US Congress

US Secretary of State Marco Rubio speaks about Operation Epic Fury and Iran conflict during a congressional hearing.
मार्को रूबियो का दावा- ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ हुआ समाप्त

  अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने दावा किया है कि ईरान के खिलाफ चलाया गया अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अब समाप्त हो चुका है। क्षेत्र में हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का सिलसिला अभी भी जारी है। अमेरिकी कांग्रेस में बोले रूबियो- अब ईरान के भीतर नहीं हो रहे लगातार हमले हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के समक्ष रूबियो ने कहा कि अमेरिका अब ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए लगातार हमले नहीं कर रहा है, क्योंकि अभियान अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल कर चुका है। वॉशिंगटन का दावा- मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक क्षमता को पहुंचाया बड़ा नुकसान रूबियो के अनुसार अमेरिका ने ईरान के रक्षा औद्योगिक ढांचे, मिसाइल लॉन्चरों, ड्रोन भंडार और पारंपरिक नौसेना को गंभीर क्षति पहुंचाई है। उन्होंने कहा कि यही इस अभियान की सफलता का पैमाना था। होर्मुज संकट बरकरार, ईरान ने सहयोगी देशों पर बढ़ाया दबाव अमेरिका के दावों के बीच ईरान ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। साथ ही Strait of Hormuz को लेकर तनाव भी बना हुआ है। कुवैत और बहरीन पर हमलों से बढ़ी चिंता, अमेरिकी ठिकाने भी निशाने पर बुधवार को ईरानी हमलों में कुवैत के एक हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति की मौत हुई, जबकि कई लोग घायल हुए। बहरीन में भी ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं, जहां अमेरिकी सैन्य उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। कांग्रेस में घिरे रूबियो, डेमोक्रेट सांसदों ने उठाए सवाल डेमोक्रेट सांसदों ने रूबियो के ‘युद्ध समाप्त’ होने के दावे पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब क्षेत्र में हमले जारी हैं और अमेरिकी सैनिक खतरे में हैं, तब संघर्ष समाप्त होने का दावा वास्तविकता से मेल नहीं खाता। सांसद सारा जैकब्स का पलटवार- नाम बदलने से हालात नहीं बदलते Sara Jacobs ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभियान का नाम बदलने या उसे समाप्त घोषित करने से यह तथ्य नहीं बदलता कि क्षेत्र में तनाव जारी है और अमेरिकी सैनिक अभी भी जोखिम में हैं। वॉशिंगटन-तेहरान वार्ता में यूरेनियम भंडार बना सबसे बड़ा मुद्दा रूबियो ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत में ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार सबसे महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। वॉशिंगटन चाहता है कि इस मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस समझौता हो। शांति समझौते पर अब भी नहीं बनी सहमति अमेरिकी विदेश मंत्री के अनुसार तेहरान ने अभी तक किसी अंतिम शांति समझौते को मंजूरी नहीं दी है। दोनों पक्षों के बीच दस्तावेजों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन अंतिम स्वीकृति अभी नहीं मिली है। युद्ध खत्म या विराम? पश्चिम एशिया में बनी हुई है अनिश्चितता रूबियो भले ही ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को समाप्त घोषित कर रहे हों, लेकिन मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और परमाणु वार्ता पर गतिरोध यह संकेत देते हैं कि अमेरिका-ईरान टकराव का अध्याय अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Students checking IIT BTech seat matrix and JoSAA counselling 2026 admission details
IIT में बढ़ीं बीटेक सीटें, इस बार 791 नए अवसर; कंप्यूटर साइंस नहीं, मैकेनिकल इंजीनियरिंग में सबसे ज्यादा सीटें

देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश का सपना देख रहे लाखों छात्रों के लिए राहत भरी खबर है। Joint Seat Allocation Authority काउंसलिंग 2026 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके साथ जारी सीट मैट्रिक्स में पता चला है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में बीटेक सीटों की संख्या इस वर्ष बढ़ा दी गई है। सीटों में हुई इस बढ़ोतरी से अधिक छात्रों को देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश पाने का मौका मिलेगा। उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संस्थानवार और शाखावार सीटों का पूरा विवरण देख सकते हैं। पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ीं सीटें JoSAA द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में IITs में बीटेक की कुल 18,160 सीटें उपलब्ध थीं। वहीं वर्ष 2026 में यह संख्या बढ़कर 18,951 हो गई है। यानी इस साल कुल 791 नई सीटें जोड़ी गई हैं। इससे उन छात्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है जो संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई एडवांस्ड) के माध्यम से IIT में दाखिला लेना चाहते हैं। कंप्यूटर साइंस नहीं, इस शाखा में सबसे ज्यादा सीटें आमतौर पर इंजीनियरिंग अभ्यर्थियों के बीच कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग सबसे लोकप्रिय शाखा मानी जाती है। बेहतर प्लेसमेंट, आकर्षक वेतन पैकेज और बढ़ती तकनीकी मांग के कारण अधिकांश छात्र इसी शाखा को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि सीटों की संख्या के मामले में इस बार भी मैकेनिकल इंजीनियरिंग सबसे आगे रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार— मैकेनिकल इंजीनियरिंग : 2,286 सीटें कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग : 2,183 सीटें इस तरह सीटों की संख्या के लिहाज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग ने कंप्यूटर साइंस को पीछे छोड़ दिया है। सीट मैट्रिक्स क्यों है महत्वपूर्ण? JoSAA काउंसलिंग के दौरान सीट मैट्रिक्स छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक होता है। इसमें देश के सभी IIT, NIT, IIIT और GFTI संस्थानों में उपलब्ध सीटों का विस्तृत विवरण दिया जाता है। इसकी मदद से छात्र यह जान सकते हैं— किस संस्थान में कितनी सीटें उपलब्ध हैं किस शाखा में प्रवेश के कितने अवसर हैं विभिन्न श्रेणियों के लिए सीटों का वितरण काउंसलिंग विकल्प भरने की बेहतर रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि सीटों में बढ़ोतरी से इस वर्ष IIT में प्रवेश के अवसर पहले की तुलना में बेहतर हो सकते हैं, हालांकि प्रतिस्पर्धा अभी भी काफी कड़ी रहने वाली है।  

