रांची। झारखंड में प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। थोड़ी ही देर में शोभा यात्रा भी निकाली जायेगी। इसे लेकर लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है। इस खास अवसर पर साल (सखुआ) वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। आदिवासी समाज की मान्यता के अनुसार इसी वृक्ष में सरना मां का वास होता है, जो गांव और प्रकृति की रक्षा करती हैं। सरना स्थल पर सखुआ और महुआ के फूलों से पूजा-अर्चना कर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। गांव के पाहन (पुजारी) विधि-विधान से पूजा करते हैं और मिट्टी के घड़ों में पवित्र जल भरते हैं। परंपरा के अनुसार, इन घड़ों के जल स्तर के आधार पर वर्षा का अनुमान लगाया जाता है पानी कम होने पर कम बारिश और यथावत रहने पर अच्छी वर्षा का संकेत माना जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी समाज में इसकी गहरी आस्था है। शोभा यात्रा की तैयारी राजधानी रांची में सरहुल पर्व की खास रौनक देखने को मिलती है। हातमा स्थित सरना स्थल में पूजा के बाद आदिवासी समाज के लोग सिरमटोली तक भव्य शोभायात्रा निकालते हैं, जिसकी शुरुआत दोपहर दो बजे से होती है। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग नृत्य और गीत के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करते हैं। रांची में सरहुल शोभायात्रा की शुरुआत वर्ष 1967 में कार्तिक उरांव के नेतृत्व में हुई थी। इसका उद्देश्य आदिवासी जमीन, परंपरा और संस्कृति की रक्षा करना था। आज यह शोभायात्रा पूरे राज्य की पहचान बन चुकी है। सरहुल के अवसर पर गांवों के अखड़ा में सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है, जिसमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे लोग इस पर्व को सामूहिकता और प्रकृति के प्रति सम्मान के रूप में मनाते हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम इसी बीच, सरहुल और ईद को देखते हुए रांची में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। शहर के प्रमुख स्थानों पर ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों के जरिए निगरानी की जा रही है। एसएसपी राकेश रंजन के अनुसार, पुलिस मुख्यालय से अतिरिक्त बल तैनात किया गया है। जिला पुलिस के साथ-साथ आईआरबी, जैप, होमगार्ड्स और केंद्रीय बलों के जवानों को संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया है, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था से निपटा जा सके। ट्रैफिक रूट में बदलाव सरहुल शोभायात्रा के मद्देनजर शहर के कई प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रतिबंध लागू किया गया है। कांके रोड, रातू रोड, बोड़ेया रोड से लेकर रेडियम चौक, शहीद चौक, अलबर्ट एक्का चौक, मेन रोड, सुजाता चौक और मुंडा चौक होते हुए सिरमटोली सरना स्थल तक वाहनों का परिचालन बंद रहेगा। इसके अलावा नामकुम, खूंटी रोड, बिरसा चौक, डोरंडा ओवरब्रिज और अरगोड़ा-हरमू-कडरू मार्ग पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। रात 10:30 बजे तक रांची शहर में भारी वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक रहेगी और उन्हें रिंग रोड से गुजरने का निर्देश दिया गया है। दोपहर 12:30 बजे से एसएसपी आवास चौक, कचहरी चौक, शहीद चौक, जाकिर हुसैन पार्क, कमिश्नर चौक, अपर बाजार, चडरी तालाब, पुरुलिया रोड, चर्च रोड, कर्बला और राजेंद्र चौक सहित कई प्रमुख मार्गों पर आवागमन बंद रहेगा। इन रास्तों पर केवल शोभायात्रा से जुड़े वाहन ही चल सकेंगे। ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष डायवर्जन प्लान लागू किया गया है। सर्कुलर रोड से आने वाले वाहन केवल जेल चौक तक ही जा सकेंगे, जबकि जमशेदपुर रोड से आने वाले वाहनों को चुटिया-केतारी बगान होते हुए बहुबाजार की ओर मोड़ा जाएगा। कांटाटोली और पिस्का मोड़ से आने वाले वाहनों के लिए भी वैकल्पिक मार्ग निर्धारित किए गए हैं।
