वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ गया है। शुक्रवार को अमेरिका ने आरोप लगाया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में एक वाणिज्यिक मालवाहक जहाज पर हमला किया। इसके कुछ ही समय बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। जवाब में ईरान ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी कार्रवाई की। यह घटनाक्रम दोनों देशों के बीच स्विट्जरलैंड में हुए हालिया समझौते के बाद पहली प्रत्यक्ष सैन्य भिड़ंत माना जा रहा है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। कार्गो जहाज पर हमले के बाद अमेरिका की कार्रवाई अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक कमर्शियल कार्गो शिप पर हमला किया। इस घटना के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर ड्रोन और मिसाइल से जुड़े सैन्य ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बयान जारी कर कहा कि कार्रवाई के दौरान चुनिंदा सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। हालांकि, हमलों में हुए नुकसान या हताहतों की विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। IRGC का पलटवार, अमेरिकी ठिकानों पर हमला अमेरिकी हमलों के कुछ ही देर बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जवाबी कार्रवाई करते हुए क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने का दावा किया। ईरान ने कहा कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का "कड़ा और निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया गया और इस हमले में कितना नुकसान हुआ, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ट्रंप ने पहले ही दिए थे जवाबी कार्रवाई के संकेत अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान के खिलाफ संभावित जवाबी कदम के संकेत दिए थे। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिका कार्गो जहाज पर हुए हमले का जवाब देगा, तो ट्रंप ने कहा, "आपको जल्द ही पता चल जाएगा।" इसके कुछ समय बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। क्षेत्र में बढ़ा तनाव अमेरिका और ईरान के बीच ताजा सैन्य कार्रवाई ने पश्चिम एशिया में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में तनाव कम करने के प्रयास किए जा रहे थे, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहता है, तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते का पालन नहीं करता है, तो वाशिंगटन सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ईरान का रवैया ठीक नहीं रहा, तो वह वही करेंगे जो आवश्यक होगा। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान अपने समझौते पर खरा नहीं उतरता या उसका व्यवहार सही नहीं रहता है, तो मुझे जो करना पड़ेगा, मैं वह करूंगा।" उनके इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते के बाद ट्रंप का सख्त संदेश गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ महीने पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में ईरान के हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की स्थिति में पहुंचा दिया था। समझौते के बावजूद ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि वाशिंगटन ईरान के हर कदम पर कड़ी निगरानी रखेगा और किसी भी उल्लंघन पर कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है। अमेरिकी किसानों को मिलेगा फायदा ट्रंप ने कहा कि ईरान की जो धनराशि पहले से रोकी गई थी, उसका इस्तेमाल केवल अमेरिका से खाद्य उत्पाद खरीदने के लिए किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था से अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ट्रंप ने कहा, "वह सारा पैसा भोजन की खरीद के रूप में वापस अमेरिका आ रहा है। ईरान की आबादी 9.1 करोड़ है और वे अपने लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए जो पैसा जारी किया जा रहा है, वह सीधे हमारे किसानों के पास जाएगा।" युद्ध के बाद गहरा मानवीय और आर्थिक संकट ईरान, इजरायल और लेबनान में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में भारी मानवीय संकट पैदा कर दिया है। युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों के कारण हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समझौते के भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते की सफलता काफी हद तक दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की आशंका है।
वॉशिंगटन/तेल अवीव: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि उन्होंने इजरायल से लेबनान में Hezbollah के साथ युद्धविराम बनाए रखने और तनाव कम करने के प्रयासों का समर्थन करने का आग्रह किया है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब युद्धविराम की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही इजरायल और हिजबुल्लाह ने एक-दूसरे पर नए हमले शुरू कर दिए। एनबीसी न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने बताया कि वह पूरे दिन इजरायली नेतृत्व के संपर्क में रहे और उन्होंने क्षेत्र में शांति स्थापित करने के प्रयासों को समर्थन देने की अपील की। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनकी सीधे तौर पर इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से बातचीत हुई या नहीं। 'यह सोने पर सुहागा जैसा कदम' इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम को ट्रंप ने सकारात्मक विकास करार देते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में शांति बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा, "यह सोने पर सुहागा जैसा है।" ट्रंप का इशारा हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए उस समझौता ज्ञापन की ओर था, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय संघर्ष को कम करना और ईरान के साथ तकनीकी एवं कूटनीतिक वार्ता के लिए नए रास्ते खोलना है। नेतन्याहू के साथ संबंधों पर बोले ट्रंप इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ अपने संबंधों पर ट्रंप ने कहा, "बीबी के साथ मेरे संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं। बस आपको कभी-कभी शांत होकर अपने दिमाग का इस्तेमाल करना होता है।" ट्रंप के इस बयान को इजरायल से संयम बरतने और सैन्य कार्रवाई को सीमित रखने की अप्रत्यक्ष सलाह के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका, कतर और ईरान की मध्यस्थता से लागू हुआ युद्धविराम सूत्रों के मुताबिक, इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच नया युद्धविराम शुक्रवार सुबह लागू हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, यह समझौता अमेरिका और Qatar की मध्यस्थता से संभव हुआ, जबकि एक अन्य राजनयिक सूत्र ने बताया कि ईरान ने भी पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों पक्षों के बीच स्थानीय समयानुसार सुबह 9 बजे से युद्धविराम प्रभावी करने पर सहमति बनी। इजरायली सेना ने जारी रखी चेतावनी Israel Defense Forces (आईडीएफ) ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी संभावित खतरे या युद्धविराम उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगी। आईडीएफ के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल एफी डेफ्रिन ने कहा, "हम किसी भी तत्काल खतरे का जवाब देना और अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जारी रखेंगे।" इस बयान से संकेत मिलता है कि युद्धविराम के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। स्विट्जरलैंड में शांति वार्ता फिर टली ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance भविष्य में स्विट्जरलैंड में ईरान के साथ प्रस्तावित शांति वार्ता में हिस्सा ले सकते हैं। शुक्रवार को प्रस्तावित बैठक स्थगित कर दी गई। ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जेडी वेंस भविष्य में इस प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे, जबकि विशेष दूत स्टीव विटकॉफ अलग से वार्ता प्रयासों में जुटे हैं। स्विस विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अमेरिका, ईरान, कतर और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित बैठक फिलहाल स्थगित कर दी गई है, लेकिन वार्ता के लिए तैयारियां जारी हैं। अमेरिका-ईरान 14-सूत्रीय समझौते में क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं, जिनमें: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकना 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करना अमेरिका द्वारा नौसैनिक नाकेबंदी और कुछ प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाना ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों के सुरक्षित आवागमन की सुविधा देना ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तकनीकी वार्ता शुरू करना ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करना ईरानी तेल निर्यात के लिए अमेरिकी छूट प्रदान करना ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास कार्यक्रम का खाका तैयार करना पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में बड़ा कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल-हिजबुल्लाह युद्धविराम और अमेरिका-ईरान समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। जमीनी स्तर पर जारी सैन्य गतिविधियां और आपसी अविश्वास इस शांति प्रक्रिया के सामने अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
वॉशिंगटन/बेरूत: पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित उच्चस्तरीय वार्ता फिलहाल टल गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया है। इस बीच इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई है। ताजा घटनाक्रम ने अमेरिका-ईरान शांति पहल और पश्चिम एशिया में युद्धविराम की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्साय समझौते के बाद भी नहीं रुके इजरायली हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में बुधवार को फ्रांस के वर्साय महल में अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक 14-सूत्रीय समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को रोकना और सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई समाप्त करना था। समझौते के कुछ ही घंटों बाद इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में 16 लोगों के मारे जाने की खबर है। नेतन्याहू ने पीछे हटने से किया इनकार इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगी। नेतन्याहू के इस रुख ने युद्धविराम और क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्विट्जरलैंड में होने वाली तकनीकी वार्ता टली अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को स्थायी शांति समझौते में बदलने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी स्तर की वार्ता प्रस्तावित थी। इस बैठक का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को करना था, लेकिन उन्होंने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया, जिसके बाद यह वार्ता अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई। व्हाइट हाउस ने बताई 'लॉजिस्टिक्स' समस्या व्हाइट हाउस ने जेडी वेंस का दौरा रद्द होने के पीछे व्यवस्थागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी कारणों का हवाला दिया है। हिजबुल्लाह समर्थक मीडिया संस्थान अल-मायादीन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने लेबनान पर इजरायल के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में अपने प्रतिनिधिमंडल को स्विट्जरलैंड भेजने से इनकार कर दिया है। इजरायल को जेडी वेंस की दोटूक चेतावनी शांति समझौते के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि इस समय दुनिया में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। वेंस के बयान को इजरायल के आक्रामक सैन्य रुख पर अमेरिकी असंतोष और युद्ध रोकने के बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है। अधर में लटका 60 दिनों का युद्धविराम बुधवार को हुए समझौते के तहत कम-से-कम 60 दिनों के लिए संघर्षविराम बढ़ाने पर सहमति बनी थी। लेकिन लेबनान में जारी इजरायली हमलों और स्विट्जरलैंड वार्ता के टलने से पूरा शांति समझौता संकट में पड़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकी, तो पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की यह बड़ी कूटनीतिक पहल पूरी तरह विफल हो सकती है। पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा अनिश्चितता का माहौल अमेरिका-ईरान समझौते के बावजूद लेबनान में जारी संघर्ष और इजरायल के सख्त रुख ने क्षेत्र में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कोई नया कूटनीतिक रास्ता निकलेगा या पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ेगा।
US Iran War Cost: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है। हालांकि इस युद्ध की कीमत दोनों देशों को भारी चुकानी पड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू होकर 16 जून तक चले इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने केवल सैन्य अभियानों पर ही लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को जोड़ने पर कुल नुकसान 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हुए 11.3 अरब डॉलर अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। इसके बाद प्रतिदिन औसतन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब ₹94,475 करोड़) का खर्च दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सैन्य अभियानों का अनुमानित खर्च है। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। मिसाइल और सैन्य तैनाती पर भारी खर्च युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों पर लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए। पैट्रियट मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर बताई जाती है। खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी अरबों डॉलर खर्च हुए। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की थी। अमेरिका पर कुल आर्थिक बोझ 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान अर्थशास्त्रियों और कई अमेरिकी नेताओं का मानना है कि युद्ध का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण: तेल की कीमतों में उछाल आया। ऊर्जा लागत बढ़ी। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा। कुछ अनुमानों के मुताबिक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। ईरान के पुनर्निर्माण पर भी भारी खर्च युद्ध में ईरान के कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियां और पावर ग्रिड प्रभावित हुए। इनके पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण प्रक्रिया में सहयोग करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस फंडिंग में खाड़ी देशों की भी भूमिका रहेगी। आम लोगों पर भी पड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ा। अनुमान है कि केवल ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक हो सकता है। प्रमुख आंकड़े एक नजर में युद्ध की अवधि: 108 दिन सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर शुरुआती 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर प्रतिदिन औसत खर्च: लगभग 1 अरब डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत: 300 अरब डॉलर कुल संभावित आर्थिक प्रभाव: 1 ट्रिलियन डॉलर तक
