नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि होगी, 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी और 16 जुलाई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 30 जुलाई को होगा और 3 अगस्त को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाएंगे। प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने पर सस्पेंस उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। जन सुराज पार्टी ने घोषणा की है कि वह 5 जुलाई को अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान करेगी। हालांकि पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर खुद चुनाव लड़ेंगे या नहीं, इस पर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है। राजनीतिक दलों ने शुरू की तैयारियां उपचुनाव की घोषणा के साथ ही भाजपा, राजद, कांग्रेस और जन सुराज समेत सभी प्रमुख दलों ने चुनावी रणनीति तेज कर दी है। बांकीपुर सीट को बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक माना जा रहा है और इस चुनाव के नतीजों पर पूरे राज्य की राजनीतिक निगाहें टिकी रहेंगी।
नई दिल्ली ,एजेंसियां। चुनाव आयोग ने बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की तीन रिक्त विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने की घोषणा कर दी है। आयोग के अनुसार, 30 जुलाई 2026 को मतदान होगा, जबकि 3 अगस्त 2026 को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे। इन सीटों पर आचार संहिता तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। इन तीन सीटों पर होगा उपचुनाव उपचुनाव बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मंजलपुर विधानसभा सीट पर कराया जाएगा। तीनों सीटें अलग-अलग कारणों से रिक्त हुई थीं। क्यों खाली हुईं ये सीटें? बिहार की बांकीपुर सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हुई। मध्य प्रदेश की दतिया सीट कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की धोखाधड़ी मामले में दोषसिद्धि के बाद सदस्यता समाप्त होने से रिक्त हुई, जबकि गुजरात की मंजलपुर सीट भाजपा विधायक योगेशभाई नारनदास पटेल के निधन के कारण खाली हुई। जानिए पूरा चुनाव कार्यक्रम चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, 6 जुलाई को अधिसूचना जारी होगी। 13 जुलाई नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि होगी, 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 16 जुलाई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 30 जुलाई को होगा और 3 अगस्त को मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे। राजनीतिक दलों ने शुरू की तैयारियां उपचुनाव की घोषणा के साथ ही तीनों राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रमुख दल उम्मीदवारों के चयन और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। इन उपचुनावों को आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में नेतृत्व और चुनाव चिन्ह को लेकर बढ़े विवाद के बीच चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को नोटिस जारी कर अपना-अपना पक्ष रखने को कहा है। आयोग ने ममता बनर्जी गुट और बागी गुट से 6 जुलाई 2026 को शाम 5:30 बजे तक दावे, प्रति-दावे और संबंधित दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए हैं। दोनों गुटों से मांगे गए दावे और दस्तावेज चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से पार्टी के संगठनात्मक चुनाव, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं , पार्टी के संविधान और 'जुड़वां फूल' चुनाव चिन्ह पर अपने दावे के समर्थन में सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। आयोग दोनों पक्षों की ओर से दाखिल किए जाने वाले रिकॉर्ड का परीक्षण करेगा। चुनाव चिन्ह पर बना है मुख्य विवाद बागी गुट का दावा है कि उसे पार्टी के अधिकांश विधायकों और पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वही असली टीएमसी है। वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे के आधार पर खुद को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बता रहा है। 6 जुलाई के बाद होगी अगली कार्रवाई निर्धारित समय सीमा तक दोनों पक्षों के जवाब मिलने के बाद चुनाव आयोग दस्तावेजों की समीक्षा करेगा। आवश्यकता पड़ने पर आयोग अगली सुनवाई की तारीख तय करेगा और इसके बाद पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिन्ह को लेकर आगे का निर्णय लिया जाएगा। राजनीतिक हलकों की नजर आयोग के फैसले पर टीएमसी से जुड़े इस विवाद पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति और पार्टी के भविष्य पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