surbhi जून 4, 2026 0
US House lawmakers voting on a resolution to limit President Trump's war powers regarding Iran
ट्रंप को अपनी पार्टी से झटका, ईरान युद्ध पर सैन्य शक्तियां सीमित करने का प्रस्ताव पास

  ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव को लेकर अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया है। खास बात यह रही कि इस प्रस्ताव को पारित कराने में कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। 215-208 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव बुधवार को हुए मतदान में प्रस्ताव 215 के मुकाबले 208 मतों से पारित हुआ। मतदान के दौरान रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इस नतीजे ने संकेत दिया है कि ईरान नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद बढ़ रहे हैं। कांग्रेस की मंजूरी बिना युद्ध पर उठे सवाल विवाद की जड़ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ है, जिसकी शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। आलोचकों का आरोप है कि व्हाइट हाउस ने इस सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं ली। डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार लंबे सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक है। क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन? प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के तहत लाया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की अनुमति के बिना लंबे समय तक किसी सैन्य संघर्ष में अमेरिका को शामिल न रख सकें।  यह प्रस्ताव सीधे कानून नहीं बनता, लेकिन इसके जरिए राष्ट्रपति पर राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। अब सीनेट में होगी अगली परीक्षा हाउस से पारित होने के बाद यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। वहां भी मंजूरी मिलने पर ट्रंप प्रशासन पर दबाव और बढ़ सकता है। अंतिम रूप से यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाता और सामान्य परिस्थितियों में इसे कानून का दर्जा नहीं मिलता। डेमोक्रेट सांसद बोले- संविधान की रक्षा जरूरी प्रस्ताव पेश करने वाले न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि कांग्रेस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रही है। उन्होंने कहा कि जब कार्यपालिका संविधान के अनुरूप काम नहीं करती, तब विधायिका का दायित्व है कि वह नियंत्रण और संतुलन की भूमिका निभाए। पहले टल गया था मतदान, अब बदल गए हालात इस प्रस्ताव पर मतदान मई में होना था, लेकिन उस समय इसे टाल दिया गया था। डेमोक्रेट नेताओं ने आरोप लगाया था कि रिपब्लिकन नेतृत्व प्रस्ताव की संभावित सफलता से चिंतित था। अब कुछ रिपब्लिकन सांसदों के समर्थन के साथ प्रस्ताव पारित होने से राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बढ़ रही असहमति ईरान नीति के अलावा हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन के कई प्रस्तावों पर रिपब्लिकन सांसदों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति और सरकारी खर्चों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़े खुलकर सामने आने लगे हैं। स्पीकर माइक जॉनसन ने किया विरोध प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर इस तरह के प्रतिबंध अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं। उनका तर्क था कि ईरान में सैन्य अभियान के उद्देश्य पूरे किए जा चुके हैं और अब शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सैन्य अभियान की वैधानिक जांच भी शुरू इसी बीच पेंटागन, विदेश विभाग और यूएसएआईडी के महानिरीक्षकों ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान की संयुक्त समीक्षा शुरू कर दी है। निगरानी एजेंसियों का कहना है कि कानून के तहत 60 दिनों से अधिक समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की समीक्षा अनिवार्य होती है। इससे व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Donald Trump faces renewed US-China tensions as lawmakers push sanctions on CCP-linked companies
ट्रंप की नई चाल से भड़केगा चीन: CCP से जुड़ी कंपनियों पर सख्त प्रतिबंध लाने की तैयारी

