Sanatan Dharma

Jagadguru Shankaracharya Swami Nischalananda Saraswati to address a grand Dharma Sabha in Kolkata
कोलकाता में पहली बार होगी पुरी पीठाधीश्वर की विशाल धर्मसभा, 19 जुलाई को जुटेंगे हजारों श्रद्धालु

पुरी गोवर्धन मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज के कोलकाता आगमन को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। पश्चिम बंगाल में पहली बार उनके सान्निध्य में एक भव्य धर्मसभा आयोजित की जा रही है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सहित राज्य सरकार के कई मंत्रियों और विधायकों को भी आमंत्रित किया गया है। इस आयोजन की जानकारी कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान दी गई। 18 जुलाई को शालीमार पहुंचेंगे शंकराचार्य आयोजक संस्था आनंद वाहिनी की राष्ट्रीय महामंत्री निभा प्रकाश ने बताया कि जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज 18 जुलाई की सुबह श्री जगन्नाथ एक्सप्रेस से शालीमार रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे। इसके अगले दिन यानी 19 जुलाई को शाम 5 बजे कोलकाता के धन धान्य ऑडिटोरियम में भव्य धर्मसभा का आयोजन किया जाएगा, जहां श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए वे सनातन धर्म से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखेंगे। सनातन धर्म से जुड़े सवालों का देंगे जवाब आयोजकों के अनुसार, धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा पूछे गए सनातन धर्म से जुड़े प्रश्नों का समाधान स्वयं शंकराचार्य करेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों के बीच धार्मिक जागरूकता बढ़ाना और सनातन परंपराओं के प्रति सही जानकारी उपलब्ध कराना है। निभा प्रकाश ने कहा कि पश्चिम बंगाल में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए यह अपने प्रकार का पहला बड़ा आयोजन होगा। बड़े जनसमागम की उम्मीद आयोजकों का दावा है कि यह पश्चिम बंगाल में अब तक आयोजित सनातन धर्मावलंबियों के सबसे बड़े आयोजनों में से एक साबित हो सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है। प्रेस वार्ता में निभा प्रकाश के अलावा सुभाष अग्रवाल, शंभुनाथ झा और श्रेया नाथ भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री समेत कई जनप्रतिनिधियों को निमंत्रण आयोजकों ने बताया कि इस धर्मसभा के लिए मुख्यमंत्री सहित राज्य सरकार के कई मंत्रियों और विधायकों को आमंत्रित किया गया है। हालांकि, कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति को लेकर आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं की गई है। आयोजन को लेकर प्रशासनिक और सुरक्षा स्तर पर भी तैयारियां की जा रही हैं।  

kalpana जुलाई 16, 2026 0
Golden turmeric soup and turmeric milk with black pepper, healthy monsoon recipes for metabolism and wellness.
सुबह खाली पेट नहीं, इस समय खाएं हल्दी की ये रेसिपी, मेटाबॉलिज्म सपोर्ट करने और मानसून में त्वचा व सेहत को फायदा पहुंचाने में मिल सकती है मदद

Haldi Benefits in Monsoon: हल्दी भारतीय रसोई का एक ऐसा मसाला है, जिसका इस्तेमाल सदियों से भोजन और पारंपरिक घरेलू उपायों में किया जाता रहा है। लाइफस्टाइल कोच ल्यूक कुटिन्हो और डाइट एक्सपर्ट्स के अनुसार, हल्दी में मौजूद कर्क्यूमिन (Curcumin) शरीर के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन यह तभी बेहतर तरीके से अवशोषित होता है जब इसे सही तरीके से सेवन किया जाए। मानसून के मौसम में हल्दी को संतुलित मात्रा में डाइट में शामिल करना इम्यूनिटी, त्वचा और पाचन के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि यह किसी बीमारी का इलाज नहीं है। मानसून में हल्दी क्यों फायदेमंद मानी जाती है? बारिश के मौसम में संक्रमण, पाचन संबंधी समस्याएं और त्वचा से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में हल्दी में मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हल्दी अकेले पानी में मिलाकर पीने की बजाय इसे सही कॉम्बिनेशन के साथ लेना अधिक उपयोगी हो सकता है। हल्दी का असर बढ़ाने का सही तरीका विशेषज्ञों के अनुसार, हल्दी का कर्क्यूमिन शरीर में कम मात्रा में अवशोषित होता है। इसकी बायोएवेलेबिलिटी बढ़ाने के लिए: हल्दी को ½ चम्मच देसी घी, नारियल तेल या ऑलिव ऑयल जैसे हेल्दी फैट के साथ लें। इसमें एक चुटकी काली मिर्च मिलाएं। काली मिर्च में मौजूद पाइपरीन (Piperine) कर्क्यूमिन के अवशोषण को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। हल्दी को दाल, सब्जी, सूप या अन्य पके हुए भोजन में हल्की आंच पर इस्तेमाल करें। मानसून में त्वचा और सेहत के लिए संभावित फायदे शरीर में सामान्य सूजन (Inflammation) को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है। इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करने में मदद मिल सकती है। त्वचा को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में भूमिका निभा सकती है। घाव भरने और स्किन रिकवरी में सहायक मानी जाती है। पाचन तंत्र के सामान्य कार्य को सपोर्ट कर सकती है। जोड़ों की सामान्य सेहत बनाए रखने में मदद मिल सकती है। क्या हल्दी मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है? हल्दी मेटाबॉलिज्म को सीधे तेज करने वाला चमत्कारी फूड नहीं है। हालांकि कुछ शोध बताते हैं कि इसमें मौजूद कर्क्यूमिन सूजन कम करने और मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करने में भूमिका निभा सकता है। इसका असर संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली के साथ ही बेहतर देखा जा सकता है। क्या वजन घटाने में मदद करती है? हल्दी अकेले वजन कम नहीं करती। लेकिन यदि इसे कैलोरी नियंत्रित डाइट, पर्याप्त प्रोटीन, नियमित एक्सरसाइज और अच्छी नींद के साथ शामिल किया जाए, तो यह स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा बन सकती है। इसे वजन घटाने का शॉर्टकट नहीं माना जाना चाहिए। कितनी बार करें सेवन? सप्ताह में 4–5 दिन सेवन किया जा सकता है। प्रतिदिन ½ से 1 छोटा चम्मच हल्दी सामान्य खाना पकाने में पर्याप्त मानी जाती है। अधिक मात्रा में सेवन करने से बचें। सेवन का सबसे अच्छा समय दोपहर या रात के भोजन के साथ शाम के समय हल्दी वाला सूप रात में सोने से 1–2 घंटे पहले हल्दी वाला दूध (यदि शरीर को सूट करता हो) खाली पेट लेने की आवश्यकता नहीं है। डाइट चार्ट में कैसे करें शामिल? नाश्ता: वेज चीला या ओट्स उपमा में हल्दी लंच: दाल, सब्जी या खिचड़ी में हल्दी शाम: हल्दी-गाजर सूप डिनर: हल्दी वाली मूंग दाल या सब्जी रेसिपी 1: गोल्डन हल्दी मूंग दाल सूप सामग्री ½ कप धुली मूंग दाल ½ छोटा चम्मच हल्दी एक चुटकी काली मिर्च ½ छोटा चम्मच देसी घी अदरक जीरा नमक स्वादानुसार बनाने की विधि दाल को अच्छी तरह पकाएं। घी में जीरा और अदरक का तड़का लगाएं। हल्दी डालें और पकी हुई दाल मिलाएं। अंत में काली मिर्च डालकर गर्मागर्म परोसें। बनने का समय: 20–25 मिनट प्रति सर्विंग अनुमानित पोषण कैलोरी: 180 kcal प्रोटीन: 10 ग्राम फाइबर: 6 ग्राम रेसिपी 2: हल्दी-काली मिर्च वाला गोल्डन मिल्क सामग्री 1 कप लो-फैट दूध या प्लांट-बेस्ड दूध ½ छोटा चम्मच हल्दी एक चुटकी काली मिर्च ½ छोटा चम्मच देसी घी या नारियल तेल दालचीनी (वैकल्पिक) बनाने की विधि दूध को हल्की आंच पर गर्म करें। इसमें हल्दी, काली मिर्च और घी मिलाकर 3–4 मिनट पकाएं। गुनगुना होने पर सेवन करें। बनने का समय: 8–10 मिनट प्रति सर्विंग अनुमानित पोषण कैलोरी: 130–160 kcal प्रोटीन: 7–8 ग्राम ध्यान दें :- हल्दी किसी बीमारी का इलाज नहीं है। यदि आपको पित्ताशय (Gallbladder) की समस्या, किडनी स्टोन, ब्लड थिनर दवाओं का सेवन या कोई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, तो नियमित रूप से अधिक मात्रा में हल्दी या कर्क्यूमिन सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली ही बेहतर स्वास्थ्य का आधार हैं।   

