अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance की पाकिस्तान यात्रा फिलहाल टाल दी गई है। यह दौरा ईरान के साथ न्यूक्लियर डील को लेकर अहम बातचीत के लिए प्रस्तावित था, लेकिन तेहरान की ओर से अमेरिकी प्रस्तावों पर कोई जवाब नहीं मिलने के कारण इसे रोक दिया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेंस को मंगलवार सुबह इस्लामाबाद के लिए रवाना होना था, जहां बुधवार को वार्ता होनी थी। हालांकि, अब यह यात्रा अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्धविराम समाप्त होने के करीब था। इसी बीच Donald Trump ने सीजफायर बढ़ाने का ऐलान कर दिया, ताकि बातचीत के लिए और समय मिल सके।
अमेरिका का कहना है कि वह अभी भी कूटनीतिक समाधान चाहता है, लेकिन सैन्य विकल्पों को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी बरकरार है।
ईरान की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त प्रतिक्रिया सामने आई है। वरिष्ठ नेताओं ने साफ कहा है कि “धमकी के साए में बातचीत संभव नहीं है।”
ईरानी अधिकारियों ने सीजफायर बढ़ाने के फैसले को एक “रणनीतिक चाल” बताया और इसे समय खरीदने की कोशिश करार दिया। वहीं, सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने इस्लामाबाद में होने वाली संभावित वार्ता में हिस्सा नहीं लिया।
फिलहाल अमेरिका यह संकेत मिलने का इंतजार कर रहा है कि ईरान के वार्ताकार समझौते के लिए पूरी तरह अधिकृत हैं या नहीं। अगर स्थिति स्पष्ट होती है, तो JD Vance की पाकिस्तान यात्रा दोबारा तय की जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध के चलते क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ सकता है और कूटनीतिक समाधान की राह और कठिन हो सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ईरान ने दी खुली धमकी, तेल उद्योग को निशाना बनाने की बात अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईरान ने बड़ा और सख्त बयान दिया है। ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड’ (IRGC) के एयरोस्पेस प्रमुख जनरल माजिद मूसावी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका के साथ युद्ध दोबारा शुरू हुआ, तो ईरान पूरे क्षेत्र की ऑयल इंडस्ट्री को तबाह कर सकता है। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई “गंभीर भूल” साबित होगी और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। पड़ोसी देशों को भी चेतावनी, तेल भंडार खतरे में ईरानी अधिकारी ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के अन्य देशों को भी आगाह किया। मूसावी ने कहा कि अगर किसी देश ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी, तो उनके तेल भंडार भी निशाने पर आ सकते हैं। इस बयान से पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जहां पहले से ही हालात नाजुक बने हुए हैं। ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर, कूटनीति को मिला समय ईरान की चेतावनी के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि युद्धविराम तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान की ओर से कोई ठोस और संयुक्त प्रस्ताव नहीं आता। ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध के बाद लिया गया, ताकि दोनों देशों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने का मौका मिल सके। बातचीत अटकी, बढ़ सकता है वैश्विक संकट सीजफायर खत्म होने से ठीक पहले यह फैसला लिया गया, जिससे संकेत मिलता है कि हालात अब भी बेहद संवेदनशील हैं। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में प्रगति नहीं होने और सख्त बयानों के चलते वैश्विक तेल बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
ट्रंप की ईरान से सीधी अपील अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान में बंद आठ महिलाओं की रिहाई को लेकर भावुक अपील की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इन महिलाओं की तस्वीरें साझा करते हुए ईरानी नेतृत्व से अनुरोध किया कि उन्हें किसी तरह का नुकसान न पहुंचाया जाए और जल्द रिहा किया जाए। “रिहाई से बातचीत की अच्छी शुरुआत होगी” ट्रंप ने अपने संदेश में कहा कि अगर ईरान इन महिलाओं को रिहा करता है, तो यह दोनों देशों के बीच बातचीत की सकारात्मक शुरुआत साबित हो सकती है। उन्होंने लिखा, “मैं ईरानी नेताओं से आग्रह करता हूं कि इन महिलाओं को नुकसान न पहुंचाएं। उनकी रिहाई हमारे संबंधों के लिए एक अच्छा संकेत होगी।” फांसी की खबरों पर विवाद सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि इन महिलाओं को जल्द ही फांसी दी जा सकती है। हालांकि, Iran के अटॉर्नी जनरल ने इन खबरों को खारिज कर दिया है। अब तक इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, जिससे मामले को लेकर असमंजस बना हुआ है। वायरल जानकारी के अनुसार, ये सभी महिलाएं जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार की गई थीं। इन पर प्रदर्शन में शामिल होने और कथित तौर पर विद्रोह भड़काने जैसे आरोप लगाए गए हैं। सोशल मीडिया पोस्ट से बढ़ा अंतरराष्ट्रीय ध्यान बताया जा रहा है कि यह मुद्दा सबसे पहले एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सामने आया, जिसे बाद में ट्रंप ने रीपोस्ट किया। इस पोस्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले पर चर्चा तेज हो गई है और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया का भी इंतजार किया जा रहा है। मानवाधिकार और कूटनीति का मुद्दा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ मानवाधिकार से जुड़ा नहीं है, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे कूटनीतिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है। अब नजर इस बात पर है कि ईरान इस अपील पर क्या प्रतिक्रिया देता है और आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
ट्रंप ने बढ़ाया ईरान के साथ युद्धविराम अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि यह तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान के नेता एक साझा प्रस्ताव पेश नहीं करते और बातचीत पूरी नहीं हो जाती। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए बताया कि यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। पाकिस्तान की अपील का हवाला ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir की अपील के बाद अमेरिका ने हमले को टालने का निर्णय लिया। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की सरकार फिलहाल आंतरिक रूप से बंटी हुई है, इसलिए बातचीत के लिए समय देना जरूरी है। सैन्य दबाव बरकरार रहेगा सीजफायर बढ़ाने के बावजूद अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाए रखा है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को पूरी तरह तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं और ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी जारी रहेगी। यह कदम एक तरफ तनाव को कम करने का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर सैन्य तैयारियों को भी कायम रखता है। ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने इस नाकेबंदी को “युद्ध जैसी कार्रवाई” बताया है। उन्होंने चेतावनी दी कि व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना और क्रू को रोकना हालात को और बिगाड़ सकता है। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह पाकिस्तान में होने वाली बातचीत में शामिल नहीं होगा। साजिश का आरोप और बढ़ता तनाव ईरान के एक वरिष्ठ सलाहकार ने ट्रंप के फैसले को “समय खरीदने की चाल” बताया है। उनका कहना है कि यह किसी संभावित हमले की तैयारी हो सकती है। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकलेगा। कूटनीतिक हल पर टिकी नजर फिलहाल यह फैसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद अभी भी बरकरार हैं और आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।