रांची। झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में आज प्रकृति पर्व सरहुल पूरे उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व सूर्य और पृथ्वी के मिलन का प्रतीक माना जाता है और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर होता है। इस दिन विशेष रूप से साल (सखुआ) वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसे आदिवासी समाज में पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इसी वृक्ष में सरना मां का वास होता है, जो गांव और लोगों की प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करती हैं। पूजा-विधि और वर्षा की पारंपरिक भविष्यवाणी सरहुल के अवसर पर गांव के पाहन (पुजारी) सरना स्थल पर विधि-विधान से पूजा करते हैं। इस दौरान मिट्टी के घड़ों में पवित्र जल भरा जाता है। इन घड़ों के पानी के स्तर को देखकर वर्षा का अनुमान लगाया जाता है। यदि पानी कम हो जाए तो कम बारिश की संभावना मानी जाती है, जबकि पानी जस का तस रहने पर अच्छी वर्षा का संकेत समझा जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी समाज में इसका विशेष महत्व है। रांची में भव्य शोभायात्रा की तैयारी राजधानी रांची में सरहुल पर्व की खास रौनक देखने को मिलती है। हातमा स्थित सरना स्थल में पूजा के बाद सिरमटोली तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी, जिसकी शुरुआत दोपहर दो बजे से होगी। पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग ढोल-नगाड़ों के साथ नृत्य और गीत प्रस्तुत कर अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। इस शोभायात्रा की शुरुआत 1967 में कार्तिक उरांव के नेतृत्व में हुई थी, जिसका उद्देश्य आदिवासी संस्कृति और जमीन की रक्षा करना था। सामूहिक नृत्य और सांस्कृतिक उत्सव सरहुल के दौरान गांव के अखड़ा में सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है। इसमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे लोग गीत-संगीत के साथ उत्सव मनाते हैं, जो सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। सुरक्षा के कड़े इंतजाम पर्व और ईद को देखते हुए रांची में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है। पुलिस के साथ-साथ अतिरिक्त बल, आईआरबी, जैप और केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था को रोका जा सके। ट्रैफिक व्यवस्था में बदलाव शोभायात्रा के मद्देनजर शहर के कई प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रतिबंधित रहेगा। कांके रोड, मेन रोड, अलबर्ट एक्का चौक सहित कई इलाकों में दोपहर 12:30 बजे से आवागमन बंद रहेगा। भारी वाहनों के प्रवेश पर रात 10:30 बजे तक रोक रहेगी और उन्हें रिंग रोड से गुजरने का निर्देश दिया गया है। प्रशासन ने लोगों से वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करने की अपील की है।
रांची। आदिवासियों के सबसे बड़े प्रकृति पर्व सरहुल 2026 का आगाज राजधानी रांची सहित पूरे प्रदेश में उत्सव और भक्ति के माहौल के साथ हुआ। पर्व की शुरुआत शुक्रवार को ‘केकड़ा पकड़ाई’ और ‘जल रखाई’ जैसी पारंपरिक रस्मों के साथ की गई। इस परंपरा के अनुसार परिवार का एक सदस्य उपवास रखेगा और शाम के समय जलाशय से दो नए घड़ों में जल भरकर सरना स्थल पर रखा जाएगा। इस जल के स्तर से आने वाले वर्ष की बारिश और फसल का अनुमान लगाया जाता है। शहर में सजावट और तैयारियां: रांची के प्रमुख मार्गों और सरना स्थलों को रंगीन लाइटों, पारंपरिक पेंटिंग और लोक कला से सजाया गया है। अल्बर्ट एक्का चौक पर स्वागत मंच बनाए गए हैं, जहां पुष्प वर्षा के साथ श्रद्धालुओं का अभिनंदन किया जाएगा। शनिवार को राजधानी के 298 विभिन्न सरना स्थलों से श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते मुख्य शोभायात्रा में शामिल होंगे। खोड़हा दलों की थाप और मांदर की गूंज से पूरा शहर गूंजायमान रहेगा। प्रकृति संरक्षण का संदेश इसके साथ ही प्रकृति संरक्षण के संदेश के लिए