India Nepal Relations

Nepalese Gorkha soldiers parade during launch of Britain's new King's Gurkha Artillery regiment.
गोरखा भर्ती पर भारत-नेपाल गतिरोध के बीच ब्रिटेन ने बनाई नई सैन्य यूनिट, अगले 3 वर्षों में होंगे 400 सैनिक शामिल

  भारत और नेपाल के बीच गोरखा सैनिकों की भर्ती को लेकर जारी गतिरोध के बीच ब्रिटेन ने नेपाली गोरखाओं के लिए एक नई सैन्य यूनिट का गठन किया है। ब्रिटिश सेना ने ‘किंग्स गोरखा आर्टिलरी’ नामक नई रेजिमेंट की शुरुआत की है, जिसमें आने वाले तीन वर्षों के दौरान सैकड़ों नेपाली युवाओं की भर्ती की जाएगी। ब्रिटिश सेना में बनी नई गोरखा आर्टिलरी यूनिट ब्रिटिश सेना की रॉयल आर्टिलरी शाखा के अंतर्गत गठित ‘किंग्स गोरखा आर्टिलरी’ को आधुनिक युद्ध प्रणालियों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है। ब्रिटिश सरकार के अनुसार, वर्ष 2029 तक इस यूनिट में 500 से अधिक सैनिक शामिल हो सकते हैं, जबकि शुरुआती चरण में लगभग 400 सैनिकों की भर्ती की जाएगी। यह यूनिट अप्रैल 2025 में स्थापित की गई थी और हाल ही में इसकी पहली औपचारिक सैन्य परेड आयोजित की गई। आधुनिक हथियार प्रणालियों पर मिलेगा प्रशिक्षण नई यूनिट के सैनिकों को ब्रिटिश सेना की उन्नत आर्टिलरी प्रणालियों पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। इनमें आर्चर सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी सिस्टम, लाइट गन और रिमोट-कंट्रोल्ड हॉवित्जर 155 सिस्टम जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। ब्रिटिश सेना का कहना है कि यह यूनिट भविष्य के सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। किंग चार्ल्स ने नेपाली भाषा में किया अभिवादन नई रेजिमेंट के समारोह में ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स तृतीय ने नेपाली भाषा में सैनिकों का अभिवादन किया। उन्होंने कहा, “आजुर दिन राम्रो छ” अर्थात “आज का दिन अच्छा है।” ब्रिटिश शाही परिवार ने इसे ब्रिटिश सेना की पहली समर्पित गोरखा आर्टिलरी यूनिट और हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य पहलों में से एक बताया। भारत में क्यों रुकी हुई है गोरखा भर्ती? दूसरी ओर भारतीय सेना में नेपाली गोरखा सैनिकों की नई भर्ती पिछले कुछ वर्षों से बंद है। शुरुआत में कोविड-19 महामारी के कारण भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हुई थी। बाद में भारत की अग्निपथ योजना को लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई। नेपाल का कहना है कि चार वर्षीय अग्निवीर मॉडल उन पारंपरिक भर्ती शर्तों से अलग है, जिनके तहत नेपाली नागरिक दशकों से भारतीय सेना में भर्ती होते रहे हैं। अग्निपथ योजना बना मुख्य विवाद नेपाल सरकार ने अभी तक अग्निपथ योजना के तहत अपने नागरिकों की भर्ती को मंजूरी नहीं दी है। इसी वजह से भारत और नेपाल के बीच गोरखा भर्ती का मुद्दा लंबित है। दोनों देशों के बीच इस विषय पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया है। दो शताब्दियों पुराना है गोरखाओं का सैन्य इतिहास गोरखा सैनिकों की बहादुरी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। उनका सैन्य इतिहास 19वीं सदी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है, जब एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखा सैनिकों की भर्ती शुरू की थी। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद गोरखा रेजिमेंटों का विभाजन भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ। वर्तमान में भारतीय सेना और ब्रिटिश सेना दोनों में नेपाली मूल के गोरखा सैनिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भविष्य पर बनी हुई है अनिश्चितता विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत और नेपाल के बीच भर्ती संबंधी मुद्दों का समाधान जल्द नहीं निकलता, तो भारतीय सेना की गोरखा इकाइयों में नई भर्ती को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं। वहीं ब्रिटेन लगातार गोरखा सैनिकों की भूमिका का विस्तार कर रहा है और उन्हें आधुनिक सैन्य संरचना में अधिक महत्व दे रहा है।  

