Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
Pakistan की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan की सत्ता से विदाई और सेना प्रमुख Asim Munir के तेजी से उभार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें United States की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी और घटनाएं धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ती गईं। ‘साइफर केस’ से शुरू हुआ विवाद अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Drop Site News की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पूरा विवाद एक गोपनीय राजनयिक संदेश यानी “साइफर” से शुरू हुआ। मार्च 2022 में पाकिस्तान के तत्कालीन अमेरिका स्थित राजदूत Asad Majeed Khan ने इस्लामाबाद को एक संदेश भेजा था। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें अमेरिकी अधिकारी Donald Lu का कथित बयान शामिल था कि यदि इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सफल हो जाता है, तो “वॉशिंगटन सब कुछ माफ कर देगा।” इमरान खान ने इसे विदेशी साजिश का प्रमाण बताया था और कई रैलियों में इसे “लंदन प्लान” कहा। अमेरिका से क्यों बिगड़े इमरान के रिश्ते? प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान ने धीरे-धीरे अमेरिका से दूरी बनाने वाली विदेश नीति अपनाई। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद उन्होंने अमेरिका को सैन्य ठिकाने देने से साफ इनकार कर दिया था। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था — “Absolutely Not।” सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब 24 फरवरी 2022 को, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दिन, इमरान खान ने Vladimir Putin से मॉस्को में मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुलाकात से वॉशिंगटन बेहद नाराज हुआ। सेना और इमरान खान के बीच बढ़ा टकराव रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान की सेना को लगने लगा था कि इमरान खान की नीतियां देश को अमेरिका से दूर कर सकती हैं, जिससे रणनीतिक नुकसान हो सकता है। यहीं से सेना और इमरान खान के बीच तनाव बढ़ने लगा। आसिम मुनीर का उभार कैसे हुआ? रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में इमरान खान के ईरान दौरे के दौरान आसिम मुनीर, जो उस समय ISI प्रमुख थे, ने ईरानी अधिकारियों के साथ बेहद सख्त रुख अपनाया था। रिपोर्ट में इसे अमेरिकी रणनीतिक सोच के करीब माना गया, क्योंकि उस समय अमेरिका पाकिस्तान-ईरान संबंधों को मजबूत होते नहीं देखना चाहता था। कुछ समय बाद इमरान खान ने खुद आसिम मुनीर को ISI प्रमुख पद से हटा दिया था। CIA प्रमुख से मिलने से इनकार रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इमरान खान ने 2021 में William J. Burns से मिलने से इनकार कर दिया था। वह सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति Joe Biden से बात करना चाहते थे। हालांकि बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं किया। अविश्वास प्रस्ताव और सत्ता से बाहर होना अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान की सरकार गिर गई। तकनीकी रूप से यह संवैधानिक प्रक्रिया थी, लेकिन उनके समर्थकों ने इसे सेना और अमेरिका के बीच समझौते का परिणाम बताया। सरकार गिरने के बाद Pakistan Tehreek-e-Insaf (PTI) पर कार्रवाई शुरू हुई। इमरान खान और उनकी पत्नी Bushra Bibi को जेल भेज दिया गया। यूक्रेन युद्ध के बाद बदला पाकिस्तान का रुख रिपोर्ट में दावा किया गया कि इमरान खान के हटने के बाद पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिका के करीब आने लगा। इस दौरान पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराए। साथ ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को International Monetary Fund से राहत पैकेज भी मिला। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद और मजबूत हुए मुनीर आसिम मुनीर नवंबर 2022 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। बाद में उनका कार्यकाल 2027 तक बढ़ा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 में भारत के कथित “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद पाकिस्तान में उनकी स्थिति और मजबूत हो गई। इसके बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और नए बनाए गए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) पद की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की नई रणनीति? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब Saudi Arabia के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है और आसिम मुनीर विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के दौरों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावनाओं में भी चर्चा में है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पाकिस्तान की राजनीति, सेना और वैश्विक शक्तियों के संबंधों पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