कोलकाता एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी सियासी हलचल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का बागी विधायक दल आज चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व और चुनाव चिन्ह से जुड़े मुद्दों पर अपना पक्ष आयोग के समक्ष रखेगा। नेतृत्व विवाद को लेकर चुनाव आयोग के सामने रखेगा पक्ष सूत्रों के अनुसार, बागी गुट का कहना है कि पार्टी में नए नेतृत्व का गठन किया गया है और इसकी आधिकारिक जानकारी चुनाव आयोग को दी जानी चाहिए। वहीं ममता बनर्जी समर्थक गुट का दावा है कि टीएमसी की वैध राष्ट्रीय कार्यसमिति और पदाधिकारियों की सूची पहले ही आयोग को सौंप दी गई है और पार्टी पर उनका ही अधिकार है। चुनाव चिन्ह पर भी हो सकती है चर्चा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी गुट की यह पहल भविष्य में पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक अधिकारों को लेकर कानूनी विवाद का रूप ले सकती है। हालांकि, अभी तक चुनाव आयोग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। राजनीतिक हलकों की नजर आयोग के फैसले पर आज होने वाली इस मुलाकात पर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग के अगले कदम से इस विवाद की दिशा और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर इसका असर आने वाले दिनों में साफ हो सकेगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राजधानी दिल्ली में मंगलवार से चुनाव आयोग का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान शुरू हो गया है। इस विशेष सत्यापन अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह अपडेट, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है। 30 जून से 29 जुलाई तक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे और आवश्यक जानकारी जुटाएंगे। घर-घर पहुंचेगी BLO टीम दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अशोक कुमार के अनुसार, बीएलओ प्रत्येक घर पर कम से कम तीन बार पहुंचेंगे। यदि घर बंद मिलता है तो सूचना छोड़कर जाएंगे और आसपास के लोगों से भी जानकारी ले सकते हैं। बिना सत्यापन और उचित प्रक्रिया के किसी भी मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जाएगा। 2002 की वोटर लिस्ट होगी आधार यदि आपका नाम 10 जनवरी 2002 की मतदाता सूची में दर्ज है, तो चिंता की जरूरत नहीं है। हालांकि, सत्यापन प्रक्रिया में सहयोग करना आवश्यक होगा। जिन लोगों का नाम उस सूची में नहीं है, वे अपने माता-पिता, दादा-दादी या अन्य परिजनों के रिकॉर्ड के आधार पर जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। नाम कैसे करें चेक और सुधार 5 अगस्त को प्रारंभिक मतदाता सूची जारी होने के बाद मतदाता voters.eci.gov.in पर अपना नाम जांच सकेंगे। यदि नाम में कोई त्रुटि हो या नाम सूची में न मिले, तो 5 अगस्त से 4 सितंबर तक सुधार या नया नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया जा सकेगा। किसी भी समस्या की स्थिति में मतदाता 1950 हेल्पलाइन या मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट से सहायता प्राप्त कर सकते हैं। जरूरी दस्तावेज और महत्वपूर्ण तिथियां जरूरत पड़ने पर पहचान और निवास संबंधी दस्तावेज, जैसे 10वीं की मार्कशीट, पासपोर्ट, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, सरकारी पहचान पत्र, जाति प्रमाण पत्र या भूमि आवंटन से जुड़े दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। महत्वपूर्ण तिथियां: 30 जून–29 जुलाई: घर-घर सत्यापन अभियान 5 अगस्त: प्रारंभिक मतदाता सूची जारी 5 अगस्त–4 सितंबर: नाम जोड़ने और सुधार का अवसर 5 अगस्त–3 अक्टूबर: दावों और आपत्तियों की सुनवाई 7 अक्टूबर: अंतिम मतदाता सूची जारी चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह केवल सत्यापन प्रक्रिया है और उचित जांच के बिना किसी भी पात्र मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जाएगा।
रांची। झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का अभियान 30 जून से शुरू हो रहा है। इस दौरान बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) 29 जुलाई तक घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे और उन्हें गणना प्रपत्र उपलब्ध कराएंगे। मतदाताओं को केवल इस प्रपत्र को सही ढंग से भरकर उस पर हस्ताक्षर कर बीएलओ को लौटाना होगा। इस चरण में किसी भी प्रकार का दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि हस्ताक्षरित गणना प्रपत्र समय पर जमा नहीं किया गया, तो संबंधित व्यक्ति का नाम प्रारूप मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा। बीएलओ प्रपत्र लेने के लिए कम से कम तीन बार घर पहुंचेंगे। 1 अक्टूबर तक 18 वर्ष पूरे करने वाले बन सकेंगे मतदाता चुनाव आयोग ने इस पुनरीक्षण के लिए 1 अक्टूबर 2026 को अर्हता तिथि निर्धारित की है। यानी इस तिथि तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा नए मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकेंगे। नए मतदाताओं को गणना चरण या दावा-आपत्ति अवधि के दौरान फॉर्म-6 भरकर आवश्यक दस्तावेजों और घोषणा-पत्र के साथ जमा करना होगा। वहीं, दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में नाम स्थानांतरित कराने वाले मतदाताओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म-8 भरना होगा। 5 अगस्त को प्रारूप सूची, 7 अक्टूबर को अंतिम प्रकाशन विशेष पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और अद्यतन बनाना है, ताकि कोई पात्र मतदाता छूटे नहीं और अपात्र व्यक्तियों के नाम सूची में शामिल न रहें। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार 5 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होगी, जिस पर 4 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी। इनके निस्तारण के बाद 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत अथवा विदेशी नागरिकता प्राप्त कर चुके लोगों के नाम भी जांच के बाद मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, जिससे सूची अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बन सके।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है। तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।" 'हम ही असली तृणमूल हैं' अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है। उन्होंने कहा, "हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ममता बनर्जी पर साधा निशाना अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।" 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया ऐलान रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। टीएमसी ने बताया गैरकानूनी कदम तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है। Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।" 'असली तृणमूल वही है जिसकी अध्यक्ष ममता हैं' तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। सौगत रॉय ने कहा, "तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।" सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी गुट में शामिल छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। विधानसभा से संसद तक छिड़ी नियंत्रण की जंग तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। क्या ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न? राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।
मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। इस बीच भाजपा नेता और राज्य सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान ने विवाद को और हवा दे दी है। उन्होंने संकेत दिया कि नामांकन में कथित खामियों की जानकारी भाजपा को कांग्रेस के ही भीतर से मिली हो सकती है। “जानकारी हमें तेलंगाना से मिली”—कैलाश विजयवर्गीय कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि नामांकन से जुड़ी अहम जानकारियां तेलंगाना से सामने आईं, जहां कांग्रेस की सरकार है। उन्होंने कहा, “हमें तेलंगाना से पेपर्स मिले। वहीं से जानकारी मिली कि नामांकन पत्र में कुछ त्रुटियां हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस के लोग ही यह जानकारी साझा कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति और आपसी मतभेद भी सामने आते हैं। कांग्रेस का पलटवार: लोकतंत्र पर हमला कांग्रेस ने इस फैसले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि नामांकन रद्द करना राजनीतिक दबाव का परिणाम है और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर इस फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई और निष्पक्ष जांच की मांग की है। मीनाक्षी नटराजन का आरोप: “लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है” मीनाक्षी नटराजन ने भी इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक उम्मीदवार का मामला नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भाजपा ने तीसरा उम्मीदवार उतारा, तभी से राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा था। भाजपा का दावा: प्रक्रिया के तहत हुआ फैसला भाजपा का कहना है कि नामांकन रद्द होना पूरी तरह चुनावी प्रक्रिया और नियमों के अनुसार हुआ है। पार्टी नेताओं ने कहा कि दस्तावेजों में कथित त्रुटियों को लेकर आपत्ति दर्ज की गई थी, जिसके बाद जांच में नामांकन रद्द किया गया। चुनाव आयोग पहुंचा विवाद इस मामले को लेकर कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग भी पहुंचा और फैसले पर आपत्ति जताई। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया। 18 जून को वोटिंग मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 18 जून को होना है। उससे पहले यह विवाद राज्य की सियासत में बड़ा मुद्दा बन गया है और आने वाले दिनों में राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है।
भोपाल/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के बाद राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस फैसले को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए “सीट चोरी” का गंभीर आरोप लगाया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया लोकतंत्र पर हमला कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया। मंगलवार को कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचा और औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। पार्टी ने चेतावनी दी है कि वह इस मामले को अदालत में भी चुनौती देगी। सचिन पायलट ने उठाए गंभीर सवाल कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि यह बेहद दुर्लभ मामला है कि बिना स्पष्ट और ठोस आधार के किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द किया गया हो। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई FIR है और न ही कोई आपराधिक चार्जशीट दाखिल है। पायलट ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। मीनाक्षी नटराजन का आरोप—‘वोट से आगे अब सीट की चोरी’ नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दबाव में उनका नामांकन खारिज किया गया है। उन्होंने कहा कि पहले “वोट चोरी” की बात होती थी, लेकिन अब मामला “सीट चोरी” तक पहुंच गया है। नटराजन ने दावा किया कि उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। नामांकन रद्द करने का क्या है आधार? सूत्रों के अनुसार, भाजपा प्रत्याशी पक्ष की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई थी कि नटराजन ने अपने शपथपत्र में एक लंबित आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। बताया गया कि तेलंगाना की एक अदालत में CrPC की धारा 223 के तहत एक मामला दर्ज है, जिसका उल्लेख नामांकन पत्र में नहीं किया गया। इसी आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने नामांकन रद्द करने का निर्णय लिया। भाजपा ने फैसले को बताया सही मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “न्याय की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार हुई है और नियमों के तहत ही आपत्ति दर्ज की गई थी। कांग्रेस का पलटवार कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को गलत बताया। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई एफआईआर है और न ही कोई आपराधिक मुकदमा लंबित है। तन्खा के अनुसार केवल CrPC की धारा 223 के तहत एक नोटिस जारी हुआ था, जिसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। चुनाव आयोग में शिकायत, अदालत जाने की तैयारी कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने संकेत दिया है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो वह अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। राज्यसभा चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तनाव मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले इस घटनाक्रम ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इस मामले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं।
निर्वाचन आयोग ने ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के तीसरे चरण के तहत घर-घर सत्यापन अभियान शुरू कर दिया है। इस अभियान के दौरान बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) मतदाताओं के घर जाकर गणना प्रपत्रों का वितरण, संग्रह और सत्यापन करेंगे। आयोग के अनुसार, इस चरण में 3.68 करोड़ से अधिक मतदाताओं का सत्यापन किया जाएगा। निर्वाचन आयोग ने बताया कि इस विशेष अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और अद्यतन बनाना है, ताकि सभी पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल किए जा सकें और अपात्र व्यक्तियों के नाम हटाए जा सकें। ओडिशा में सबसे अधिक मतदाता चारों राज्यों में कुल 3.67 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। इनमें ओडिशा में सबसे अधिक 3.34 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। राज्य में पुनरीक्षण कार्य के लिए 38,123 बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLO) और 8,391 बूथ स्तरीय एजेंटों (BLA) की तैनाती की गई है। वहीं, मिजोरम में 8.75 लाख, सिक्किम में 4.71 लाख और मणिपुर में 20.92 लाख मतदाता इस प्रक्रिया के दायरे में आएंगे। 14 मई से शुरू हुआ था तीसरा चरण निर्वाचन आयोग ने 14 मई से 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चरणबद्ध तरीके से विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का तीसरा चरण शुरू किया था। वर्तमान चरण में मतदाताओं से आवश्यक जानकारी एकत्र की जाएगी। मतदाता अपने भरे हुए गणना प्रपत्र BLO के माध्यम से जमा कर सकते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन माध्यम से भी आवेदन जमा करने की सुविधा उपलब्ध है। आयोग के अनुसार, जिन मतदाताओं के गणना प्रपत्र 28 जून या उससे पहले निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को प्राप्त हो जाएंगे, उनके नाम मसौदा मतदाता सूची में शामिल किए जाएंगे। समय सीमा चूकने वालों को भी मिलेगा अवसर निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि जो मतदाता निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने प्रपत्र जमा नहीं कर पाएंगे, वे दावा एवं आपत्ति अवधि के दौरान निर्धारित घोषणा-पत्र के साथ फॉर्म-6 भरकर नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकेंगे। मतदाताओं से सहयोग की अपील आयोग ने सभी पात्र नागरिकों से इस अभियान में सक्रिय भागीदारी और चुनाव अधिकारियों को सहयोग देने की अपील की है। आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाता सूचियां अधिक समावेशी, अद्यतन और विश्वसनीय बनेंगी। निर्वाचन आयोग ने दोहराया कि पात्रता तिथि पर 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, जो