राजधानी रांची में 20 से 22 मार्च तक ‘प्रकृति 2026’ अखिल भारतीय बसंत कला शिविर का आयोजन होगा। इस कार्यक्रम में देशभर के कलाकार जंगल, जल और जैव विविधता जैसे विषयों पर अपनी कला के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देंगे। मुख्य आकर्षण लाइव पेंटिंग होगा, जिसमें कलाकार मौके पर चित्र बनाकर पर्यावरण संरक्षण के महत्व को दर्शाएंगे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को प्रकृति के महत्व से जोड़ना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार ने बताया कि यह आयोजन कला और पर्यावरण के बीच मजबूत संबंध स्थापित करेगा तथा लोगों को प्रकृति के करीब लाने में सहायक होगा।
रांची। झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। हर साल बसंत ऋतु में यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। झारखंड के गांवों से लेकर राजधानी रांची तक सरहुल की तैयारियां जोरों से चलती हैं। इस पर्व के दौरान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना, गीत-संगीत और नृत्य का आयोजन होता है। पहला हैं मुंडा समाज का बहा पोरोब मुंडा समुदाय में सरहुल को “बाहा पोरोब” कहा जाता है। यह पर्व सखुआ, साल या सरजोम वृक्ष के नीचे स्थित सरना स्थल पर मनाया जाता है। पूजा की सारी धार्मिक विधियां पुरोहित द्वारा संपन्न की जाती हैं। जब सखुआ के पेड़ों पर फूल आ जाते हैं, तब गांव के लोग एक निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाते हैं। इस पर्व से पहले गांव के पहान (पुरोहित) उपवास रखते हैं। पूजा के दौरान सबसे पहले सिंगबोंगा परमेश्वर, फिर पूर्वजों और ग्राम देवता की आराधना की जाती है। पूजा समाप्त होने के बाद लोग नाचते-गाते हुए पहान को उनके घर तक पहुंचाते हैं। दूसरा हैं हो समुदाय का बा पोरोब हो समुदाय में इस पर्व को “बा पोरोब” कहा जाता है, जिसका अर्थ फूलों का त्योहार होता है। यह पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन “बा गुरि” के दौरान नए घड़े में तैयार भोजन को मृत आत्माओं, पूर्वजों और ग्राम देवता को अर्पित किया जाता है। दूसरे दिन जंगल से साल के पेड़ की डालियां फूलों सहित लाकर पूजा की जाती है और इन्हें घर के आंगन या चौखट पर लगाया जाता है। तीसरे दिन “बा बसि” में पूजन सामग्री का विसर्जन किया जाता है और रात में सामूहिक नृत्य-गान होता है। तीसरा हैं उरांव समाज का खेखेल बेंजा उरांव समुदाय में सरहुल के दिन सूर्य और धरती के प्रतीकात्मक विवाह की परंपरा निभाई जाती है, जिसे “खेखेल बेंजा” कहा जाता है। इस अनुष्ठान का प्रतिनिधित्व उरांव पुरोहित नयगस और उनकी पत्नी नगयिनी करते हैं। सरहुल पूजा से पहले धरती को कुंवारी कन्या के रूप में माना जाता है। पूजा के दौरान पहान सरना स्थल पर तीन मुर्गों की बलि देते हैं और खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। साथ ही पहान घड़े के पानी के आधार पर उस वर्ष की बारिश का अनुमान भी लगाते हैं। चौथा हैं संथाल समाज का बाहा पर्व संथाल समुदाय में सरहुल को “बाहा” पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस समुदाय में साल और महुआ के पेड़ों को देवता का रूप मानकर पूजा की जाती है। यह पर्व फागुन महीने में शुरू होकर पूरे महीने चलता है। पूजा के दौरान जाहेरथान (पूजा स्थल) में पारंपरिक विधि से ईष्ट देव की आराधना की जाती है। मुर्गा बलि के बाद खिचड़ी का प्रसाद बांटा जाता है। बाहा नृत्य इस पर्व की खास पहचान है, जिसमें महिलाएं नृत्य करती हैं और पुरुष पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाते हैं। पांचवा हैं खड़िया समुदाय का जांकोर पर्व खड़िया समुदाय इस पर्व को “जांकोर” के नाम से मनाता है। इसका अर्थ है फलों और बीजों के क्रमिक विकास का उत्सव। यह पर्व फागुन पूर्णिमा से एक दिन पहले शुरू होता है। इस दौरान पुरुष शिकार के लिए जाते हैं और शाम को दो नए घड़ों में पानी लाकर रखा जाता है। अगले दिन पहान पूजा के बाद बलि देते हैं और घड़े के