लिवर को नुकसान केवल अल्कोहल से नहीं होता। जरूरत से ज्यादा पेनकिलर, प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी, बिना सलाह के सप्लीमेंट्स और वायरल संक्रमण भी लिवर की सेहत पर गंभीर असर डाल सकते हैं। Liver Health Tips: जब भी लिवर को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों की बात होती है, तो सबसे पहले शराब का नाम आता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की कुछ सामान्य आदतें और खाद्य पदार्थ भी धीरे-धीरे लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई लोग अनजाने में ऐसी चीजों का नियमित सेवन करते हैं, जिससे समय के साथ फैटी लिवर, लिवर इंफ्लेमेशन और अन्य गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। 1. जरूरत से ज्यादा पेनकिलर का सेवन हल्के दर्द में बार-बार दर्द निवारक दवाएं लेना लिवर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। दवाओं का सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करें। 2. ज्यादा चीनी और फ्रुक्टोज वाले फूड्स कोल्ड ड्रिंक, पैकेट वाले जूस, मिठाइयां और प्रोसेस्ड स्नैक्स में मौजूद अतिरिक्त शुगर लिवर में फैट जमा होने का कारण बन सकती है, जिससे नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) का जोखिम बढ़ सकता है। 3. प्रोसेस्ड और जंक फूड बर्गर, पिज्जा, चिप्स और डीप-फ्राइड फूड्स में ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट अधिक होता है। इनका नियमित सेवन लिवर में सूजन और फैट बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। 4. बिना सलाह के सप्लीमेंट्स लेना फिटनेस, बॉडीबिल्डिंग या वजन घटाने के नाम पर कई लोग बिना विशेषज्ञ की सलाह के सप्लीमेंट्स या स्टेरॉयड लेने लगते हैं। कुछ उत्पादों में मौजूद तत्व लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। 5. हेपेटाइटिस जैसी वायरल बीमारियों को नजरअंदाज करना हेपेटाइटिस B और C जैसे संक्रमण समय पर इलाज न मिलने पर लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे बचाव के लिए वैक्सीनेशन, सुरक्षित स्वास्थ्य आदतें और समय पर जांच जरूरी है। लिवर को स्वस्थ रखने के आसान उपाय संतुलित और पौष्टिक आहार लें। जंक फूड और शुगर का सेवन सीमित रखें। नियमित व्यायाम करें और स्वस्थ वजन बनाए रखें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं या सप्लीमेंट्स न लें। नियमित हेल्थ चेकअप कराएं। ध्यान दें: यह जानकारी केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। यदि आपको लगातार थकान, पीलिया, पेट में सूजन या अन्य लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 13 जुलाई को देश के सभी सरकारी बैंकों (पीएसबी) और आईडीबीआई बैंक के प्रमुखों के साथ एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक करेंगी। बैठक का मुख्य उद्देश्य विदेशी मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाना, बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा जमा (एफसीएनआर-बी) जुटाने की प्रगति की समीक्षा करना और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल में घोषित रियायती उपायों के प्रभाव का आकलन करना है। सरकार का लक्ष्य प्रवासी भारतीयों और विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिए अधिक आकर्षित करना है। तीन प्रमुख मुद्दों पर रहेगा फोकस बैठक में विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (FCNR-B) खातों में जमा राशि बढ़ाने, सरकारी बैंकों द्वारा विदेशों से पूंजी जुटाने के लिए जारी किए जाने वाले विदेशी बॉन्ड तथा भारतीय कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB) की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। इन तीनों माध्यमों से देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। आरबीआई की रियायतों की होगी समीक्षा पिछले महीने आरबीआई ने 30 सितंबर तक के लिए कई राहत उपाय लागू किए थे। इनमें 3 से 5 वर्ष की अवधि वाले नए एफसीएनआर (बी) जमा पर ब्याज दर की अधिकतम सीमा को अस्थायी रूप से हटाना शामिल है, जिससे बैंक विदेशी जमाकर्ताओं को अधिक आकर्षक ब्याज दर की पेशकश कर सकते हैं। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा विनिमय जोखिम कम करने के लिए बैंकों और सरकारी कंपनियों को रियायती दर पर फॉरेक्स स्वैप सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। विदेशी निवेश में तेजी की उम्मीद बैंकिंग क्षेत्र के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, नई रियायतों के बाद 3 जुलाई तक एफसीएनआर (बी) जमा के माध्यम से करीब 3 से 4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष रूप से खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की भागीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ सकता है। अनुमान है कि इन उपायों से भविष्य में 40 से 50 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकता है, जिससे भारतीय रुपये को मजबूती मिलने के साथ-साथ देश की विदेशी मुद्रा स्थिति भी और सुदृढ़ होगी।
रोजाना कॉफी पीने वालों में गंभीर लिवर रोगों का खतरा कम पाया गया अगर आप रोजाना कॉफी पीते हैं, तो यह आदत सिर्फ आपको तरोताजा ही नहीं रखती, बल्कि आपके लिवर की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकती है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में दावा किया गया है कि नियमित रूप से कॉफी का सेवन करने वाले लोगों में लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का जोखिम कम देखा गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों के आधार पर हर किसी को अचानक ज्यादा कॉफी पीना शुरू नहीं कर देना चाहिए। करीब साढ़े तीन लाख लोगों पर किया गया अध्ययन यह शोध मेडिकल जर्नल Clinical Gastroenterology and Hepatology में प्रकाशित हुआ है। इसमें ब्रिटेन के यूके बायोबैंक (UK Biobank) के लगभग 3.55 लाख वयस्कों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का 10 वर्षों से अधिक समय तक विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की कॉफी पीने की आदत, लिवर की स्कैन रिपोर्ट, रक्त जांच और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके बाद कॉफी के सेवन और लिवर स्वास्थ्य के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आए। 5 या उससे अधिक कप कॉफी पीने वालों को मिला सबसे ज्यादा लाभ अध्ययन के अनुसार, जो लोग प्रतिदिन 5 या उससे अधिक कप कॉफी पीते थे, उनमें लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा उल्लेखनीय रूप से कम पाया गया। शोध में सामने आए प्रमुख निष्कर्ष: लिवर सिरोसिस का खतरा 32% तक कम लिवर कैंसर का जोखिम 47% तक घटा लिवर संबंधी कारणों से मृत्यु का खतरा 42% कम हालांकि, रोजाना 1 से 2 कप कॉफी पीने वालों में भी कुछ हद तक सकारात्मक प्रभाव देखा गया। कैफीन नहीं, कॉफी के प्राकृतिक तत्व भी हैं असरदार शोध की एक दिलचस्प बात यह रही कि कैफीनयुक्त (Regular) और डिकैफ (Decaffeinated) दोनों तरह की कॉफी पीने वालों में लगभग समान लाभ देखने को मिले। इससे वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, पॉलीफेनॉल और अन्य प्राकृतिक यौगिक भी लिवर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कैसे पहुंचाती है कॉफी लिवर को फायदा? विशेषज्ञों के अनुसार कॉफी में मौजूद प्राकृतिक तत्व शरीर में सूजन कम करने, कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाने और लिवर में अतिरिक्त वसा जमा होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि लंबे समय में लिवर को होने वाले नुकसान का जोखिम कम हो सकता है। ज्यादा चीनी मिलाने से घट सकते हैं फायदे शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कॉफी में अधिक मात्रा में चीनी, आर्टिफिशियल स्वीटनर या अत्यधिक प्रोसेस्ड क्रीमर मिलाने से लिवर को मिलने वाले कुछ फायदे कम हो सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि कॉफी पीनी हो तो कम या बिना चीनी वाली कॉफी बेहतर विकल्प हो सकती है। क्या अब सभी लोगों को 5 कप कॉफी पीनी चाहिए? इस अध्ययन के बावजूद वैज्ञानिकों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है। यह शोध केवल कॉफी और बेहतर लिवर स्वास्थ्य के बीच संबंध दिखाता