नई दिल्ली, एजेंसियां। चर्चित राजा रघुवंशी हनीमून मर्डर केस की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मेघालय सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में हाईकोर्ट के फैसले को लेकर कुछ सवाल जरूर हैं, लेकिन चूंकि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी हैं, इसलिए इस स्तर पर उनकी जमानत पर रोक लगाना उचित नहीं होगा। सरकार ने बताया हाईकोर्ट का फैसला चौंकाने वाला सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट के फैसले को "बेहद चौंकाने वाला" बताया। उन्होंने अदालत को बताया कि यह एक सुनियोजित हत्या का मामला है, जिसमें हनीमून पर गए राजा रघुवंशी की हत्या कर शव को गहरी खाई में फेंक दिया गया था। सरकार के मुताबिक, इस मामले में 94 गवाह हैं और मुकदमे की सुनवाई जारी है। टाइपिंग की गलती बनी जमानत का आधार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) की जगह गलती से धारा 403(1) लिखे जाने को आधार बनाकर जमानत दी। मेघालय सरकार का तर्क है कि यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी और आरोपी को गिरफ्तारी के समय हत्या के आरोपों की पूरी जानकारी दी गई थी। इसलिए इतनी गंभीर वारदात में सिर्फ तकनीकी गलती के आधार पर जमानत देना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश ने पूछा कि यदि पहले की जमानत याचिकाओं में गिरफ्तारी के आधार का मुद्दा नहीं उठाया गया था, तो बाद में यही आधार कैसे बन गया। वहीं, सोनम के वकील ने कहा कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से नहीं बताए गए थे और वह सख्त शर्तों के तहत शिलांग में रह रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जमानत बरकरार रहेगी, लेकिन मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश की वैधता पर विचार किया जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत याचिका पर तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल गंभीर स्वास्थ्य स्थिति या जीवन को वास्तविक खतरा होने की स्थिति में ही जमानत पर विचार किया जाएगा। अदालत ने इस मामले में राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। उम्र और बीमारी को नहीं माना पर्याप्त आधार न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल अधिक उम्र या बीमारी जमानत का आधार नहीं बन सकती। आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है और वे कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। इस पर अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में स्वास्थ्य की स्थिति इतनी गंभीर हो जाए कि उनके जीवन को खतरा हो, तभी राहत पर विचार किया जाएगा। चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सजा पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया। साथ ही जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आसाराम को आवश्यक और उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही मामले में आगे कोई फैसला लिया जाएगा। हाईकोर्ट पहले ही बरकरार रख चुका है सजा इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने 27 मई को आसाराम की उम्रकैद की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत ने उन्हें सामूहिक दुष्कर्म और कुछ अन्य धाराओं से राहत दी थी, लेकिन नाबालिग से दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न, पॉक्सो कानून की संबंधित धाराओं, गलत तरीके से बंधक बनाने, आपराधिक धमकी और अन्य आरोपों में दोषसिद्धि कायम रखी थी। 2013 का है मामला यह मामला वर्ष 2013 का है, जब आसाराम पर अपने आश्रम में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2018 में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन फिलहाल शीर्ष अदालत ने भी तत्काल जमानत देने से इनकार कर दिया है।
नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पासपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे "अजीब कानूनी विरोधाभास" बताया है। उन्होंने कहा कि जब सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले सभी दस्तावेजों और पहचान की विस्तृत जांच करती है, तो फिर उसी पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना आम लोगों के लिए भ्रम पैदा करता है। थरूर ने सरकार से कानून में संशोधन कर पासपोर्ट और आधार को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की है। पासपोर्ट को लेकर सरकार के रुख पर उठाए सवाल शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता, जबकि इसे जारी करने से पहले सरकार व्यापक सत्यापन प्रक्रिया अपनाती है। उन्होंने कहा कि यदि इतनी जांच के बाद भी पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता, तो यह कानूनी व्यवस्था में गंभीर विरोधाभास को दर्शाता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस भ्रम को दूर करने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव किए जाएं। आधार कार्ड को लेकर भी जताई चिंता थरूर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि आधार केवल पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। ऐसे में करोड़ों भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेज तो हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए कोई स्पष्ट और अंतिम दस्तावेज नहीं है। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है। कानून में संशोधन की मांग कांग्रेस सांसद ने मांग की कि केंद्र सरकार कानून में बदलाव कर भारतीय पासपोर्ट और सामान्य आधार कार्ड को नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण घोषित करे। उनका कहना है कि इससे नागरिकों को विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रशासनिक व्यवस्था भी सरल होगी। गैर-नागरिकों के लिए अलग आधार कार्ड का सुझाव शशि थरूर ने यह भी सुझाव दिया कि भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए अलग रंग या अलग पहचान वाला आधार कार्ड जारी किया जाए। उनका मानना है कि इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा और सरकारी एजेंसियों के लिए पहचान संबंधी प्रक्रियाएं आसान होंगी। सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम प्रमाण। सरकार का कहना है कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार ने अपने पक्ष के समर्थन में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी किया जाना अपने आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