Asaduddin Owaisi ने हैदराबाद में पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक जनसभा के दौरान मतदाताओं से SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को गंभीरता से लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि 25 जून से शुरू होने वाली इस प्रक्रिया के तहत चुनाव अधिकारियों और बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा घर-घर जाकर मतदाता सत्यापन और संबंधित फॉर्म वितरित किए जाएंगे। ओवैसी ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें और आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराएं। SIR को लेकर क्या कहा? ओवैसी के अनुसार: चुनाव आयोग ने प्रक्रिया के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की हैं। All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल एजेंट के रूप में नियुक्त किया है। मतदाताओं को सत्यापन प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि मताधिकार और नागरिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने कहा कि वे लोगों को डराने या भावनाएं भड़काने के लिए नहीं बोल रहे हैं, बल्कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसका सीधा संबंध नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से है। सड़क पर नमाज को लेकर भी दिया बयान अपने संबोधन में ओवैसी ने सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक आयोजनों को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि सड़कों पर नमाज अदा करने पर आपत्ति है, तो समान मानदंड सभी धर्मों के सार्वजनिक आयोजनों पर लागू होने चाहिए। उनका तर्क था कि नियम और कानून सभी समुदायों के लिए समान रूप से लागू होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजनों और उनसे जुड़े प्रतिबंधों पर चर्चा करते समय समानता का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। SIR क्या है? SIR (Special Intensive Revision) चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसके तहत: मतदाता सूची का सत्यापन किया जाता है। नए मतदाताओं का पंजीकरण किया जाता है। मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं। मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाया जाता है। ओवैसी ने लोगों से अपील की कि वे अपने मतदाता रिकॉर्ड की जांच करें और सत्यापन प्रक्रिया में पूरा सहयोग दें ताकि भविष्य में मतदान संबंधी किसी समस्या का सामना न करना पड़े।
पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट पर गुरुवार को दोबारा मतदान जारी है। दक्षिण 24 परगना जिले की 144-फलता सीट के सभी 285 मतदान केंद्रों पर री-पोलिंग कराई जा रही है। पिछली वोटिंग के दौरान ईवीएम में कथित छेड़छाड़ और अनियमितताओं की शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने मतदान रद्द कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला लिया था। सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर मतदाताओं की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। लोग उत्साह के साथ मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। वोटों की गिनती 24 मई को होगी। वोटरों ने कहा- इस बार माहौल शांतिपूर्ण मतदाता देबाशीष घोष ने कहा कि इस बार मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा है और लोग बिना किसी डर के वोट डाल पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली बार विभिन्न राजनीतिक दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से दबाव बनाया गया था। उन्होंने कहा कि पिछली बार लोगों को घर-घर जाकर तय समय पर वोट डालने के लिए कहा जा रहा था और इलाके में डर का माहौल था, लेकिन इस बार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से मतदाता खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बीजेपी ने जीत का किया दावा भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने कहा कि इलाके में मतदान शांतिपूर्ण और उत्सव जैसा माहौल है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी बड़ी जीत दर्ज करेगी। पांडा ने कहा कि लोग आराम से वोट डाल रहे हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी पार्टी डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल करेगी। उन्होंने टीएमसी नेता जहांगीर खान पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्हें पहले ही हार का अंदाजा हो गया था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, इस बार हर मतदान केंद्र पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के आठ जवान तैनात किए गए हैं। पिछली वोटिंग में प्रत्येक बूथ पर केवल चार जवान मौजूद थे। फलता विधानसभा क्षेत्र में कुल 35 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं। इसके अलावा किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 30 क्विक रिस्पांस टीम भी बनाई गई हैं। टीएमसी उम्मीदवार ने छोड़ा मैदान री-पोलिंग से पहले टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव मैदान से हटने का ऐलान कर दिया था। हालांकि पार्टी ने इसे उनका निजी फैसला बताया है। अब इस सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में लंबे समय तक वाम दलों का प्रभाव रहा है, इसलिए मुकाबले में वामपंथी दलों की भूमिका को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहले मतदान में क्या हुआ था? 29 अप्रैल को हुए मतदान के दौरान कई मतदान केंद्रों से ईवीएम पर इत्र और चिपकने वाला टेप लगाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं। इसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए पूरे निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया था।