anmol जुलाई 16, 2026 0
Devotees worship Lord Jagannath at home with lamps, flowers, tulsi leaves, and sacred mantras during Rath Yatra.
Jagannath Ji Ke Mantra: घर पर करें भगवान जगन्नाथ की पूजा, जानें सरल पूजा विधि, गायत्री मंत्र, मूल मंत्र और स्तोत्र

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का शुभारंभ होता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर की यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचने से सौ यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यदि आप किसी कारणवश रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, तो श्रद्धा और भक्ति के साथ घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा, मंत्र जाप और स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई आराधना भगवान की कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनती है। घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा कैसे करें? घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा करने के लिए इन सरल चरणों का पालन करें— सबसे पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। घी का दीपक और धूप जलाकर पूजा का प्रारंभ करें। भगवान को चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद भगवान जगन्नाथ के मंत्रों और स्तोत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। मालपुआ, मौसमी फल तथा सात्विक (बिना प्याज-लहसुन) भोजन का भोग अर्पित करें। अंत में भगवान जगन्नाथ की आरती करें और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें। भगवान जगन्नाथ गायत्री मंत्र ॐ जगन्नाथाय विद्महे। महाबलाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ भगवान जगन्नाथ का मूल मंत्र ॐ श्री जगन्नाथाय नमः॥ श्री जगन्नाथ अष्टकम का महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार श्री जगन्नाथ अष्टकम का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य स्वरूप, करुणा और भक्तों के प्रति उनके स्नेह का वर्णन करता है। परंपरागत विश्वास है कि नियमित रूप से इसका पाठ करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। जगन्नाथ स्तोत्र का महत्व जगन्नाथ स्तोत्र में भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप की स्तुति की गई है। इसमें भक्त भगवान से जीवन के कष्टों, भय, दुख और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करने से मन में भक्ति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक संतुलन बढ़ता है। रथ यात्रा का धार्मिक महत्व मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के मिलन का प्रतीक है। इस दौरान भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और सभी को अपने दर्शन का अवसर प्रदान करते हैं। जो श्रद्धालु रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पाते, वे घर पर भगवान का स्मरण, मंत्र जाप, स्तोत्र पाठ और आरती करके भी अपनी भक्ति व्यक्त कर सकते हैं।  

surbhi जुलाई 16, 2026 0
Oil lamp flame during Hindu worship showing symbolic shapes believed to represent traditional spiritual signs and religious meanings.
Deepak Ki Lau Ke Sanket: पूजा के दीपक की लौ में बनने वाली आकृतियां क्या बताती हैं? जानें शुभ और अशुभ संकेतों का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दीपक जलाना शुभ और मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की लौ केवल प्रकाश ही नहीं देती, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक होती है। कई धार्मिक मान्यताओं और लोकविश्वासों के अनुसार, पूजा के समय दीपक की लौ में बनने वाली कुछ आकृतियां जीवन से जुड़े शुभ-अशुभ संकेत भी दे सकती हैं। ज्योतिष एवं वास्तु से जुड़े पारंपरिक मतों के अनुसार, दीपक की लौ में बनने वाली आकृतियों को दैवीय संकेत माना जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इन्हें धार्मिक आस्था एवं परंपरागत विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आइए जानते हैं कि दीपक की लौ में दिखाई देने वाली अलग-अलग आकृतियों का पारंपरिक अर्थ क्या माना जाता है। दीपक की लौ में दिखने वाले शुभ संकेत त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि दीपक की लौ में त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति दिखाई दे, तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह ईश्वर की विशेष कृपा और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत हो सकता है। साथ ही जीवन में चल रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने की संभावना मानी जाती है। फूल जैसी आकृति यदि लौ में कमल या गुलाब जैसे फूल की आकृति प्रतीत हो, तो पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आपकी पूजा-आराधना स्वीकार हो रही है। इसे आने वाले शुभ समाचार और मनोकामनाओं की पूर्ति से भी जोड़ा जाता है। हंस या मोर की आकृति हंस और मोर दोनों को भारतीय संस्कृति में शुभता, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यदि दीपक की लौ में ऐसी आकृति दिखाई दे, तो इसे परिवार में सुख-शांति, प्रेम और मानसिक संतुलन का संकेत माना जाता है। भगवान गणेश जैसी आकृति यदि लौ में भगवान गणेश का स्वरूप प्रतीत हो, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह कार्यों में आ रही बाधाओं के दूर होने और नए शुभ कार्यों के सफल होने का संकेत माना जाता है। दीपक की लौ में दिखाई देने वाले सतर्क करने वाले संकेत दो भागों में बंटी हुई लौ यदि दीपक की लौ बीच से दो हिस्सों में विभाजित दिखाई दे, तो पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभ नहीं माना जाता। इसे परिवार में मतभेद, आर्थिक चुनौतियों या किसी प्रकार की अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बिना हवा के काला धुआं निकलना यदि वातावरण शांत होने के बावजूद दीपक से लगातार काला धुआं निकल रहा हो, तो लोकमान्यताओं के अनुसार इसे नकारात्मक ऊर्जा का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में घर की साफ-सफाई, सकारात्मक वातावरण और पूजा-पाठ पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। लगातार फड़फड़ाती हुई लौ यदि दीपक की लौ बिना स्पष्ट कारण के लगातार तेज़ी से कांपती या फड़फड़ाती रहे, तो इसे आने वाली चुनौतियों, अनावश्यक खर्चों या स्वास्थ्य संबंधी सावधानी बरतने का संकेत माना जाता है। ध्यान रखने योग्य बात धार्मिक मान्यताएं व्यक्ति की आस्था और परंपराओं पर आधारित होती हैं। दीपक की लौ में दिखाई देने वाली आकृतियों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हें भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। सकारात्मक सोच, सत्कर्म और नियमित पूजा ही जीवन में मानसिक शांति और आत्मविश्वास का आधार बनते हैं।  

surbhi जुलाई 16, 2026 0
ICC T20 World Cup 2028
ICC ने T20 वर्ल्ड कप के फॉर्मेट में किया बड़ा बदलाव, 'सुपर 10' और एलिमिनेटर राउंड की होगी एंट्री