नई दिल्ली, एजेंसियां। घर खरीदने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया और खरीदार ने बाद में मजबूरी में कब्जा ले भी लिया, तब भी वह देरी के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है। केवल कब्जा स्वीकार कर लेने से होमबायर का मुआवजे का अधिकार खत्म नहीं होगा। क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि बिल्डर समय पर फ्लैट नहीं देता, तो यह 'सेवा में कमी' (Deficiency in Service) माना जाएगा। ऐसे मामलों में खरीदार उपभोक्ता आयोग (Consumer Commission) का दरवाजा खटखटा सकता है और उचित मुआवजा मांग सकता है, भले ही उसने बाद में फ्लैट का कब्जा ले लिया हो। बिल्डरों को नहीं मिलेगा राहत का फायदा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कई बार खरीदार किराए और ईएमआई के दोहरे बोझ के कारण मजबूरी में फ्लैट का कब्जा ले लेते हैं। ऐसे में बिल्डर यह तर्क नहीं दे सकता कि कब्जा मिलने के बाद खरीदार को मुआवजा नहीं मिलेगा। लाखों होमबायर्स को मिलेगा फायदा इस फैसले से देशभर के उन लाखों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके फ्लैट तय समय से महीनों या वर्षों की देरी से मिले। अब वे देरी के कारण हुए आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी के लिए मुआवजे की मांग कर सकेंगे। उपभोक्ता अधिकार हुए और मजबूत कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला रियल एस्टेट सेक्टर में बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ाएगा और खरीदारों के अधिकारों को मजबूत करेगा। इससे भविष्य में बिल्डरों पर समय पर परियोजनाएं पूरी करने का दबाव भी बढ़ेगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा में 13 मई को हुए विश्वास मत में कथित भ्रष्टाचार और विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि याचिका में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। अदालत ने माना कि केवल अनुमान या आरोपों के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका "अस्पष्ट, निराधार और बिना प्रमाण वाले आरोपों" पर आधारित है। ऐसे मामलों में अदालत तभी दखल देती है जब आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध हो। इसी आधार पर पीठ ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। क्या है मामला ? यह मामला 13 मई को तमिलनाडु विधानसभा में हुए विश्वास मत से जुड़ा था। उस दौरान मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने बहुमत साबित किया था। सत्तारूढ़ गठबंधन को कांग्रेस, वीसीके, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माकपा और आईयूएमएल सहित सहयोगी दलों का समर्थन मिला था। वहीं, विश्वास मत के दौरान द्रमुक ने सदन से वॉकआउट किया था, जबकि अन्नाद्रमुक के कुछ बागी विधायकों के समर्थन की भी चर्चा रही थी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में क्या दलील दी ? याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि विश्वास मत के दौरान विधायकों की खरीद-फरोख्त हुई और यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। वकील ने दावा किया कि कई विधायकों को धन और अन्य प्रलोभनों के जरिए प्रभावित किया गया। हालांकि अदालत ने कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों की जांच का आदेश देने के लिए केवल दावे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य भी आवश्यक हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मुख्यमंत्री विजय सरकार को बड़ी कानूनी राहत मिली है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ गंभीर आरोपों पर न्यायिक हस्तक्षेप तभी होगा, जब उनके समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हों।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राज्यसभा चुनाव के बीच कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान नामांकन खारिज होने जैसे मामलों में आमतौर पर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता और ऐसे विवादों का समाधान चुनाव के बाद चुनाव याचिका के माध्यम से किया जाता है। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालत का हस्तक्षेप सीमित सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 329(b) का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालत का हस्तक्षेप सीमित होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हर नामांकन विवाद में तत्काल सुनवाई शुरू कर दी जाए, तो चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होगी और संविधान की मंशा के विपरीत स्थिति पैदा हो सकती है। कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन क्यों हुआ था रद्द? मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था। हालांकि भाजपा ने उनके नामांकन पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में नहीं दी। इसके बाद रिटर्निंग अधिकारी ने 9 जून को उनका नामांकन निरस्त कर दिया था। अभिषेक मनु सिंघवी ने रखा था पक्ष सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मीनाक्षी नटराजन को चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता करते हैं और यदि उन्हें पर्याप्त वोट नहीं मिलते तो वे चुनाव हार जाएंगी। भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार रजनीश अग्रवाल, तरुण चुग और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित हो गए। निर्वाचन अधिकारियों ने उन्हें प्रमाण पत्र भी सौंप दिया है।