है, लेकिन यह साबित नहीं करता कि कॉफी सीधे लिवर रोगों को रोकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान, शराब का सेवन, वजन, खानपान और जीवनशैली जैसे कई अन्य कारक भी लिवर की सेहत को प्रभावित करते हैं। अधिक कॉफी पीने के हो सकते हैं नुकसान हर व्यक्ति का शरीर कैफीन को अलग-अलग तरीके से सहन करता है। जरूरत से ज्यादा कॉफी पीने पर कुछ लोगों में ये समस्याएं हो सकती हैं— बेचैनी और घबराहट नींद में बाधा दिल की धड़कन तेज होना पेट संबंधी परेशानियां गर्भवती महिलाओं और कुछ विशेष स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही कैफीन का सेवन करना चाहिए। क्या कहता है यह अध्ययन? यह शोध संकेत देता है कि नियमित और संतुलित मात्रा में कॉफी पीना लिवर की सेहत के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि, केवल कॉफी के भरोसे स्वस्थ रहने की बजाय संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी उतना ही जरूरी है।
नई दिल्ली: बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना भारत में एक आम आदत बन चुकी है, लेकिन यही लापरवाही कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सेल्फ-मेडिकेशन से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि कुछ दवाओं के गलत कॉम्बिनेशन या अधिक मात्रा का सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसा ही एक कॉम्बिनेशन है पैरासिटामोल और निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट, जिस पर भारत सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ है। यह दवा पहले बुखार और शरीर दर्द में इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन इसके संभावित दुष्प्रभावों को देखते हुए सरकार ने इसके निर्माण, बिक्री और उपयोग पर रोक लगा दी। क्या है पैरासिटामोल-निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट? डिस्पर्सिबल टैबलेट वह दवा होती है जिसे सेवन से पहले पानी में घोलकर लिया जाता है, ताकि उसका असर जल्दी शुरू हो सके। लेकिन शोधों में पाया गया कि पैरासिटामोल और निमेसुलाइड का यह संयोजन डिस्पर्सिबल रूप में स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 26A के तहत इस कॉम्बिनेशन पर प्रतिबंध लगाया है। बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं खरीद सकते पहले यह दवा आसानी से मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध थी, लेकिन अब इसे डॉक्टर की सलाह के बिना लेना सुरक्षित नहीं माना जाता। दवा खरीदते समय उसके ब्रांड नाम के साथ लिखे जेनेरिक साल्ट्स को पढ़ना जरूरी है, ताकि आपको पता चल सके कि उसमें कौन-कौन सी दवाएं शामिल हैं। 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित सरकार ने 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में निमेसुलाइड के किसी भी फॉर्मुलेशन के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में इस दवा के दुष्प्रभाव अधिक तेजी से और गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं। 100 मिलीग्राम से अधिक डोज की अनुमति नहीं निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से तीव्र दर्द में किया जाता है। सरकार ने दवा निर्माता कंपनियों को निर्देश दिया है कि किसी भी ओरल दवा में इसकी मात्रा 100 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। लिवर के लिए बन सकती है खतरा विभिन्न शोधों में निमेसुलाइड के संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका गलत या लंबे समय तक इस्तेमाल लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है और कुछ मामलों में एक्यूट हेपेटाइटिस जैसी गंभीर स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसी वजह से कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दवा के अनियंत्रित उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते रहे हैं। दवा लेने से पहले रखें ये बातें ध्यान में बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा न लें। दवा के पैकेट पर लिखे साल्ट्स जरूर पढ़ें। बच्चों को किसी भी दवा का सेवन कराने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें। निर्धारित डोज से अधिक दवा लेने से बचें। किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
