कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने अपने पद के साथ-साथ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। उनके इस कदम को टीएमसी नेतृत्व, खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान माना जा रहा है। राज्यसभा सभापति को सौंपा इस्तीफा सुखेंदु शेखर राय ने राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आवाज उठाने के कारण उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया और संगठन में अलग-थलग कर दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बढ़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की मिली सजा राय ने कहा कि उन्होंने कई बार सार्वजनिक और संगठनात्मक मंचों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी राय रखी, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें किनारे कर दिया गया। उनका कहना है कि सिद्धांतों से समझौता न करने के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला लिया। इंडिया गठबंधन पर भी उठाए सवाल टीएमसी से अलग होने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में इस गठबंधन का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता और विपक्षी दलों के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आती है। कोयल मल्लिक को लेकर भी अटकलें राय के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में टीएमसी की एक अन्य राज्यसभा सांसद कोयल मल्लिक को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि वह भी पार्टी से दूरी बना सकती हैं। हालांकि अभी तक उनके इस्तीफे या पार्टी छोड़ने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफे ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिससे पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक स्थिति पर असर पड़ सकता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे के बाद अब राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और अनुभवी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हालात पर सवाल उठाते हुए ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर खुला विद्रोह माना जा रहा है। उनके बयानों के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। “असहनीय अराजकता का अंत हुआ” : सुखेंदु शेखर रॉय सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति की तुलना रोमन साम्राज्य के पतन से की। उन्होंने लिखा कि वर्ष 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या सीनेट में हुई थी, लेकिन बंगाल में जनता ने “असहनीय अराजकता” का अंत कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का यह बयान सीधे तौर पर टीएमसी शासन और पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। “भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा मिला, बुद्धिजीवियों को किनारे किया गया” एक अन्य पोस्ट में रॉय ने कहा कि जब भ्रष्ट लोग व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं और बुद्धिमानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। उन्होंने स्वतंत्र विचारों और आंतरिक लोकतंत्र की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना और अलग राय को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। आरजी कर कांड को लेकर भी जताई नाराजगी सूत्रों के अनुसार, सुखेंदु शेखर रॉय इस बात से बेहद नाराज हैं कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में जनता के गुस्से को पार्टी सही तरीके से समझ नहीं पाई। रॉय का मानना है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद सड़कों पर जो भारी जनआक्रोश दिखा, उसे पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जब जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध कर रही थी, तब पार्टी के कुछ नेता उसे राजनीतिक साजिश बताने में लगे थे। उनके अनुसार, यही disconnect आगे चलकर चुनावी हार की बड़ी वजह बना। “पार्टी में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका” सुखेंदु शेखर रॉय ने निजी बातचीत में यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार अब “संस्थागत रूप” ले चुका है। उनका मानना है कि इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रॉय का इशारा पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं की तरफ है, जिन पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं सुखेंदु शेखर रॉय? सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा और अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले रॉय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार माने जाते हैं। संसद में वे लंबे समय तक टीएमसी के सबसे मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनका खुलकर असंतोष जताना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। टीएमसी में “पुराने बनाम नये” की लड़ाई तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद टीएमसी में “पुराने बनाम नये नेतृत्व” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के पुराने नेता कथित तौर पर आई-पैक और नई रणनीतिक टीम की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार और अब सुखेंदु शेखर रॉय के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। क्या ममता बनर्जी करेंगी संगठन में बड़ा बदलाव? टीएमसी की हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द संगठनात्मक सुधार नहीं किए, तो असंतोष और बढ़ सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय के बागी तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी बड़ा संघर्ष शुरू हो चुका है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।