भोपाल, एजेंसियां। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार मिनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस ने आधी रात को कानूनी रणनीति तैयार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। मामले पर अवकाशकालीन पीठ के समक्ष जल्द सुनवाई की उम्मीद जताई जा रही है। भाजपा की आपत्ति के बाद हुआ फैसला विवाद की शुरुआत भाजपा द्वारा उठाई गई आपत्ति से हुई। भाजपा का आरोप है कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में तेलंगाना से जुड़े एक कानूनी मामले की जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस फैसले को पूरी तरह गैरकानूनी और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया साजिश मीनाक्षी नटराजन और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है, जिसे चुनावी नियमों के तहत घोषित करना आवश्यक हो। उनका दावा है कि संबंधित मामला केवल एक निजी शिकायत तक सीमित था और अदालत ने उस पर अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सरकार के दबाव में आकर निर्णय लिया। चुनाव आयोग से भी की गई शिकायत वरिष्ठ कांग्रेस नेता Abhishek Manu Singhvi और K. C. Venugopal के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आयोग से हस्तक्षेप कर नामांकन रद्द करने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार थीं। नामांकन की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद उनका पर्चा खारिज होने से पार्टी किसी अन्य उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतार सकती। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हुई हैं। अब सबकी नजर अदालत पर राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन चुके इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस की आगे की रणनीति तय करेगा। साथ ही चुनाव आयोग भी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है।
रांची। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) ने झारखंड न्यायिक सेवा के अंतर्गत सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रारंभिक प्रतियोगिता परीक्षा का संशोधित रिजल्ट जारी कर दिया है। आयोग की ओर से जारी की गई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक यह संशोधित रिजल्ट विज्ञापन संख्या-22/2023 के लिए सुर्प्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में तैयार किया गया है। JPSC की वेबसाइट पर देखें रिजल्ट आयोग ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी 2026 को एक न्यायिक आदेश पारित किया था। इस आदेश के अनुपालन में आयोग ने पहले एक संशोधित उत्तर कुंजी तैयार की। इसी संशोधित आंसर की को आधार बनाते हुए 10 मार्च 2024 को आयोजित की गई सिविल जज प्रारंभिक परीक्षा का नया और संशोधित परिणाम जारी किया गया है। परीक्षार्थी अपना रिजल्ट JPSC की आधिकारिक वेबसाइट www.jpsc.gov.in पर जाकर देख सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद अब शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की संख्या लगभग अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंच जाएगी। इन नियुक्तियों के साथ सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 37 हो जाएगी और केवल एक पद रिक्त रहेगा। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नियुक्तियों का रास्ता साफ केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) Arjun Ram Meghwal ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी प्रदान कर दी है। इन नियुक्तियों में चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं। सरकार का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। कौन हैं सुप्रीम कोर्ट के पांच नए न्यायाधीश? सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए नए न्यायाधीशों में शामिल हैं: Justice Sheel Nagu, मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट Justice S. Chandrashekhar, मुख्य न्यायाधीश, बॉम्बे हाईकोर्ट Justice Sanjeev Sachdeva, मुख्य न्यायाधीश, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट Justice Arun Palli, मुख्य न्यायाधीश, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट Venkita Subramani Mohan, वरिष्ठ अधिवक्ता इन नियुक्तियों में वरिष्ठता, योग्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और न्यायपालिका में विविधता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा गया है। कॉलेजियम ने 27 मई को की थी सिफारिश इन नामों की सिफारिश 27 मई को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की थी। यह सूची भारत के प्रधान न्यायाधीश Justice Surya Kant के नेतृत्व वाले कॉलेजियम की पहली प्रमुख सिफारिशों में शामिल मानी जा रही है। कॉलेजियम ने न्यायपालिका की बढ़ती जरूरतों और लंबित मामलों के दबाव को देखते हुए इन नियुक्तियों की अनुशंसा की थी। सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ने का क्या होगा असर? हाल ही में केंद्र सरकार ने Supreme Court (Number of Judges) Amendment Ordinance, 2026 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाई थी। इस संशोधन के तहत शीर्ष अदालत में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) कर दी गई। नई नियुक्तियों के बाद सुप्रीम कोर्ट लगभग अपनी पूरी स्वीकृत क्षमता पर पहुंच जाएगा और केवल एक पद ही रिक्त रहेगा। लंबित मामलों के निपटारे में मिलेगी मदद विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा संविधान पीठों का अधिक नियमित गठन संभव होगा, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई तेज हो सकेगी। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, नई नियुक्तियां शीर्ष अदालत की कार्यक्षमता बढ़ाने और न्याय वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं।