देश के चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब प्रशासनिक कामकाज फिर से रफ्तार पकड़ने जा रहा है. भारत निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में लागू आदर्श आचार संहिता (MCC) तत्काल प्रभाव से हटा दी गयी है. 15 मार्च से लागू पाबंदियों के खत्म होने के बाद अब नयी सरकारें और प्रशासन विकास योजनाओं, सरकारी परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों पर तेजी से काम कर सकेंगे. किन राज्यों में खत्म हुई आचार संहिता? निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिवों और मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेजकर जानकारी दी कि निम्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अब आचार संहिता लागू नहीं रहेगी: Assam Kerala Tamil Nadu West Bengal Puducherry इसके अलावा गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नगालैंड और त्रिपुरा की उन विधानसभा सीटों पर भी प्रतिबंध समाप्त कर दिये गये हैं, जहां उपचुनाव कराए गये थे. पश्चिम बंगाल की फालता सीट पर अभी जारी रहेगी सख्ती हालांकि पश्चिम बंगाल में एक सीट पर अब भी चुनावी पाबंदियां लागू रहेंगी. Falta विधानसभा सीट पर चुनाव आयोग ने पुनर्मतदान (Re-polling) के आदेश दिये हैं. जब तक वहां मतदान और मतगणना की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक उस क्षेत्र में आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी. यानी फालता सीट पर प्रशासन अभी कोई नई सरकारी घोषणा या परियोजना शुरू नहीं कर सकेगा. 15 मार्च से थमा हुआ था विकास कार्य इन राज्यों में 15 मार्च से चुनाव आचार संहिता लागू थी. इसके कारण सरकारें नई योजनाओं की घोषणा, शिलान्यास या बड़े प्रशासनिक फैसले नहीं ले पा रही थीं. विधानसभा चुनाव तीन चरणों – 9 अप्रैल, 23 अप्रैल और 29 अप्रैल – को संपन्न हुए थे. 4 मई को नतीजे घोषित होने के बाद अब राजनीतिक तस्वीर साफ हो चुकी है. अब क्या बदलेगा? आचार संहिता हटने के बाद अब: रुकी हुई सरकारी योजनाओं को मंजूरी मिल सकेगी विकास परियोजनाओं पर काम तेज होगा नई नीतियों और घोषणाओं का रास्ता खुलेगा प्रशासनिक नियुक्तियों और बजट खर्च में तेजी आयेगी नई सरकारों के गठन के साथ अब इन राज्यों में शासन और विकास का नया चरण शुरू होने जा रहा है.
SIR Impact on Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हार और जीत के कारणों को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गयी है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के पीछे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में यह दावा किया जा रहा है कि जिन सीटों पर मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाये गये, वहां भाजपा को भारी फायदा मिला. मतदाता सूची में बड़े बदलाव और बदला चुनावी गणित चुनाव आयोग की ओर से चलायी गयी SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ा, जहां तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत माना जाता था. बताया जा रहा है कि बंगाल की 177 ऐसी विधानसभा सीटें थीं, जहां हटाये गये मतदाताओं की संख्या 2021 में टीएमसी की जीत के अंतर से अधिक थी. इन सीटों में से 140 से ज्यादा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गयी है कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया. 15 हजार से ज्यादा नाम हटे, कई मंत्री हारे विश्लेषण के मुताबिक, करीब 50 सीटों पर 15 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे. इन्हीं सीटों पर टीएमसी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा ने इन इलाकों में आक्रामक प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत रणनीति अपनायी, जिसका फायदा उसे चुनाव में मिला. SIR प्रक्रिया से कैसे बदला समीकरण? निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में डिजिटल वेरिफिकेशन, आधार लिंकिंग और रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया गया. इसके तहत मृत और पलायन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे कथित फर्जी मतदान की संभावना कम हुई और चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इसे टीएमसी के चुनावी नेटवर्क पर बड़ा झटका बताया. ममता बनर्जी ने पहले ही जतायी थी आशंका चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे. पार्टी का आरोप था कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाये जा रहे हैं. हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया था. अब चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गयी है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची की सफाई से वास्तविक जनमत सामने आया, जबकि टीएमसी इसे अपने वोट बैंक को कमजोर करने की रणनीति बता रही है. भाजपा को मिला बड़ा फायदा राज्य में भाजपा ने 207 सीटों तक पहुंचकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया, सत्ताविरोधी माहौल और बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ने भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिलहाल बंगाल की राजनीति में SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है.