Deepshikha जून 6, 2026 0
Nepal PM Balen Shah addresses parliament amid controversy over remarks on India-Nepal border issues
‘नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया’, PM बालेन शाह के बयान से मचा विवाद

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। संसद में अपने संबोधन के दौरान शाह ने कहा कि केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि का उपयोग या कब्जा किया है। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को आधिकारिक सफाई जारी करनी पड़ी। पहली संसदीय स्पीच में उठाया सीमा विवाद का मुद्दा प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद में अपने पहले संबोधन में बालेन शाह ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सीमा विवाद का समाधान दोनों देशों को विशेषज्ञों और इतिहासकारों की मदद से बातचीत के जरिए निकालना चाहिए। विपक्ष ने मांगे सबूत प्रधानमंत्री के बयान के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे का दावा किया जा रहा है, तो सरकार इसके प्रमाण पेश करे। कई नेताओं ने बयान वापस लेने की भी मांग की। सीमा विशेषज्ञों ने दावे पर जताई असहमति नेपाल-भारत सीमा मामलों के जानकारों ने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र पर आधिकारिक अतिक्रमण का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। हालांकि सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा जमीन के उपयोग के कुछ मामले सामने आते रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का आशय किसी सरकारी कब्जे से नहीं था। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि उपयोग की स्थिति का जिक्र किया था। लिपुलेख-कालापानी विवाद फिर चर्चा में यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल हाल ही में लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भी आपत्ति जता चुका है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद जारी है।  

surbhi जून 1, 2026 0
Tea workers plucking leaves in Darjeeling tea gardens amid India-Nepal tea trade dispute
भारत-नेपाल में चाय विवाद गहराया,क्या दार्जिलिंग टी ब्रांड पर बढ़ा संकट?जानें पूरा मामला

India और Nepal के बीच चाय कारोबार को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। विवाद की सबसे बड़ी वजह दार्जिलिंग चाय की वैश्विक पहचान और नेपाल की ऑर्थोडॉक्स चाय का तेजी से बढ़ता बाजार माना जा रहा है। दार्जिलिंग ब्रांड को लेकर भारत की चिंता भारत का कहना है कि नेपाली ऑर्थोडॉक्स चाय को कई बार दार्जिलिंग टी के नाम से बेचा जाता है, जिससे दुनिया भर में मशहूर दार्जिलिंग ब्रांड की साख प्रभावित हो सकती है। दार्जिलिंग चाय का सालाना उत्पादन सिर्फ 6 से 6.5 हजार टन के आसपास है, जबकि इसकी वैश्विक मांग कहीं ज्यादा है। आरोप है कि इसी कमी को पूरा करने के लिए नेपाली चाय को मिलाकर निर्यात किया जाता है। 2024 से बढ़ी सख्ती अप्रैल 2024 से भारतीय कस्टम विभाग ने नेपाल से आने वाली हर चाय खेप की 100 फीसदी जांच शुरू कर दी। इससे सीमा पर लंबी देरी होने लगी और नेपाल के चाय कारोबार पर असर पड़ा। बाद में Mamata Banerjee ने भी केंद्र सरकार से नेपाली चाय पर टैक्स छूट की समीक्षा करने की मांग की। उनका कहना था कि सस्ती नेपाली चाय दार्जिलिंग उद्योग को नुकसान पहुंचा रही है। नेपाल ने कहा- गुणवत्ता नहीं, बाजार की लड़ाई नेपाल के चाय कारोबारी इस कार्रवाई को राजनीतिक और व्यावसायिक दबाव बता रहे हैं। उनका कहना है कि नेपाली ऑर्थोडॉक्स चाय की गुणवत्ता बेहतर होने के कारण दार्जिलिंग उत्पादकों पर दबाव बढ़ा है। नेपाल के इलाम, पांचथर और धनकुटा जैसे इलाकों की चाय अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। नेपाल की अर्थव्यवस्था में चाय का बड़ा योगदान नेपाल हर साल करीब 2.75 करोड़ किलोग्राम चाय पैदा करता है। इसमें बड़ी मात्रा भारत को निर्यात होती है। करीब 60 हजार लोगों को रोजगार 20 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में खेती हर साल अरबों रुपये का कारोबार भारत ने कुछ नियमों में दी राहत हाल ही में भारत ने घरेलू बाजार में बिकने वाली नेपाली चाय के लिए अनिवार्य लैब टेस्टिंग में ढील दी है। री-एक्सपोर्ट वाली चाय की जांच जारी रहेगी। रिश्तों पर भी असर विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ चाय का विवाद नहीं, बल्कि ब्रांड वैल्यू, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और भारत-नेपाल संबंधों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच बातचीत से समाधान निकलने की उम्मीद जताई जा रही है।  

surbhi मई 26, 2026 0
Trucks and cargo containers stranded at Birgunj India Nepal border amid new Nepal customs rules
नेपाल-भारत बॉर्डर पर संकट: नए कस्टम नियम से 600 कंटेनर फंसे, बालेन सरकार बैकफुट पर

नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से मजबूत व्यापारिक संबंध रहे हैं, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। लेकिन नेपाल सरकार के एक नए कस्टम नियम ने इस संतुलन को अचानक बिगाड़ दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सीमा के प्रमुख चेकप्वाइंट पर सैकड़ों कंटेनर अटक गए हैं और व्यापारिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। क्या है पूरा मामला? नेपाल सरकार ने अपनी आय (रेवेन्यू) बढ़ाने के उद्देश्य से हाल ही में एक नया कस्टम नियम लागू किया। इस नियम के तहत: भारत से आने वाले किसी भी व्यक्ति को 100 नेपाली रुपए (NPR) से ज्यादा का सामान लाने पर कस्टम ड्यूटी देनी होगी हर सामान पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) लिखा होना अनिवार्य किया गया कागज पर यह नियम व्यवस्थित लगता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू करना बेहद मुश्किल साबित हुआ। बीरगंज बॉर्डर बना जाम का केंद्र इस फैसले का सबसे ज्यादा असर बीरगंज बॉर्डर पर देखने को मिला, जो भारत-नेपाल के बीच सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक है। यहां करीब 600 कंटेनर फंसे हुए हैं कस्टम क्लीयरेंस में भारी देरी हो रही है ट्रकों की लंबी कतारें लग गई हैं कई दिनों तक माल सीमा पर ही रुका रह रहा है यह स्थिति सिर्फ लॉजिस्टिक समस्या नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक संकट का संकेत बनती जा रही है। नियम क्यों पड़ा भारी? इस पूरे मामले में सबसे बड़ी दिक्कत MRP नियम को लेकर आई। असल में: भारत से आने वाले कई सामान (खासकर थोक या खुले उत्पाद) पर MRP नहीं लिखा होता छोटे व्यापारी या स्थानीय लोग हर सामान की कीमत का दस्तावेज नहीं रख पाते कस्टम अधिकारियों के पास इतनी बड़ी मात्रा में सामान की जांच के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं नतीजा–हर ट्रक और हर कंटेनर की जांच में समय लगने लगा, जिससे सिस्टम जाम हो गया। स्थानीय लोगों और व्यापारियों में नाराजगी सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं। नए नियम के बाद: छोटे स्तर का व्यापार लगभग ठप हो गया आम लोगों को जरूरी सामान लाने में दिक्कतें आने लगीं व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान होने लगा इस वजह से जगह-जगह विरोध शुरू हो गया और सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। सरकार को क्यों लेना पड़ा यू-टर्न? बढ़ते विरोध और बिगड़ते हालात को देखते हुए नेपाल सरकार को अपने फैसले में ढील देनी पड़ी। अब सरकार ने कुछ राहत उपाय लागू किए हैं: लोग खुद अपने सामान की कीमत (MRP) घोषित कर सकते हैं उसी आधार पर कस्टम क्लियरेंस मिलेगा उद्योगों के कच्चे माल और जल्दी खराब होने वाले सामान (फल, सब्जी आदि) को अस्थायी छूट दी गई है हालांकि यह राहत अस्थायी है, लेकिन इससे कुछ हद तक स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है। आर्थिक और कूटनीतिक असर इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक प्रभाव हो सकते हैं: व्यापार पर असर: भारत-नेपाल के बीच छोटे और मध्यम व्यापार पर बड़ा झटका सप्लाई चेन बाधित: जरूरी सामान की उपलब्धता प्रभावित कीमतों में बढ़ोतरी: बाजार में वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं कूटनीतिक संकेत: दोनों देशों के बीच व्यापारिक नीतियों पर नए सिरे से चर्चा की जरूरत आगे की चुनौती नेपाल सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह: राजस्व बढ़ाने की अपनी नीति को जारी रखे साथ ही व्यापार और आम लोगों की जरूरतों को भी संतुलित करे

surbhi मई 1, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Military activity near the Strait of Hormuz amid escalating US-Iran tensions and reported retaliatory strikes.
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अपाचे हेलीकॉप्टर घटना के बाद अमेरिका का ईरान पर हमला, तेहरान ने दी कड़ी चेतावनी

Deepshikha जून 10, 2026 0