देशभर में अलग-अलग इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबरों की व्यवस्था अब बदलने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया है कि पूरे भारत में आपातकालीन सेवाओं के लिए केवल एक हेल्पलाइन नंबर ‘112’ को पूरी तरह लागू किया जाए। अदालत ने कहा कि किसी भी दुर्घटना या आपात स्थिति में समय पर सहायता मिलना नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा मामला है और इसमें देरी जानलेवा साबित हो सकती है। फिलहाल देश में पुलिस, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस और अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग नंबर जैसे 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 इस्तेमाल किए जाते हैं। अब इन सभी सेवाओं को एकीकृत कर 112 नंबर से जोड़ा जाएगा। ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ की याचिका पर सुनाया फैसला सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर 112 हेल्पलाइन को पूरी तरह संचालित करें। अदालत ने यह भी कहा कि राज्यों को ‘गुड समैरिटन’ यानी सड़क हादसों में मदद करने वाले लोगों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली भी तैयार करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट बोला- ट्रॉमा केयर जीवन रक्षक दवा की तरह सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना या गंभीर आपात स्थिति में घायल व्यक्ति अक्सर सदमे और भ्रम की स्थिति में होता है। ऐसे समय में तुरंत चिकित्सा सहायता मिलना बेहद जरूरी होता है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “आपात स्थिति में बिना चिकित्सा सहायता के बीतने वाला हर मिनट जीवित रहने की संभावना को कम करता है। तेजी वास्तव में जीवनरक्षक दवा की तरह है।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रॉमा केयर और आपातकालीन चिकित्सा सहायता नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं। मदद करने वाले लोगों को कानूनी डर से बचाने पर जोर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार लोग सड़क हादसों में घायलों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन पुलिस पूछताछ, अदालत में गवाही और कानूनी प्रक्रियाओं के डर से पीछे हट जाते हैं। अदालत ने राज्यों से ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा है, जिससे लोग बिना डर के जरूरतमंदों की मदद कर सकें। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए मजबूत ‘गुड समैरिटन’ कानून, जन-जागरूकता अभियान और प्राथमिक उपचार प्रशिक्षण जरूरी हैं। हर राज्य को देनी होगी नियमित अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर नियमित मासिक बैठकें आयोजित करें। इन बैठकों की कार्यवाही संबंधित सरकारी पोर्टलों पर अपलोड करनी होगी और अनुपालन रिपोर्ट अदालत को भी सौंपनी होगी। 112 नंबर GPS और रियल-टाइम ट्रैकिंग से होगा लैस अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर ट्रॉमा मामलों के लिए मेडिकल रेस्क्यू प्रोटोकॉल तैयार करने की अनुमति दी है। इसके बाद राज्यों को इसे लागू करने के लिए अतिरिक्त तीन महीने का समय दिया गया है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सरकारी और निजी एंबुलेंस को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड-125 (AIS-125) के अनुरूप बनाया जाए। इन एंबुलेंस में GPS और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगाना अनिवार्य होगा, जिन्हें 112 हेल्पलाइन से रियल-टाइम में जोड़ा जाएगा। एंबुलेंस सेवा और प्रतिक्रिया समय की होगी निगरानी सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता, प्रतिक्रिया समय, चिकित्सा उपकरणों और इलाज के परिणामों का समय-समय पर ऑडिट किया जाए। इन रिपोर्टों को एक केंद्रीय प्राधिकरण के पास भेजा जाएगा, ताकि देशभर में ट्रॉमा और आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी रखी जा सके। पूरे देश में एक समान इमरजेंसी सिस्टम बनाने की दिशा में बड़ा कदम कानूनी विशेषज्ञों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में आपातकालीन सेवाओं को अधिक तेज, सरल और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। एकीकृत 112 हेल्पलाइन लागू होने से लोगों को अलग-अलग नंबर याद रखने की जरूरत नहीं होगी और आपात स्थिति में सहायता मिलने की प्रक्रिया पहले से अधिक तेज हो सकेगी।
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई Cockroach Janta Party को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। मामले में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें संगठन की गतिविधियों की जांच कराने और FIR दर्ज करने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह स्व-घोषित राजनीतिक संगठन सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर रहा है और उनका व्यावसायिक लाभ उठाया जा रहा है। CBI जांच की मांग याचिकाकर्ता ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए कहा है कि इसकी जांच Central Bureau of Investigation से कराई जानी चाहिए। साथ ही याचिका में कथित फर्जी वकीलों और नकली डिग्री रखने वाले लोगों की जांच की भी मांग की गई है। संवैधानिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग का आरोप याचिका में कहा गया है कि कुछ संगठन अदालत की टिप्पणियों और संवैधानिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल प्रचार, डिजिटल मार्केटिंग और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कर रहे हैं। इसे न्यायिक प्रक्रिया के “खतरनाक व्यावसायीकरण” के