नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश में वर्ष 2011 की जनगणना के बाद हुए जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee on Demographic Changes - HLCDC) का गठन किया है। गृह मंत्रालय की ओर से गठित यह समिति अवैध घुसपैठ, असामान्य बसावट और जनसंख्या संरचना में आए बदलावों की जांच करेगी तथा एक वर्ष के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। समिति का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती राज्यों, महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन के कारणों का अध्ययन करना और आवश्यक नीति एवं कानूनी सुधारों की सिफारिश करना है। राज्यों को भेजी जाएगी विस्तृत प्रश्नावली समिति ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विस्तृत प्रश्नावली तैयार की है। इसे मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों (DGP) और संबंधित विभागों को भेजा जाएगा, ताकि दौरे से पहले आवश्यक आंकड़े और सूचनाएं जुटाई जा सकें। सरकार का मानना है कि इससे समिति को जमीनी स्तर पर तथ्यात्मक और व्यापक अध्ययन करने में मदद मिलेगी। सीमावर्ती राज्यों और बड़े शहरों पर रहेगा विशेष फोकस सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित कई सीमावर्ती राज्यों का दौरा करेगी। इसके अलावा समिति देश के प्रमुख महानगरों और औद्योगिक शहरों में भी जनसंख्या पैटर्न और बसावट का अध्ययन करेगी। अमित शाह ने जल्द रिपोर्ट सौंपने के दिए निर्देश केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समिति को जल्द से जल्द अपनी सिफारिशें तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने गृह सचिव को भी समिति के कार्य और राज्यों के दौरों के दौरान हरसंभव सहयोग सुनिश्चित करने को कहा है। अवैध प्रवास पर बन सकती है नई नीति समिति अपने अध्ययन के दौरान अवैध प्रवास, असामान्य जनसंख्या वृद्धि और जनसांख्यिकीय बदलावों के संभावित कारणों का विश्लेषण करेगी। इसके आधार पर समिति निम्नलिखित विषयों पर सुझाव देगी: अवैध प्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया हिरासत और निष्कासन की स्थायी व्यवस्था सीमा प्रबंधन को और मजबूत बनाने के उपाय केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की रणनीति आवश्यक कानूनी और नीतिगत सुधार एक साल में सरकार को सौंपी जाएगी रिपोर्ट गृह मंत्रालय ने समिति को एक वर्ष के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य दिया है। रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसंख्या प्रबंधन से जुड़ी नीतियों में बदलाव पर विचार कर सकती है। सरकार का कहना है कि इस अध्ययन का उद्देश्य देश में जनसंख्या से जुड़े बदलावों का तथ्यात्मक और वैज्ञानिक विश्लेषण करना है, ताकि भविष्य की नीतियां सटीक आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर तैयार की जा सकें।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) के तहत नए संशोधित नियम 2026 जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों के कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करना बताया गया है। सरकार ने पहली बार धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट परिभाषा तय करते हुए उनके दायरे को भी विस्तृत रूप से निर्धारित किया है। धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट परिभाषा तय नए नियमों के अनुसार मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, मठ, सिनेगॉग और अन्य धार्मिक स्थलों के निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण और रखरखाव को धार्मिक उद्देश्य के तहत मान्यता दी गई है। इसके साथ ही धार्मिक ग्रंथों का संरक्षण, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटलीकरण, धार्मिक दर्शन और संस्कृति से जुड़े अध्ययन संस्थान, धर्मशालाओं, लंगरों, अन्नदान और सामुदायिक रसोई का संचालन तथा तीर्थयात्रियों के लिए पेयजल, शौचालय और आश्रय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने को भी वैध धार्मिक गतिविधियों में शामिल किया गया है। धर्मांतरण गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की धर्मांतरण (प्रोसिलिटाइजेशन) गतिविधि को धार्मिक उद्देश्य नहीं माना जाएगा। इसके तहत धर्मांतरण से जुड़े कार्यक्रम या किसी भी प्रकार का ऐसा प्रचार-प्रसार जो धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देता है, उसे अनुमति नहीं दी जाएगी। धार्मिक शिक्षा, प्रवचन, सत्संग, ध्यान शिविर, भजन-कीर्तन और पारंपरिक आस्था प्रणालियों के संरक्षण को अनुमति दी गई है। विदेशी फंडिंग उपयोग पर सख्त शर्तें नए नियमों के तहत किसी भी संस्था को अगली किस्त तभी मिलेगी जब वह पहले प्राप्त विदेशी फंड का कम से कम 75 प्रतिशत उपयोग कर चुकी हो। इसके साथ ही सभी संस्थाओं को अपने सोशल मीडिया अकाउंट, वेबसाइट और प्रकाशनों की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। सभी FCRA पंजीकृत संगठनों को अपनी गतिविधियों और कार्यों का वार्षिक अपडेट भी केंद्र सरकार को देना होगा। “की फंक्शनरी” की नई