कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उनकी गाड़ी के बाहर सुरक्षाकर्मियों के लटककर सफर करने के कथित मामले में कोलकाता पुलिस उनके जवाब से संतुष्ट नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस अब उन्हें एक नया नोटिस जारी करने की तैयारी कर रही है, जिसमें मांगे गए दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख किया जाएगा। पुलिस ने मांगे थे जरूरी दस्तावेज कालीघाट थाने की ओर से पहले जारी नोटिस में अभिषेक बनर्जी से मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के कथित उल्लंघन से संबंधित आवश्यक दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया था। उन्हें शनिवार तक जवाब देने की समय-सीमा दी गई थी। हालांकि निर्धारित समय बीतने के बाद अभिषेक बनर्जी ने अपने प्रतिनिधि के माध्यम से कालीघाट थाने में कुछ दस्तावेज जमा कराए। जवाब को पुलिस ने बताया अधूरा पुलिस सूत्रों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी की ओर से जमा कराए गए दस्तावेजों में वह सभी जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिनकी मांग की गई थी। इसी वजह से जांच अधिकारी उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। सूत्रों का कहना है कि अब नया नोटिस जारी कर स्पष्ट रूप से उन दस्तावेजों और सूचनाओं का उल्लेख किया जाएगा, जो अब तक पुलिस को उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। क्या है पूरा मामला? यह मामला बागुईहाटी निवासी राजीव सरकार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी की गाड़ी पर दो सुरक्षाकर्मी खतरनाक तरीके से बाहर लटककर यात्रा कर रहे थे, जो मोटर वाहन अधिनियम का उल्लंघन है। शिकायत में मोटर वाहन अधिनियम की धारा 123 का हवाला दिया गया है, जिसमें चलती गाड़ी से लटककर यात्रा करने पर रोक है। साथ ही धारा 184का भी उल्लेख किया गया है, जो खतरनाक तरीके से वाहन चलाने या यात्रा करने को दंडनीय अपराध मानती है। पुलिस ने मांगी थीं ये जानकारियां जांच के दौरान पुलिस ने अभिषेक बनर्जी से कई महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं, जिनमें शामिल हैं— वाहन खरीदने की तारीख। वाहन चालक (ड्राइवर) का नाम, पता और पहचान। गाड़ी के बाहर लटककर यात्रा करने वाले सुरक्षाकर्मियों की पहचान। घटना से जुड़े अन्य आवश्यक दस्तावेज। पुलिस का दावा है कि इन जानकारियों में से कई अब भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। जांच जारी कोलकाता पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और सभी तथ्यों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। यदि आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो पुलिस आगे भी कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती है। गौरतलब है कि यह मामला अभी जांच के चरण में है और पुलिस की ओर से किसी भी प्रकार की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। वहीं, अभिषेक बनर्जी की ओर से भी इस मामले पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एलिवेटेड रोड पर उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब चलती कार के अंदर अचानक एक जहरीला कोबरा सांप दिखाई दिया। घटना बुधवार सुबह की बताई जा रही है। कार चला रही महिला ने घबराने के बजाय बेहद सूझबूझ का परिचय देते हुए वाहन को सुरक्षित सड़क किनारे रोका और तुरंत ट्रैफिक पुलिस को सूचना दी। समय रहते कार्रवाई होने से बड़ा हादसा टल गया। कार के अंदर दिखा कोबरा, तुरंत रोकी गाड़ी जानकारी के मुताबिक महिला नोएडा की ओर जा रही थीं। इसी दौरान उन्हें कार के अंदर एक जहरीला कोबरा दिखाई दिया। सांप को देखते ही उन्होंने घबराने के बजाय संयम बनाए रखा और सुरक्षित स्थान पर कार रोककर बाहर निकल गईं। इसके बाद ट्रैफिक पुलिस को सूचना दी गई। ट्रैफिक पुलिस और रेस्क्यू टीम ने संभाला मोर्चा सूचना मिलते ही ट्रैफिक पुलिस मौके पर पहुंची और आसपास का ट्रैफिक नियंत्रित किया। बाद में रेस्क्यू टीम ने सावधानीपूर्वक कार के भीतर मौजूद कोबरा को सुरक्षित बाहर निकाला। पूरी कार्रवाई के दौरान किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पुलिसकर्मी