रूप में पेश किया गया है। सोशल मीडिया अकाउंट बंद होने का दावा कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक Abhijeet Deepak ने दावा किया है कि संगठन के सभी सोशल मीडिया अकाउंट और वेबसाइट ब्लॉक कर दिए गए हैं। उनका कहना है कि अब संगठन अपने आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक स्क्रीन रिकॉर्डिंग साझा करते हुए दावा किया था कि पार्टी के इंस्टाग्राम अकाउंट को 22 अप्रैल से 21 मई के बीच 1.6 बिलियन व्यूज मिले। उनके मुताबिक, इस दौरान करीब 1.2 करोड़ नए फॉलोअर्स जुड़े। NEET-UG मुद्दे के बाद चर्चा में आई थी पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी हाल ही में NEET-UG paper leak controversy को लेकर चलाए गए ऑनलाइन अभियान के बाद सुर्खियों में आई थी। इस अभियान में केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan के इस्तीफे की मांग की गई थी। शुरुआत में व्यंग्य के तौर पर शुरू हुआ यह डिजिटल अभियान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। बड़ी संख्या में यूजर्स खुद को “कॉकरोच” कहकर इस अभियान से जुड़ने लगे। कांग्रेस ने बीजेपी पर लगाए आरोप इस विवाद को लेकर Indian National Congress ने केंद्र सरकार और Bharatiya Janata Party पर निशाना साधा है। महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Nana Patole ने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर बढ़ते जन आक्रोश को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि खुफिया एजेंसियों की चेतावनी के बाद इस डिजिटल संगठन के सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए गए।
Air India Flight AI171 Crash को लेकर एक नया और भावुक दावा सामने आया है। हादसे में अपने परिवार के तीन सदस्यों को खोने वाले गुजरात के खेड़ा निवासी Roman Vohra ने दावा किया है कि उन्होंने मोर्चरी में पायलट Captain Sumeet Sabharwal का शव “बैठी हुई अवस्था” में देखा था और उनके हाथ अब भी विमान के कंट्रोल पर थे। हादसे में गई थी 260 लोगों की जान Air India की फ्लाइट AI-171 12 जून को Sardar Vallabhbhai Patel International Airport से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद मेघानीनगर इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। विमान लंदन जा रहा था। इस भीषण हादसे में विमान में सवार 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी। केवल एक यात्री जीवित बचा था। विमान का संचालन कैप्टन सुमीत सभरवाल और सह-पायलट Clive Kunder कर रहे थे। “मोर्चरी में देखा पायलट का शव” रोमन वोहरा ने बताया कि वह 13 जून को अपने भाई, भतीजी और बुआ के शव की पहचान के लिए अहमदाबाद सिविल अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के कारण उन्हें अंदर जाने की अनुमति मिली थी। उनके अनुसार, कैप्टन सुमीत सभरवाल का शव बाकी शवों से अलग रखा गया था और शरीर कठोर अवस्था में बैठने की मुद्रा में था, मानो वह अभी भी विमान की सीट पर बैठे हों। “पायलट के हाथ कंट्रोल योक पर थे” रोमन वोहरा ने दावा किया कि पायलट के हाथ विमान के कंट्रोल योक पर थे और पैर भी बैठे हुए व्यक्ति की मुद्रा में मुड़े हुए थे। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म और शरीर की बनावट से उन्होंने पायलट की पहचान की। उनके मुताबिक, शव का आगे का हिस्सा और चेहरा ज्यादा नहीं जला था, जबकि पीठ की ओर अधिक जलने के निशान थे। डीएनए मैच के बाद मिला शव रोमन वोहरा ने बताया कि हादसे के बाद कई दिनों तक परिवार के लोग अस्पताल के बाहर इंतजार करते रहे। बाद में डीएनए मिलान के बाद उनके परिजनों के शव सौंपे गए। उन्होंने कहा कि मेडिकल फील्ड से जुड़े होने के कारण वह शरीर की संरचना और अन्य संकेतों के आधार पर पहचान कर सके कि वह शव कैप्टन सभरवाल का ही था। अमेरिकी लॉ फर्म ने उठाए सवाल अमेरिका की लॉ फर्म Chiunuma Law, जो हादसे में मारे गए 115 लोगों के परिवारों का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रही है, ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। फर्म के केस मैनेजर Ayush Rajpal ने कहा कि यदि पायलट आखिरी समय तक विमान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे, तो केवल अटकलों के आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हादसे के हर तकनीकी, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और मानवीय पहलू की स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा जांच होनी चाहिए। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया था? Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) ने जुलाई में जारी अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा था कि उड़ान भरने के कुछ सेकंड बाद विमान के इंजन के फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद हो गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डिंग में एक पायलट दूसरे से पूछता सुनाई देता है कि उसने फ्यूल सप्लाई क्यों बंद की, जबकि दूसरा जवाब देता है कि उसने ऐसा नहीं किया। AAIB के मुताबिक, फ्यूल सप्लाई बंद होने के बाद इंजन की शक्ति तेजी से कम होने लगी थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पिछले साल नवंबर में Supreme Court of India ने भी इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि हादसे के लिए किसी ने भी मुख्य पायलट को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। अदालत ने कैप्टन सुमीत सभरवाल के 91 वर्षीय पिता से कहा था कि वह किसी तरह का भावनात्मक बोझ अपने ऊपर न लें।