दिग्गज फिल्म निर्माता और पूर्व सेंसर बोर्ड प्रमुख Pahlaj Nihalani के निधन के बाद लिवर सिरोसिस एक बार फिर चर्चा में है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि यह बीमारी केवल अत्यधिक शराब पीने से होती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार लिवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण कई मामलों में हेपेटाइटिस C वायरस (HCV) संक्रमण भी होता है। क्या है लिवर सिरोसिस? लिवर सिरोसिस एक गंभीर बीमारी है, जिसमें लिवर की स्वस्थ कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होकर उनकी जगह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त ऊतक (Scar Tissue) ले लेते हैं। इससे लिवर की कार्यक्षमता कम होने लगती है और समय के साथ लिवर फेलियर, आंतरिक रक्तस्राव और लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शराब कैसे पहुंचाती है नुकसान? विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक अत्यधिक शराब का सेवन लिवर को तीन चरणों में नुकसान पहुंचाता है: सबसे पहले लिवर में फैट जमा होने लगता है (फैटी लिवर)। इसके बाद सूजन और कोशिकाओं की क्षति बढ़ती है। अंत में लिवर का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर सिरोसिस में बदल जाता है। इसी वजह से शराब को लिवर सिरोसिस का प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। हेपेटाइटिस C क्यों है ज्यादा खतरनाक? हेपेटाइटिस C एक ब्लड-बोर्न वायरस है, जो संक्रमित रक्त के संपर्क से फैलता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में अधिकांश मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोग वर्षों तक इस संक्रमण के साथ रहते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनका लिवर लगातार क्षतिग्रस्त हो रहा है। अगर समय पर इलाज न हो, तो यह संक्रमण लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर तक का कारण बन सकता है। टूथब्रश से कैसे फैल सकता है संक्रमण? हेपेटाइटिस C संक्रमित व्यक्ति के खून के जरिए फैलता है। यदि किसी संक्रमित व्यक्ति के मसूड़ों से खून टूथब्रश पर लग जाए और वही टूथब्रश किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल किया जाए, जिसके मुंह में कट, छाला या मसूड़ों से खून निकल रहा हो, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। इसी कारण डॉक्टर निम्नलिखित चीजें किसी के साथ साझा न करने की सलाह देते हैं: टूथब्रश रेजर नेल कटर टैटू या पियर्सिंग उपकरण इस्तेमाल की हुई सुई किन बातों का रखें ध्यान? कभी भी अपना टूथब्रश या रेजर किसी के साथ शेयर न करें। टैटू या पियर्सिंग हमेशा प्रमाणित और स्टेरिलाइज्ड उपकरणों से ही करवाएं। रक्त चढ़ाने या मेडिकल प्रक्रियाओं के दौरान सुरक्षा मानकों की पुष्टि करें। लिवर से जुड़ी समस्याओं के लक्षण दिखने पर तुरंत जांच कराएं। हेपेटाइटिस संक्रमण की आशंका होने पर समय रहते टेस्ट करवाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस C का आज प्रभावी इलाज उपलब्ध है। समय पर पहचान और उपचार से लिवर को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।
अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease से पीड़ित लोग अगर महीने में कम से कम एक बार भी ‘बिंज ड्रिंकिंग’ करते हैं, तो उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है। क्या है यह स्टडी? यह अध्ययन National Health and Nutrition Examination Survey (NHANES) के 2017–2023 के डेटा पर आधारित है। इसमें 8,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें विभिन्न प्रकार की लीवर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ‘बिंज ड्रिंकिंग’ को इस तरह परिभाषित किया: महिलाओं के लिए: एक दिन में 4 या उससे ज्यादा ड्रिंक पुरुषों के लिए: एक दिन में 5 या उससे ज्यादा ड्रिंक और यह आदत महीने में कम से कम एक बार चौंकाने वाले नतीजे स्टडी में पाया गया कि: MASLD के मरीज जो बिंज ड्रिंकिंग करते