रांची। झारखंड के सिमडेगा जिले ने कृषि और बागवानी क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। मुख्यमंत्री Hemant Soren के विजन और बिरसा हरित ग्राम योजना के सफल क्रियान्वयन का परिणाम है कि जिले के उच्च गुणवत्ता वाले आम्रपाली आम पहली बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच गए हैं। सिमडेगा से 1322 किलोग्राम (1.32 टन) आम्रपाली आम की पहली व्यावसायिक खेप यूनाइटेड किंगडम के लंदन के लिए रवाना की गई है। कोरोना काल में शुरू हुई योजना बनी सफलता की मिसाल कोरोना महामारी के दौरान ग्रामीणों को रोजगार और आजीविका उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बिरसा हरित ग्राम योजना की शुरुआत की गई थी। वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच सिमडेगा जिले के 12 हजार से अधिक किसानों ने लगभग 10,500 एकड़ भूमि पर आम्रपाली, मल्लिका और लंगड़ा आम की बागवानी की। आज उन्हीं किसानों की मेहनत का फल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा है। पिछले वर्ष आम का उत्पादन अच्छा होने के बावजूद किसानों को उचित बाजार नहीं मिल पाया था। इस बार जिला प्रशासन ने खरीदार-विक्रेता बैठकें आयोजित कर बाजार से सीधा संपर्क स्थापित किया। साथ ही APEDA के सहयोग से आमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किया गया। महिला किसान बनीं निर्यात अभियान की ताकत सिमडेगा में 7,500 सखी मंडलों से जुड़ी 93 हजार से अधिक महिलाओं ने इस सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिले के छह किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के लगभग 300 किसान इस निर्यात प्रक्रिया से जुड़े हैं। महिला जागृति फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड और बेउरा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने पहली खेप के निर्यात में प्रमुख भूमिका निभाई। 81 टन आम बेचने का लक्ष्य जिला प्रशासन ने इस सीजन में 81 टन आम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचने का लक्ष्य रखा है। जल्द ही यूके और यूरोप के लिए नई खेप भेजी जाएगी। साथ ही घरेलू बाजार में रिलायंस मार्ट के साथ भी बाजार संपर्क स्थापित किया गया है। 2.15 लाख ग्रामीण परिवारों को मिला रोजगार बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत पूरे झारखंड में 1.86 लाख एकड़ क्षेत्र में बागवानी विकसित की गई है, जिससे 2.15 लाख ग्रामीण परिवारों को स्थायी रोजगार मिला है। राज्य सरकार का अनुमान है कि इस वर्ष लगभग 50 हजार मीट्रिक टन फल उत्पादन होगा, जिससे झारखंड भविष्य में फलों के निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 से 18 जून तक फ्रांस और स्लोवाकिया के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह फ्रांस में आयोजित G-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के साथ-साथ दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे। स्लोवाकिया की यह यात्रा विशेष रूप से ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि 1993 में देश के गठन के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक यात्रा होगी। फ्रांस से होगी यात्रा की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी 13 जून को फ्रांस के नीस शहर पहुंचेंगे। 14 जून को उनकी मुलाकात फ्रांसीसी राष्ट्रपति Emmanuel Macron से होगी। दोनों नेता भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी, निवेश और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। बैठक के दौरान दोनों नेता संयुक्त रूप से ‘भारत इनोवेट्स’ कार्यक्रम का उद्घाटन भी करेंगे। इस कार्यक्रम में भारत, फ्रांस और अन्य देशों के प्रमुख स्टार्टअप, निवेशक और वेंचर कैपिटल फंड भाग लेंगे। यह आयोजन भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष के तहत आयोजित किया जा रहा है। पहली बार स्लोवाकिया जाएंगे पीएम मोदी यात्रा के दूसरे चरण में प्रधानमंत्री मोदी 14 से 16 जून तक Slovakia की राजकीय यात्रा करेंगे। यह दौरा स्लोवाक प्रधानमंत्री Robert Fico के निमंत्रण पर हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इस दौरान प्रधानमंत्री फिको के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और व्यापार, निवेश, ऑटोमोबाइल विनिर्माण, रेलवे, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा करेंगे। अपने दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी स्लोवाकिया के राष्ट्रपति Peter Pellegrini से भी मुलाकात करेंगे। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच बढ़ते संपर्कों को देखते हुए इस यात्रा को द्विपक्षीय संबंधों में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। G-7 शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी यात्रा के तीसरे चरण में प्रधानमंत्री मोदी 16 और 17 जून को फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 Summit 2026 में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। G-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी कई देशों के नेताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के साथ संभावित मुलाकात पर भी रहेगी। पेरिस में करेंगे VivaTech सम्मेलन में शिरकत यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री मोदी 18 जून को पेरिस जाएंगे। यहां वह VivaTech 2026 में भाग लेंगे, जिसे यूरोप के सबसे बड़े प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप आयोजनों में गिना जाता है। प्रधानमंत्री के पेरिस में भारतीय समुदाय को संबोधित करने की भी संभावना है। इसके अलावा वह विभिन्न प्रौद्योगिकी कंपनियों और निवेशकों के साथ संवाद कर सकते हैं। क्यों महत्वपूर्ण है यह दौरा? प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा फ्रांस, स्लोवाकिया और यूरोपीय देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती दे सकती है। G-7 मंच पर भारत की भागीदारी वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में उसकी बढ़ती भूमिका को रेखांकित करेगी, जबकि नवाचार और प्रौद्योगिकी से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेना भारत को वैश्विक स्टार्टअप और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर देगा।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब मिस्र भी दोनों देशों के बीच संभावित समझौते की कोशिशों में सक्रिय हो गया है। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सीसी ने कहा है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौता कराने के लिए विभिन्न पक्षों के साथ लगातार संपर्क में है। मैक्रों से बातचीत में सामने आया मिस्र का रुख मिस्र के राष्ट्रपति ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ फोन पर क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की। इस दौरान अल-सीसी ने कहा कि काहिरा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और एक व्यापक समझौते का रास्ता निकालने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर मिस्र का रुख अंतरराष्ट्रीय कानून, देशों की संप्रभुता और उनके संसाधनों के सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित है। उनका मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बातचीत और कूटनीति ही सबसे प्रभावी रास्ता है। मध्य पूर्व में स्थिरता पर फ्रांस का जोर बातचीत के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व को नए संघर्ष और अराजकता से बचाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए। मैक्रों ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों की निर्बाध आवाजाही बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रंप बोले- समझौते के करीब हैं दोनों देश इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान परमाणु समझौते के काफी करीब पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति बनी है। व्हाइट हाउस में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उन्होंने कहा कि यदि समझौता हो जाता है तो यह सभी पक्षों के लिए बेहतर होगा। परमाणु हथियार नहीं बनाने की बात पर सहमति ट्रंप के अनुसार, ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि वह न तो परमाणु हथियार विकसित करेगा और न ही किसी अन्य देश से हासिल करेगा। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई और शर्तों को और स्पष्ट किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण गारंटी यही है कि ईरान के पास किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार न हों। उन्होंने दावा किया कि इस दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है। सैन्य विकल्प अब भी खुला ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंचती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि वह कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन अमेरिका की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने बातचीत को जटिल और कठिन बताया, लेकिन साथ ही विश्वास जताया कि धीरे-धीरे दोनों पक्ष किसी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता और मध्य पूर्व की राजनीति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए 51 देशों की बैठक के बाद फैसला होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और समुद्री व्यापार पर खतरे को देखते हुए अब यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस ने एक बड़ा कदम उठाया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने घोषणा की है कि दोनों देश मिलकर एक बहुराष्ट्रीय (Multinational) रक्षा मिशन का नेतृत्व करेंगे, जिसका उद्देश्य समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना होगा। यह फैसला 51 देशों की एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद लिया गया है, जिसमें कई देशों ने इस मिशन में सहयोग देने की इच्छा जताई है। मिशन होगा पूरी तरह शांतिपूर्ण और रक्षात्मक ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि यह मिशन किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई के लिए नहीं होगा। इसका उद्देश्य केवल: वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा समुद्री मार्गों की निगरानी और बारूदी सुरंगों (माइन) को हटाना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मिशन तब पूरी तरह लागू होगा जब क्षेत्र में चल रहा संघर्ष समाप्त हो जाएगा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों है अहम? होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इसी रास्ते से बड़े पैमाने पर तेल और गैस का परिवहन होता है। हाल ही में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव से बढ़ी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, हाल के संघर्ष के दौरान ईरान पर इस जलमार्ग को बाधित करने के आरोप लगे थे। हालांकि बाद में ईरान के विदेश मंत्री ने दावा किया कि यह मार्ग अब पूरी तरह खुला है। उधर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान दिया कि समुद्री रास्ते फिर से चालू हो गए हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने नाटो की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उसे “जरूरत के समय कमजोर” बताया। ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त अगुवाई कीर स्टारमर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि इस मिशन में दर्जनों देश शामिल हो सकते हैं। कई देशों ने अपने सैन्य और तकनीकी संसाधन देने की पेशकश भी की है। मैक्रों ने कहा कि हालात में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन अभी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि इस क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जर्मनी समेत कई देशों का समर्थन जर्मनी ने भी इस मिशन का समर्थन करते हुए कहा है कि वह नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। साथ ही, यह भी माना जा रहा है कि अमेरिका की भागीदारी इस मिशन को और मजबूत बना सकती है। अगले हफ्ते आएगा पूरा रोडमैप ब्रिटेन सरकार ने बताया है कि इस मिशन की विस्तृत योजना अगले हफ्ते लंदन में होने वाली सैन्य बैठक के बाद सार्वजनिक की जाएगी।
भारत की महत्वाकांक्षी राफेल फाइटर जेट डील एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह प्रगति नहीं, बल्कि ठहराव है। 12 फरवरी 2026 को रक्षा मंत्रालय की Defence Acquisition Council (DAC) से मंजूरी मिलने के बाद उम्मीद थी कि प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ेगी, खासकर तब जब 17 फरवरी को Emmanuel Macron भारत दौरे पर आए। माना जा रहा था कि इस दौरान बड़ा ऐलान हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ-और अब करीब दो महीने बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी है। इस देरी की सबसे बड़ी वजह तकनीकी और रणनीतिक मतभेद बताए जा रहे हैं, जिसमें रूस की भूमिका अहम बनकर उभरी है। भारत के सामने चुनौती स्पष्ट है-वायुसेना के पास मौजूदा समय में केवल 29 स्क्वाड्रन हैं, जबकि न्यूनतम आवश्यकता 42 की है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत 114 नए Dassault Rafale लड़ाकू विमान खरीदने की योजना पर काम कर रहा है। इससे पहले ही भारतीय वायुसेना के पास राफेल के दो स्क्वाड्रन मौजूद हैं और नौसेना के लिए 26 मरीन राफेल की डील भी हो चुकी है। क्या है डील का पूरा ढांचा? प्रस्तावित डील के तहत 114 विमानों में से 18 सीधे फ्रांस से तैयार हालत (फ्लाइ-अवे) में मिलेंगे, जबकि 96 विमानों का निर्माण भारत में होगा। इसमें लोकल मैन्युफैक्चरिंग और “मेक इन इंडिया” को बढ़ावा देने के लिए 50–60 प्रतिशत तक स्वदेशी कंपोनेंट शामिल करने की योजना है। इस डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है, जो भारत के सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी डील में से एक हो सकती है। कहां फंसा है पेंच? असल विवाद “सोर्स कोड” और हथियार एकीकरण (integration) को लेकर है। भारत चाहता है कि वह राफेल में अपनी स्वदेशी मिसाइलें और हथियार बिना किसी अतिरिक्त अनुमति के इस्तेमाल कर सके। इसमें सबसे अहम है BrahMos missile, जो भारत और Russia की संयुक्त परियोजना है। यहीं से फ्रांस की चिंता शुरू होती है। राफेल के सॉफ्टवेयर और सिस्टम में बदलाव के लिए संवेदनशील सोर्स कोड साझा करना पड़ सकता है। फ्रांस को आशंका है कि इस प्रक्रिया में यह तकनीक अप्रत्यक्ष रूप से रूस तक पहुंच सकती है, जो उसके लिए रणनीतिक जोखिम है। खासकर तब, जब रूस और पश्चिमी देशों के बीच Russia-Ukraine War के कारण संबंध पहले से तनावपूर्ण हैं और NATO के सदस्य देश फ्रांस रूस को प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। भारत की स्थिति क्या है? भारत का तर्क साफ है-वह अपने हथियारों और मिसाइल सिस्टम को किसी भी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता चाहता है, ताकि लागत कम रहे और रणनीतिक स्वायत्तता बनी रहे। भारत का यह भी रिकॉर्ड रहा है कि उसने किसी भी रक्षा सौदे में तकनीक लीक नहीं की है। क्या है आगे का रास्ता? यह डील भारत और फ्रांस दोनों के लिए बेहद अहम है। जहां भारत को तत्काल फाइटर जेट्स की जरूरत है, वहीं फ्रांस के लिए यह एक बड़ा रक्षा निर्यात सौदा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान “विश्वास और संतुलन” के बीच ही निकलेगा-संभवतः फ्रांस सीमित एक्सेस या नियंत्रित तकनीकी साझा करने का विकल्प दे सकता है, जबकि भारत तकनीक की सुरक्षा को लेकर आश्वासन देगा। फिलहाल, राफेल डील सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक साझेदारियों के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुकी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।