Western Railway ने Bandra Terminus के पास अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया है। Bombay High Court के निर्देशों के बाद शुरू किए गए इस अभियान के पहले दिन करीब 18 प्रतिशत अवैध झोपड़ियों को हटाया गया। रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। 23 मई तक चलेगा अभियान पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी Vineet Abhishek ने बताया कि यह पांच दिवसीय अभियान 23 मई तक चलेगा। अभियान का उद्देश्य लगभग 5,300 वर्ग मीटर रेलवे भूमि को खाली कराना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। रेलवे के अनुसार बांद्रा टर्मिनस के पुनर्विकास के तहत यहां एलिवेटेड रोड, बहुमंजिला इमारतें, आधुनिक प्लेटफॉर्म और रखरखाव सुविधाओं से युक्त एकीकृत परिसर विकसित करने की योजना है। रेलवे भूमि पर बनी थीं 500 झोपड़ियां अधिकारियों के मुताबिक गरीब नगर इलाके में रेलवे की जमीन पर करीब 500 अवैध झोपड़ियां बनी हुई थीं। अभियान के पहले दिन इनमें से लगभग 15 से 18 प्रतिशत झोपड़ियों को खाली कराया गया। रेलवे ने कहा कि कार्रवाई के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिक प्रशासन, पुलिस और रेलवे सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त टीम तैनात की गई है। 2017 से चल रही थी कानूनी प्रक्रिया पश्चिम रेलवे के बयान के अनुसार इस मामले में सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत कार्रवाई 2017 से पहले शुरू की गई थी और 27 नवंबर 2017 को बेदखली के आदेश पारित किए गए थे। रेलवे ने बताया कि इस मामले में लगभग नौ वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया चली, जिसमें Bombay High Court और Supreme Court of India में सुनवाई भी शामिल रही। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मिली अनुमति रेलवे अधिकारियों के अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने आदेश में चिन्हित पात्र संरचनाओं को संरक्षण देते हुए अवैध अतिक्रमण हटाने की अनुमति दी थी। बाद में इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में भी बरकरार रखा गया। रेलवे का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए की जा रही है।
देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों को लेकर Supreme Court of India ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी अपने पहले के आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने डॉग लवर्स और विभिन्न NGO की याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ कहा कि 7 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेश में कोई संशोधन नहीं किया जाएगा। जस्टिस Vikram Nath, Sandeep Mehta और N. V. Anjaria की बेंच ने 29 जनवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। “कुत्तों के काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते” फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर में बच्चों और आम लोगों पर आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं बेहद गंभीर हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “ABC फ्रेमवर्क 2001 में शुरू किया गया था, लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी के अनुसार संसाधनों को बढ़ाने और व्यवस्थित योजना बनाने में गंभीर कमी रही है। नसबंदी और टीकाकरण अभियान बिना समुचित योजना के चलाए गए।” स्कूल, अस्पताल और हाईवे से हटाने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिए गए अंतरिम आदेश में राज्यों और National Highways Authority of India (NHAI) को हाईवे, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के आसपास से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो कुत्ते आक्रामक नहीं हैं और रेबीज से संक्रमित नहीं हैं, उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी इलाके में छोड़ा जा सकता है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। कुत्ता काटे तो जिम्मेदारी किसकी? पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि किसी आवारा कुत्ते के हमले में किसी व्यक्ति की चोट या मौत होती है, तो संबंधित नगर निकाय के साथ-साथ नियमित रूप से कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। कोर्ट ने कहा, “ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति रोज कुत्तों को खाना खिलाए, लेकिन उनके काटने पर उसकी कोई जिम्मेदारी न हो।” असम के आंकड़ों पर कोर्ट ने जताई चिंता सुनवाई के दौरान कोर्ट ने असम में डॉग बाइट के मामलों पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, वर्ष 2024 में राज्य में 1.66 लाख डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए, जबकि 2025 में केवल जनवरी महीने में ही 20,900 घटनाएं सामने आईं। कोर्ट ने इन आंकड़ों को “बेहद भयावह” बताते हुए राज्यों को स्पष्ट और ठोस कार्ययोजना पेश करने की चेतावनी दी। कैसे शुरू हुआ मामला? यह मामला 28 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में बढ़ते डॉग बाइट मामलों और मौतों पर स्वतः संज्ञान लिया था। उस दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें आवारा कुत्ते बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर हमला करते दिखाई दे रहे थे। इसके बाद 11 अगस्त 2025 को कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आठ सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। बाद में 22 अगस्त 2025 को कोर्ट ने अपने आदेश में आंशिक बदलाव किया था।