परिभाषा लागू संशोधित नियमों में “की फंक्शनरी” की नई परिभाषा जोड़ी गई है, जिसके तहत ट्रस्टी, निदेशक, साझेदार, पदाधिकारी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के प्रतिनिधि और संस्था के संचालन से जुड़े अन्य जिम्मेदार व्यक्ति शामिल होंगे। इससे संस्थाओं की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा। विदेशी नागरिकों से जुड़े संगठनों पर कड़ी शर्त सरकार के अनुसार यदि किसी धार्मिक संस्था में विदेशी नागरिक प्रमुख पद पर है, तो उसे सामान्य परिस्थितियों में FCRA पंजीकरण नहीं मिलेगा, जब तक कि सरकार से विशेष अनुमति प्राप्त न हो। सरकार का उद्देश्य गृह मंत्रालय ने कहा है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुव्यवस्थित बनाना है, ताकि इसका उपयोग केवल निर्धारित धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए ही हो सके।
नई दिल्ली: देश में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को तकनीक के जरिए और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में गृह मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को 'अभिज्ञान (Abhigyan) ऐप' लॉन्च किया, जो पुलिसकर्मियों को रियल टाइम में संदिग्धों की पहचान करने और उनके आपराधिक रिकॉर्ड तक तुरंत पहुंचने की सुविधा देगा। यह नया सिस्टम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित किया गया है और इसे देश के विशाल फिंगरप्रिंट डेटाबेस NAFIS (National Automated Fingerprint Identification System) से जोड़ा गया है। अंगूठे का निशान लगाते ही सामने आएगा पूरा रिकॉर्ड अभिज्ञान ऐप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पुलिसकर्मी अब किसी संदिग्ध व्यक्ति के फिंगरप्रिंट लेकर सीधे अपने स्मार्टफोन पर उसका आपराधिक इतिहास जांच सकेंगे। इसके लिए व्यक्ति को थाने ले जाने की जरूरत नहीं होगी। यह सिस्टम करीब 1.3 करोड़ आरोपियों, दोषियों और संदिग्धों के राष्ट्रीय डेटाबेस से जुड़ा हुआ है, जिससे कुछ ही सेकंड में जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। सड़क पर ही हो सकेगी जांच नई तकनीक के जरिए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सड़क पर, चेकिंग के दौरान या किसी अभियान में मौके पर ही बायोमेट्रिक सत्यापन कर सकेंगी। डेमो के दौरान यह दिखाया गया कि फिंगरप्रिंट का मिलान मात्र 35 सेकंड में हो जाता है। इससे फरार अपराधियों और वांटेड आरोपियों की पहचान पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से की जा सकेगी। पहले सिर्फ थानों तक सीमित थी सुविधा अब तक फिंगरप्रिंट मिलान की सुविधा देशभर के पुलिस थानों और जिला मुख्यालयों में स्थापित लगभग 1,556 वर्कस्टेशनों तक सीमित थी। किसी व्यक्ति के फिंगरप्रिंट की जांच के लिए उसे संबंधित केंद्र तक ले जाना पड़ता था। अभिज्ञान ऐप आने के बाद यह पूरी प्रक्रिया मोबाइल आधारित और रियल टाइम हो जाएगी। इसके अलावा ऐप में टू-स्टेप ऑथेंटिकेशन जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी दी गई है। NAFIS डेटाबेस में मौजूद हैं लाखों अपराधियों के रिकॉर्ड राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस में विभिन्न प्रकार के अपराधों से जुड़े लाखों रिकॉर्ड मौजूद हैं। इनमें नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और जेल रिकॉर्ड से संबंधित बड़ी संख्या में डेटा शामिल है। टेक्नोलॉजी से अपराधियों को सजा दिलाने पर जोर अभिज्ञान ऐप लॉन्च करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केवल अपराधियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि समयबद्ध तरीके से उन्हें सजा दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि फिंगरप्रिंट, डीएनए, मोबाइल टावर डेटा, फेस रिकॉग्निशन और आईरिस स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने से मजबूत चार्जशीट तैयार करने और अपराधियों को कड़ी सजा दिलाने में मदद मिलेगी। यह पहल देश की पुलिस व्यवस्था को आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
केंद्र सरकार ने भारत आने वाले विदेशी नागरिकों के लिए आप्रवास और वीजा नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। गृह मंत्रालय ने ‘आप्रवास और विदेशियों विषयक नियम, 2025’ में संशोधन करते हुए नए प्रावधानों को अधिसूचित कर दिया है। इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी नागरिकों के ठहराव और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाना बताया जा रहा है। 