BRICS Summit 2026 को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में Vladimir Putin के साथ-साथ Xi Jinping के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, Russia और China दोनों ने भारत को संकेत दिए हैं कि उनके शीर्ष नेता 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में भाग ले सकते हैं। इस बार India BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। 2019 के बाद पहली भारत यात्रा हो सकती है यदि शी जिनपिंग का दौरा तय होता है, तो यह अक्टूबर 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। आखिरी बार वह तमिलनाडु के मामल्लापुरम में भारत-चीन अनौपचारिक शिखर वार्ता में शामिल होने आए थे। 2020 के बाद बिगड़े थे रिश्ते भारत और चीन के संबंध अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए गलवान सैन्य गतिरोध के बाद काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हालांकि अक्टूबर 2024 में Kazan में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उसी दौरान दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति जताई थी। पिछले डेढ़ साल में रिश्तों में आई नरमी पिछले कुछ समय में भारत और चीन के संबंधों में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं वीजा सेवाएं बहाल की गईं कुछ चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई हालांकि सीमा पर अब भी बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं और तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विदेश मंत्रियों की बैठक में तय हुआ एजेंडा हाल ही में नई दिल्ली में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर चर्चा की गई। Sergey Lavrov इस बैठक में शामिल हुए थे, जबकि Wang Yi बीजिंग में व्यस्तता के कारण नहीं आ सके। उनकी जगह भारत में चीन के राजदूत Xu Feihong ने भाग लिया। सूत्रों के मुताबिक, अगर कोई अप्रत्याशित परिस्थिति नहीं बनी तो BRICS देशों की ओर से शीर्ष स्तर पर भागीदारी की जानकारी जल्द आधिकारिक रूप से दी जा सकती है। पुतिन की यात्रा लगभग तय रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है। यह एक साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में वह भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत आए थे। पश्चिम एशिया युद्ध पर साझा रुख बनाने की कोशिश BRICS संगठन की स्थापना 2006 में हुई थी। शुरुआत में इसमें Brazil, Russia, India, China और South Africa शामिल थे। बाद में Egypt, Ethiopia, Iran, United Arab Emirates और Indonesia भी इस समूह में शामिल हुए। BRICS अब दुनिया की लगभग 49 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया युद्ध पर नजर भारत चाहता है कि BRICS देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और Iran संकट पर साझा कूटनीतिक रुख अपनाएं। हालांकि इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विशेष रूप से ईरान और United Arab Emirates के अलग-अलग रुख के कारण साझा बयान तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर पूरी सहमति नहीं बन सकी थी।
रूस के विदेश मंत्री Sergey Lavrov का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। नई दिल्ली में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान प्रेस वार्ता में उन्होंने एक व्यक्ति को मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर सख्त लेकिन मजाकिया अंदाज में चेतावनी दी। हालांकि लावरोव की टिप्पणी गंभीर लहजे में शुरू हुई, लेकिन बाद में उन्होंने ऐसा मजाक किया कि वहां मौजूद लोग हंस पड़े। प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या हुआ? बताया जा रहा है कि घटना प्रेस वार्ता शुरू होने से ठीक पहले की है। वायरल वीडियो में लावरोव अपनी बात रख रहे थे, तभी उनकी नजर एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो मोबाइल फोन पर बात कर रहा था। इस पर उन्होंने पहले अंग्रेजी में कहा, “क्या आप यहां से थोड़ा हट सकते हैं?” इसके बाद उन्होंने दोबारा कहा, “या तो आप हट जाइए या आपका फोन।” ‘मैं मजाक नहीं कर रहा हूं’ जब संबंधित व्यक्ति ने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी, तो लावरोव थोड़े सख्त नजर आए। उन्होंने कहा, “क्या आप यहां से जा सकते हैं? मैं मजाक नहीं कर रहा हूं।” वीडियो में इसके बाद लावरोव इधर-उधर देखते दिखाई देते हैं, मानो सुरक्षा कर्मियों या स्टाफ से बात कर रहे हों। फिर आया ‘गन’ वाला मजाक कुछ ही सेकंड बाद लावरोव ने माहौल हल्का करते हुए कहा, “अगर आपने अपना फोन सरेंडर नहीं किया, तो वे बंदूक निकाल लेंगे।” उनकी यह