हैं, उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा करीब 3 गुना ज्यादा होता है। ऐसे मरीजों में गंभीर फाइब्रोसिस का खतरा 1.69 गुना और एडवांस्ड फाइब्रोसिस का खतरा 2.76 गुना अधिक पाया गया। जितनी ज्यादा मात्रा में एक बार में शराब पी जाती है, लीवर को उतना ही ज्यादा नुकसान होता है। किन लोगों में ज्यादा खतरा? रिसर्च के अनुसार: युवाओं और पुरुषों में बिंज ड्रिंकिंग की आदत ज्यादा देखी गई MASLD के लगभग 15.9% मरीज इस तरह की पीने की आदत रखते हैं लीवर फाइब्रोसिस कैसे मापा गया? शोधकर्ताओं ने लीवर की कठोरता (liver stiffness) के आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की: 8 kPa या उससे ज्यादा: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस 12 kPa या उससे ज्यादा: एडवांस्ड फाइब्रोसिस रिसर्च से क्या संकेत मिले? अभी तक लीवर बीमारी की श्रेणियों में केवल औसत शराब सेवन को ध्यान में रखा जाता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि ‘कभी-कभार ज्यादा पीना’ भी उतना ही खतरनाक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बिंज ड्रिंकिंग को ध्यान में रखकर मरीजों को दोबारा वर्गीकृत किया जाए, तो MetALD (MASLD + Alcohol) के मामलों की संख्या अमेरिका में दोगुनी से भी ज्यादा हो सकती है। क्या है इसका मतलब? यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि: “कभी-कभी ज्यादा पीना” भी सुरक्षित नहीं है लीवर रोग के मरीजों को शराब से पूरी तरह बचना चाहिए डॉक्टरों को मरीजों की पीने की आदतों का और गहराई से आकलन करना चाहिए
हमारी आंखें सिर्फ देखने का माध्यम ही नहीं हैं, बल्कि कई बार शरीर में होने वाली बीमारियों के संकेत भी देती हैं। खासकर Liver Cancer और अन्य लिवर से जुड़ी बीमारियों के कुछ लक्षण आंखों में भी दिखाई दे सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो गंभीर बीमारी से बचाव संभव हो सकता है। शरीर में लिवर की अहम भूमिका लिवर हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन में मदद करने और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने का काम करता है। लेकिन लंबे समय तक शराब का सेवन, Hepatitis B या Hepatitis C संक्रमण, मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और फैटी लिवर जैसी समस्याएं लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यदि लिवर लंबे समय तक खराब रहता है तो यह स्थिति Cirrhosis में बदल सकती है, जो आगे चलकर लिवर फेलियर या लिवर कैंसर का कारण बन सकती है। आंखों में दिखने वाले लिवर की बीमारी के लक्षण 1. आंखों का पीला पड़ना (पीलिया) लिवर की गंभीर बीमारी का सबसे आम लक्षण आंखों का पीला पड़ना है, जिसे Jaundice कहा जाता है। यह तब होता है जब शरीर में बिलीरुबिन नामक पदार्थ बढ़ जाता है और लिवर उसे बाहर नहीं निकाल पाता। 2. आंखों में सूखापन लिवर की समस्या के कारण शरीर में विटामिन A की कमी हो सकती है, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या होने लगती है। 3. रात में देखने में परेशानी विटामिन A की कमी के कारण कई लोगों को रात में साफ दिखाई देने में दिक्कत होने लगती है। 4. पलकों के आसपास पीले दाग या गांठ कुछ मामलों में पलकों के आसपास पीले रंग की छोटी गांठें दिखाई देती हैं, जिन्हें Xanthelasma कहा जाता है। यह शरीर में फैट और लिवर से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है। कब बढ़ जाता है खतरा? एक्सपर्ट्स के अनुसार जब लिवर में ट्यूमर बढ़ने लगता है, तो वह बाइल डक्ट पर दबाव डाल सकता है। इससे शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ जाता है, जिसके कारण आंखें और त्वचा पीली पड़ सकती हैं। इसके साथ ही गहरा पेशाब, खुजली, थकान और भूख कम लगना जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। समय पर जांच है जरूरी डॉक्टरों का कहना है कि अगर आंखों में इस तरह के लक्षण लंबे समय तक दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। शुरुआती चरण में बीमारी का पता चलने पर इलाज और लाइफस्टाइल में बदलाव से लिवर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।