Donald Trump और Xi Jinping के बीच हालिया बातचीत और रिश्तों में नरमी की चर्चाओं के बीच अमेरिका में चीन के खिलाफ बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी संसद में एक नया विधेयक पेश किया गया है, जिसका मकसद चीन की सेना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी कंपनियों पर तेजी से प्रतिबंध लगाना है। इस कदम को अमेरिका की चीन के खिलाफ रणनीतिक और आर्थिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। क्या है CCP Sanctions Shot Clock Act? अमेरिका में रिपब्लिकन सांसद Rick Scott और Elise Stefanik ने ‘CCP Sanctions Shot Clock Act’ नाम का विधेयक पेश किया है। इस कानून के तहत अमेरिकी ट्रेजरी विभाग को उन चीनी कंपनियों और व्यक्तियों पर एक साल के भीतर कार्रवाई करनी होगी, जिन्हें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है। यह विधेयक वित्त वर्ष 2026 के National Defense Authorization Act में संशोधन के रूप में लाया गया है। अब तय समय सीमा में लगेगा बैन मौजूदा व्यवस्था में अमेरिकी राष्ट्रपति हर दो साल में उन चीनी कंपनियों और नागरिकों की रिपोर्ट जारी करते हैं, जिन्हें चीन के सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क से जुड़ा माना जाता है। लेकिन अभी तक अमेरिकी ट्रेजरी विभाग पर इन संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डालने की कोई तय समय सीमा नहीं थी। नए प्रस्ताव के अनुसार, राष्ट्रपति की रिपोर्ट आने के बाद ट्रेजरी विभाग को एक साल के भीतर संबंधित कंपनियों और व्यक्तियों को “Non-SDN Chinese Military-Industrial Complex Companies List” में शामिल करना होगा। इसके बाद इस सूची को आधिकारिक रूप से फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया जाएगा। “कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन” सीनेटर रिक स्कॉट ने चीन पर बेहद सख्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अमेरिका के लिए सीधा खतरा है और अब कार्रवाई में देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “जो संस्थाएं चीनी सैन्य हितों के लिए काम कर रही हैं, उन्हें अमेरिका में कारोबार करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन है और अब उसी हिसाब से कार्रवाई का समय आ गया है।” चीन पर आर्थिक निर्भरता घटाने की रणनीति एलिस स्टेफानिक ने कहा कि यह कानून रिपब्लिकन पार्टी की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य चीन से जुड़ी आर्थिक निर्भरता कम करना है। उन्होंने कहा कि चीन के सैन्य विस्तार और दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ अमेरिका को तेजी से कार्रवाई करनी होगी। स्टेफानिक के मुताबिक, कांग्रेस पहले ही प्रशासन से ऐसी चीनी कंपनियों की रिपोर्ट मांग चुकी है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार धीमी रही। नया कानून इसी प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया है। ट्रंप-शी रिश्तों पर पड़ सकता है असर यह विधेयक ऐसे समय पेश किया गया है जब हाल ही में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच रिश्तों में सुधार की चर्चाएं हो रही थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह कानून पास होता है, तो अमेरिका-चीन संबंधों में फिर तनाव बढ़ सकता है। खासकर तकनीक, रक्षा, चिप निर्माण और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चीनी कंपनियों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। वैश्विक बाजार पर भी दिख सकता है असर अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ती सख्ती का असर वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन और निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अमेरिका चीन की सैन्य और टेक कंपनियों पर और ज्यादा आर्थिक दबाव बना सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।  

surbhi मई 22, 2026 0
congressional proposal to limit presidential war powers against Iran.
अमेरिका में ट्रंप पर लगाम की तैयारी: ईरान पर हमले से पहले US कांग्रेस की मंजूरी जरूरी बनाने का प्रस्ताव

अमेरिका की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां Donald Trump के युद्ध संबंधी अधिकारों को सीमित करने की तैयारी हो रही है। United States Congress में एक प्रस्ताव लाया जा रहा है, जिसके तहत ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति को संसद की मंजूरी लेनी होगी। डेमोक्रेट्स का बड़ा कदम डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता Chuck Schumer ने कहा कि मौजूदा हालात में कांग्रेस को अपने संवैधानिक अधिकारों को फिर से लागू करना चाहिए। उनका मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा बिना अनुमति के युद्ध जैसे फैसले लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसी कड़ी में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक नेता Hakeem Jeffries ने भी इस प्रस्ताव पर वोटिंग कराने की मांग की है। ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता हाल ही में Iran के साथ तनाव के बीच ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए धमकी दी थी कि अगर Strait of Hormuz नहीं खोला गया तो अमेरिका बड़ा सैन्य हमला कर सकता है। उनके इस बयान ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी। हालांकि बाद में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन ट्रंप की आक्रामक भाषा और नीति को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर बना हुआ है। संविधान क्या कहता है? अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध की घोषणा करने का अधिकार कांग्रेस के पास होता है, न कि राष्ट्रपति के पास। हालांकि, आपातकालीन स्थितियों में राष्ट्रपति सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। आरोप है कि ट्रंप इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट टकराव कांग्रेस में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के पास मामूली बहुमत है, जिसके चलते इस तरह के प्रस्ताव पहले भी पारित नहीं हो पाए हैं। लेकिन डेमोक्रेट्स लगातार इस मुद्दे को उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रस्ताव सिर्फ ईरान नीति तक सीमित नहीं, बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन की बड़ी बहस का हिस्सा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि ट्रंप की सैन्य नीतियों पर लगाम लगती है या नहीं।  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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