और रेस्क्यू टीम कार से कोबरा को निकालते हुए दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया यूजर्स महिला की हिम्मत और ट्रैफिक पुलिस की त्वरित कार्रवाई की सराहना कर रहे हैं। यूपी पुलिस से जुड़े अकाउंट ने भी किया शेयर UP POLICE NEWS @UPPOLICE_NEWS5 नाम के एक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट से भी घटना का वीडियो साझा किया गया है। पोस्ट में दावा किया गया कि गाजियाबाद के एलिवेटेड रोड पर चलती कार में कोबरा निकलने के बाद ट्रैफिक पुलिस ने मौके पर पहुंचकर सुरक्षित रेस्क्यू किया और संभावित दुर्घटना को टाल दिया। सावधानी और सूझबूझ से टला बड़ा खतरा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वाहन चलाते समय कार में सांप दिखाई दे तो घबराने के बजाय सुरक्षित स्थान पर गाड़ी रोकें, वाहन से बाहर निकलें और तुरंत पुलिस या वन विभाग की रेस्क्यू टीम को सूचना दें। खुद सांप को पकड़ने या हटाने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है।
रामगढ़। रामगढ़-बोकारो मुख्य मार्ग एनएच-23 पर बारलौंग के पास बुधवार देर रात हुए भीषण सड़क हादसे में ऑटो चालक समेत दो लोगों की मौत हो गई, जबकि आधा दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई और कुछ समय के लिए सड़क पर यातायात भी प्रभावित रहा। जानकारी के अनुसार, यात्रियों से भरा एक ऑटो गोला से रामगढ़ की ओर जा रहा था। इसी दौरान सामने से आ रही एक तेज रफ्तार बस ने ऑटो को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि ऑटो पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और उसके परखच्चे उड़ गए। हादसे में ऑटो में सवार सभी यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल में दो को मृत घोषित किया गया घटना के बाद स्थानीय लोगों और पुलिस की मदद से घायलों को तुरंत रामगढ़ सदर अस्पताल पहुंचाया गया। वहां चिकित्सकों ने ऑटो चालक और सुकरीगढ़ा निवासी रिया कुमारी को मृत घोषित कर दिया। बताया जा रहा है कि रिया किसी पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए रामगढ़ जा रही थीं। वहीं, हादसे में घायल रविरंजन भारती और अमित कुमार की हालत गंभीर बनी हुई है। दोनों पतरातू रेलवे में लोको पायलट के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि वे ड्यूटी समाप्त कर वापस लौट रहे थे, तभी यह दुर्घटना हुई। प्राथमिक उपचार के बाद दोनों को बेहतर इलाज के लिए रांची रेफर कर दिया गया। पुलिस ने शुरू की जांच हादसे की सूचना मिलते ही रजरप्पा थाना प्रभारी कृष्ण कुमार पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने स्थानीय ग्रामीणों की सहायता से राहत एवं बचाव कार्य चलाया और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। दुर्घटनाग्रस्त बस और ऑटो को जब्त कर लिया गया है। सदर अस्पताल के चिकित्सक डॉ. कमलेश्वर प्रसाद ने बताया कि चार गंभीर घायलों को एक साथ अस्पताल लाया गया था, जिनमें दो की मौत हो चुकी थी। शेष दो घायलों की हालत नाजुक होने के कारण उन्हें रांची रेफर किया गया। पुलिस मामले की जांच कर दुर्घटना के कारणों का पता लगाने में जुटी है।
आज की आधुनिक कारों और ट्रकों में एडवांस LED और प्रोजेक्टर हेडलाइट्स देखने को मिलती हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सड़कों पर चलने वाले कई ट्रकों, बसों और कारों की हेडलाइट पर काली पट्टी लगाई जाती थी। नई पीढ़ी के लिए यह सिर्फ एक अजीब डिजाइन लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सड़क सुरक्षा, तकनीकी सीमाएं और ऐतिहासिक कारण जुड़े हुए थे। तेज रोशनी से बचाने के लिए अपनाया जाता था यह तरीका पहले के दौर में वाहनों में आधुनिक हेडलाइट तकनीक उपलब्ध नहीं थी। अधिकांश गाड़ियों में साधारण बल्ब आधारित हेडलाइट्स लगी होती थीं, जिनमें रोशनी को नियंत्रित करने के लिए बेहतर फोकसिंग सिस्टम नहीं होता था। ऐसे में हाई बीम की तेज रोशनी सामने से आने वाले वाहन चालक की आंखों में पड़कर दुर्घटना का कारण बन सकती थी। इसी समस्या से बचने के लिए कई ड्राइवर हेडलाइट के ऊपरी हिस्से पर काली पट्टी या काला रंग लगा देते थे। इससे रोशनी का कुछ हिस्सा अवरुद्ध हो जाता था और प्रकाश