नई दिल्ली: अभिनेता अनिल कपूर की भाभी और बिजनेसमैन संजय कपूर की पत्नी महीप कपूर ने पहली बार खुलकर बताया कि कैसे टाइप 1 डायबिटीज की वजह से उनका वजन अचानक 15 किलोग्राम तक कम हो गया और शुरुआत में उन्होंने इसे कोविड-19 का असर समझ लिया। अभिनेत्री सोहा अली खान के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान महीप ने अपनी बीमारी, गलतफहमी और समय पर इलाज न मिलने से जुड़ी पूरी कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि बीमारी का पता चलने से पहले उनका शरीर लगातार संकेत दे रहा था, लेकिन कोविड महामारी के दौरान डॉक्टर के पास जाने से बचने और लक्षणों को वायरस का प्रभाव मान लेने के कारण सही समय पर बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हो गए कि एक यात्रा के दौरान दिल्ली पहुंचते ही वह अचानक गिर पड़ीं और उन्हें तुरंत अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। कोविड का असर समझती रहीं, लेकिन वजह थी डायबिटीज महीप कपूर ने बताया कि डायबिटीज का पता चलने से पहले उन्हें टाइफाइड भी हुआ था। इसके साथ ही उनके पीरियड्स अनियमित होने लगे, वजन तेजी से घटने लगा और उन्हें महसूस हो रहा था कि शरीर पहले जैसा नहीं रहा। उस समय वह पेरीमेनोपॉज के दौर से भी गुजर रही थीं, इसलिए कई बदलाव सामान्य हार्मोनल परिवर्तन जैसे लगे। कोविड-19 संक्रमण के बाद उनका वजन लगभग 15 किलोग्राम कम हो गया। उन्होंने इसे कोविड का साइड इफेक्ट समझ लिया और करीब तीन महीने तक लगातार काम और यात्रा करती रहीं। इस दौरान उनकी वास्तविक बीमारी लगातार बढ़ती रही। दिल्ली पहुंचते ही बिगड़ी तबीयत महीप ने बताया कि लगातार यात्रा के बाद जैसे ही वह दिल्ली पहुंचीं, उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाकर आईसीयू में भर्ती किया गया। जांच के बाद डॉक्टरों ने टाइप 1 डायबिटीज की पुष्टि की और इंसुलिन थेरेपी शुरू की। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं और नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच करती हैं ताकि किसी भी तरह की जटिलता से बचा जा सके। उन्हें वर्ष 2022 में टाइप 1 डायबिटीज का निदान हुआ था। टाइप 1 डायबिटीज में वजन तेजी से क्यों घटता है? टाइप 1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। इंसुलिन का काम रक्त में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाकर उसे ऊर्जा में बदलना होता है। जब इंसुलिन की कमी होती है, तो शरीर ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पाता। ऐसे में शरीर ऊर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए फैट और मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है। यही वजह है कि मरीज का वजन तेजी से कम होने लगता है। इसके अलावा, रक्त में बढ़ी हुई शुगर को बाहर निकालने के लिए किडनी अधिक मेहनत करती है, जिससे शरीर की ऊर्जा और तेजी से खर्च होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति में कमजोरी, थकान और तेजी से वजन घटने जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। क्या है टाइप 1 डायबिटीज? टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अग्न्याशय (Pancreas) की उन बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। जब ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, तो शरीर में इंसुलिन का उत्पादन लगभग बंद हो जाता है और मरीज को जीवनभर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ सकता है। क्या केवल बच्चों को होती है टाइप 1 डायबिटीज? आम धारणा है कि टाइप 1 डायबिटीज केवल बच्चों या किशोरों में होती है, लेकिन ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के कई मामले वयस्कों में भी सामने आते हैं। कई बार डॉक्टर भी शुरुआती लक्षणों को टाइप 2 डायबिटीज समझ लेते हैं, जिससे सही इलाज में देरी हो सकती है। कुछ मामलों में 70–80 वर्ष की उम्र में भी टाइप 1 डायबिटीज का पता चलता है। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना अत्यधिक थकान और कमजोरी धुंधला दिखाई देना लगातार भूख लगना यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पंजाबी गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ के हालिया खुलासे के बाद गॉलब्लैडर स्टोन (पित्ताशय की पथरी) एक बार फिर चर्चा में है। दिलजीत ने बताया कि करीब 10 साल पहले जांच के दौरान उनके गॉलब्लैडर में 11-12 मिमी की पथरी का पता चला था, लेकिन उन्होंने अब तक इसकी सर्जरी नहीं कराई है। इसके बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या लंबे समय तक गॉलब्लैडर स्टोन के साथ रहना सुरक्षित है और इसका इलाज टालने से क्या खतरे हो सकते हैं। गॉलब्लैडर और किडनी स्टोन में होता है अंतर गॉलब्लैडर स्टोन पित्ताशय में कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन के जमा