सिवान, एजेंसियां। बिहार में सिपाही भर्ती परीक्षा के दौरान फर्जीवाड़े का बड़ा मामला सामने आया है। सिवान जिले में केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही भर्ती) द्वारा आयोजित परीक्षा के दौरान दो फर्जी अभ्यर्थियों को गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपी दूसरे अभ्यर्थियों के स्थान पर परीक्षा देने पहुंचे थे। पुलिस ने उनके पास से फर्जी दस्तावेज, एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र और अन्य संदिग्ध कागजात बरामद किए हैं। दो परीक्षा केंद्रों से हुई गिरफ्तारी यह कार्रवाई 17 जून को प्रथम और द्वितीय पाली की परीक्षा के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर परीक्षा केंद्र और दाउद मेमोरियल उर्दू गर्ल्स हाई स्कूल परीक्षा केंद्र पर की गई। परीक्षा केंद्रों पर तैनात दंडाधिकारी और पुलिस टीम ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर दोनों अभ्यर्थियों को पकड़ लिया। पूछताछ में उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान बताई और परीक्षा में फर्जी तरीके से शामिल होने की बात स्वीकार की। पहले भी दे चुके थे परीक्षा गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पटना जिले के पीरपुरा थाना क्षेत्र निवासी सियाराम कुमार और जहानाबाद जिले के मखदूमपुर थाना क्षेत्र निवासी गौतम कुमार के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि दोनों आरोपी 14 जून को मोतिहारी और गोपालगंज में आयोजित इसी भर्ती परीक्षा में भी शामिल हो चुके थे। इससे पुलिस को संगठित परीक्षा गिरोह की आशंका है। नेटवर्क की जांच में जुटी पुलिस तलाशी के दौरान दोनों के पास से एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र मिले, जिनमें जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज थी। सभी संदिग्ध दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं। सिवान पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब इस फर्जीवाड़े से जुड़े पूरे नेटवर्क की तलाश में जुटी है। सिवान के एसपी पुरन कुमार झा ने कहा कि परीक्षा की शुचिता बनाए रखना पुलिस की प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि परीक्षा में किसी भी तरह की अनियमितता या संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस नियंत्रण कक्ष के हेल्पलाइन नंबर 9031683607 या निकटतम थाने को दें।
अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से जारी तनाव के बाद आखिरकार शांति समझौते पर मुहर लग गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने युद्ध समाप्त करने, क्षेत्रीय तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए एक डिजिटल मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी उत्साहित नजर आए। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या डील साइन हो गई है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "It's Signed!" डिजिटल हस्ताक्षर से लागू हुआ समझौता अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के अनुसार, बुधवार (17 जून) को राष्ट्रपति ट्रंप और मसूद पेजेशकियन ने डिजिटल माध्यम से समझौते पर हस्ताक्षर किए। इससे पहले रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकर कालिबाफ भी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर चुके थे। हस्ताक्षर के तुरंत बाद यह समझौता प्रभावी हो गया, जिसके कारण इस सप्ताह स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित औपचारिक हस्ताक्षर समारोह को रद्द कर दिया गया। होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोलने पर बनी सहमति समझौते के तहत ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य करने पर सहमत हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है और दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने और तेल की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। ईरान को मिलेगी प्रतिबंधों में राहत समझौते के तहत ईरान पर लगाए गए कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने और उसके तेल निर्यात को फिर से शुरू करने का रास्ता भी खुल सकता है। माना जा रहा है कि इससे ईरानी अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूती मिलेगी। वर्साय पैलेस में हार्ड कॉपी पर भी किए हस्ताक्षर अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार रात फ्रांस के वर्साय पैलेस में आयोजित एक डिनर कार्यक्रम के दौरान समझौते की हार्ड कॉपी पर भी आधिकारिक हस्ताक्षर किए। उस समय फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी मौजूद थे। व्हाइट हाउस ने इस साइनिंग का वीडियो भी जारी किया है, जिसमें ट्रंप डिनर टेबल पर दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते नजर आ रहे हैं। कई महीनों की तनातनी और सैन्य तनाव के बाद हुआ यह समझौता अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में शांति और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता की नई उम्मीद भी जगी है।
एवियन/वॉशिंगटन: फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि तेहरान के साथ प्रस्तावित समझौता अभी अंतिम रूप में नहीं पहुंचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) है और यदि उन्हें इसकी शर्तें पसंद नहीं आईं या ईरान ने अपेक्षित व्यवहार नहीं किया, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। ट्रंप ने कहा, "यह कोई अंतिम समझौता नहीं है। अगर मुझे यह पसंद नहीं आया या ईरान ने सही तरीके से व्यवहार नहीं किया, तो हम फिर से उन पर कार्रवाई करेंगे।" उन्होंने ईरान पर पिछले 47 वर्षों से क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। व्हाइट हाउस ने समझौते को बताया रणनीतिक सफलता व्हाइट हाउस की ओर से रिपब्लिकन सांसदों और ट्रंप समर्थकों को भेजे गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि प्रस्तावित समझौते से अमेरिका अपने प्रमुख रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में सफल रहा है। दस्तावेज के अनुसार, समझौते के प्रमुख बिंदु हैं— • ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। • होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही सामान्य बनी रहेगी। • पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। समझौते की गोपनीयता पर उठ रहे सवाल अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का पूरा विवरण अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके चलते अमेरिकी राजनीतिक हलकों में कई सवाल उठ रहे हैं। कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी माना है कि शर्तों को गोपनीय रखने से भ्रम और अटकलें बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समझौते का पूरा दस्तावेज सामने नहीं आता, तब तक यह स्पष्ट नहीं हो सकेगा कि दोनों देशों ने किन शर्तों पर सहमति बनाई है और उनकी वास्तविक प्रतिबद्धताएं क्या हैं। दुनिया की नजरें अमेरिका-ईरान वार्ता पर अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक तेल बाजार और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से यह भी संकेत मिला है कि कूटनीतिक बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प अभी भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते से पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान अब किसी भी समय दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), में समुद्री यातायात को बाधित करने की क्षमता रखता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की यह क्षमता केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति के लिए भी बड़ा जोखिम बन सकती है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में कुछ खुफिया सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि होर्मुज पर ईरान का प्रभाव अमेरिका के लिए परमाणु हथियारों से भी बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरा है। दुनिया के 20 फीसदी तेल व्यापार का प्रमुख मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी समुद्री रास्ते से होता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा का असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में मिसाइलें, ड्रोन, मिसाइल लॉन्चर और तेज गति वाली नौकाएं मौजूद हैं, जिनकी मदद से वह इस समुद्री क्षेत्र में दबाव बनाने की क्षमता रखता है। अमेरिका-ईरान समझौते पर टिकी नजरें अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिया है कि समझौते के प्रमुख बिंदुओं में ईरान का परमाणु हथियार नहीं रखने का वादा और होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखना शामिल है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह आने वाले दिनों में समझौते का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर सकते हैं। अभी तक इस समझौते के आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। विशेषज्ञों की चिंता बरकरार भले ही अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता आगे बढ़ रही हो, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों और सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की रणनीतिक पकड़ भविष्य में भी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अनिश्चितता का बड़ा कारण बनी रह सकती है।
तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर इजराइल में बढ़ती राजनीतिक नाराजगी के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दो टूक कहा है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे कोई समझौता हो या न हो, इजराइल अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। नेतन्याहू ने कहा, "ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे, न आज और न कल। हमने अपने देश पर मंडरा रहे विनाश के तत्काल खतरे को टाल दिया है और इजराइल को पूर्ण विनाश से बचाया है।" विपक्ष और सहयोगियों के निशाने पर नेतन्याहू प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के सहयोगियों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। इजराइल में कई राजनीतिक दलों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते से क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का हमला इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार Naftali Bennett ने नेतन्याहू सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल राजनीतिक विभाजन, 7 अक्टूबर के नरसंहार और अब ईरान मुद्दे पर ऐतिहासिक विफलता से चिह्नित रहा है। बेनेट ने दावा किया कि यदि वह सत्ता में होते तो कूटनीतिक और सुरक्षा मामलों में अलग रणनीति अपनाते। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध केवल इजराइल के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाते। ट्रंप से मतभेद की अटकलों पर दिया जवाब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ मतभेद की चर्चाओं पर नेतन्याहू ने कहा कि कुछ मुद्दों पर दोनों नेताओं के विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन इजराइल के सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे अवसर आते हैं जब राष्ट्रपति ट्रंप और मेरे विचार पूरी तरह समान नहीं होते, लेकिन इजराइल की सुरक्षा की समझदारी से रक्षा की जानी चाहिए।" लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखेगा इजराइल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने की संभावना को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इजराइल ने गाजा, लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र स्थापित किए हैं और जरूरत पड़ने तक वहां अपनी उपस्थिति बनाए रखेगा। नेतन्याहू ने कहा, "हमने इजराइल के चारों ओर गहरे सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने सीरिया में असद की सेना के हथियारों को नष्ट किया है। अपने देश की सुरक्षा के लिए हम इन क्षेत्रों में तब तक बने रहेंगे, जब तक इसकी आवश्यकता होगी।" समझौते को लेकर जारी है सियासी बहस विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणी लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अमेरिका-ईरान समझौते के कार्यान्वयन में बाधा बन सकते हैं। ऐसे में इजराइल के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा या नए सुरक्षा संकट पैदा करेगा।
नई दिल्ली/तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही इजरायल ने इसका विरोध शुरू कर दिया। इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने समझौते पर गंभीर आपत्तियां जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि इजरायल अपनी सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ कोई भी समझौता इजरायल पर बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने कहा, "इजरायल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है। हमारी पहली जिम्मेदारी इजरायल के नागरिकों, इजरायली रक्षा बलों (आईडीएफ) और यहूदी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।" 'इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं' बेन-गवीर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में सुरक्षा समझौते किए, तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने ओस्लो समझौते, 2006 के लेबनान युद्धविराम और गाजा संघर्ष विराम के उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे समझौतों का परिणाम अक्सर नई हिंसा के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा, "हम अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप का सम्मान करते हैं, लेकिन इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं है। देश के सुरक्षा संबंधी फैसले केवल इजरायल के हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।" हिज्बुल्लाह के खिलाफ सख्त रुख बेन-गवीर ने मांग की कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के सैन्य ढांचे को पूरी तरह समाप्त किया जाए और जिन क्षेत्रों को इजरायली सेना ने आतंकवादी गतिविधियों से मुक्त कराया है, वहां से सेना को पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लेबनान से इजरायल की ओर कोई ड्रोन या मिसाइल दागी जाती है तो उसका जवाब दाहिया समेत अन्य ठिकानों पर कड़ी सैन्य कार्रवाई के रूप में दिया जाएगा। विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी उठाए सवाल इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी समझौते पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता जो लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित करता हो। गैंट्ज ने कहा, "ईरान के साथ उभरता यह समझौता एक रणनीतिक विफलता साबित हो सकता है। इसके कारण आने वाले वर्षों में इजरायल को कूटनीतिक, सैन्य और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।" ट्रंप ने किया था समझौते का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने की घोषणा करते हुए कहा था, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता पूरा हो चुका है। सभी को बधाई।" ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों के लिए तत्काल प्रभाव से खोला जाएगा और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जाएगी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। 19 जून को हो सकते हैं औपचारिक हस्ताक्षर रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर हो सकते हैं। समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बहाल करने, क्षेत्रीय तनाव कम करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा तय किया जाएगा। क्या ट्रंप के लिए बढ़ेगी मुश्किल? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इजरायल की खुली नाराजगी ने नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यदि इजरायल समझौते के कुछ प्रावधानों को मानने से इनकार करता है, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना आसान नहीं होगा और अमेरिकी प्रशासन को अपने दो प्रमुख सहयोगियों के बीच संतुलन बनाने की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते (Peace Deal) की खबरों के बीच ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। राजधानी तेहरान, मशहद और अन्य शहरों में लोगों ने सड़कों पर उतरकर विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रस्तावित समझौते के जरिए ईरान के राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों से समझौता किया जा रहा है। यह विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द ही शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। ईरान ने अभी तक किसी तय समयसीमा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। मशहद में सबसे ज्यादा विरोध उत्तर-पूर्वी ईरान के शहर मशहद में विदेश मंत्रालय के एक कार्यालय के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में प्रदर्शनकारी लाल और काले झंडे लहराते और सरकार विरोधी नारे लगाते दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, "अराघची मुर्दाबाद", "समझौता करने वालों को शर्म आनी चाहिए" और "देश के साथ समझौता करने वाले इस्तीफा दो"। यह प्रदर्शन उस इंटरव्यू के बाद हुआ, जिसमें विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संभावित समझौते को लेकर बातचीत की पुष्टि की थी। तेहरान समेत कई शहरों में प्रदर्शन रिपोर्ट्स के अनुसार, राजधानी तेहरान और अन्य शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने सीधे तौर पर विदेश मंत्री को अमेरिका के साथ बातचीत के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान "समझौतावादी मुर्दाबाद" और "समझौता करने वाले इस्तीफा दो" जैसे नारे भी सुनाई दिए। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी चिंता विरोध कर रहे लोगों का मानना है कि प्रस्तावित डील से ईरान की रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) पर ईरान की पकड़ ढीली पड़ने की आशंका को लेकर लोगों में नाराजगी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि अमेरिका के साथ समझौता हासिल करने के लिए ईरानी वार्ताकार जरूरत से ज्यादा रियायतें देने को तैयार हैं, जिससे देश के दीर्घकालिक हित प्रभावित हो सकते हैं। अराघची ने क्या कहा था? शुक्रवार को सरकारी टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि संभावित समझौता अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का रास्ता खोल सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य का संचालन पहले जैसा नहीं रहेगा। अराघची ने यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट ईरान की रणनीतिक निरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसके हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी। ट्रंप और शहबाज शरीफ ने दिए समझौते के संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि ईरान के साथ एक प्रारूप समझौते पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कहा कि दोनों पक्ष एक शांति ढांचे पर सहमत हो चुके हैं और समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। ईरान ने इन दावों पर सावधानी बरतते हुए कहा है कि अभी किसी तत्काल हस्ताक्षर की पुष्टि नहीं की जा सकती। ईरान ने कहा- अभी नहीं होगा समझौता ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा कि समझौते पर तत्काल हस्ताक्षर नहीं होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा, "यह कल नहीं होगा।" उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में यदि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है तो समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। समझौते में क्या हो सकता है शामिल? रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित शांति समझौते का मुख्य उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलना और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाना है। इसके अलावा अगले 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अलग चरण में बातचीत की योजना बनाई जा सकती है। मसौदे में ईरान की जमी हुई अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी करने और ईरानी तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत देने जैसे प्रस्ताव भी शामिल बताए जा रहे हैं। इन बिंदुओं पर अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है।
वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”
बेरूत: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इजराइल की सेना (IDF) ने रविवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्ला से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि यह कार्रवाई उत्तरी इजराइल पर हिज्बुल्ला के हालिया हमलों के जवाब में की गई है। इजराइली सेना के मुताबिक, हमलों का निशाना हिज्बुल्ला से संबंधित सैन्य ढांचे और रणनीतिक ठिकाने थे। इससे पहले भी इजराइल ने एक सप्ताह पूर्व बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर हमला किया था, जिसके बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हिज्बुल्ला के मिसाइल हमलों के बाद बढ़ा तनाव हिज्बुल्ला ने दो मार्च को उत्तरी इजराइल पर कई मिसाइलें दागी थीं। यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के दो दिन बाद हुआ था। हिज्बुल्ला ने इन हमलों को क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ जवाबी कदम बताया था। इजराइल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है और सीमा पार से होने वाले हमलों का कड़ा जवाब दिया जाएगा। ईरान ने रखी नई शर्त हिज्बुल्ला के प्रमुख समर्थक ईरान ने कहा है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते में लेबनान में इजराइली सैन्य अभियानों को रोकना भी शामिल होना चाहिए। तेहरान का कहना है कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल होगा। अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर पाकिस्तान का दावा इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में युद्ध समाप्त करने के लिए एक अंतिम मसौदा समझौते की शर्तों पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिशों में भूमिका निभाई है और दोनों देशों के साथ आगे की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई थी। इस संघर्ष के कारण फारस की खाड़ी से तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। सात अप्रैल से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन इजराइल-हिज्बुल्ला तनाव के चलते क्षेत्र में हालात अब भी नाजुक बने हुए हैं।
युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति, समझौते का मसौदा तैयार अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने शांति समझौते के एक ड्राफ्ट (मसौदा) के शब्दों पर सहमति बना ली है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और मध्यस्थ देश इसे अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति है और समझौता पहले से कहीं ज्यादा करीब दिखाई दे रहा है। ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री ने भी दिए सकारात्मक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच समझौता जल्द हो सकता है। वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी समझौते के इतने करीब दोनों देश पहले कभी नहीं पहुंचे थे। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मसौदा अभी आंतरिक समीक्षा के दौर से गुजर रहा है और अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। क्या जल्द होगा समझौते पर हस्ताक्षर? ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हस्ताक्षर किसी आमने-सामने बैठक के बजाय ऑनलाइन या दूरस्थ माध्यम से भी किए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को फिलहाल इस समझौते से अलग रखा गया है और उन पर बाद में अलग चरण में बातचीत की जाएगी। किन मुद्दों पर अब भी बनी हुई है असहमति? हालांकि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिले और विदेशों में जमा उसकी संपत्तियां मुक्त की जाएं। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि किसी भी राहत से पहले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ कदम उठाने होंगे। यही कारण है कि अंतिम समझौते से पहले कुछ शर्तों पर और बातचीत हो सकती है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता? इस संभावित समझौते का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते में Strait of Hormuz को फिर से पूरी तरह खोलने की दिशा में कदम शामिल हो सकते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ जाएगी। इजरायल अभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel इस वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। इजरायली नेतृत्व पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। अगले कुछ दिन होंगे बेहद अहम कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के भीतर सभी स्तरों पर मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले कुछ दिनों में आधिकारिक समझौते की घोषणा हो सकती है। इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने, वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा बहाल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