सड़क पर अधिक केंद्रित रहता था, जिससे सामने वाले वाहन चालक को कम ग्लेयर महसूस होता था। द्वितीय विश्व युद्ध से भी जुड़ा है इसका इतिहास हेडलाइट पर काली पट्टी लगाने का चलन केवल आम वाहनों तक सीमित नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई देशों की सैन्य गाड़ियों में भी हेडलाइट्स को आंशिक रूप से ढंका जाता था। इसका उद्देश्य दुश्मन को वाहन की सटीक स्थिति और दिशा का अंदाजा लगाने से रोकना था। रात में सीमित रोशनी के साथ वाहन चलाना उस समय सैन्य रणनीति का हिस्सा माना जाता था। इसलिए हेडलाइट की चमक को नियंत्रित करना आवश्यक समझा जाता था। भारतीय ट्रक ड्राइवरों का लोकप्रिय जुगाड़ भारत में 1970 से 1990 के दशक के बीच ट्रक और बस चालकों के बीच यह तरीका काफी लोकप्रिय था। कई ड्राइवर अपने अनुभव के आधार पर हेडलाइट पर तिरछी काली पट्टी लगाते थे। उनका मानना था कि इससे सामने वाले वाहन चालक को कम चकाचौंध होती है और रात के समय दुर्घटनाओं की आशंका घट जाती है। दिलचस्प बात यह है कि यह किसी सरकारी नियम या कानून का हिस्सा नहीं था, बल्कि पूरी तरह ड्राइवरों के अनुभव और व्यवहारिक समझ पर आधारित एक देसी जुगाड़ था। अब क्यों नहीं दिखाई देती काली पट्टी? समय के साथ वाहन तकनीक में बड़ा बदलाव आया है। आज की कारों और ट्रकों में लो बीम और हाई बीम सिस्टम अलग-अलग तरीके से काम करते हैं। LED, प्रोजेक्टर और मैट्रिक्स हेडलाइट्स रोशनी को अधिक सटीक दिशा में भेजती हैं। कई आधुनिक वाहनों में ऑटोमैटिक हाई-बीम कंट्रोल जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, आज के दौर में हेडलाइट पर काली पट्टी लगाने से चालक की अपनी विजिबिलिटी प्रभावित हो सकती है, इसलिए इसकी जरूरत लगभग खत्म हो चुकी है। तकनीक ने बदल दी पुरानी परंपरा जिस समस्या का समाधान कभी ड्राइवर काली पट्टी लगाकर करते थे, आज वही काम आधुनिक हेडलाइट तकनीक आसानी से कर रही है। हालांकि पुराने ट्रकों और बसों की तस्वीरों में दिखाई देने वाली यह काली पट्टी आज भी ऑटोमोबाइल इतिहास की एक दिलचस्प याद के रूप में देखी जाती है।
देशभर में अलग-अलग इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबरों की व्यवस्था अब बदलने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया है कि पूरे भारत में आपातकालीन सेवाओं के लिए केवल एक हेल्पलाइन नंबर ‘112’ को पूरी तरह लागू किया जाए। अदालत ने कहा कि किसी भी दुर्घटना या आपात स्थिति में समय पर सहायता मिलना नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा मामला है और इसमें देरी जानलेवा साबित हो सकती है। फिलहाल देश में पुलिस, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस और अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग नंबर जैसे 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 इस्तेमाल किए जाते हैं। अब इन सभी सेवाओं को एकीकृत कर 112 नंबर से जोड़ा जाएगा। ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ की याचिका पर सुनाया फैसला सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर 112 हेल्पलाइन को पूरी तरह संचालित करें। अदालत ने यह भी कहा कि राज्यों को ‘गुड समैरिटन’ यानी सड़क हादसों में मदद करने वाले लोगों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली भी तैयार करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट बोला- ट्रॉमा केयर जीवन रक्षक दवा की तरह सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना या गंभीर आपात स्थिति में घायल व्यक्ति अक्सर सदमे और भ्रम की स्थिति में होता है। ऐसे समय में तुरंत चिकित्सा सहायता मिलना बेहद जरूरी होता है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “आपात स्थिति में बिना चिकित्सा सहायता के बीतने वाला हर मिनट जीवित रहने की संभावना को कम करता है। तेजी वास्तव में जीवनरक्षक दवा की तरह है।