ब्रिटेन की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था National Institute for Health and Care Excellence (NICE) ने एंडोमेट्रियोसिस से जूझ रहे और गर्भधारण में कठिनाई का सामना कर रहे मरीजों के लिए नई फर्टिलिटी गाइडलाइन जारी की है। इस अपडेट का उद्देश्य इलाज को अधिक व्यक्तिगत, प्रभावी और वैज्ञानिक बनाना है, ताकि मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकें।
नई गाइडलाइन के अनुसार डॉक्टरों को अब हर मरीज के लिए अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर उपचार तय करने की सलाह दी गई है। इसमें शामिल हैं:
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मरीज को उपचार विकल्पों के बारे में विस्तार से बताया जाएगा।
गाइडलाइन एक स्पष्ट ट्रीटमेंट पाथवे सुझाती है:
इस अपडेट का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब एंडोमेट्रियोसिस को “अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी” (बिना कारण वाली बांझपन) की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।
Endometriosis UK समेत कई संगठनों और विशेषज्ञों की राय के बाद यह फैसला लिया गया है कि इस बीमारी के लिए अलग और विशेष फर्टिलिटी पाथवे जरूरी है।
नई गाइडलाइन के तहत फर्टिलिटी क्लीनिक्स को बिना वैज्ञानिक प्रमाण वाले “एड-ऑन ट्रीटमेंट” देने से रोका जाएगा। इससे मरीजों को अनावश्यक खर्च और गलत उम्मीदों से बचाने में मदद मिलेगी।
अब NHS के तहत फर्टिलिटी प्रिजर्वेशन (जैसे एग फ्रीजिंग) की सुविधा सिर्फ कैंसर मरीजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अन्य जरूरतमंद मरीजों को भी इसका लाभ मिल सकेगा।
यूके में लगभग 15 लाख लोग एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक मरीजों को इलाज में असमानता और भ्रम का सामना करना पड़ा है।
2026 की एक बड़ी स्टडी में सामने आया:
इससे यह स्पष्ट होता है कि उपचार का सही समय और तरीका बेहद महत्वपूर्ण है।
NICE के अनुसार यह नई पर्सनलाइज्ड गाइडलाइन:
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Pulmonary Arterial Hypertension (PAH) सिर्फ दिल और फेफड़ों तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह दिमाग पर भी गंभीर असर डाल सकती है। अध्ययन के मुताबिक, यह बीमारी ब्रेन इंफ्लेमेशन, ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) में गड़बड़ी और धीरे-धीरे कॉग्निटिव डिक्लाइन (याददाश्त व सोचने की क्षमता में कमी) का कारण बन सकती है। क्या है PAH और क्यों है खतरनाक? PAH एक प्रोग्रेसिव बीमारी है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में दबाव बढ़ जाता है, जिससे दिल के दाहिने हिस्से पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अब तक इसे मुख्य रूप से कार्डियोपल्मोनरी डिजीज माना जाता था, लेकिन मरीजों में लगातार मेमोरी प्रॉब्लम और सोचने की क्षमता में गिरावट देखी जा रही थी। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में चूहों (rats) में PAH की स्थिति उत्पन्न कर 14 दिनों तक उनके व्यवहार और शारीरिक बदलावों का विश्लेषण किया। PAH से ग्रस्त चूहों में फेफड़ों की धमनियों का दबाव बढ़ा और दिल के दाहिने हिस्से में सूजन देखी गई साथ ही उनकी याददाश्त और नई चीजों को पहचानने की क्षमता कमजोर पाई गई खास बात यह रही कि उनमें एंग्जायटी जैसे लक्षण नहीं दिखे, जिससे स्पष्ट हुआ कि असर सीधे कॉग्निशन पर पड़ रहा है दिमाग में सूजन और BBB डैमेज रिसर्च में पाया गया कि PAH के कारण दिमाग के महत्वपूर्ण हिस्सों - कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस - में सूजन बढ़ गई। माइक्रोग्लिया और एस्ट्रोसाइट्स (ब्रेन सेल्स) सक्रिय हो गए इंफ्लेमेटरी मार्कर्स जैसे TNF-α और IL-1β का स्तर बढ़ा ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) कमजोर हुआ, जिससे दिमाग में बाहरी तत्वों का प्रवेश बढ़ा यह संकेत देते हैं कि PAH सीधे ब्रेन फंक्शन को प्रभावित कर सकता है। क्या हैं इसके मायने? यह स्टडी बताती है कि PAH को अब सिर्फ दिल और फेफड़ों की बीमारी मानना गलत होगा। यह एक मल्टीसिस्टम डिजीज है, जो दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकती है। हालांकि, यह रिसर्च जानवरों पर आधारित है और इसका समयकाल भी सीमित (14 दिन) था, इसलिए इसे सीधे इंसानों पर लागू करने से पहले और अध्ययन की जरूरत है। आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि: PAH मरीजों में कॉग्निटिव लक्षणों पर ज्यादा ध्यान देना होगा इंफ्लेमेशन को कम करने और BBB को सुरक्षित रखने वाली थेरेपी पर रिसर्च जरूरी है
अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease से पीड़ित लोग अगर महीने में कम से कम एक बार भी ‘बिंज ड्रिंकिंग’ करते हैं, तो उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है। क्या है यह स्टडी? यह अध्ययन National Health and Nutrition Examination Survey (NHANES) के 2017–2023 के डेटा पर आधारित है। इसमें 8,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें विभिन्न प्रकार की लीवर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ‘बिंज ड्रिंकिंग’ को इस तरह परिभाषित किया: महिलाओं के लिए: एक दिन में 4 या उससे ज्यादा ड्रिंक पुरुषों के लिए: एक दिन में 5 या उससे ज्यादा ड्रिंक और यह आदत महीने में कम से कम एक बार चौंकाने वाले नतीजे स्टडी में पाया गया कि: MASLD के मरीज जो बिंज ड्रिंकिंग करते हैं, उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा करीब 3 गुना ज्यादा होता है। ऐसे मरीजों में गंभीर फाइब्रोसिस का खतरा 1.69 गुना और एडवांस्ड फाइब्रोसिस का खतरा 2.76 गुना अधिक पाया गया। जितनी ज्यादा मात्रा में एक बार में शराब पी जाती है, लीवर को उतना ही ज्यादा नुकसान होता है। किन लोगों में ज्यादा खतरा? रिसर्च के अनुसार: युवाओं और पुरुषों में बिंज ड्रिंकिंग की आदत ज्यादा देखी गई MASLD के लगभग 15.9% मरीज इस तरह की पीने की आदत रखते हैं लीवर फाइब्रोसिस कैसे मापा गया? शोधकर्ताओं ने लीवर की कठोरता (liver stiffness) के आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की: 8 kPa या उससे ज्यादा: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस 12 kPa या उससे ज्यादा: एडवांस्ड फाइब्रोसिस रिसर्च से क्या संकेत मिले? अभी तक लीवर बीमारी की श्रेणियों में केवल औसत शराब सेवन को ध्यान में रखा जाता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि ‘कभी-कभार ज्यादा पीना’ भी उतना ही खतरनाक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बिंज ड्रिंकिंग को ध्यान में रखकर मरीजों को दोबारा वर्गीकृत किया जाए, तो MetALD (MASLD + Alcohol) के मामलों की संख्या अमेरिका में दोगुनी से भी ज्यादा हो सकती है। क्या है इसका मतलब? यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि: “कभी-कभी ज्यादा पीना” भी सुरक्षित नहीं है लीवर रोग के मरीजों को शराब से पूरी तरह बचना चाहिए डॉक्टरों को मरीजों की पीने की आदतों का और गहराई से आकलन करना चाहिए
अगर आप बच्चों को हेल्दी और टेस्टी नाश्ता खिलाना चाहते हैं, तो ये गाजर की इडली परफेक्ट ऑप्शन है। इसका रंग, स्वाद और सॉफ्ट टेक्सचर बच्चों को तुरंत पसंद आ जाएगा बनाने के लिए सामग्री सफेद चावल – 1 कप उड़द दाल – ½ कप गाजर – 1 कप (कद्दूकस की हुई) नमक – स्वादानुसार ईनो – 1 छोटा चम्मच (या ¼ छोटा चम्मच बेकिंग सोडा) पानी – जरूरत अनुसार तेल – ग्रीस करने के लिए बनाने की आसान विधि दाल-चावल भिगोएं चावल और उड़द दाल को अलग-अलग 4–5 घंटे पानी में भिगो दें। घोल तैयार करें भीगे हुए चावल और दाल को मिक्सी में पीसकर स्मूद बैटर (घोल) बना लें (न ज्यादा पतला, न ज्यादा गाढ़ा) गाजर मिलाएं अब इसमें कद्दूकस की हुई गाजर नमक डालकर अच्छे से मिक्स करें चाहें तो हल्की तीखापन के लिए काली मिर्च या हरी मिर्च भी डाल सकते हैं ईनो डालें इडली बनाने से ठीक पहले बैटर में ईनो डालें और हल्के हाथ से मिलाएं बैटर तुरंत फूल जाएगा स्टीम करें इडली सांचे को तेल से ग्रीस करें बैटर डालें 10–12 मिनट तक स्टीम करें टूथपिक डालकर चेक करें - साफ निकले तो इडली तैयार कैसे परोसें? गरमा-गरम इडली को परोसें: नारियल चटनी टमाटर चटनी सांभर क्यों है हेल्दी? गाजर से मिलता है विटामिन A और फाइबर हल्की और आसानी से पचने वाली बच्चों और बड़ों दोनों के लिए परफेक्ट टिप अगर समय कम हो तो आप इंस्टेंट रवा इडली बैटर + गाजर मिलाकर भी बना सकते हैं