दुबई, एजेंसियां। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप के फॉर्मेट में बड़े बदलावों को मंजूरी दे दी है। नए प्रारूप के तहत टूर्नामेंट में 20 टीमें हिस्सा लेंगी, लेकिन अब प्रतियोगिता ग्रुप स्टेज, एलिमिनेटर, सुपर 10 और नॉकआउट चरणों में खेली जाएगी। ICC का कहना है कि नए फॉर्मेट का उद्देश्य अधिक प्रतिस्पर्धी मुकाबले और उभरती टीमों को बेहतर अवसर देना है।   एलिमिनेटर राउंड से बढ़ेगा रोमांच   नए फॉर्मेट में ग्रुप चरण के बाद कुछ टीमें सीधे अगले दौर में पहुंचेंगी, जबकि अन्य क्वालीफाई करने वाली टीमें एलिमिनेटर मुकाबले खेलेंगी। इन मुकाबलों के विजेता आगे बढ़ेंगे, जबकि हारने वाली टीमों का सफर यहीं समाप्त हो जाएगा।   'सुपर 10' में होगा खिताब का असली मुकाबला   एलिमिनेटर के बाद 10 टीमें 'सुपर 10' चरण में पहुंचेंगी। यहां सभी टीमों को दो समूहों में बांटा जाएगा और प्रत्येक टीम अपने समूह की अन्य टीमों से मुकाबला करेगी। इसके बाद शीर्ष टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाएंगी।   उभरती टीमों को मिलेगा बड़ा मौका   ICC के अनुसार, नए फॉर्मेट से एसोसिएट और उभरती क्रिकेट टीमों को अधिक प्रतिस्पर्धी मैच खेलने का अवसर मिलेगा। साथ ही बड़े देशों के बीच अधिक हाई-वोल्टेज मुकाबले देखने को मिल सकते हैं।   2028 से लागू होगा नया प्रारूप   ICC ने स्पष्ट किया है कि नया फॉर्मेट 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप से लागू होगा। इस टूर्नामेंट की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से करेंगे। नए प्रारूप को लेकर क्रिकेट जगत में उत्सुकता बढ़ गई है।

abhishek singh जुलाई 16, 2026 0
Devotee performing Pitru Tarpan ritual on Ashadh Amavasya
आषाढ़ अमावस्या 2026: सपने में दिखें पितर तो क्या करें? जानिए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ संकेत और उपाय

आषाढ़ अमावस्या को सनातन धर्म में पितरों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से किए गए कर्म पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति में सहायक होते हैं। वहीं, स्वप्न शास्त्र में भी अमावस्या के दिन सपने में पितरों के दर्शन को विशेष संकेत माना गया है। यदि इस दिन आपको सपने में अपने पूर्वज दिखाई दें, तो कुछ धार्मिक उपाय करने की परंपरा बताई गई है। आइए जानते हैं इन मान्यताओं के बारे में। आषाढ़ अमावस्या पर सपने में पितर दिखने का क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन सपने में पूर्वजों का दिखाई देना उनके आशीर्वाद, स्मरण या किसी संदेश का संकेत माना जाता है। स्वप्न शास्त्र में कहा गया है कि ऐसे सपनों के बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है। सपने में पितरों के दर्शन हों तो करें ये उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि अमावस्या के दिन सपने में पूर्वज दिखाई दें तो ये कार्य किए जा सकते हैं- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काले तिल और कुश मिलाकर पितरों का तर्पण करें। जरूरतमंदों या ब्राह्मण को भोजन कराएं। अपनी श्रद्धा अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें। शाम के समय दक्षिण दिशा में या पीपल के वृक्ष के समीप सरसों के तेल का दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें। सपने में मुस्कुराते हुए पितर दिखें तो क्या संकेत मिलता है? स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि यदि सपने में पूर्वज प्रसन्न या मुस्कुराते हुए दिखाई दें, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह उनके संतोष और आशीर्वाद का प्रतीक हो सकता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का संकेत देता है। अगर सपने में पितर भोजन मांगें तो क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि सपने में पूर्वज भोजन मांगते हुए दिखाई दें, तो तर्पण, पिंडदान या ब्राह्मण भोजन कराने जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। आषाढ़ अमावस्या का धार्मिक महत्व आषाढ़ अमावस्या को पितरों के निमित्त किए जाने वाले तर्पण, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए धार्मिक कार्यों को पुण्यदायी माना जाता है। साथ ही, जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य को भी इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, स्वप्न शास्त्र और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। IDTV Indradhanush इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या उपाय को अपनाने से पहले अपने विवेक का उपयोग करें।  

surbhi जुलाई 14, 2026 0
Ranchi Sadar Hospital
10 करोड़ पहुंची लागत, फिर भी शुरू नहीं हो सका सदर अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट

रांची। रांची के सदर अस्पताल में बनने वाली झारखंड की पहली सरकारी बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) यूनिट का निर्माण फिलहाल अंतिम प्रशासनिक मंजूरी का इंतजार कर रहा है। परियोजना की लागत 6.45 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 10 करोड़ रुपये हो गई है। एल-1 कंपनी ने संशोधित डिजाइन और नई लागत के आधार पर सबसे कम बोली लगाई है। लागत बढ़ने के साथ यूनिट के प्लान और डिजाइन में भी कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं, जिसके कारण निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो सका है।   स्वास्थ्य विभाग की मंजूरी के बाद तीन माह में होगा निर्माण सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि यूनिट का संशोधित डिजाइन पूरी तरह तैयार कर लिया गया है और इसे स्वास्थ्य विभाग को भेजा जा रहा है। विभाग से संशोधित डीपीआर और बढ़ी हुई लागत को मंजूरी मिलते ही चयनित एजेंसी को कार्यादेश जारी कर दिया जाएगा। निर्माण शुरू होने के बाद एजेंसी को तीन महीने के भीतर यूनिट तैयार कर पूरी तरह संचालन योग्य बनाना होगा।   सातवीं मंजिल पर बनेगी अत्याधुनिक यूनिट संक्रमण के खतरे को देखते हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट सदर अस्पताल की सातवीं मंजिल पर विकसित की जाएगी। यहां नियंत्रित वातावरण, क्लीन रूम, आइसोलेशन जोन, सीमित प्रवेश व्यवस्था, आईसीयू स्तर की सुविधाएं और हाई-एफिशिएंसी एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम स्थापित किए जाएंगे। साथ ही सेंसर आधारित हैंड-फ्री स्टेशन जैसी आधुनिक संक्रमण नियंत्रण व्यवस्थाएं भी उपलब्ध होंगी।   झारखंड के मरीजों को मिलेगा बड़ा लाभ यूनिट शुरू होने के बाद राज्य के हजारों मरीजों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। सदर अस्पताल के हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक रंजन और विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम रांची में ही यह जटिल उपचार उपलब्ध कराएगी। वर्तमान में निजी अस्पतालों में इस उपचार पर 15 से 30 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने से मरीजों को कम लागत में इलाज मिलेगा और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।

abhishek singh जुलाई 14, 2026 0
Devotee offering fresh fruits as bhog during Hindu worship with traditional Pooja items and flowers.
भोग में बीज वाले फल चढ़ाना सही या गलत? जानिए क्या कहते हैं धार्मिक नियम और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