टिप्पणी सुनते ही वहां मौजूद लोग हंस पड़े। सोशल मीडिया पर अब यही क्लिप तेजी से शेयर की जा रही है। सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने इसे लावरोव का ‘ड्राई ह्यूमर’ बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे प्रेस कार्यक्रम में अनुशासन बनाए रखने की कोशिश माना। हालांकि, जिस व्यक्ति को यह टिप्पणी कही गई, उसकी पहचान अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। BRICS बैठक में शामिल होने भारत आए थे लावरोव सर्गेई लावरोव 14-15 मई को आयोजित BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने भारत आए थे। इस बैठक में Seyed Abbas Araghchi समेत कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ी हुई है। सख्त बयानों के लिए जाने जाते हैं लावरोव रूस-यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर सर्गेई लावरोव अक्सर अपने सख्त और तीखे बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। दिल्ली में उनकी यह हल्की-फुल्की लेकिन सख्त टिप्पणी अब सोशल मीडिया पर चर्चा का नया विषय बन गई है।
ईरान ने दी खुली धमकी, तेल उद्योग को निशाना बनाने की बात अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईरान ने बड़ा और सख्त बयान दिया है। ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड’ (IRGC) के एयरोस्पेस प्रमुख जनरल माजिद मूसावी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका के साथ युद्ध दोबारा शुरू हुआ, तो ईरान पूरे क्षेत्र की ऑयल इंडस्ट्री को तबाह कर सकता है। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई “गंभीर भूल” साबित होगी और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। पड़ोसी देशों को भी चेतावनी, तेल भंडार खतरे में ईरानी अधिकारी ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के अन्य देशों को भी आगाह किया। मूसावी ने कहा कि अगर किसी देश ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी, तो उनके तेल भंडार भी निशाने पर आ सकते हैं। इस बयान से पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जहां पहले से ही हालात नाजुक बने हुए हैं। ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर, कूटनीति को मिला समय ईरान की चेतावनी के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि युद्धविराम तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान की ओर से कोई ठोस और संयुक्त प्रस्ताव नहीं आता। ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध के बाद लिया गया, ताकि दोनों देशों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने का मौका मिल सके। बातचीत अटकी, बढ़ सकता है वैश्विक संकट सीजफायर खत्म होने से ठीक पहले यह फैसला लिया गया, जिससे संकेत मिलता है कि हालात अब भी बेहद संवेदनशील हैं। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में प्रगति नहीं होने और सख्त बयानों के चलते वैश्विक तेल बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
ईरान के जवाब का इंतजार, दौरा फिलहाल स्थगित अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance की पाकिस्तान यात्रा फिलहाल टाल दी गई है। यह दौरा ईरान के साथ न्यूक्लियर डील को लेकर अहम बातचीत के लिए प्रस्तावित था, लेकिन तेहरान की ओर से अमेरिकी प्रस्तावों पर कोई जवाब नहीं मिलने के कारण इसे रोक दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेंस को मंगलवार सुबह इस्लामाबाद के लिए रवाना होना था, जहां बुधवार को वार्ता होनी थी। हालांकि, अब यह यात्रा अनिश्चितकाल के लिए टल गई है। सीजफायर की समयसीमा के बीच बढ़ा दबाव यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्धविराम समाप्त होने के करीब था। इसी बीच Donald Trump ने सीजफायर बढ़ाने का ऐलान कर दिया, ताकि बातचीत के लिए और समय मिल सके। अमेरिका का कहना है कि वह अभी भी कूटनीतिक समाधान चाहता है, लेकिन सैन्य विकल्पों को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी बरकरार है। ईरान ने ठुकराया दबाव, बातचीत पर सवाल ईरान की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त प्रतिक्रिया सामने आई है। वरिष्ठ नेताओं ने साफ कहा है कि “धमकी के साए में बातचीत संभव नहीं है।” ईरानी अधिकारियों ने सीजफायर बढ़ाने के फैसले को एक “रणनीतिक चाल” बताया और इसे समय खरीदने की कोशिश करार दिया। वहीं, सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने इस्लामाबाद में होने वाली संभावित वार्ता में हिस्सा नहीं लिया। आगे क्या? अनिश्चितता के बीच टिकी निगाहें फिलहाल अमेरिका यह संकेत मिलने का इंतजार कर रहा है कि ईरान के वार्ताकार समझौते के लिए पूरी तरह अधिकृत हैं या नहीं। अगर स्थिति स्पष्ट होती है, तो JD Vance की पाकिस्तान यात्रा दोबारा तय की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध के चलते क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ सकता है और कूटनीतिक समाधान की राह और कठिन हो सकती है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर प्रधानमंत्री Narendra Modi की तारीफ करते हुए उन्हें “अच्छा काम करने वाला नेता” बताया है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और सीजफायर की कोशिशों के बीच दोनों नेताओं के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत हुई, जिसे ट्रंप ने “बहुत सकारात्मक” करार दिया। ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनकी पीएम मोदी के साथ बातचीत काफी अच्छी रही। उन्होंने कहा, “वह मेरे अच्छे मित्र हैं और बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।” सीजफायर और मिडिल ईस्ट पर चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, इस बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति, खासकर इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका इस क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति स्थापित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखे हुए है। पाकिस्तान दौरे के दिए संकेत ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर ईरान के साथ सीजफायर समझौता होता है, तो वह पाकिस्तान का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर इस्लामाबाद में डील साइन होती है, तो मैं वहां जा सकता हूं।” उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि वह शांति प्रक्रिया में अच्छा काम कर रहा है और अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है। कूटनीतिक कोशिशें तेज यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका मिडिल ईस्ट में कई स्तर पर कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। इसमें ईरान के साथ बातचीत, इजरायल-लेबनान सीमा पर तनाव कम करना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है। ट्रंप ने यह भी उम्मीद जताई कि हिजबुल्लाह जैसे समूह सीजफायर का पालन करेंगे और क्षेत्र में हिंसा कम होगी।
US-Iran Tension: अमेरिका-ईरान सीजफायर के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की “चालों” में नहीं फंसना चाहिए और कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। “अमेरिका को तय करना होगा रास्ता” अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा: “40 दिनों की लड़ाई के बाद अहम सीजफायर हुआ है, ऐसे में अमेरिका को इसे खत्म नहीं होने देना चाहिए।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका ने इजरायल को कूटनीति बिगाड़ने की छूट दी, तो यह “बेवकूफी” होगी हालांकि ईरान हर स्थिति के लिए तैयार है। नेतन्याहू पर सीधा हमला ईरानी विदेश मंत्री ने नेतन्याहू के क्रिमिनल ट्रायल का जिक्र करते हुए कहा: “अगर क्षेत्र में अशांति होती है, तो उन्हें जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा।” यह बयान इजरायल पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है। लेबनान में जारी हमलों से बढ़ा तनाव सीजफायर के बावजूद: इजरायल ने साफ किया है कि लेबनान में सीजफायर लागू नहीं होता हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी रिपोर्ट्स के मुताबिक: हालिया हमलों में 300+ लोगों की मौत 1,100 से ज्यादा घायल इजरायल ने यह भी दावा किया है कि हमले में हिजबुल्लाह प्रमुख के करीबी अली यूसुफ हर्षी मारे गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी हलचल अराघची ने रूस, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से बातचीत कर: सीजफायर बनाए रखने पर जोर दिया इजरायल के हमलों पर चिंता जताई फ्रांस और स्पेन ने भी इजरायल के हमले रोकने और कूटनीति जारी रखने की बात कही होर्मुज स्ट्रेट पर शर्त ईरान ने संकेत दिया है कि: अगर अमेरिका अपने वादे निभाता है तो दो हफ्ते तक होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही जारी रहेगी
करीब 39 दिनों तक चले तनाव और हमलों के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम पर सहमति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों के अस्थायी सीजफायर का ऐलान किया, जिस पर ईरान ने भी सहमति जताई है। इस फैसले से पूरे मिडिल ईस्ट और वैश्विक स्तर पर राहत की सांस ली जा रही है। होर्मुज खोलने पर बनी सहमति सीजफायर की सबसे अहम शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर रही। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को जहाजों की आवाजाही के लिए खोलने पर सहमति दे दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर मंडरा रहा खतरा फिलहाल टल गया है। ट्रंप का बयान डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी देते हुए कहा: अमेरिका दो हफ्तों के लिए सैन्य कार्रवाई रोक रहा है अधिकांश सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं अब दोनों देश स्थायी शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ेंगे ट्रंप के अनुसार यह फैसला शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद लिया गया। ईरान का रुख ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया: अगर अमेरिका हमले रोकता है, तो ईरान भी पलटवार नहीं करेगा 14 दिनों तक होर्मुज से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही जारी रहेगी आगे की बातचीत साझा प्रस्तावों के आधार पर होगी 14 दिन क्यों अहम? यह संघर्षविराम सिर्फ अस्थायी है, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण: इस दौरान स्थायी शांति समझौते पर बातचीत होगी क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिश होगी वैश्विक बाजार और तेल आपूर्ति स्थिर रह सकती है आगे की राह सीजफायर के बाद अब नजरें आने वाले 14 दिनों पर टिकी हैं। अगर बातचीत सफल रहती है, तो यह समझौता मिडिल ईस्ट में लंबे समय की शांति का रास्ता खोल सकता है।
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के बीच इजरायल द्वारा ईरान के शीर्ष नेता अली लारिजानी को निशाना बनाकर एयरस्ट्राइक किए जाने का दावा सामने आया है। हालांकि इस हमले में लारिजानी की स्थिति- मृत्यु या घायल होने- को लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, और ईरान की ओर से भी चुप्पी बनी हुई है। IDF का बड़ा ऑपरेशन, शीर्ष नेतृत्व निशाने पर रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel Defense Forces ने इस एयरस्ट्राइक में न सिर्फ लारिजानी, बल्कि बासिज बल के एक वरिष्ठ कमांडर को भी निशाना बनाया। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में पहले से ही युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है और दोनों पक्षों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई जारी है। हमले से पहले लारिजानी का तीखा बयान एयरस्ट्राइक से ठीक एक दिन पहले अली लारिजानी ने अमेरिका-इजरायल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने वैश्विक मुस्लिम समुदाय और इस्लामी देशों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि: ईरान को अपेक्षित अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिला अधिकांश मुस्लिम देशों ने केवल बयानबाजी की, ठोस समर्थन नहीं दिया अमेरिका-इजरायल पर गंभीर आरोप अपने पत्र में लारिजानी ने: अमेरिका को “बड़ा शैतान” और इजरायल को “छोटा शैतान” बताया उन्होंने आरोप लगाया कि: ईरान पर हमलों में नागरिकों और सैन्य अधिकारियों की मौत हुई इसके बावजूद ईरान ने “दृढ़ इच्छाशक्ति” के साथ जवाब दिया इस्लामी देशों पर उठाए सवाल लारिजानी ने मुस्लिम देशों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा: क्या वे निष्पक्ष रहेंगे या किसी पक्ष का समर्थन करेंगे? जिन देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, वहां से ईरान पर हमले हो रहे हैं उन्होंने यह भी पूछा कि क्या ईरान चुप बैठा रहे, जबकि उसके खिलाफ हमले जारी हैं। एकता की अपील और क्षेत्रीय संदेश अपने पत्र के अंत में लारिजानी ने इस्लामी देशों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि: अमेरिका भरोसेमंद नहीं है इजरायल क्षेत्र का दुश्मन है यदि मुस्लिम देश एकजुट हों, तो सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित हो सकती है क्या बढ़ेगा टकराव? इस घटनाक्रम ने मध्य-पूर्व में तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीर्ष नेताओं को निशाना बनाए जाने की घटनाएं बढ़ती हैं, तो यह संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है।
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब और गंभीर होता जा रहा है। Iran और Israel के बीच चल रहे संघर्ष का 11वां दिन है, लेकिन हालात शांत होने के बजाय और ज्यादा तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाई के कारण पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई है, जबकि इस युद्ध का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस बीच Iran ने एक बड़ा बयान देते हुए चेतावनी दी है कि अगर तनाव इसी तरह जारी रहा तो हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी जाएगी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि “हॉर्मुज से एक लीटर तेल भी नहीं जाने दिया जाएगा।” तेहरान में धमाके, ईरान का जवाबी हमला रिपोर्टों के मुताबिक ईरान की राजधानी तेहरान में कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं। इसके जवाब में ईरान ने भी इजराइल की ओर मिसाइलें दागने का दावा किया है। यह हमला उस समय हुआ जब हाल ही में देश में नेतृत्व परिवर्तन के बाद Mojtaba Khamenei को नया सुप्रीम लीडर बनाए जाने की खबर सामने आई। वह पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei के बेटे हैं। दूसरी ओर