फ्रांस में नई रिसर्च के बाद गर्भवती महिलाओं में बढ़ी Cytomegalovirus जांच और एंटीवायरल इलाज गर्भावस्था के दौरान होने वाले संक्रमणों को लेकर एक नई स्टडी में अहम जानकारी सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, Cytomegalovirus Infection की जांच और इलाज में फ्रांस में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखा गया है। 2020 में प्रकाशित एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बाद गर्भवती महिलाओं में CMV स्क्रीनिंग और Valacyclovir उपचार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। खास बात यह रही कि जांच बढ़ने के बावजूद गर्भपात (Termination of Pregnancy) के मामलों में वृद्धि नहीं हुई। क्या है Cytomegalovirus (CMV)? Cytomegalovirus Infection एक वायरल संक्रमण है, जो नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और मानसिक विकास में देरी जैसी गंभीर दिक्कतों का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार: फ्रांस में लगभग 0.4% नवजात congenital CMV infection से प्रभावित होते हैं गर्भावस्था की शुरुआती तिमाही में संक्रमण होने पर खतरा ज्यादा बढ़ जाता है स्क्रीनिंग में बड़ा उछाल स्टडी में 2017 से 2023 के बीच 451 गर्भावस्थाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि: 2017-2020 के बीच CMV स्क्रीनिंग दर 22% थी 2021-2023 में यह बढ़कर 40% हो गई वहीं महिलाओं द्वारा खुद टेस्ट की मांग करने के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। Valacyclovir इलाज से क्या फायदा मिला? 2020 की स्टडी में पाया गया था कि गर्भावस्था की शुरुआती अवस्था में Valacyclovir देने से मां से बच्चे में संक्रमण फैलने का खतरा लगभग दो-तिहाई तक कम हो सकता है। इसके बाद: एंटीवायरल थेरेपी का इस्तेमाल 27.7% से बढ़कर 59.8% हो गया यूरोप के कई विशेषज्ञ समूहों ने शुरुआती गर्भावस्था में CMV संक्रमण होने पर Valacyclovir इस्तेमाल की सिफारिश भी की। MRI और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट ने तय किए फैसले स्टडी में पाया गया कि जिन मामलों में: MRI या अल्ट्रासाउंड में दिमाग से जुड़ी गंभीर असामान्यताएं दिखीं, उन्हीं मामलों में गर्भपात के फैसले लिए गए। इन समस्याओं में शामिल थीं: Microcephaly Ventriculomegaly Brain calcifications Cerebellar hypoplasia गर्भपात के मामलों में आई कमी शुरुआती CMV संक्रमण वाले मामलों में कुल Termination Rate 20.7% रही। हालांकि 2020 के बाद इसमें गिरावट देखी गई: पहले: 25.9% बाद में: 13% रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं को Valacyclovir नहीं मिला, उनमें गर्भपात की संभावना ज्यादा रही। अब भी बने हुए हैं कई सवाल हालांकि फ्रांस ने मई 2025 में ही राष्ट्रीय स्तर पर CMV स्क्रीनिंग की सिफारिशें लागू की हैं, लेकिन पूरे यूरोप में अभी भी अलग-अलग नीतियां अपनाई जा रही हैं। विशेषज्ञों की कुछ चिंताएं अब भी बनी हुई हैं: गर्भवती महिलाओं में मानसिक तनाव हाई-डोज Valacyclovir के संभावित साइड इफेक्ट्स जरूरत से ज्यादा मेडिकल हस्तक्षेप फिर भी रिसर्चर्स का मानना है कि अब CMV जांच और इलाज को नियमित गर्भावस्था देखभाल का हिस्सा बनाने की दिशा में स्वीकार्यता बढ़ रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं, खासकर ओवरी से जुड़ी बीमारियों के इलाज और पहचान में बड़ी भूमिका निभा सकता है। एक नई सिस्टमेटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस में पाया गया है कि AI तकनीक ओवेरियन कैंसर और अन्य ओवेरियन कंडीशंस की पहचान और इलाज को ज्यादा सटीक और पर्सनलाइज्ड बना सकती है। रिसर्च के अनुसार, AI आधारित मॉडल्स ने ओवेरियन कैंसर की पहचान में काफी बेहतर प्रदर्शन किया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बना सकती है। ओवेरियन कैंसर पहचानने में AI की बड़ी सफलता स्टडी में पाया गया कि AI मॉडल्स ने अल्ट्रासाउंड स्कैन और ब्लड टेस्ट डेटा को मिलाकर ओवेरियन कैंसर की पहचान लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सही