तेहरान/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने अपने नागरिकों के लिए उच्च स्तरीय सुरक्षा चेतावनी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद भारतीयों को जल्द से जल्द देश छोड़ने की सलाह दी है, जबकि अन्य नागरिकों से फिलहाल ईरान की यात्रा पूरी तरह टालने की अपील की गई है। दूतावास की यह एडवाइजरी ऐसे समय में जारी हुई है जब इजरायल और ईरान के बीच पिछले 24 घंटों में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ती नजर आ रही है। भारतीय दूतावास ने जारी की नई चेतावनी भारतीय दूतावास ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि क्षेत्र में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए भारतीय नागरिकों को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत है। दूतावास ने कहा, “हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे ईरान की यात्रा से बचें। जो भारतीय वर्तमान में ईरान में मौजूद हैं, वे उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग कर जल्द से जल्द देश से बाहर निकलने की व्यवस्था करें।” दूतावास ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक स्थानीय प्रशासन की सलाह का पालन करें और सुरक्षा संबंधी अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखें। 24 घंटे में तेजी से बदले हालात पश्चिम एशिया में तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की खबरें सामने आईं। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ की गई कार्रवाई ने पहले से नाजुक स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया घटनाक्रमों ने क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंकाओं को फिर से बढ़ा दिया है। बेरूत हमलों के बाद बढ़ा संकट तनाव की शुरुआत रविवार को हुई, जब इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हवाई हमले किए। इसके बाद ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई और दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तथा सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने एक ईरानी पेट्रोकेमिकल परिसर को निशाना बनाया, जबकि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इजरायली सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा किया है। लाल सागर में भी बढ़ी चिंता क्षेत्रीय तनाव का असर समुद्री मार्गों पर भी दिखाई देने लगा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात पर पड़ सकता है। लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्गों में शामिल है। ट्रंप की कूटनीतिक कोशिशों को झटका बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौते के जरिए क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। हालिया हमलों ने इन प्रयासों को कठिन बना दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। नेतन्याहू से ट्रंप की फोन पर बातचीत अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी मिसाइल हमलों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत की। बताया जा रहा है कि ट्रंप ने नेतन्याहू से आगे सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का आग्रह किया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि दोनों पक्ष किसी संभावित समझौते के करीब पहुंच सकते हैं, बशर्ते तनाव को और न बढ़ाया जाए। ‘अब बातचीत की मेज पर लौटने का समय’ एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि समझौते की संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि हाल के घटनाक्रमों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला है और क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रहने चाहिए। भारतीयों के लिए क्या है सलाह? भारत सरकार और भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद नागरिकों से अपील की है कि वे स्थिति को हल्के में न लें और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करें। दूतावास ने भारतीयों से कहा है कि वे अपनी यात्रा योजनाओं की समीक्षा करें, स्थानीय परिस्थितियों पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर जल्द से जल्द सुरक्षित स्थानों की ओर रवाना हों। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभाव को देखते हुए दुनिया भर की सरकारें हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम यह तय करेंगे कि क्षेत्र शांति की ओर बढ़ता है या एक नए बड़े संघर्ष की ओर।
वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी कूटनीतिक और रणनीतिक टकराव को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि अगले दो सप्ताह अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे और इसी अवधि में ईरान के खिलाफ “पूर्ण विजय” हासिल होने की संभावना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच एक नए परमाणु समझौते की राह खुल सकती है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ा सैन्य तनाव फिलहाल कम होता दिखाई दे रहा है और क्षेत्र में युद्ध की आशंकाओं के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। चुनावी कार्यक्रम में किया बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने यह टिप्पणी एक वर्चुअल राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान की, जहां उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित किया। कार्यक्रम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन में आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ईरान अमेरिकी मांगों पर गंभीरता से विचार कर रहा है और समझौते की संभावना पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। ट्रंप ने कहा, “हम बातचीत कर रहे हैं और वे एक अच्छा समझौता करना चाहते हैं। वे हमें लगभग हर वह चीज देने को तैयार हैं जिसकी हमें जरूरत है। वे परमाणु हथियार नहीं रखने पर भी तैयार हैं।” ‘दो सप्ताह में दिखेगी असली जीत’ राष्ट्रपति ट्रंप ने अगले पखवाड़े को निर्णायक बताते हुए कहा कि अमेरिका जल्द ही अपनी रणनीतिक सफलता की घोषणा कर सकता है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हम यह संघर्ष जीत रहे हैं, लेकिन असली जीत अगले दो सप्ताह में दिखाई देगी। हम पूर्ण विजय की घोषणा करेंगे। यह पूरी जीत होगी और बहुत जल्द होगी।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि यदि समझौता सफल रहा तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है। ईरान-इजरायल तनाव के बीच आया बयान ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सप्ताहांत में ईरान और इजरायल के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों ने पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाएं बढ़ा दी थीं। तनाव बढ़ने के बाद इजरायल ने ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि ईरान ने भी जवाबी हमले किए। बाद में दोनों पक्षों की ओर से सैन्य गतिविधियों में कमी देखने को मिली। नेतन्याहू ने हमले रोकने की पुष्टि की इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पुष्टि की है कि इजरायली सेना ने फिलहाल ईरानी ठिकानों पर अपने सैन्य अभियान रोक दिए हैं। उन्होंने किसी औपचारिक युद्धविराम की घोषणा नहीं की, लेकिन सैन्य कार्रवाई में आई नरमी को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दूसरी ओर, ईरान ने भी संकेत दिया है कि वह फिलहाल अपने सैन्य अभियान को आगे नहीं बढ़ाएगा। तेहरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके हितों को नुकसान पहुंचाने वाली कोई नई कार्रवाई होती है तो जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं। परमाणु समझौते पर फिर बढ़ीं उम्मीदें ट्रंप के बयान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई दौर की वार्ताएं भी विफल रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष किसी नए समझौते पर सहमत होते हैं तो इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। पहले भी दे चुके हैं ऐसी समयसीमा यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने किसी कूटनीतिक सफलता के लिए दो सप्ताह की समयसीमा तय की हो। इससे पहले भी उन्होंने क्षेत्रीय संघर्षों और युद्धविराम प्रयासों को लेकर इसी तरह की समय-सीमा का उल्लेख किया था। अब एक बार फिर ट्रंप ने अगले दो सप्ताह को निर्णायक बताते हुए संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इन दावों पर अंतिम तस्वीर आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगी। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते घटनाक्रमों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। क्षेत्र में शांति बहाल करने के प्रयासों और संभावित परमाणु समझौते की दिशा में होने वाली प्रगति आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।