होने से बनती है, जबकि किडनी स्टोन मूत्र में मौजूद कैल्शियम ऑक्सलेट, यूरिक एसिड और अन्य खनिजों के क्रिस्टल से बनती है। कई लोगों में पथरी वर्षों तक बिना किसी लक्षण के रहती है, लेकिन कुछ मामलों में छोटी पथरी भी असहनीय दर्द का कारण बन सकती है। इलाज में देरी से बढ़ सकती हैं जटिलताएं गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. विपिन राय के अनुसार, गॉलब्लैडर स्टोन का समय पर इलाज जरूरी है। यदि पथरी पित्त नली को अवरुद्ध कर दे तो बार-बार पित्ताशय में सूजन, संक्रमण, पीलिया, अग्न्याशय (पैंक्रियास) में सूजन और गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। लंबे समय तक इलाज न होने पर गॉलब्लैडर कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है, हालांकि यह स्थिति दुर्लभ मानी जाती है। इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें विशेषज्ञों का कहना है कि पेट के दाहिने हिस्से में तेज दर्द, तैलीय भोजन के बाद दर्द बढ़ना, मतली, उल्टी, पीलिया, पेशाब में परेशानी या कमर में लगातार दर्द जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। अल्ट्रासाउंड से गॉलब्लैडर स्टोन की पहचान की जाती है और जरूरत पड़ने पर कोलेसिस्टेक्टॉमी (गॉलब्लैडर हटाने की सर्जरी) की जाती है। पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ वजन बनाए रखना पथरी के खतरे को कम करने में मददगार माना जाता है।
भारतीय रसोई में खाना बनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर भारत में जहां सरसों का तेल सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, वहीं दक्षिण भारत में नारियल तेल का उपयोग अधिक होता है। लेकिन अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने सलाह दी है कि लंबे समय तक सिर्फ एक ही प्रकार के तेल का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प नहीं है। ICMR की नई डाइटरी गाइडलाइंस के मुताबिक, बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाना बनाने में समय-समय पर अलग-अलग खाद्य तेलों का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे शरीर को विभिन्न प्रकार के आवश्यक फैटी एसिड और पोषक तत्व मिलते हैं। क्यों बदल-बदलकर इस्तेमाल करना चाहिए कुकिंग ऑयल? ICMR और FSSAI के अनुसार, कोई भी एक कुकिंग ऑयल सभी जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध नहीं कराता। हर खाद्य तेल की अपनी अलग पोषण संबंधी विशेषताएं होती हैं। ऐसे में यदि लोग अलग-अलग तेलों का संतुलित उपयोग करते हैं, तो शरीर को विभिन्न प्रकार के हेल्दी फैट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेल्दी डाइट का मतलब तेल पूरी तरह छोड़ देना नहीं, बल्कि सही मात्रा और सही तरीके से उसका इस्तेमाल करना है। ICMR की हेल्दी ऑयल गाइडलाइन स्वस्थ रहने के लिए ICMR ने कुछ आसान सुझाव दिए हैं— एक ही तेल का लगातार इस्तेमाल करने के बजाय समय-समय पर तेल बदलें। तेल का उपयोग सीमित मात्रा में करें। एक बार इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म करने से बचें। ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। डीप फ्राई की बजाय स्टीम, ग्रिल या रोस्टेड भोजन को प्राथमिकता दें। कौन-सा तेल किसलिए फायदेमंद है? सरसों का तेल सरसों का तेल मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड और ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत माना जाता है। यह हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है और इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी पाए जाते हैं। तिल का तेल तिल के तेल में ओमेगा-6 फैटी एसिड और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। यह शरीर में सूजन कम करने और कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद कर सकता है। नारियल तेल नारियल तेल में मीडियम चेन ट्राइग्लिसराइड्स (MCTs) पाए जाते हैं, जो शरीर को जल्दी ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। हालांकि इसका सेवन भी सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है। पाम ऑयल ICMR के अनुसार, पाम ऑयल में टोकोफेरॉल्स, टोकोट्रिएनोल्स (विटामिन E के रूप) और कैरोटेनॉयड्स जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। संतुलित मात्रा में उपयोग करने पर यह भी आहार का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इसका अत्यधिक सेवन किसी भी अन्य तेल की तरह उचित नहीं माना जाता। सूरजमुखी का तेल सूरजमुखी का तेल विटामिन-E और पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड से भरपूर होता है। यह त्वचा और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है। तेल की मात्रा कैसे करें कम? FSSAI के मुताबिक, यदि आप रोजाना इस्तेमाल होने वाले तेल की मात्रा में लगभग 10 प्रतिशत की कमी