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रॉमा केयर और आपातकालीन चिकित्सा सहायता नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं। मदद करने वाले लोगों को कानूनी डर से बचाने पर जोर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार लोग सड़क हादसों में घायलों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन पुलिस पूछताछ, अदालत में गवाही और कानूनी प्रक्रियाओं के डर से पीछे हट जाते हैं। अदालत ने राज्यों से ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा है, जिससे लोग बिना डर के जरूरतमंदों की मदद कर सकें। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए मजबूत ‘गुड समैरिटन’ कानून, जन-जागरूकता अभियान और प्राथमिक उपचार प्रशिक्षण जरूरी हैं। हर राज्य को देनी होगी नियमित अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर नियमित मासिक बैठकें आयोजित करें। इन बैठकों की कार्यवाही संबंधित सरकारी पोर्टलों पर अपलोड करनी होगी और अनुपालन रिपोर्ट अदालत को भी सौंपनी होगी। 112 नंबर GPS और रियल-टाइम ट्रैकिंग से होगा लैस अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर ट्रॉमा मामलों के लिए मेडिकल रेस्क्यू प्रोटोकॉल तैयार करने की अनुमति दी है। इसके बाद राज्यों को इसे लागू करने के लिए अतिरिक्त तीन महीने का समय दिया गया है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सरकारी और निजी एंबुलेंस को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड-125 (AIS-125) के अनुरूप बनाया जाए। इन एंबुलेंस में GPS और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगाना अनिवार्य होगा, जिन्हें 112 हेल्पलाइन से रियल-टाइम में जोड़ा जाएगा। एंबुलेंस सेवा और प्रतिक्रिया समय की होगी निगरानी सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता, प्रतिक्रिया समय, चिकित्सा उपकरणों और इलाज के परिणामों का समय-समय पर ऑडिट किया जाए। इन रिपोर्टों को एक केंद्रीय प्राधिकरण के पास भेजा जाएगा, ताकि देशभर में ट्रॉमा और आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी रखी जा सके। पूरे देश में एक समान इमरजेंसी सिस्टम बनाने की दिशा में बड़ा कदम कानूनी विशेषज्ञों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में आपातकालीन सेवाओं को अधिक तेज, सरल और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। एकीकृत 112 हेल्पलाइन लागू होने से लोगों को अलग-अलग नंबर याद रखने की जरूरत नहीं होगी और आपात स्थिति में सहायता मिलने की प्रक्रिया पहले से अधिक तेज हो सकेगी।
लोहरदगा। झारखंड के लोहरदगा सदर थाना क्षेत्र में शनिवार तड़के एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। पुलिस अधीक्षक आवास और उपविकास आयुक्त आवास के पास तेज रफ्तार टाटा सफारी कार पहले डिवाइडर से टकराई और फिर अनियंत्रित होकर पेड़ से जा भिड़ी। हादसा इतना भीषण था कि कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई और उसमें सवार युवक अंदर फंस गए। इस दुर्घटना में एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पांच अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। शादी समारोह से लौट रहे थे युवक जानकारी के अनुसार, सभी युवक कुड़ू थाना क्षेत्र के कड़ाक गांव में आयोजित एक शादी समारोह से लौट रहे थे। कार में आजसू नेता लाल गुड्डू नाथ शाहदेव के बेटे विराट शाहदेव और सम्राट शाहदेव समेत कुल छह लोग सवार थे। अन्य घायलों में विकेश सिंह, उतम सिंह और दीपेश्वर सिंह शामिल हैं। हादसे में खलारी निवासी प्रमोद कुमार सिंह उर्फ चंपा की मौत हो गई। राहत-बचाव में जुटी पुलिस हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक आवास के सुरक्षाकर्मी और राहगीर मौके पर पहुंचे। इसके बाद सदर थाना पुलिस ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया और सभी घायलों को कार से निकालकर लोहरदगा सदर अस्पताल पहुंचाया। प्राथमिक उपचार के बाद चार गंभीर घायलों को बेहतर इलाज के लिए Rajendra Institute of Medical Sciences (रिम्स) रांची रेफर कर दिया गया। पुलिस कर रही मामले की जांच पुलिस ने दुर्घटनाग्रस्त कार को अपने कब्जे में ले लिया है और हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में तेज रफ्तार को हादसे की वजह माना जा रहा है। घटना के बाद इलाके में शोक का माहौल है।