पूजा-पाठ में भगवान को फल अर्पित करना सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, कई श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल रहता है कि क्या बीज वाले फल भगवान को चढ़ाए जा सकते हैं या नहीं। खासकर आम, तरबूज, लीची या अन्य बड़े बीज वाले फलों को लेकर लोगों में अलग-अलग धारणाएं देखने को मिलती हैं। आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस विषय में क्या माना जाता है और भोग लगाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए। क्या भगवान को बीज वाले फल चढ़ा सकते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान को बीज वाले फल अर्पित करना पूरी तरह स्वीकार्य माना जाता है। फल को सात्विक और पवित्र भोग माना गया है तथा मौसमी फलों का भोग विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, यदि फल में बड़ा बीज हो, जैसे आम, तरबूज या अन्य ऐसे फल, तो भोग लगाने से पहले उसका बीज निकाल देना उचित माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को वही स्वरूप में भोग अर्पित करना चाहिए, जैसा भोजन सामान्य रूप से ग्रहण किया जाता है। भोग लगाने से पहले इन नियमों का रखें ध्यान भगवान को फल अर्पित करते समय केवल फल का चयन ही नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता और प्रस्तुत करने का तरीका भी महत्वपूर्ण माना गया है। भोग में शामिल किए जाने वाले फलों को पहले साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। पूजा से काफी पहले फल काटकर न रखें। भोग से ठीक पहले ही फल धोकर या काटकर अर्पित करें। यदि फल बड़ा है तो उसे स्वच्छ चाकू से काटकर भगवान के सामने रखें। भोग में संभव हो तो तुलसी दल भी शामिल करें, जिसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भोग लगाते समय मन शांत रखें और पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ भगवान का स्मरण करें। श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त की सच्ची भावना और श्रद्धा होती है। भोग कितना बड़ा या महंगा है, इससे अधिक महत्व उसे अर्पित करने के भाव का माना गया है। इसलिए पूजा के दौरान अहंकार छोड़कर पूर्ण विश्वास और भक्ति के साथ भगवान को भोग अर्पित करना चाहिए। बड़े बीज वाले फलों के लिए क्या करें? यदि किसी फल में बड़ा और कठोर बीज हो, तो उसे निकालकर फल भगवान को अर्पित करना बेहतर माना जाता है। वहीं छोटे बीज वाले फलों को सामान्य रूप से भी चढ़ाया जा सकता है। उद्देश्य यह माना जाता है कि भगवान को वही भोजन प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाए, जिसे आसानी से ग्रहण किया जा सके। ध्यान रखें धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में विभिन्न क्षेत्रों और संप्रदायों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में यदि आपके परिवार या गुरु द्वारा बताए गए विशेष पूजा-विधान हैं, तो उनका पालन करना अधिक उचित माना जाता है। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा, पवित्रता और सच्ची आस्था ही मानी जाती है।  

surbhi जुलाई 14, 2026 0
Indian and Polish officials during a bilateral meeting in New Delhi, discussing stronger cooperation in defence, trade, technology and strategic partnership.
पोलैंड ने भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने का किया ऐलान, रक्षा और व्यापार में बढ़ेगा सहयोग

नई दिल्ली: भारत और पोलैंड के रिश्ते नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। भारत दौरे पर आए पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव व्लादिस्लाव तेओफिल बार्तोशेव्स्की ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक प्रगति की भी सराहना की और कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर लगातार मजबूत भूमिका निभा रहा है। अक्टूबर में भारत आएंगे पोलैंड के प्रधानमंत्री पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव ने बताया कि पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क अक्टूबर में भारत की यात्रा करेंगे। इस दौरे की तैयारियों को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा भारत-पोलैंड रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगी। रक्षा क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग बार्तोशेव्स्की ने कहा कि भारत और पोलैंड रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पोलैंड पहले ही भारत में ड्रोन निर्माण शुरू कर चुका है। अब दोनों देश संयुक्त रक्षा उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पोलैंड भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल का समर्थन करता है और भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिए तैयार है। भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते से बढ़ेगा कारोबार पोलैंड के अधिकारी ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का स्वागत करते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के बीच व्यापार को नई गति मिलेगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत और पोलैंड के बीच करीब 6 अरब यूरो का द्विपक्षीय व्यापार होता है, जिसे आने वाले वर्षों में और बढ़ाने की बड़ी संभावना है। भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना बार्तोशेव्स्की ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक और तकनीकी प्रगति की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का भारत का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन देश उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और आर्थिक सुधारों की भी प्रशंसा की। वैश्विक मुद्दों पर भारत के रुख का समर्थन पोलैंड के अधिकारी ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुला रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की बाधा स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम का विरोध किया और पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भारत के संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण की सराहना की। रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति का समर्थन करते हुए कहा कि पोलैंड की भी आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति है। इन क्षेत्रों में भी बढ़ेगा सहयोग पोलैंड ने भारत के साथ निम्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है- रक्षा और संयुक्त सैन्य उत्पादन ऊर्जा और हरित ऊर्जा स्वच्छ जल प्रबंधन अंतरिक्ष और सैटेलाइट तकनीक ड्रोन निर्माण तकनीकी नवाचार व्यापार और निवेश दोनों देशों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में और अधिक मजबूत होगी।  

Deepshikha जुलाई 14, 2026 0
Devotees performing Hindu rituals on Bhadli Navami, considered an auspicious Abujh Muhurat for weddings and new beginnings.
भड़ली नवमी 2026: क्यों कहा जाता है इसे ‘अबूझ मुहूर्त’? जानिए इस दिन बिना मुहूर्त देखे कौन-कौन से शुभ कार्य किए जाते हैं