वॉशिंगटन: इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और बढ़ाया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका फिलहाल क्षेत्र में युद्ध नहीं, बल्कि कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत में कहा कि मध्य पूर्व को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेलने वाले कदमों से बचना जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष और गहराता है, तो तेहरान के साथ चल रही बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर सकती है। बातचीत के रास्ते को बचाना चाहता है अमेरिका व्हाइट हाउस के सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा तनाव कहीं व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में न बदल जाए। अमेरिका इस समय ईरान के साथ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिशों में लगा हुआ है और वह नहीं चाहता कि सैन्य टकराव इन प्रयासों को विफल कर दे। ट्रंप का मानना है कि किसी भी नए बड़े संघर्ष की स्थिति में अमेरिका को भी सीधे या परोक्ष रूप से इसमें शामिल होना पड़ सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और जटिल हो जाएगी। बेरूत हमले के बाद बढ़ा तनाव तनाव उस समय और बढ़ गया जब रविवार को इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्लाह से जुड़े ठिकानों पर हमला किया। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर कई मिसाइलें दागीं। इन घटनाओं ने पूरे मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी। क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच जवाबी हमलों का सिलसिला जारी रहा, तो स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकती है। ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद इजराइल ने की सीमित कार्रवाई रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की ओर से संयम बरतने की सलाह दिए जाने के बावजूद नेतन्याहू ने अमेरिकी प्रशासन को स्पष्ट कर दिया था कि इजराइल अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा और आवश्यक होने पर सीमित सैन्य कार्रवाई करेगा। इसके बाद इजराइल ने ईरान से जुड़े कुछ ठिकानों को निशाना बनाया। जवाब में ईरान ने भी मिसाइल हमलों का नया दौर शुरू कर दिया। यह टकराव पूर्ण युद्ध में नहीं बदला, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिका ने सीधे हिस्सा नहीं लिया, लेकिन इजराइल की मदद की अमेरिका इस सैन्य कार्रवाई में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुआ, लेकिन क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य संसाधनों ने इजराइल की रक्षा में सहयोग किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने इजराइल की ओर बढ़ रही कई ईरानी मिसाइलों को रोकने में मदद की। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि अमेरिका अपने सहयोगी इजराइल की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन वह संघर्ष के विस्तार से बचना चाहता है। फोन कॉल में फिर हुई बातचीत तनाव बढ़ने के बाद ट्रंप ने एक बार फिर नेतन्याहू से फोन पर संपर्क किया। इस बातचीत में उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से बड़े पैमाने पर जवाबी हमले की योजना को रोकने का आग्रह किया। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने साफ कहा कि मौजूदा हालात में किसी भी आक्रामक कदम से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक रणनीति को नुकसान पहुंच सकता है। तनाव कम करने पर बनी सहमति रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद एक सीमित सहमति बनी। नेतन्याहू ने संकेत दिया कि यदि ईरान की ओर से कोई नया हमला नहीं किया जाता है, तो इजराइल भी आगे सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा। इस समझ के बाद क्षेत्र में तत्काल तनाव को कम करने की कोशिश की गई है। हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों के अगले कदमों पर करीबी नजर बनाए हुए है। मध्य पूर्व की राजनीति पर दूरगामी असर संभव विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की कोशिश है कि सैन्य टकराव को सीमित रखा जाए और संवाद के रास्ते खुले रहें। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों पक्ष संयम बरतते हैं या क्षेत्र एक नए संकट की ओर बढ़ता है।
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए जाने के बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई करते हुए तेहरान समेत कई ईरानी शहरों में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर अंतिम निर्णय वही लेते हैं और कूटनीतिक समाधान की कोशिशें अभी भी जारी हैं। ईरानी मिसाइल हमले के बाद बदला घटनाक्रम रविवार रात ईरान ने इजरायल पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। अप्रैल में हुए युद्धविराम के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली प्रत्यक्ष सैन्य भिड़ंत मानी जा रही है। तेहरान ने कहा कि यह कार्रवाई लेबनान की राजधानी Beirut पर इजरायली हमलों के जवाब में की गई है। ईरान का आरोप है कि लेबनान में इजरायल के सैन्य अभियान ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाया है। उत्तरी इजरायल में गूंजे सायरन ईरान ने दावा किया कि उसने उत्तरी इजरायल की ओर 10 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले की चेतावनी मिलते ही कई इलाकों में एयर रेड सायरन बजने लगे और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए गए। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के अनुसार, हमले का प्रमुख लक्ष्य रामत डेविड एयर बेस था। दूसरी ओर इजरायली सेना ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने अधिकांश मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर दिया। तेहरान, इस्फहान और तबरीज में धमाकों की आवाजें ईरान के हमले के कुछ घंटों बाद तेहरान के कई हिस्सों में जोरदार विस्फोट सुनाई दिए। Tehran के मेहराबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास भी धमाकों की सूचना मिली। इसके अलावा Isfahan और Tabriz में भी विस्फोट दर्ज किए गए। रिपोर्टों के मुताबिक, खुजेस्तान प्रांत के बंदर-ए-महशहर स्थित करुण पेट्रोकेमिकल कंपनी को भी निशाना बनाया गया। इजरायली वायु सेना ने कहा कि उसके वरिष्ठ सैन्य अधिकारी लगातार स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं और ईरान में चल रहे सैन्य अभियानों की निगरानी कर रहे हैं। लेबनान बना विवाद का केंद्र मौजूदा संघर्ष का सबसे बड़ा कारण लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां हैं। ईरान लगातार कहता रहा है कि लेबनान पर इजरायली हमले बंद होना किसी भी व्यापक शांति समझौते की पूर्व शर्त है। मार्च से इजरायल, Hezbollah के खिलाफ अभियान चला रहा है। इजरायल का आरोप है कि संगठन ने उसकी सीमा पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए थे, जबकि ईरान का कहना है कि लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रहने तक स्थायी शांति संभव नहीं है। ट्रंप बोले- अंतिम फैसले मैं लेता हूं तनावपूर्ण हालात के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान के साथ वार्ता पूरी तरह विफल नहीं हुई है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मौजूदा घटनाक्रम से समझौते की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा और क्षेत्रीय मामलों में अंतिम निर्णय वही लेते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से फोन पर बातचीत भी की थी और उन्हें आगे सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह दी थी। ईरान की कड़ी चेतावनी ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि अमेरिकी सैन्य ठिकाने और इजरायली हित अब वैध लक्ष्य हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्रीय समझौतों का उल्लंघन होने के कारण हालात बिगड़े हैं। अप्रैल में युद्धविराम लागू होने के बाद से रविवार तक ईरान ने सीधे तौर पर इजरायल पर हमला नहीं किया था, लेकिन अब उसने प्रत्यक्ष जवाबी कार्रवाई की है। तेल बाजार में बढ़ी चिंता ईरान-इजरायल तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दिया। सोमवार की शुरुआती ट्रेडिंग में कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई और ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, खासकर Strait of Hormuz को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव और वार्ता को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव का अंत चाहे कूटनीतिक समझौते से हो या सैन्य ताकत के जरिए, नतीजा अमेरिका के पक्ष में ही रहेगा। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच जारी बातचीत का उद्देश्य कई महीनों से चल रहे संकट को समाप्त करना है। खामेनेई से मुलाकात के संकेत ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei से संभावित मुलाकात को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने कहा, "अगर समझौता होता है और मुलाकात का अवसर मिलता है तो मुझे उनसे मिलकर खुशी होगी। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।" ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी मुलाकात किसी संभावित समझौते की स्थिति में ही संभव हो सकती है। एनरिच्ड यूरेनियम पर अमेरिका की नजर अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का उल्लेख करते हुए दावा किया कि अमेरिका उस पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका चाहे तो उस सामग्री पर नियंत्रण हासिल कर सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। ट्रंप के अनुसार यूरेनियम सुरक्षित स्थान पर है और उसकी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही है। समझौते के लिए अमेरिका की दो प्रमुख शर्तें ट्रंप ने संभावित समझौते की दो मुख्य शर्तें भी सामने रखीं। ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। Strait of Hormuz को पूरी तरह से खोला जाए। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग माना जाता है और दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। तेहरान का जवाब- मसौदे में कई बातें अब भी अस्पष्ट ईरान की ओर से बातचीत को लेकर सतर्क रुख अपनाया गया है। खामेनेई के सलाहकार Mohsen Rezaee ने कहा कि प्रस्तावित समझौते में कई महत्वपूर्ण बिंदु अब भी स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका अपनी शर्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान की चिंताओं और मांगों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। ईरान की प्रमुख मांगें क्या हैं? तेहरान ने स्थायी शांति समझौते के लिए कई शर्तें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं: अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना। तेल और गैस निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना। विदेशों में जमी ईरानी संपत्तियों को जारी करना। भविष्य में सैन्य हमलों के खिलाफ सुरक्षा गारंटी देना। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तंत्र बनाना। क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम करना। ईरान का कहना है कि परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर चर्चा तभी होगी जब युद्ध और नाकाबंदी से जुड़े मुद्दों का समाधान हो जाएगा। संघर्षविराम के बावजूद पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हालात दोनों देशों के बीच 8 अप्रैल से संघर्षविराम लागू है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। मध्य पूर्व के कई हिस्सों में अस्थिरता बनी हुई है और समय-समय पर सैन्य गतिविधियों की खबरें सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वार्ता प्रक्रिया में प्रगति हुई है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद अभी भी गहरे हैं। कूटनीति और दबाव की दोहरी रणनीति ट्रंप के हालिया बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका एक ओर वार्ता और समझौते की संभावना खुली रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी जारी रखे हुए है। ऐसे में आने वाले हफ्तों में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाली बातचीत इस बात का फैसला कर सकती है कि संकट का समाधान कूटनीतिक रास्ते से निकलता है या तनाव एक बार फिर बढ़ता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने दावा किया है कि ईरान के खिलाफ चलाया गया अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अब समाप्त हो चुका है। क्षेत्र में हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का सिलसिला अभी भी जारी है। अमेरिकी कांग्रेस में बोले रूबियो- अब ईरान के भीतर नहीं हो रहे लगातार हमले हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के समक्ष रूबियो ने कहा कि अमेरिका अब ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए लगातार हमले नहीं कर रहा है, क्योंकि अभियान अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल कर चुका है। वॉशिंगटन का दावा- मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक क्षमता को पहुंचाया बड़ा नुकसान रूबियो के अनुसार अमेरिका ने ईरान के रक्षा औद्योगिक ढांचे, मिसाइल लॉन्चरों, ड्रोन भंडार और पारंपरिक नौसेना को गंभीर क्षति पहुंचाई है। उन्होंने कहा कि यही इस अभियान की सफलता का पैमाना था। होर्मुज संकट बरकरार, ईरान ने सहयोगी देशों पर बढ़ाया दबाव अमेरिका के दावों के बीच ईरान ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। साथ ही Strait of Hormuz को लेकर तनाव भी बना हुआ है। कुवैत और बहरीन पर हमलों से बढ़ी चिंता, अमेरिकी ठिकाने भी निशाने पर बुधवार को ईरानी हमलों में कुवैत के एक हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति की मौत हुई, जबकि कई लोग घायल हुए। बहरीन में भी ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं, जहां अमेरिकी सैन्य उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। कांग्रेस में घिरे रूबियो, डेमोक्रेट सांसदों ने उठाए सवाल डेमोक्रेट सांसदों ने रूबियो के ‘युद्ध समाप्त’ होने के दावे पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब क्षेत्र में हमले जारी हैं और अमेरिकी सैनिक खतरे में हैं, तब संघर्ष समाप्त होने का दावा वास्तविकता से मेल नहीं खाता। सांसद सारा जैकब्स का पलटवार- नाम बदलने से हालात नहीं बदलते Sara Jacobs ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभियान का नाम बदलने या उसे समाप्त घोषित करने से यह तथ्य नहीं बदलता कि क्षेत्र में तनाव जारी है और अमेरिकी सैनिक अभी भी जोखिम में हैं। वॉशिंगटन-तेहरान वार्ता में यूरेनियम भंडार बना सबसे बड़ा मुद्दा रूबियो ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत में ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार सबसे महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। वॉशिंगटन चाहता है कि इस मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस समझौता हो। शांति समझौते पर अब भी नहीं बनी सहमति अमेरिकी विदेश मंत्री के अनुसार तेहरान ने अभी तक किसी अंतिम शांति समझौते को मंजूरी नहीं दी है। दोनों पक्षों के बीच दस्तावेजों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन अंतिम स्वीकृति अभी नहीं मिली है। युद्ध खत्म या विराम? पश्चिम एशिया में बनी हुई है अनिश्चितता रूबियो भले ही ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को समाप्त घोषित कर रहे हों, लेकिन मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और परमाणु वार्ता पर गतिरोध यह संकेत देते हैं कि अमेरिका-ईरान टकराव का अध्याय अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।