पानी को देखकर वर्षा का अनुमान लगाते हैं। सरहुल के दौरान पूरे गांव में उत्सव का माहौल रहता है। दिनभर की मेहनत के बाद रात में गांव के लोग अखड़ा में एकत्र होकर मांदर और नगाड़े की थाप पर नृत्य करते हैं। बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला यह पर्व खुशियों और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस समय प्रकृति अपने यौवन पर होती है और जंगल फल-फूल से भर जाते हैं। आदिवासी समाज का मानना है कि प्रकृति कभी किसी को भूखा नहीं रहने देती, इसलिए सरहुल पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी एक माध्यम है।
रांची। “जे नाची से बांची”, जिसका अर्थ है “जो नाचेगा वही बचेगा।” इस कहावत के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि लोकनृत्य और सांस्कृतिक परंपराएं ही समाज की पहचान और अस्तित्व को जीवित रखती हैं। झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व केवल प्रकृति पूजा का त्योहार ही नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का जीवंत उत्सव भी है। इस पर्व के दौरान लोकनृत्य, गीत-संगीत और पारंपरिक वेशभूषा की विशेष झलक देखने को मिलती है। सरहुल का अर्थ और परंपरा प्रकृति पर्व सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सर’ और ‘हूल’। ‘सर’ का अर्थ है सखुआ या साल का फूल, जबकि ‘हूल’ का अर्थ क्रांति या परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है। इस तरह सखुआ फूल के खिलने के साथ प्रकृति में आने वाले नए बदलाव को ही सरहुल कहा जाता है। यह पर्व झारखंड के अलावा ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है। मुंडारी, संथाली और हो भाषा में इसे ‘बा’ या ‘बाहा पोरोब’ कहा जाता है, जबकि खड़िया भाषा में ‘जांकोर’ और कुड़ुख भाषा में ‘खद्दी’ या ‘खेखेल बेंजा’ कहा जाता है। पूजा की विधि और पाहन की भूमिका इस पूजा की खास बात यह है कि मुख्य पूजा गांव के धर्मगुरु, जिन्हें ‘पाहन’ कहा जाता है, उनके द्वारा कराई जाती है। पाहन सरना स्थल पर विधि-विधान से सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा यानी सृष्टिकर्ता देवता की पूजा करते हैं और गांव की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस दौरान ग्राम देवता को रंगा हुआ मुर्गा अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। पूजा के माध्यम से पाहन गांव को बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करते हैं।सरहुल पर्व से जुड़ी एक अनोखी परंपरा भी है। वर्षा की भविष्यवाणी की परंपरा पूजा के बाद शाम को विभिन्न मौजा के पाहनों के द्वारा ढोल-मांदर बजाते हुए कुएं या तालाब से दो घड़ा पानी लाकर जल रखाई की रस्म निभाई जाती है। गांव के नदी, तालाब या कुएं से दो घड़े में पानी लाकर सरना स्थल की उत्तर और दक्षिण दिशा में रखा जाता है। पानी की गहराई को साल के तने से नापा जाता है। जिसके बाद दूसरे दिन घड़े में पानी को उसी तने से ही नापा जाता है। घड़े में पानी के कम होने या नहीं होने की स्थिति पर उस साल वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व प्रकृति और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इस पर्व में विशेष रूप से सखुआ (साल) के पेड़ की पूजा की जाती है। केकड़ा पकड़ने की अनोखी परंपरा इस पर्व से एक दिन पहले उपवास रखकर केकड़ा और मछली पकड़ने की परंपरा निभाई जाती है। कई जगहों पर घर के नए दामाद या बेटे तालाब से केकड़ा पकड़ते हैं। उस केकड़े को साल के पत्तों में लपेटकर घर में सुरक्षित रखा जाता है। बाद में आषाढ़ महीने में बीज बोने के समय केकड़े का चूर्ण बनाकर बीज के साथ खेतों में मिलाया जाता है। मान्यता है कि इससे फसल अच्छी होती है और खेतों में समृद्धि आती है। लोकनृत्य और पारंपरिक परिधान इस दिन बैगा पुजार द्वारा घड़े में खिचड़ी पकाया जाता है। इसकी मान्यता है कि घड़े के जिस ओर से खिचड़ी उबलना शुरू करता है। उसी ओर से बरसात का आगमन होता है। इसके बाद जब बैगा