हिंदू धर्म में भड़ली नवमी को वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में से एक माना जाता है। इस दिन को 'अबूझ मुहूर्त' की श्रेणी में रखा जाता है, यानी ऐसा शुभ दिन जब कई मांगलिक कार्यों के लिए अलग से पंचांग या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। वर्ष 2026 में भड़ली नवमी 22 जुलाई को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए शुभ कार्यों से सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए यह तिथि विशेष मानी जाती है। क्या होता है 'अबूझ मुहूर्त'? 'अबूझ मुहूर्त' का अर्थ है ऐसा शुभ समय जिसमें पूरे दिन किसी भी समय मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। मान्यता है कि भड़ली नवमी पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति शुभ कार्यों के लिए अनुकूल रहती है, इसलिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी वजह से देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इस दिन अपने महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत करना शुभ मानते हैं। भड़ली नवमी पर कौन-कौन से कार्य किए जाते हैं? धार्मिक परंपराओं के अनुसार भड़ली नवमी पर कई शुभ कार्य किए जा सकते हैं, जैसे— विवाह गृह प्रवेश नए व्यापार की शुरुआत भूमि पूजन संपत्ति खरीदना वाहन खरीदना आभूषण खरीदना नामकरण संस्कार यज्ञ एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान मान्यता है कि इस दिन शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं कम आती हैं और सफलता की संभावना बढ़ जाती है। क्यों मानी जाती है इतनी शुभ? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भड़ली नवमी सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक है। इसलिए इस दिन किए गए मांगलिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं। इसी कारण इसे हिंदू पंचांग की सबसे शुभ तिथियों में शामिल किया जाता है और कई परिवार वर्षों से इस दिन महत्वपूर्ण धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजन करते आ रहे हैं। इस दिन किन बातों का रखें ध्यान? भड़ली नवमी के दिन कुछ धार्मिक परंपराओं का पालन करने की भी सलाह दी जाती है। भगवान विष्णु और मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करें। यदि परिवार या निकट संबंधियों में शोक की स्थिति हो, तो मांगलिक कार्य टालने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। किसी बड़े धार्मिक या पारिवारिक आयोजन से पहले अपने परिवार की परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का भी ध्यान रखें। धार्मिक महत्व भड़ली नवमी केवल एक शुभ तिथि ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। इस दिन शुभ कार्य करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होने का विश्वास है। यही वजह है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस तिथि का इंतजार करते हैं और अपने महत्वपूर्ण कार्य इसी दिन संपन्न करते हैं। नोट: भड़ली नवमी को 'अबूझ मुहूर्त' मानने की परंपरा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। किसी भी बड़े धार्मिक या पारिवारिक निर्णय से पहले स्थानीय परंपराओं या योग्य पुरोहित की सलाह लेना उचित माना जाता है।  

surbhi जुलाई 11, 2026 0
Dhamaal 4
'धमाल 4' ने बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार शुरुआत, पहले दिन दुनियाभर में ₹20 करोड़ से ज्यादा की कमाई

मुंबई, एजेंसियां। अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी और जावेद जाफरी स्टारर कॉमेडी फिल्म 'धमाल 4' ने रिलीज के पहले ही दिन बॉक्स ऑफिस पर शानदार शुरुआत की है। निर्देशक इंद्र कुमार की इस मल्टीस्टारर फिल्म ने पहले दिन भारत में करीब ₹13.5–13.75 करोड़ का नेट कलेक्शन किया, जबकि दुनियाभर में इसकी कमाई ₹20 करोड़ का आंकड़ा पार कर लगभग ₹21 करोड़ से अधिक पहुंच गई।   कॉमेडी का जादू दर्शकों को आया पसंद   लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर लौटी 'धमाल' फ्रेंचाइजी को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। फिल्म के हल्के-फुल्के हास्य, पुराने किरदारों की वापसी और दमदार स्टारकास्ट ने फैमिली ऑडियंस को सिनेमाघरों तक खींचने में अहम भूमिका निभाई। पहले दिन कई शहरों में शो के दौरान अच्छी ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई, जिससे वीकेंड पर कमाई में और तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।   वीकेंड से बढ़ी उम्मीदें   हालांकि फिल्म अपनी पिछली किस्त 'टोटल धमाल' की ओपनिंग को पीछे नहीं छोड़ सकी, लेकिन ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि सकारात्मक वर्ड ऑफ माउथ और छुट्टियों का फायदा मिलने पर फिल्म शुरुआती वीकेंड में मजबूत कारोबार कर सकती है। मेकर्स को उम्मीद है कि 'धमाल 4' आने वाले दिनों में घरेलू और विदेशी बाजारों में अपनी कमाई का ग्राफ और ऊपर ले जाएगी।

abhishek singh जुलाई 11, 2026 0
Bowl of Panchamrit and Charanamrit placed before Hindu deities during a traditional worship ritual.
चरणामृत और पंचामृत में क्या है अंतर? पूजा में दोनों का महत्व जानिए, ज्यादातर लोग कर देते हैं यह गलती

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान चरणामृत और पंचामृत का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि कई लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं, जबकि सनातन परंपरा में दोनों का अर्थ, बनाने की विधि और धार्मिक उपयोग अलग-अलग है। आइए जानते हैं कि चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है और पूजा के बाद इनके बचे हुए भाग का क्या करना चाहिए। चरणामृत क्या होता है? चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरणों का अमृत। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के चरणों का स्पर्श प्राप्त जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। चरणामृत तैयार करने के लिए आमतौर पर इन चीजों का उपयोग किया जाता है— स्वच्छ जल गंगाजल तुलसी के पत्ते चंदन मान्यता है कि चरणामृत का सेवन करने से मन को शांति मिलती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। इसे तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है। पंचामृत क्या होता है? पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत तत्वों का मिश्रण। इसका उपयोग मुख्य रूप से देवी-देवताओं के अभिषेक (स्नान) में किया जाता है। पंचामृत बनाने में सामान्यतः इन सामग्रियों का प्रयोग होता है— गाय का दूध दही घी शहद शक्कर (या मिश्री) कई परंपराओं में इसमें थोड़ी मात्रा में जल भी मिलाया जाता है। अभिषेक के बाद यही पंचामृत भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। चरणामृत और पंचामृत में मुख्य अंतर चरणामृत पंचामृत भगवान के चरणों का पवित्र जल माना जाता है पांच पवित्र पदार्थों से तैयार किया जाता है जल, गंगाजल, तुलसी और चंदन का उपयोग दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का उपयोग पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप दिया जाता है अभिषेक के लिए उपयोग होता है, फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है चांदी, कांसे या मिट्टी के पात्र में रखना शुभ माना जाता है बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत सिंक, नाली या किसी अपवित्र स्थान पर नहीं बहाना चाहिए। यदि पूजा के बाद यह बच जाए, तो इसे— तुलसी के पौधे में अर्पित करें। किसी पवित्र पौधे या स्वच्छ स्थान पर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ऐसा करना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। धार्मिक महत्व चरणामृत और पंचामृत दोनों ही हिंदू पूजा-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चरणामृत जहां भगवान के चरणों की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है, वहीं पंचामृत शुद्धता, समृद्धि और देवपूजन में श्रद्धा का प्रतीक है। दोनों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है और इन्हें श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा है.  

surbhi जुलाई 11, 2026 0
Rescue teams search through landslide debris at a Rohingya refugee camp in Cox's Bazar after heavy rainfall triggered a deadly slope collapse.
बांग्लादेश के रोहिंग्या कैंप में भूस्खलन का कहर, 8 बच्चों की मौत, कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका

कॉक्स बाजार: बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच बड़ा हादसा हो गया। उखिया उपजिले के शरणार्थी कैंप में पहाड़ी ढलान खिसकने से हुए भूस्खलन (लैंडस्लाइड) में आठ बच्चों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है। राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी है। भारी बारिश बनी हादसे की वजह लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ी इलाकों की मिट्टी कमजोर हो गई, जिसके चलते रोहिंग्या कैंप के पास पहाड़ी ढह गई। भूस्खलन की चपेट में कई अस्थायी झोपड़ियां आ गईं, जिससे कैंप में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने परिजनों की तलाश में घटनास्थल पर जुट गए। मलबे से लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू अभियान रिफ्यूजी रिलीफ एंड रिपैट्रिएशन कमिश्नर (RRRC) मिजाननुर रहमान ने बताया कि हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों और राहत टीमों की मदद से बचाव अभियान शुरू किया गया। मलबे में फंसे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास जारी है। हादसे में घायल हुए पांच बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। अधिकारियों का कहना है कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि अभी भी कई लोगों के लापता होने की सूचना है। प्रशासन ने जारी की चेतावनी पुलिस और प्रशासन ने बताया कि लगातार बारिश के कारण रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। बड़ी संख्या में शरणार्थी पहाड़ी ढलानों पर बनी अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा बना हुआ है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है और निगरानी बढ़ा दी गई है। राहत एजेंसियां सक्रिय हादसे के बाद सरकारी एजेंसियों, संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्थाओं और अन्य राहत संगठनों ने प्रभावित इलाके में राहत कार्य तेज कर दिया है। प्रभावित परिवारों को भोजन, दवाइयां, तिरपाल और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, मौसम सामान्य होने तक राहत एवं बचाव अभियान जारी रहेगा और जोखिम वाले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम तेज किया जाएगा.  

Deepshikha जुलाई 9, 2026 0
Devotees worship Lord Vishnu on Yogini Ekadashi while reading the sacred vrat katha with devotion.
योगिनी एकादशी 2026: व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक करें पाठ, भगवान विष्णु की कृपा से दूर होंगे कष्ट और मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इस वर्ष 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और योगिनी एकादशी व्रत कथा का श्रद्धा के साथ पाठ करने से पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मान्यता है कि इस एकादशी की महिमा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को किया था। योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व सनातन परंपरा में योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, उपवास, भजन-कीर्तन और व्रत कथा का पाठ करते हैं। मान्यता है कि यह व्रत अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित का अवसर प्रदान करता है और व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। योगिनी एकादशी व्रत कथा हेम माली की भूल बनी संकट का कारण पौराणिक कथा के अनुसार, अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनकी दैनिक पूजा के लिए हेम माली नामक सेवक मानसरोवर से ताजे फूल लाया करता था। हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह फूल लेकर लौट तो आया, लेकिन पूजा स्थल पहुंचने के बजाय अपनी पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर फूल नहीं पहुंचा सका। कुबेर के श्राप से बदल गई किस्मत जब पूजा का समय बीतने लगा और फूल नहीं पहुंचे, तो कुबेर ने कारण का पता लगाया। उन्हें जब हेम माली की लापरवाही का पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उसे श्राप दे दिया कि वह स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर जाएगा, कुष्ठ रोग से पीड़ित होगा और पत्नी के वियोग का दुख सहेगा। श्राप के प्रभाव से हेम माली तत्काल स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर रोगग्रस्त हो गया और वह अपनी पत्नी से भी अलग हो गया। वह लंबे समय तक जंगलों में दुख और कष्ट भरा जीवन बिताने लगा। महर्षि मार्कण्डेय ने बताया मुक्ति का मार्ग भटकते-भटकते एक दिन हेम माली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा और अपनी पूरी व्यथा सुनाई। महर्षि ने उसे सलाह दी कि वह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करे और भगवान विष्णु की आराधना करे। उन्होंने बताया कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। व्रत के प्रभाव से मिला नया जीवन हेम माली ने महर्षि के निर्देशानुसार पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और रात्रि जागरण भी किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया। उसे अपना दिव्य स्वरूप वापस प्राप्त हुआ और वह पुनः स्वर्ग लौटकर अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताने लगा। क्या संदेश देती है यह कथा? योगिनी एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि जीवन में कर्तव्य, अनुशासन और ईश्वर भक्ति का विशेष महत्व है। यदि व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सच्चे मन से भगवान विष्णु की आराधना करे, तो उसे अपने कर्मों का प्रायशित करने और जीवन में नई शुरुआत करने का अवसर मिल सकता है। धार्मिक सूचना: यह लेख पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। आस्था और विश्वास व्यक्तिगत विषय हैं।  

surbhi जुलाई 9, 2026 0
Lord Krishna with Radha, Sudama, Arjuna, and Govardhan, symbolizing love, friendship, duty, and righteousness.
भगवान श्रीकृष्ण: हर रिश्ते को प्रेम, कर्तव्य और सम्मान से निभाने वाले आदर्श पुरुष

भगवान श्रीकृष्ण को सनातन धर्म में केवल विष्णु के अवतार के रूप में ही नहीं, बल्कि ऐसे आदर्श व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता है जिन्होंने जीवन के हर रिश्ते को प्रेम, समर्पण और जिम्मेदारी के साथ निभाया। मित्रता, परिवार, प्रेम, गुरु-भक्ति और धर्म पालन—हर क्षेत्र में उनका जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सच्ची मित्रता का सबसे बड़ा उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण उनके बाल सखा सुदामा हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद श्रीकृष्ण ने सुदामा का हमेशा सम्मान किया और बिना किसी अपेक्षा के उनकी सहायता की। वहीं अर्जुन के साथ उनका रिश्ता केवल मित्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने जीवन के कठिन समय में उनके मार्गदर्शक और सारथी बनकर धर्म का मार्ग दिखाया। श्रीदामा और बड़े भाई बलराम के साथ भी श्रीकृष्ण का संबंध प्रेम, विश्वास और सहयोग का प्रतीक माना जाता है। राधा-कृष्ण का प्रेम भक्ति का प्रतीक श्रीकृष्ण और राधा का संबंध भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह प्रेम सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के मिलन का संदेश देता है। वृंदावन की गोपियों के साथ उनकी रासलीला भी ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण की भावना को दर्शाती है। परिवार के प्रति निभाई हर जिम्मेदारी धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियां थीं—रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, नाग्नजिति, भद्रा और लक्ष्मणा। उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों का सदैव संतुलित ढंग से निर्वहन किया और सभी के प्रति समान सम्मान का भाव रखा। माता-पिता और भाई के प्रति अटूट सम्मान श्रीकृष्ण का जन्म देवकी और वसुदेव के घर हुआ, लेकिन उनका पालन-पोषण नंद बाबा और यशोदा माता ने किया। उन्होंने दोनों परिवारों के प्रति समान प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता दिखाई। बड़े भाई बलराम के साथ उनका रिश्ता भी आदर्श भाईचारे का उदाहरण माना जाता है, जिसमें सहयोग, विश्वास और सम्मान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। हर रिश्ते में निभाया कर्तव्य श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में बुआ कुंती, बहन सुभद्रा, भांजे अभिमन्यु और पांडवों के साथ हर संबंध को पूरी जिम्मेदारी से निभाया। महाभारत के कठिन समय में उन्होंने अपने प्रियजनों को सही मार्ग दिखाया और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का किया अंत जहां श्रीकृष्ण ने प्रेम और करुणा का संदेश दिया, वहीं अधर्म और अन्याय के विरुद्ध कठोर रुख भी अपनाया। उन्होंने कंस, शिशुपाल, नरकासुर और कालिय नाग जैसे अत्याचारियों का अंत कर समाज में धर्म और न्याय की स्थापना की। आदर्श शिष्य और जनरक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण कर आदर्श शिष्य होने का उदाहरण प्रस्तुत किया। गुरु-दक्षिणा के रूप में उन्होंने उनके पुत्र को वापस लाकर अपनी गुरु भक्ति का परिचय दिया। वहीं, गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने वृंदावनवासियों की रक्षा की और यह संदेश दिया कि सच्चा नेतृत्व हमेशा अपने लोगों की सुरक्षा और कल्याण के लिए समर्पित होता है। श्रीकृष्ण का जीवन देता है यह संदेश भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन सिखाता है कि किसी भी रिश्ते की नींव प्रेम, विश्वास, सम्मान और कर्तव्य पर टिकी होती है। मित्रता हो, परिवार हो, गुरु का सम्मान हो या समाज के प्रति जिम्मेदारी—हर संबंध को ईमानदारी और निष्ठा से निभाना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।  