हैदराबाद, एजेंसियां। सनराइजर्स हैदराबाद ने पंजाब किंग्स को 33 रन से हराकर IPL 2026 पॉइंट्स टेबल में टॉप स्थान हासिल कर लिया। वहीं, पंजाब को इस सीजन में लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद टीम पहले स्थान से खिसककर दूसरे नंबर पर पहुंच गई। राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में पंजाब ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। इसके बाद हैदराबाद ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 235 रन बनाए। जवाब में 236 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पंजाब की टीम 20 ओवर में 7 विकेट पर 202 रन ही बना सकी। हैदराबाद की ओर से 2 फिफ्टी लगी पहले बैटिंग करने उतरी हैदराबाद के लिए हेनरिक क्लासन और ईशान किशन ने अर्धशतक लगाए। क्लासन ने 43 बॉल पर 69 और ईशान ने 32 बॉल पर 55 रन बनाए। दोनों के बीच तीसरे विकेट के लिए 88 रन की साझेदारी हुई। क्लासन और नीतीश रेड्डी (29*) के बीच चौथे विकेट के लिए 63 रन की साझेदारी हुई। इसके अलावा अभिषेक शर्मा (35) और ट्रैविस हेड (38) ने 55 रन की ओपनिंग पार्टनरशिप की। पंजाब के लिए लॉकी फर्ग्यूसन, विजयकुमार वैशाख, युजवेंद्र चहल को 1-1 विकेट मिला। काम ना आया कोनोली का शतक पंजाब का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। टीम ने फील्डिंग के दौरान 3 कैच छोड़े, जबकि टारगेट का पीछा करते समय लगातार विकेट गंवाती रही। पंजाब के लिए कूपर कोनोली के अलावा कोई बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। कोनोली ने 59 बॉल पर नाबाद 107 रन बनाए। उनके अलावा मार्कस स्टोयनिस ने 28 और सूर्यांश शेडगे ने 25 रन का योगदान दिया। हैदराबाद के लिए पैट कमिंस और शिवांग कुमार ने 2-2 विकेट लिए। नीतीश रेड्डी, ईशान मलिंगा और साकिब हुसैन को 1-1 विकेट मिला। पैट कमिंस प्लेयर ऑफ द् मैच चुने गये।
नई दिल्ली: राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर ‘वोट चोरी’ का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अगर अभी निष्पक्ष तरीके से लोकसभा चुनाव कराए जाएं, तो BJP 140 सीटों से ज्यादा नहीं जीत पाएगी। उनके इस बयान के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। ‘हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता’ राहुल गांधी ने दावा किया कि BJP के मौजूदा 240 सांसदों में से “हर छठा सांसद” कथित रूप से वोट चोरी के जरिए जीतकर आया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि BJP की अपनी भाषा में ऐसे सांसदों को “घुसपैठिया” कहा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यही तर्क लागू किया जाए, तो हरियाणा की पूरी सरकार को भी “घुसपैठिया” कहा जा सकता है। ‘एक्स’ पर पोस्ट कर साधा निशाना राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “वोट चोरी से कभी सीटें चुराई जाती हैं, कभी पूरी सरकार।” उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में हेरफेर कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। चुनाव आयोग पर भी उठाए सवाल कांग्रेस नेता ने भारतीय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ संस्थाओं को “जेब में रखने” और चुनावी प्रक्रिया को “तोड़-मरोड़” कर परिणाम प्रभावित किए जा रहे हैं। असम और बंगाल के नतीजों के बाद बयान राहुल गांधी का यह बयान असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में BJP की जीत के बाद आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन राज्यों में भी चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। राजनीतिक माहौल गरम राहुल गांधी के इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। BJP की ओर से अभी इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो सकते हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारतीय चुनाव आयोग (EC) ने नई विधानसभा के गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है, जिसके बाद सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया है। 4 मई को आए चुनाव नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है। वहीं, करीब 15 साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) 80 सीटों पर सिमट गई। नतीजों के बाद अब नई सरकार के गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है। 