धनबाद। धनबाद के जोड़ापोखर थाना क्षेत्र अंतर्गत जियलगोरा के समीप सोमवार को एक भीषण सड़क दुर्घटना हो गई। ऑटो और तेज रफ्तार ट्रेलर की आमने-सामने टक्कर में एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक ही परिवार के छह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। शादी समारोह में जा रहा था परिवार जानकारी के अनुसार, सभी लोग Bokaro जिले के चंदनकियारी थाना क्षेत्र के अमलाबाद के निवासी हैं। परिवार सासाराम-डेहरी में आयोजित एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए निकला था और धनबाद स्टेशन से ट्रेन पकड़ने जा रहा था। इसी दौरान रास्ते में यह हादसा हो गया। तेज रफ्तार ट्रेलर ने मारी टक्कर घायल परिवार के मुखिया परमेश्वर ठाकुर ने बताया कि पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रेलर ने ऑटो को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि ऑटो में सवार लोग सड़क पर जा गिरे। इस हादसे में राजमणि देवी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि चालक समेत अन्य छह लोग घायल हो गए। घायलों का अस्पताल में इलाज जारी घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। दो घायलों का इलाज एसएनएमएमसीएच में चल रहा है, जबकि चार अन्य को निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है। पुलिस जांच में जुटी जोड़ापोखर थाना पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है और आगे की कार्रवाई जारी है।
रांची। यह नजारा रांची के पुरुलिया रोड का है, जहां कई प्रतिष्ठित स्कूल अवस्थित हैं। यहां सड़क पर मालवाहक टेंपो में बच्चों को ढोया जा रहा है। ये बच्चे एक प्रतिष्ठित स्कूल के छात्र हैं, जो छुट्टी के बाद स्कूल से घर लौट रहे हैं। यह स्थिति कितनी खतरनाक है, आप अनुमान लगा सकते हैं। टेंपो में लटके बच्चे को देख दिल दहल जाता है। यह किसी बड़ी अनहोनी को आमंत्रण देने वाला दृश्य है। रांची की भीड़ भाड़ वाली सड़क पर इस लापरवाही को रोकनेवाला कोई नहीं है। पुलिस प्रशासन का ध्यान भी इस ओर नहीं जाता। ऐसे दृश्य हादसों को आमंत्रण देने वाले हैं। उम्मीद है पुलिस प्रशासन ऐसे मामलों को रोकने की पहल करेगा और संबंधित स्कूल के खिलाफ भी एक्शन लेगा।
हेयरपिन मोड़ पर चालक का संतुलन बिगड़ा, हादसे में कई घायल तमिलनाडु के सेलम जिले में एक भीषण सड़क हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया। कोयंबटूर-सेलम राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सरकारी बस के नियंत्रण खोने से हुए हादसे में केरल के 9 शिक्षकों की मौत हो गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। कैसे हुआ हादसा? जानकारी के मुताबिक, यह हादसा उस समय हुआ जब बस 13वें हेयरपिन मोड़ पर मुड़ रही थी। इसी दौरान चालक अचानक नियंत्रण खो बैठा। अनियंत्रित बस पहले एक दोपहिया वाहन और फिर एक ऑटो रिक्शा से टकराई, जिसमें करीब 10 लोग सवार थे। टक्कर के बाद बस नीचे की ओर 9वें हेयरपिन मोड़ तक जा गिरी। बस में केरल के पेरिंथलमन्ना से आए 13 पर्यटक सवार थे, जो पेशे से शिक्षक थे। मृतकों और घायलों की स्थिति हादसे में 8 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि गंभीर रूप से घायल एक अन्य व्यक्ति ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। घायलों में बस चालक, 17-18 साल के दो युवक और दो महिलाएं शामिल हैं। सभी को तुरंत बचाव दल ने निकालकर पोलाची के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। राहत और बचाव कार्य तेज घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीमें मौके पर पहुंच गईं। वरिष्ठ अधिकारियों ने खुद राहत और बचाव कार्य की निगरानी की। घायलों को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गई। प्रधानमंत्री और नेताओं ने जताया दुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया और मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताई। साथ ही घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी घटना पर दुख जताते हुए अधिकारियों को घायलों के बेहतर इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस दुखद घटना पर शोक व्यक्त किया। स्कूल में फैला मातम इस हादसे के बाद केरल के मलप्पुरम स्थित पांग-पल्लिपरंबा गवर्नमेंट एलपी स्कूल में शोक की लहर है, जहां सभी मृतक शिक्षक कार्यरत थे। पूरे इलाके में मातम का माहौल बना हुआ है।