चुनाव बाद हिंसा से जुड़ी याचिका पर खुद करेंगी पैरवी पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee गुरुवार को वकील की पोशाक पहनकर Calcutta High Court पहुंचीं। बताया जा रहा है कि वह विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) मामले में खुद अदालत के सामने दलीलें पेश करेंगी। सूत्रों के मुताबिक यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की बेंच में सूचीबद्ध है, जहां ममता बनर्जी कार्यवाही और जांच से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठा सकती हैं। अदालत परिसर में उन्हें वकीलों के पारंपरिक काले चोगे में देखा गया, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर चुकी हैं दलील यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी अदालत में वकील की भूमिका में नजर आई हों। इससे पहले वह एसआईआर मुद्दे को लेकर Supreme Court of India में भी बतौर अधिवक्ता अपना पक्ष रख चुकी हैं। जानकारी के अनुसार, यह याचिका टीएमसी नेता और वरिष्ठ वकील Kalyan Banerjee के बेटे शीर्षान्या बंदोपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी। ममता बनर्जी ने वर्ष 1982 में जोगेश चंद्र कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। बंगाल चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव गौरतलब है कि हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इसके बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर करीब 100 सीटें “छीन” लीं। वहीं, बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले में Supreme Court of India की नौ सदस्यीय संविधान पीठ में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मासिक धर्म, धार्मिक आस्था और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मासिक धर्म को “वर्जना” या “कलंक” मानना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उसे किस नजरिए से देखता है। जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी बनी चर्चा का केंद्र मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Vijay Hansaria ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म वाली उम्र है। उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर मासिक धर्म को कलंक और वर्जना की तरह देखा जाता है। इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस B. V. Nagarathna ने टिप्पणी करते हुए कहा: “यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं। सवाल यह है कि एक भक्त इसे किस नजरिए से देखता है, न कि कोई गैर-भक्त।” उनकी यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय बन गई। कोर्ट बोला- सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Jaideep Gupta ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार एक महत्वपूर्ण धार्मिक पहलू है और यदि उस व्यवस्था को बदला जाता है, तो यह श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। “अगर जनता चाहती है तो सामाजिक सुधार संभव” सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि यदि देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करते हैं, तो अदालत उस पर विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। नौ जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। दाऊदी बोहरा समेत कई धार्मिक मामलों पर भी सुनवाई संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला मामले ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सुनवाई कर रही है। इनमें Dawoodi Bohra community से जुड़े मामलों समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं और अधिकारों के मुद्दे शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
निष्पक्ष चुनाव पर उठे सवाल पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन पर निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने उन्हें पद से हटाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका, चुनाव आयोग पर कार्रवाई का दबाव यह जनहित याचिका आदित्य दास नामक याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल की गई है। इसमें चुनाव आयोग से अपील की गई है कि अजय पाल शर्मा को उनके पद से हटाया जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपनी भूमिका के अनुरूप निष्पक्षता नहीं बरती और मतदाताओं पर प्रभाव डालने या उन्हें डराने-धमकाने जैसा व्यवहार किया। वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद इस पूरे मामले की शुरुआत उस वायरल वीडियो से हुई, जिसमें अजय पाल शर्मा को फाल्टा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान को कथित तौर पर चेतावनी देते हुए देखा गया। वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई और उनके आचरण पर सवाल उठने लगे। निष्पक्ष चुनाव को लेकर उठी मांग याचिका में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे अधिकारियों को हटाया जाए, जिन पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। हालांकि, इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। कौन हैं IPS अजय पाल शर्मा? अजय पाल शर्मा 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें कड़े और सख्त पुलिसिंग के लिए जाना जाता है और उनकी छवि अक्सर ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ और ‘यूपी के सिंघम’ के रूप में देखी जाती है। वर्तमान में उन्हें पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया गया है। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज इस मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि कुछ अधिकारियों की नियुक्ति राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी हो सकती है। वहीं टीएमसी की ओर से भी इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