तरीके से की। रिपोर्ट के मुताबिक, AI सिस्टम्स ने कैंसर की मौजूदगी पहचानने में 89 से 94 प्रतिशत तक की सटीकता दिखाई। वहीं जिन मरीजों में कैंसर नहीं था, उन्हें सही तरीके से पहचानने की क्षमता भी 85 से 91 प्रतिशत तक रही। सर्जरी और IVF में भी मददगार AI सिर्फ कैंसर की पहचान तक सीमित नहीं है। रिसर्च में बताया गया कि Explainable AI टूल्स एडवांस ओवेरियन कैंसर में सर्जिकल प्लानिंग में भी प्रभावी साबित हुए। इन टूल्स ने यह अनुमान लगाने में मदद की कि सर्जरी के दौरान सभी दिखाई देने वाले कैंसर सेल्स को पूरी तरह हटाया जा सकेगा या नहीं। इसके अलावा IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया में भी AI उपयोगी साबित हुआ। AI एल्गोरिद्म ने ओवेरियन स्टिम्युलेशन प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने और फॉलिकल ग्रोथ का अनुमान लगाने में डॉक्टरों की मदद की। PCOS जैसी समस्याओं में भी संभावनाएं रिसर्चर्स के मुताबिक, AI तकनीक Polycystic Ovary Syndrome जैसी जटिल हार्मोनल समस्याओं की पहचान और इलाज को भी अधिक सटीक बना सकती है। AI की मदद से मरीज की स्थिति के अनुसार पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करना संभव हो सकता है। अभी भी मौजूद हैं कई चुनौतियां हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी माना कि रिसर्च के अच्छे नतीजों के बावजूद AI को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करना अभी आसान नहीं है। 81 स्टडीज के विश्लेषण में पाया गया कि कई रिसर्च अलग-अलग AI सिस्टम्स और रेट्रोस्पेक्टिव डेटा पर आधारित थीं। सिर्फ 22 प्रतिशत स्टडीज में मल्टीसेंटर और प्रॉस्पेक्टिव वैलिडेशन किया गया था। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने मजबूत वैलिडेशन, स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग सिस्टम और क्लिनिकल वर्कफ्लो में बेहतर इंटीग्रेशन की जरूरत बताई है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर रिसर्चर्स ने कहा कि हेल्थकेयर सेक्टर में AI का उपयोग करते समय एथिकल और जिम्मेदार गवर्नेंस बेहद जरूरी है। मरीजों की प्राइवेसी, डेटा सुरक्षा और मेडिकल फैसलों की पारदर्शिता को प्राथमिकता देना अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में AI महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकता है, खासकर ओवेरियन कैंसर, IVF और हार्मोनल डिसऑर्डर्स के इलाज में।
ब्रिटेन की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था National Institute for Health and Care Excellence (NICE) ने एंडोमेट्रियोसिस से जूझ रहे और गर्भधारण में कठिनाई का सामना कर रहे मरीजों के लिए नई फर्टिलिटी गाइडलाइन जारी की है। इस अपडेट का उद्देश्य इलाज को अधिक व्यक्तिगत, प्रभावी और वैज्ञानिक बनाना है, ताकि मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकें। क्या कहती है नई गाइडलाइन? नई गाइडलाइन के अनुसार डॉक्टरों को अब हर मरीज के लिए अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर उपचार तय करने की सलाह दी गई है। इसमें शामिल हैं: गर्भधारण की कोशिश की अवधि बीमारी की गंभीरता उम्र ओवेरियन रिजर्व (अंडाशय की क्षमता) पुरुष साथी से जुड़े फर्टिलिटी फैक्टर्स इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मरीज को उपचार विकल्पों के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। इलाज का नया तरीका: स्टेप-बाय-स्टेप अप्रोच गाइडलाइन एक स्पष्ट ट्रीटमेंट पाथवे सुझाती है: शुरुआत में “एक्सपेक्टेंट मैनेजमेंट” (प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की कोशिश) या सर्जरी का विकल्प दिया जा सकता है यदि दो साल के भीतर ये तरीके सफल नहीं होते, तो आगे इंट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन (IUI) या IVF जैसे विकल्प सुझाए जाएंगे एंडोमेट्रियोसिस को अब ‘अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी’ नहीं माना जाएगा इस अपडेट का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब एंडोमेट्रियोसिस को “अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी” (बिना कारण वाली बांझपन) की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। Endometriosis UK समेत कई संगठनों और विशेषज्ञों की राय के बाद यह फैसला लिया गया है कि इस बीमारी के लिए अलग और विशेष फर्टिलिटी पाथवे जरूरी है। गैर-प्रमाणित इलाजों पर रोक नई गाइडलाइन के तहत फर्टिलिटी क्लीनिक्स को बिना वैज्ञानिक प्रमाण वाले “एड-ऑन ट्रीटमेंट” देने से रोका जाएगा। इससे मरीजों को अनावश्यक खर्च और गलत उम्मीदों से बचाने में मदद मिलेगी। फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन का दायरा बढ़ा अब NHS के तहत फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन (जैसे एग फ्रीजिंग) की सुविधा सिर्फ कैंसर मरीजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अन्य जरूरतमंद मरीजों को भी इसका लाभ मिल सकेगा। रिसर्च क्या कहती है? यूके में लगभग 15 लाख लोग एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक मरीजों को इलाज में असमानता और भ्रम का सामना करना पड़ा है। 2026 की एक बड़ी स्टडी में सामने आया: पहली सर्जरी के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना दो गुना से ज्यादा होती है बार-बार सर्जरी कराने से फर्टिलिटी और प्रेग्नेंसी के परिणामों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है इससे यह स्पष्ट होता है कि उपचार का सही समय और तरीका बेहद महत्वपूर्ण है। क्यों है यह बदलाव अहम? NICE के अनुसार यह नई पर्सनलाइज्ड गाइडलाइन: इलाज में असमानता कम करेगी मरीजों को समान और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देगी फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को ज्यादा पारदर्शी और प्रभावी बनाएगी
Lancet Maternal Death Report: दुनियाभर में गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण होने वाली मातृ मृत्यु को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। द लैंसेट में प्रकाशित ताज़ा स्टडी के मुताबिक, दुनिया की हर 10 में से एक मां की मौत भारत में होती है, जो एक गंभीर संकेत है। क्या कहती है रिपोर्ट? रिपोर्ट के अनुसार: 2023 में दुनिया भर में करीब 2.4 लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी वजहों से हुई। इनमें से लगभग 24,700 मौतें भारत में दर्ज की गईं। यानी वैश्विक स्तर पर करीब 10% मातृ मृत्यु भारत से जुड़ी है। हालांकि, आंकड़ों का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। 1990 में भारत में मातृ मृत्यु: लगभग 1.19 लाख 2015 में घटकर: 36,900 2023 में और घटकर: 24,700 इसी तरह, मातृ मृत्यु दर (MMR) 1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति 1 लाख जीवित जन्म हो गई है सुधार के बावजूद क्यों बनी हुई है चिंता? विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार अभी अधूरा है और देश में असमानता बड़ी समस्या है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में हालात अब भी चुनौतीपूर्ण हैं मातृ मृत्यु के मुख्य कारण स्टडी के मुताबिक, ज्यादातर मौतें ऐसी वजहों से होती हैं जिन्हें रोका जा सकता है: प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव हाई ब्लड प्रेशर (प्री-एक्लेम्प्सिया जैसी स्थिति) संक्रमण (Infections) पहले से मौजूद बीमारियां इसके अलावा: समय पर इलाज न मिलना स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर ग्रामीण-शहरी असमानता भी बड़ी वजहें हैं। कोविड-19 का भी पड़ा असर एक्सपर्ट्स के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं, जिससे हालात और बिगड़े। यही वजह है कि 2015 के बाद सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई। वैश्विक स्थिति भी चिंताजनक 2023 में वैश्विक मातृ मृत्यु दर: 190 प्रति 1 लाख जीवित जन्म जबकि संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य (SDGs): 70 प्रति 1 लाख यानी दुनिया अभी भी लक्ष्य से काफी दूर है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।