surbhi जुलाई 9, 2026 0
Doctors at Indraprastha Apollo Hospital in New Delhi perform a successful liver transplant on twin brothers from the Philippines with liver donations from their mother and uncle.
फिलीपींस के जुड़वां भाइयों को दिल्ली में मिली नई जिंदगी, मां और मामा ने किया लिवर दान

नई दिल्ली: दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ और जटिल लिवर ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम देकर फिलीपींस के जुड़वां भाइयों को नई जिंदगी दी है। जन्मजात गंभीर बीमारी से जूझ रहे दोनों बच्चों का सफल लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट किया गया, जिसमें उनकी मां और मामा ने अपने लिवर का हिस्सा दान किया। जन्मजात बीमारी से जूझ रहे थे दोनों बच्चे एएनआई के मुताबिक, फिलीपींस के जुड़वां भाई केली और टायलर जन्म से ही 'कोलेडोकल सिस्ट' (Choledochal Cyst) नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थे। यह बीमारी पित्त नलिकाओं (बाइल डक्ट) को प्रभावित करती है और समय के साथ लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। डॉक्टरों के अनुसार, दोनों बच्चों का लिवर इस बीमारी से इतना प्रभावित हो चुका था कि उनके इलाज के लिए लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था। एक लाख में एक को होती है यह बीमारी इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के ट्रांसप्लांट एवं सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. नीरव गोयल ने बताया कि जुड़वां बच्चों में एक साथ इस बीमारी का होना बेहद दुर्लभ है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी लगभग एक लाख बच्चों में किसी एक को होती है। इनमें भी केवल करीब 10 प्रतिशत मरीजों में लिवर इतना खराब होता है कि प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। मां और मामा बने जीवनदाता इलाज के दौरान बच्चों के माता-पिता ने लिवर दान करने की इच्छा जताई। जांच में पिता चिकित्सकीय रूप से दान के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए। इसके बाद बच्चों की मां और उनके मामा ने आगे आकर अपने-अपने लिवर का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा दान किया। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने दोनों बच्चों का सफल ट्रांसप्लांट किया, जिसके बाद उनकी हालत में तेजी से सुधार हुआ। अब सामान्य जीवन जी सकेंगे दोनों भाई डॉ. नीरव गोयल ने बताया कि लिवर मानव शरीर का ऐसा अंग है, जो समय के साथ दोबारा विकसित होने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि दानदाता और मरीज, दोनों का लिवर धीरे-धीरे सामान्य आकार में लौट आता है। सफल सर्जरी के बाद केली और टायलर पूरी तरह स्वस्थ हैं और अब सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी सकेंगे। भारत की चिकित्सा विशेषज्ञता को मिली नई पहचान अस्पताल का कहना है कि यह दुर्लभ ट्विन लिवर ट्रांसप्लांट भारत की उन्नत चिकित्सा तकनीक, विशेषज्ञ डॉक्टरों और अंग प्रत्यारोपण क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस सफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता को एक बार फिर मजबूत किया है।  

Deepshikha जुलाई 9, 2026 0
Devotee offering prayers to a spiritual guru during Guru Purnima, symbolizing the sacred tradition of Guru Mantra and devotion.
Guru Purnima 2026: गुरु मंत्र को क्यों रखा जाता है अत्यंत गोपनीय? जानिए शास्त्रों में बताए गए आध्यात्मिक नियम और इसका महत्व

गुरु पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति पर आपकी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा हो, उसी को अपना गुरु बनाना चाहिए। एक बार गुरु से दीक्षा और गुरु मंत्र प्राप्त होने के बाद शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की आज्ञा का पालन करे, उनके बताए मार्ग पर चले और गुरु मंत्र को सदैव गोपनीय रखे। गुरु मंत्र को गोपनीय रखने की परंपरा क्यों है? धर्मग्रंथों में गुरु मंत्र को अत्यंत गोपनीय रखने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गुरु द्वारा दिया गया मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं होता, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना का माध्यम होता है। शास्त्रों के अनुसार, गुरु मंत्र की शक्ति तभी प्रभावी होती है जब साधक उसका नियमित और निष्ठापूर्वक जप करता है तथा उसे अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने प्रकट नहीं करता। प्रकृति भी देती है यही संदेश धार्मिक व्याख्याओं में गुरु मंत्र की तुलना प्रकृति के नियमों से की गई है। जैसे— बीज मिट्टी के भीतर छिपकर ही विशाल वृक्ष बनता है। गर्भ में पल रहा जीवन पूर्ण विकसित होने तक सुरक्षित और गोपनीय रहता है। संचित ऊर्जा समय आने पर सबसे अधिक प्रभावशाली रूप में प्रकट होती है। उसी प्रकार गुरु मंत्र भी साधक के अंतर्मन में मौन रूप से विकसित होने वाली आध्यात्मिक शक्ति माना जाता है। इसलिए इसे गोपनीय रखने की परंपरा बनाई गई है। गुरु मंत्र सार्वजनिक करने से क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि साधक बार-बार अपने गुरु मंत्र की चर्चा करता है, तो उसका ध्यान साधना से हटकर दूसरों की प्रतिक्रिया, प्रशंसा, शंका या तुलना की ओर जा सकता है। ऐसी स्थिति में साधना का केंद्र भीतर की बजाय बाहर हो जाता है, जिससे आध्यात्मिक एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण गुरु मंत्र को निजी साधना का विषय माना गया है। शास्त्रों में क्या कहा गया है? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति के कल्याण के लिए कुछ बातों को सदैव गोपनीय रखना चाहिए और उनमें गुरु मंत्र प्रमुख है। मान्यता के अनुसार— गुरु मंत्र किसी भी व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। परिवार, मित्र या परिचितों के बीच भी इसे साझा नहीं करना चाहिए। गुरु द्वारा दी गई मंत्र-जप की विशेष विधि भी गोपनीय रखनी चाहिए। गुरु के निर्देशों का श्रद्धापूर्वक पालन करना ही शिष्य का धर्म माना गया है। पति-पत्नी को भी गुरु मंत्र साझा न करने की सलाह परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि पति ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे अपनी पत्नी को भी वह मंत्र नहीं बताना चाहिए। इसी प्रकार यदि पत्नी ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे भी अपने पति के साथ मंत्र साझा नहीं करना चाहिए। इसी कारण कई परंपराओं में पति-पत्नी एक साथ गुरु से मंत्र दीक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि दोनों अपनी-अपनी साधना गुरु के निर्देशानुसार कर सकें। एक गुरु और एक मंत्र पर निष्ठा का महत्व धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार पूर्ण श्रद्धा के साथ किसी एक आराध्य की उपासना करने से साधक को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है, उसी प्रकार एक गुरु से प्राप्त गुरु मंत्र का नियमित जप और गुरु के प्रति अटूट निष्ठा साधना को सफल बनाने का माध्यम माना गया है।  

surbhi जुलाई 1, 2026 0
Devotees worshipping Lord Vishnu during Nirjala Ekadashi with kalash, tulsi leaves and traditional rituals
निर्जला एकादशी 2026: व्रत पारण का शुभ समय, संपूर्ण विधि और पद्म पुराण में बताए गए नियम