कोलकाता/नई दिल्ली: Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल के एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) मामले में बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद मतदाता इस बार भी वोट डाल सकेंगे, भले ही फैसला मतदान से ठीक पहले क्यों न आया हो।क्या है पूरा मामला? West Bengal में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान: करीब 90 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए लंबित सूची में 50 लाख नाम शामिल इनमें से 27 लाख नाम हटाए जा चुके हैं बड़ी संख्या में लोगों ने ट्रिब्यूनल में अपील की है पहले नियम यह था कि अगर किसी का नाम बाद में सूची में जुड़ भी जाए, तो वह फ्रीज हो चुकी वोटर लिस्ट के कारण वोट नहीं डाल सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? Supreme Court of India ने स्पष्ट किया: अगर ट्रिब्यूनल चुनाव से 2 दिन पहले भी फैसला देता है, तो भी वोट देने का अधिकार मिलेगा जरूरत पड़ने पर पूरक (Supplementary) वोटर लिस्ट जारी की जाएगी चुनाव आयोग को इस फैसले को लागू करना होगा यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जो कोर्ट को “पूर्ण न्याय” के लिए विशेष अधिकार देता है।चुनाव पर क्या होगा असर? पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल यानी 21 और 27 अप्रैल तक जिन मामलों का निपटारा होगा, उन मतदाताओं को वोट देने का मौका मिलेगा। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं Mamata Banerjee सरकार ने इस फैसले का स्वागत किया TMC सांसद काकली घोष दस्तीदार ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया CPM नेता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि यह आम लोगों की कानूनी लड़ाई की जीत है क्यों है यह फैसला अहम? यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि: इससे लाखों लोगों का मताधिकार सुरक्षित हुआ चुनाव प्रक्रिया में न्याय और समानता सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कोर्ट ने दिखाया कि जरूरत पड़ने पर वह कानूनी तकनीकी अड़चनों को दरकिनार कर सकता है सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे उन लोगों को भी वोट देने का मौका मिलेगा, जो अब तक सिस्टम की वजह से बाहर हो रहे थे। इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
नई दिल्ली: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अहम संवैधानिक सवाल उठाए, जिनका असर भविष्य में धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों की व्याख्या पर पड़ सकता है। कोर्ट का बड़ा सवाल जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने पूछा: “जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, क्या वे मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं?” सवाल यह भी उठा कि: क्या ऐसे मामलों में कोर्ट को सुनवाई करनी चाहिए? 9 जजों की संविधान पीठ कर रही विचार धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों से जुड़े 7 बड़े सवालों पर सुनवाई अहम मुद्दा: क्या कोई गैर-भक्त/गैर-सदस्य किसी धार्मिक प्रथा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है? 2018 के फैसले पर भी चर्चा 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी थी यह याचिका इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन ने दाखिल की थी कोर्ट ने अब पूछा: क्या यह संगठन वास्तव में अयप्पा भक्तों का प्रतिनिधित्व करता है? चीफ जस्टिस की अलग राय चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा: अगर मामला गंभीर संवैधानिक मुद्दे से जुड़ा हो, तो कोर्ट सुनवाई कर सकता है भले ही याचिकाकर्ता सीधे प्रभावित न हो हालांकि, उन्होंने यह भी माना: आर्टिकल 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यक्तिगत अधिकार हैं आमतौर पर वही व्यक्ति कोर्ट आता है, जिसका अधिकार प्रभावित हुआ हो सरकार vs याचिकाकर्ता सरकार का पक्ष (SG तुषार मेहता) PIL (जनहित याचिका) का दुरुपयोग हो रहा है कोर्ट तय नहीं कर सकता कि कौन-सी परंपरा अंधविश्वास है धार्मिक सुधार का काम विधायिका (सरकार) का है याचिकाकर्ताओं की दलील कई महिलाएं खुद कोर्ट नहीं आ पातीं ऐसे में संगठन उनकी आवाज बनते हैं जजों की अहम टिप्पणियां कोर्ट के पास अधिकार है कि धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा करे अगर कोई परंपरा: स्वास्थ्य सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता के खिलाफ हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है उदाहरण: सती प्रथा जैसी कुरीतियों में कोर्ट दखल दे सकता है परंपरा बनाम अधिकार सरकार का तर्क: अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है इसलिए महिलाओं के प्रवेश पर परंपरा बनी कोर्ट का सवाल: क्या परंपरा संविधान से ऊपर हो सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल एडमिशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिससे हजारों NEET अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी। कोर्ट ने साफ किया है कि धोखाधड़ी (फ्रॉड) के कारण खाली हुई MBBS सीट अब खाली नहीं छोड़ी जाएगी, बल्कि उसे मेरिट के आधार पर अगले योग्य उम्मीदवार को दिया जाएगा। क्या था मामला? मामला NEET UG 2022 से जुड़ा है एक छात्र ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए MBBS में एडमिशन ले लिया जांच में फ्रॉड सामने आने पर उसका एडमिशन रद्द कर दिया गया इससे एक सीट खाली हो गई, लेकिन मेरिट में अगले छात्र को समय पर सीट नहीं मिली सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा- MBBS सीट एक राष्ट्रीय संसाधन (National Resource) है इसे खाली छोड़ना गलत है फ्रॉड से खाली हुई सीट तुरंत अगले योग्य कैंडिडेट को दी जानी चाहिए कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक देरी या लापरवाही के कारण सीट खाली रखना पूरी प्रक्रिया के खिलाफ है। NMC को झटका नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) ने इस फैसले को चुनौती दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने NMC की अपील खारिज कर दी और छात्र के एडमिशन को बरकरार रखा छात्रों के लिए क्या बदलेगा? अब किसी भी फ्रॉड से आपका हक नहीं छीना जाएगा मेरिट लिस्ट में आगे आने वाले छात्रों को सीधा फायदा मिलेगा एडमिशन प्रक्रिया बनेगी ज्यादा फेयर और ट्रांसपेरेंट
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।