180 दिन से अधिक रुकने पर पहले कराना होगा रजिस्ट्रेशन नए नियमों के तहत, 180 दिन या उससे कम अवधि के वीजा पर भारत आने वाले विदेशी नागरिक यदि निर्धारित समय से अधिक रुकना चाहते हैं, तो उन्हें वीजा अवधि समाप्त होने से पहले ही रजिस्ट्रेशन कराना होगा। पहले यह व्यवस्था थी कि भारत में आगमन के 180 दिन पूरे होने के 14 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता था। अब सरकार ने इस नियम में बदलाव करते हुए समय सीमा को पहले ही पूरा करने की शर्त लागू कर दी है। लंबे प्रवास वाले वीजा धारकों पर भी लागू होगा नियम जिन विदेशी नागरिकों को 180 दिन से अधिक अवधि का वीजा दिया गया है, लेकिन उनके वीजा पर यह शर्त दर्ज है कि एक बार में 180 दिन से अधिक भारत में नहीं रह सकते, उन्हें भी निर्धारित अवधि समाप्त होने से पहले रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में अतिरिक्त प्रवास की अनुमति और रजिस्ट्रेशन केवल आपात परिस्थितियों में ही दिया जाएगा। बच्चों से जुड़े प्रावधानों में राहत संशोधित नियमों में विदेशी नागरिकों के बच्चों से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव किया गया है। पहले, यदि किसी बच्चे के माता-पिता में से एक या दोनों विदेशी नागरिक हों, तो जन्म के 30 दिनों के भीतर संबंधित अधिकारी को ऑनलाइन माध्यम से इसकी जानकारी देना अनिवार्य था। इसके बाद वीजा और अन्य औपचारिकताओं की प्रक्रिया पूरी की जाती थी। अब सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नियम उन मामलों में लागू नहीं होगा, जहां माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक है और परिवार बच्चे की भारतीय नागरिकता बनाए रखना चाहता है। क्या है सरकार का उद्देश्य? विशेषज्ञों के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवास से जुड़े रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी बनाना और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को समय रहते पूरा कराना है। साथ ही, नागरिकता से जुड़े मामलों में अनावश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं को कम करने का भी प्रयास किया गया है। नए प्रावधान अधिसूचना जारी होने के साथ ही लागू हो गए हैं और भारत आने वाले विदेशी नागरिकों को अब इन संशोधित नियमों का पालन करना होगा।
पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की 500 कंपनियां फिलहाल राज्य में तैनात रहेंगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने गृह मंत्रालय से 180 दिनों तक केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखने का आग्रह किया था। केंद्र सरकार ने फिलहाल 20 जून तक इसकी मंजूरी दी है। चुनाव के बाद भी तैनात रखे गए थे केंद्रीय बल विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद पश्चिम बंगाल में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीएपीएफ की 500 कंपनियों को राज्य में तैनात किया गया था। पिछले चुनावों के बाद हुई हिंसक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए इस बार मतदान खत्म होने के बाद भी केंद्रीय बलों को नहीं हटाया गया था। गत सप्ताह राज्य की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद गृह मंत्रालय ने इन बलों को चरणबद्ध तरीके से वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की थी। पहले चरण में 100 कंपनियों यानी करीब 10 हजार जवानों को हटाने का आदेश जारी किया गया था। गृह मंत्रालय ने जारी किया नया आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी नए आदेश के अनुसार, अब 20 जून तक राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रहेगी। आदेश में कहा गया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए विभिन्न बलों की कुल 500 कंपनियां पश्चिम बंगाल में मौजूद रहेंगी। इनमें: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 200 कंपनियां सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 150 कंपनियां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की 50 कंपनियां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की 50 कंपनियां सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 50 कंपनियां शामिल हैं। राज्य सरकार को करनी होगी व्यवस्थाएं गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों की तैनाती के दौरान ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक सपोर्ट और जवानों के ठहरने की व्यवस्था राज्य सरकार को करनी होगी। साथ ही बलों की सभी ऑपरेशनल जरूरतों का भी ध्यान रखने को कहा गया है। पहले चरण में हटनी थीं 100 कंपनियां गृह मंत्रालय ने पहले चरण में 100 कंपनियों को वापस बुलाने का फैसला लिया था। इनमें CRPF की 40, BSF की 30, CISF की 10, ITBP की 10 और SSB की 10 कंपनियां शामिल थीं। आदेश के मुताबिक 15 मई से इन कंपनियों को कानून व्यवस्था ड्यूटी से हटाया जाना था। सुरक्षा समीक्षा के बाद लिया गया फैसला राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हुई समीक्षा बैठक में पश्चिम बंगाल गृह विभाग और केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारी शामिल हुए थे। खुफिया एजेंसियों से भी विशेष रिपोर्ट मांगी गई थी। समीक्षा में बताया गया कि चुनाव के बाद फिलहाल राज्य में स्थिति शांतिपूर्ण है और बड़े राजनीतिक प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं नहीं हुई हैं। वहीं बांग्लादेश सीमा से लगने वाले इलाकों में विशेष निगरानी रखी जा रही है। सीमा सुरक्षा बल घुसपैठ रोकने के लिए लगातार सतर्क है और कई इलाकों में फेंसिंग का काम भी शुरू किया जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।