नई दिल्ली: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत सबसे महत्वपूर्ण और पुण्यदायी एकादशी व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे अत्यंत विशेष स्थान दिया गया है। पद्म पुराण और धर्मशास्त्रों में भी इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि महाभारत काल में भीमसेन ने इसी व्रत का पालन किया था। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करना आवश्यक माना गया है। निर्जला एकादशी व्रत पारण का शुभ समय धार्मिक पंचांग के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 26 जून 2026, शुक्रवार को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय: सुबह 5:41 बजे से 8:25 बजे तक धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर व्रत खोलना शुभ माना जाता है। समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। क्यों खास है निर्जला एकादशी? मान्यता है कि जो व्यक्ति सभी एकादशी व्रत नहीं कर पाता, वह श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखकर वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह व्रत पापों का नाश करने वाला, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला और मोक्षदायक माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार व्रत पारण की संपूर्ण विधि 1. प्रातःकाल स्नान और शुद्धि द्वादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त या सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. भगवान विष्णु की पूजा स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें। पूजा में गंध, धूप, दीप, पुष्प और सुंदर वस्त्र अर्पित करें। 3. जल कलश का संकल्प पद्म पुराण में जल से भरे घड़े के दान का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के समय जल से भरे कलश का संकल्प करें। 4. मंत्र का उच्चारण जल के घड़े का संकल्प करते समय यह मंत्र बोलें— "देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥" अर्थ: हे संसार सागर से पार लगाने वाले भगवान हृषीकेश! इस जलघट के दान से मुझे परम गति प्रदान करें। 5. दान और ब्राह्मण भोजन पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। 6. व्रत पारण ब्राह्मण भोजन और पूजा के पश्चात स्वयं व्रत का पारण करें। परंपरा के अनुसार व्रत सबसे पहले जल और तुलसी दल ग्रहण करके खोला जाता है। इसके बाद सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। व्रत करने से क्या मिलता है फल? पद्म पुराण के अनुसार विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत और द्वादशी पर पारण करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। साथ ही उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद, सुख-समृद्धि, पारिवारिक खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।  

surbhi जून 25, 2026 0
Devotees worship Lord Vishnu during Nirjala Ekadashi with lamps, tulsi leaves, and traditional offerings.
Nirjala Ekadashi 2026: कब है निर्जला एकादशी? जानिए क्यों इस एक व्रत से मिलता है पूरे साल की 24 एकादशियों का पुण्य

Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।

surbhi जून 23, 2026 0
Tulsi leaves and Gangajal offered during Hindu last rites as described in Garuda Purana
गरुड़ पुराण: मृत्यु के समय मुंह में तुलसी और गंगाजल क्यों डाला जाता है? जानिए इसका आध्यात्मिक रहस्य

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है। इनमें अंतिम संस्कार को अंत्येष्टि संस्कार कहा जाता है। मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गरुड़ पुराण में इस परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं। मृत्यु के समय तुलसी का पत्ता रखने का महत्व गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है तो उसकी आत्मा शरीर छोड़ने की तैयारी करती है। मान्यता है कि उस समय यमदूत जीवात्मा को लेने आते हैं, जिससे आत्मा भयभीत हो सकती है। शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय माना गया है और इसे ‘हरिप्रिया’ कहा जाता है। माना जाता है कि मृत्यु के समय यदि व्यक्ति के मुख, सिर या छाती पर तुलसी का पत्ता रखा जाए तो यमदूत उसके पास नहीं आते। इसके बजाय भगवान विष्णु के दूत उसकी आत्मा का मार्गदर्शन करते हैं और उसे शुभ लोकों की ओर ले जाते हैं। गंगाजल को क्यों माना गया है मोक्षदायी? सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि मां गंगा का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगाजल अत्यंत पवित्र होता है और यह व्यक्ति के पापों का नाश करने वाला माना गया है। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि यदि मृत्यु के समय गंगाजल की कुछ बूंदें व्यक्ति के कंठ से नीचे उतर जाएं तो उसके जीवनभर के अनेक पापों का क्षय होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यमलोक की यातनाओं से मुक्ति की मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी और गंगाजल का स्पर्श आत्मा को शांति प्रदान करता है। यह माना जाता है कि इनके प्रभाव से आत्मा को यमलोक की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता और उसे शुभ गति प्राप्त होती है। शास्त्रों में वर्णित श्लोक गरुड़ पुराण में इस परंपरा के महत्व को दर्शाते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है— तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले। स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः।। अर्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल का सेवन करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है, जहां पहुंचने के बाद उसे पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं आना पड़ता। धार्मिक आस्था और परंपरा का संगम तुलसी और गंगाजल से जुड़ी यह परंपरा हिंदू धर्म में आस्था, श्रद्धा और मोक्ष की अवधारणा से गहराई से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी अधिकांश हिंदू परिवार मृत्यु के अंतिम क्षणों में अपने प्रियजनों को तुलसी और गंगाजल अर्पित करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति और शुभ गति प्राप्त हो सके।  

surbhi जून 16, 2026 0
Devotees worshipping Lord Rama, Lakshmana and Goddess Sita on Adhik Ram Lakshman Dwadashi.
अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी कब है? जानें सही तिथि, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाने वाली अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी इस वर्ष 12 जून 2026 को पड़ रही है। इस बार यह तिथि कई शुभ योगों के साथ आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और उन्मीलिनी महाद्वादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की होती है विशेष पूजा अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन भगवान श्रीराम, उनके अनुज लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व भाईचारे, पारिवारिक प्रेम और धर्म के आदर्श मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। 'चंपक द्वादशी' के नाम से भी प्रसिद्ध है यह पर्व अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी को "चंपक द्वादशी" भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, श्रीराम या श्रीकृष्ण को चंपा के फूल अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और चंपा के फूल अर्पित करें। मौसमी फल और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। दीपक और धूप जलाकर रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें। श्रीराम के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व रुके हुए कार्यों में मिलती है सफलता मान्यता है कि इस दिन श्रीराम और लक्ष्मण जी की पूजा करने से लंबे समय से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने लगती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। परिवार में बढ़ता है प्रेम और सौहार्द यह पर्व भगवान राम और लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भाइयों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है। अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति पुरुषोत्तम मास में किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से दरिद्रता दूर होने की मान्यता है और साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धा और भक्ति का विशेष दिन अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाने वाली मानी जाती है।  

surbhi जून 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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