पुजार लोग खिचड़ी खाते हैं, तो उनके पीछे की ओर आग जला दिया जाता है। इसका मतलब यह होता है कि अगर बैगा पुजार आग की गर्मी को बर्दाश्त करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से खिचड़ी खाते हैं, तो गांव में सुख-शांति रहती है और जहां आग या गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, तो गांव में मच्छर, बीमारी सहित अन्य प्रकार का कहर बढ़ जाता है। इसलिए सरहुल सरना पूजा आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। फूलखोसी के साथ सरहुल का समापन अंत में फूलखोसी के साथ सरहुल का समापन होता है। फूलखोसी के मौके पर पहान अपने घर में साल यानी सरई फूल अर्पित करते हैं। इस दौरान अन्न भंडार, संदूक समेत घर के सभी दरवाजों पर पुष्प अर्पित किया जाता है। घर में पूजा के बाद पुरोहित ग्राम भ्रमण पर निकलते हैं। वे हर घर में जाकर सरई फूल देते हैं इस दौरान घर के लोग पाहन का पैर धोकर सम्मान करते हैं। उनके माथे पर सरसो तेल लगाया जाता है। इसके बाद ही सरहुल की विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है।
रांची। आदिवासी समाज में एक कहावत प्रचलित है “सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग”, जिसका अर्थ है कि जहां चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत-संगीत है। झारखंड की जीवनशैली में नृत्य, गीत और सामूहिक उत्सव का विशेष महत्व है। आज इस वीडियो में जिस त्योहार की बात करेंगे वो खेतों में नई फसल, जंगलों में खिले फूल और मौसम की नई शुरुआत के साथ खुशियों और उम्मीद का संदेश लेकर आता है। वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला आदिवासी समाज के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है सरहुल। इस दिन सरई यानी कि सखुआ पेड़ की खास तौर से पूजा की जाती है। महाभारत युद्ध से जुड़ी कथा सरहुल से जुड़ी काफी सारी कहानियां लोकप्रिय है लेकिन बहुत लोगों को ये नहीं पता है कि इस दिन पूजे जाने वाले सखुआ पेड़ के पीछे क्या कहानी है? दरअसल इसकी कहानी महाभारत युद्ध से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि जब महाभारत युद्ध चल रहा था तो मुंडा जनजातीय लोगों ने कौरव सेना की तरफ से लड़ाई में हिस्सा लिया था। इस युद्ध में कई जनजातीय योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी पहचान के लिए उनके शवों को साल यानी सखुआ के पत्तों और शाखाओं से ढक दिया गया था।कहानी के अनुसार आश्चर्यजनक बात यह थी कि जिन शवों को सखुआ के पत्तों से ढका गया था, वे लंबे समय तक सुरक्षित रहे और जल्दी नहीं सड़े, जबकि अन्य पत्तों से ढके शव सड़ने लगे। इस घटना के बाद आदिवासी समाज में सखुआ के पेड़ के प्रति गहरी आस्था विकसित हो गई। उनकी यही आस्था वर्तमान रुप में सरहुल पर्व के रूप में जाना जाता है। सरहुल की पूजा और परंपराएं सरहुल आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस समाज में खेती-बाड़ी, नए पत्तों का उपयोग और कई शुभ कार्य सरहुल पर्व के बाद ही शुरू किए जाते हैं। आदिवासी समाज हमेशा से ही प्रकृति का पूजक रहा है, ये पर्व न सिर्फ पर्यावरण को बचाने का त्योहार है। बल्कि संस्कृति, सभ्यता, एकता और अखंडता को भी बनाये रखने का प्रेरणा देता है। सरहुल के अवसर पर झारखंड के विभिन्न गांवों और शहरों में नृत्य उत्सव आयोजित किए जाते हैं। मांदर, ढोल और नगाड़े की थाप पर युवक-युवतियां सामूहिक नृत्य करते हैं। इस दौरान महिलाएं सफेद रंग की लाल किनारी वाली पारंपरिक साड़ी पहनती हैं। सफेद रंग को पवित्रता और शालीनता का प्रतीक माना जाता है, जबकि लाल रंग संघर्ष और ऊर्जा का प्रतीक है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार सफेद रंग सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल रंग ईष्टदेव बुरुबोंगा यानी पहाड़ी देवता का प्रतीक है। इसी कारण सरना स्थल पर फहराया जाने वाला झंडा भी लाल और सफेद रंग का होता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।