इजराइली सेना ने कहा कि उसने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी हमले किए हैं। इनमें मिसाइल लॉन्च साइट्स और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कमांड सेंटर शामिल बताए गए हैं। लेबनान और कतर तक पहुंचा तनाव संघर्ष का असर अब पड़ोसी देशों तक भी फैलता दिख रहा है। Lebanon की राजधानी क्षेत्र में भी तनाव बढ़ गया है, जहां इजराइल ने बेरूत के दक्षिणी इलाकों पर हवाई हमले किए। इन इलाकों को Hezbollah से जुड़े ठिकानों के रूप में देखा जाता है। वहीं Qatar की राजधानी दोहा में भी धमाकों की खबरें सामने आईं। कतर के अधिकारियों ने बताया कि सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी और तस्वीरें फैलाने के आरोप में 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। मानवाधिकार संगठन Human Rights Watch ने आरोप लगाया है कि दक्षिणी लेबनान के रिहायशी इलाकों में इजराइल द्वारा व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जाता है। वैश्विक बाजारों पर असर इस युद्ध का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ रहा है। तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। वहीं यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज उछाल देखा गया है। तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते एशिया और यूरोप के कई प्रमुख शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई है। खाड़ी देशों में भी बढ़ी सतर्कता इस संघर्ष के बीच Saudi Arabia ने बताया कि उसने शायबह तेल क्षेत्र की ओर बढ़ रहे एक ड्रोन को मार गिराया। वहीं Bahrain ने भी ईरानी हमलों के बाद अपने ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचने की जानकारी दी है। ट्रंप-पुतिन की बातचीत इस बीच युद्ध को लेकर कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। Donald Trump और Vladimir Putin के बीच करीब एक घंटे तक फोन पर बातचीत हुई। रूस की ओर से इस युद्ध को रोकने के लिए कुछ संभावित प्रस्तावों पर चर्चा की गई और साथ ही मिडिल ईस्ट में बढ़ते ऊर्जा संकट को लेकर भी चेतावनी दी गई। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि युद्ध के जल्द खत्म होने के संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में इस संघर्ष का कोई राजनीतिक या कूटनीतिक समाधान निकल पाएगा।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान की स्थिति पर हुई अहम बैठक के दौरान भारत ने पाकिस्तान पर तीखा हमला बोला और अफगानिस्तान पर किए गए हवाई हमलों की कड़ी निंदा की। भारत ने कहा कि रमजान जैसे पवित्र महीने में ऐसे हमले करना और साथ ही इस्लामी एकजुटता की बातें करना गंभीर पाखंड है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि P. Harish ने बैठक में कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और इस्लामी एकजुटता की बात करने वाले देश अगर रमजान के दौरान नागरिकों पर हवाई हमले करते हैं, तो यह दोहरे मानदंड को दर्शाता है। उन्होंने बिना सीधे नाम लिए स्पष्ट संकेत दिया कि भारत की टिप्पणी Pakistan की कार्रवाई की ओर है। नागरिकों की मौत पर जताई कड़ी चिंता भारत ने कहा कि अफगानिस्तान में हालिया हमलों में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों की जान गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 6 मार्च 2026 तक करीब 185 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें लगभग 55 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। भारत ने इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून, United Nations चार्टर और किसी भी देश की संप्रभुता के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन बताया। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान पर गंभीर आरोप अपने संबोधन में P. Harish ने कहा कि आतंकवाद आज भी वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ देश आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल पड़ोसी देशों के खिलाफ रणनीतिक हथियार के रूप में करते हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि आतंकवादी संगठनों जैसे ISIS, Al-Qaeda, Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed के साथ-साथ इनके सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की जरूरत है। भारत ने हाल ही में हुए एक आतंकी हमले का भी जिक्र किया, जिसमें The Resistance Front ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में धार्मिक आधार पर हमला किया था। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। अफगानिस्तान की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की चिंता इस बैठक में अफगानिस्तान की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों ने भी चिंता जताई। अफगानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के उप विशेष प्रतिनिधि Georgette Gagnon ने कहा कि पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव का असर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर गंभीर रूप से पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि सीमा बंद होने के कारण अफगानिस्तान के व्यापार पर भारी असर पड़ा है। फिलहाल ईरान के रास्ते व्यापार जारी है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ते युद्ध और अस्थिरता के कारण वह भी प्रभावित हो रहा है। इससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगी हैं और पहले से कमजोर अफगान अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों के अनुसार, अफगानिस्तान की दो प्रमुख सीमाओं पर बढ़ती अस्थिरता पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच ईरान की नई रणनीति मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने अपनी रणनीति में अहम बदलाव का संकेत दिया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने घोषणा की है कि अब ईरान किसी भी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी देश की जमीन से ईरान पर हमला किया गया, तो तेहरान जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। “ईरान किसी के सामने सरेंडर नहीं करेगा” अपने संबोधन में राष्ट्रपति पेजेशकियान ने साफ कहा कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि देश न तो Israel और न ही United States के सामने आत्मसमर्पण करेगा। उनके मुताबिक, ईरानी जनता और सरकार अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों से जताया खेद राष्ट्रपति पेजेशकियान ने अपने बयान में पड़ोसी देशों को लेकर नरम रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान जिन पड़ोसी देशों को हमलों का सामना करना पड़ा, उसके लिए उन्हें खेद है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ईरान की तरफ से अब ऐसे हमले नहीं किए जाएंगे और क्षेत्रीय शांति बनाए रखने की कोशिश की जाएगी। माफी के साथ रखी अहम शर्त हालांकि इस माफी के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि किसी पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया जाता है, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा और जवाबी कार्रवाई करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ईरान की नई सुरक्षा नीति का संकेत हो सकता है, जिसमें वह सीधे टकराव से बचते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। खामेनेई की मौत से बढ़ा तनाव हाल के सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पूरे मध्य पूर्व में राजनीतिक और सैन्य तनाव और बढ़ गया है। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भीतर सत्ता संतुलन और आगे की रणनीति को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ी चिंता इस संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी चिंता बढ़ गई है। खासतौर पर Strait of Hormuz को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर यहां तनाव और बढ़ता है या मार्ग बंद होता है, तो इसका असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। क्षेत्रीय शांति की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा बयान विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति पेजेशकियान का यह बयान मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि हालात अभी भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और आने वाले दिनों में क्षेत्र की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
रूस पर लगे प्रतिबंधों और ईरान युद्ध के बीच भी भारत के रूस से तेल खरीदने के फैसले को लेकर अमेरिका की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने भारत को एक जिम्मेदार और भरोसेमंद भागीदार बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संतुलित और जिम्मेदार रवैया अपनाया है। अमेरिका का मानना है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति को समझते हुए अपने फैसले लिए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई पश्चिमी देशों ने Russia के तेल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखना बेहद जरूरी है। इसलिए भारत के फैसलों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर चल रहे Iran–Israel Conflict और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे में भारत द्वारा विभिन्न देशों से तेल आयात कर आपूर्ति संतुलित रखना अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने रूस से तेल खरीदते समय वैश्विक नियमों और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखा है, जिसकी वजह से अमेरिका ने भी भारत की नीति की सराहना की है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।