नवादा/पटना: बिहार के नवादा जिले से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। JDU विधायक विभा देवी के छोटे बेटे अखिलेश कुमार की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें पटना ले जाया गया था, जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। इस घटना से परिवार और पूरे इलाके में शोक का माहौल है। तेज रफ्तार कार पेड़ से टकराई मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश कुमार गुरुवार शाम अपने घर से कार लेकर निकले थे। इसी दौरान उनकी गाड़ी अनियंत्रित होकर सड़क किनारे एक पेड़ से जा टकराई। हादसा इतना जबरदस्त था कि वे गंभीर रूप से घायल हो गए और मौके पर अफरा-तफरी मच गई। पटना में इलाज के दौरान हुई मौत घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें तुरंत बेहतर इलाज के लिए पटना ले जाया गया। लेकिन हालत नाजुक होने के कारण डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। फिलहाल उनका पार्थिव शरीर पटना से नवादा स्थित पैतृक आवास लाया जा रहा है। परिवार में पसरा मातम इस हादसे के बाद विधायक विभा देवी और उनके पति राजवल्लभ प्रसाद यादव समेत पूरा परिवार गहरे सदमे में है। घटना की खबर मिलते ही नवादा जिले में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचकर परिवार को सांत्वना दे रहे हैं। राजनीति से दूर, मिलनसार स्वभाव के थे अखिलेश अखिलेश कुमार सक्रिय राजनीति में नहीं थे, लेकिन उनका व्यवहार काफी मिलनसार बताया जाता है। वे अक्सर सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होते थे और लोगों से सहजता से घुलमिल जाते थे। स्थानीय लोग उन्हें एक सरल और विनम्र व्यक्ति के रूप में याद कर रहे हैं। हाल ही में विधायक बनी थीं विभा देवी विभा देवी ने हाल ही में विधानसभा चुनाव जीतकर नवादा सीट से प्रतिनिधित्व किया है। वे राजवल्लभ प्रसाद यादव की पत्नी हैं, जो पूर्व में राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इस दर्दनाक हादसे ने उनके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है और पूरे इलाके में शोक का माहौल बना हुआ है। पूरे इलाके में शोक की लहर अखिलेश कुमार की असमय मौत से नवादा और आसपास के क्षेत्रों में दुख का माहौल है। लोग लगातार उनके आवास पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। यह हादसा एक बार फिर तेज रफ्तार और सड़क सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
तेलंगाना में Hanamkonda जिले के हसनपर्थी इलाके में शनिवार को एक दर्दनाक सड़क हादसे में दो कॉलेज छात्रों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि तेज रफ्तार डंपर ने बाइक सवार छात्रों को जोरदार टक्कर मार दी, जिससे दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस के अनुसार यह हादसा हसनपर्थी क्षेत्र में स्थित बड़े चेरुवु (पेड्डा चेरुवु) के पास हुआ। मृतकों की पहचान सुप्रतीक और अकरम के रूप में हुई है, जो SSR डिग्री कॉलेज के छात्र बताए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक दोनों छात्र मोटरसाइकिल से कॉलेज जा रहे थे। इसी दौरान पीछे से आ रही तेज रफ्तार डंपर ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों छात्र सड़क पर गिर पड़े और उनकी मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर जमा हो गए। कुछ समय के लिए सड़क पर यातायात भी प्रभावित रहा। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रण में लिया। हसनपर्थी पुलिस इंस्पेक्टर एम. राजेश ने बताया कि शुरुआती जांच में हादसे की वजह डंपर की तेज रफ्तार सामने आई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और फरार चालक की तलाश की जा रही है। पुलिस ने दोनों छात्रों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया है और उनके परिवारों को घटना की सूचना दे दी गई है। इस हादसे की खबर से कॉलेज और स्थानीय समुदाय में शोक की लहर फैल गई है। साथियों और शिक्षकों ने दोनों छात्रों को मेहनती और उज्ज्वल भविष्य वाला बताया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।