8 मई को BJP विधायक दल की बैठक सूत्रों के मुताबिक, 8 मई को BJP विधायक दल की अहम बैठक हो सकती है, जिसमें नेता का चयन किया जाएगा। इस बैठक के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कोलकाता पहुंचने की भी संभावना है, जो पार्टी के पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद रह सकते हैं। राज्यपाल को भेजा गया नोटिफिकेशन चुनाव आयोग द्वारा जारी अधिसूचना राज्यपाल को भेज दी गई है। इसके साथ ही विजयी दल को सरकार गठन का दावा पेश करने का अधिकार मिल गया है। 7 मई को खत्म होगा विधानसभा का कार्यकाल पश्चिम बंगाल विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है। इसी बीच निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली और वोटों की लूट हुई है। ममता बनर्जी ने कहा कि “हम असल मायने में नहीं हारे हैं, ऐसे में इस्तीफे का सवाल नहीं उठता।” 9 मई को हो सकता है शपथग्रहण सूत्रों के अनुसार, नई सरकार का शपथग्रहण 9 मई को हो सकता है। यह दिन रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती का है, इसलिए इसे विशेष महत्व दिया जा रहा है। BJP प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी इस तारीख की पुष्टि के संकेत दिए हैं। अन्य राज्यों में भी प्रक्रिया शुरू चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के साथ-साथ असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी नई विधानसभा के गठन के लिए अधिसूचना जारी की है। इन अधिसूचनाओं के बाद सभी राज्यों में विजयी दल सरकार गठन का दावा पेश कर सकते हैं। फिलहाल, बंगाल में सबकी नजर BJP विधायक दल की बैठक और मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान पर टिकी है, जो राज्य की नई राजनीतिक दिशा तय करेगा।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के तहत शनिवार को राज्य के 15 बूथों पर पुनर्मतदान (री-पोल) कराया जा रहा है। इनमें डायमंड हार्बर के 4 और मगरहाट पश्चिम के 11 बूथ शामिल हैं। मतदान सुबह 7 बजे शुरू हुआ और शाम 6 बजे तक जारी रहेगा। EVM खराबी का आरोप, वोटर्स परेशान डायमंड हार्बर के रॉयनगर प्राइमरी स्कूल स्थित बूथ नंबर 243 पर मतदाताओं ने EVM में खराबी की शिकायत की। एक वोटर ने कहा कि मशीन ठीक से काम नहीं कर रही लोगों को आधे घंटे से ज्यादा समय तक लाइन में इंतजार करना पड़ा तकनीकी टीम को मौके पर बुलाया गया हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति को जल्द सामान्य करने का दावा किया गया है। क्यों कराना पड़ा री-पोल? दरअसल, 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान इन बूथों पर: EVM से छेड़छाड़ के आरोप राजनीतिक दलों के बीच झड़प मतदान प्रक्रिया में बाधा जैसी शिकायतें सामने आई थीं। इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया। दक्षिण 24 परगना के सभी बूथ प्रभावित ये सभी 15 बूथ दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित हैं, जिसे चुनाव के लिहाज से संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और केंद्रीय बलों की तैनाती भी की गई है, ताकि मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके। रिकॉर्ड मतदान ने बढ़ाई सियासी हलचल इस बार पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड स्तर पर मतदान हुआ है: पहले चरण (23 अप्रैल): 93.19% वोटिंग दूसरे चरण (29 अप्रैल): 92.48% वोटिंग कुल 294 सीटों पर औसत मतदान: 92.84% इतने बड़े मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक दलों के बीच मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। TMC का BJP पर आरोप री-पोल के बीच शशि पांजा ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि BJP ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की ज्यादा जगहों पर री-पोल कराकर बंगाल की छवि खराब करने की साजिश रची गई TMC ने उकसावे के बावजूद संयम बनाए रखा पांजा ने यह भी दावा किया कि बीजेपी चुनावी तौर पर कमजोर स्थिति में है, इसलिए इस तरह की रणनीति अपना रही है। 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। इससे पहले री-पोल और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सियासी माहौल काफी गर्म है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।