कर दें, तो इससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा— डीप फ्राइड फूड्स कम खाएं। प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। घर में कम तेल वाले भोजन को प्राथमिकता दें। भोजन में फल, सब्जियां और साबुत अनाज की मात्रा बढ़ाएं। क्या है विशेषज्ञों की सलाह? विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली के लिए किसी एक तेल को 'सबसे बेहतर' मानने के बजाय संतुलित और विविधतापूर्ण आहार अपनाना ज्यादा जरूरी है। अलग-अलग कुकिंग ऑयल का सीमित मात्रा में उपयोग, संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि मिलकर हृदय और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नई दिल्ली: बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना भारत में एक आम आदत बन चुकी है, लेकिन यही लापरवाही कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सेल्फ-मेडिकेशन से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि कुछ दवाओं के गलत कॉम्बिनेशन या अधिक मात्रा का सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसा ही एक कॉम्बिनेशन है पैरासिटामोल और निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट, जिस पर भारत सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ है। यह दवा पहले बुखार और शरीर दर्द में इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन इसके संभावित दुष्प्रभावों को देखते हुए सरकार ने इसके निर्माण, बिक्री और उपयोग पर रोक लगा दी। क्या है पैरासिटामोल-निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट? डिस्पर्सिबल टैबलेट वह दवा होती है जिसे सेवन से पहले पानी में घोलकर लिया जाता है, ताकि उसका असर जल्दी शुरू हो सके। लेकिन शोधों में पाया गया कि पैरासिटामोल और निमेसुलाइड का यह संयोजन डिस्पर्सिबल रूप में स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 26A के तहत इस कॉम्बिनेशन पर प्रतिबंध लगाया है। बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं खरीद सकते पहले यह दवा आसानी से मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध थी, लेकिन अब इसे डॉक्टर की सलाह के बिना लेना सुरक्षित नहीं माना जाता। दवा खरीदते समय उसके ब्रांड नाम के साथ लिखे जेनेरिक साल्ट्स को पढ़ना जरूरी है, ताकि आपको पता चल सके कि उसमें कौन-कौन सी दवाएं शामिल हैं। 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित सरकार ने 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में निमेसुलाइड के किसी भी फॉर्मुलेशन के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में इस दवा के दुष्प्रभाव अधिक तेजी से और गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं। 100 मिलीग्राम से अधिक डोज की अनुमति नहीं निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से तीव्र दर्द में किया जाता है। सरकार ने दवा निर्माता कंपनियों को निर्देश दिया है कि किसी भी ओरल दवा में इसकी मात्रा 100 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। लिवर के लिए बन सकती है खतरा विभिन्न शोधों में निमेसुलाइड के संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका गलत या लंबे समय तक इस्तेमाल लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है और कुछ मामलों में एक्यूट हेपेटाइटिस जैसी गंभीर स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसी वजह से कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दवा के अनियंत्रित उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते रहे हैं। दवा लेने से पहले रखें ये बातें ध्यान में बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा न लें। दवा के पैकेट पर लिखे साल्ट्स जरूर पढ़ें। बच्चों को किसी भी दवा का सेवन कराने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें। निर्धारित डोज से अधिक दवा लेने से बचें। किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
नई दिल्ली: गर्मियों के मौसम में रात के खाने के बाद ठंडी और मीठी आइसक्रीम खाना कई लोगों की पसंद होती है। कुछ लोग इसे दिनभर की थकान दूर करने का तरीका मानते हैं, तो कुछ के लिए यह डेजर्ट का अहम हिस्सा होती है। लेकिन क्या रोजाना डिनर के बाद आइसक्रीम खाना सेहत के लिए सही है? विशेषज्ञों के अनुसार, कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना नुकसानदायक नहीं माना जाता, लेकिन अगर इसे रोजाना और अधिक मात्रा में खाया जाए तो इससे पाचन, वजन, ब्लड शुगर और नींद पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। डिनर के बाद आइसक्रीम खाने से शरीर पर क्या असर पड़ता है? आइसक्रीम में शुगर, सैचुरेटेड फैट और कैलोरी की मात्रा अधिक होती है। जब भारी भोजन के तुरंत बाद इसका सेवन किया जाता है, तो शरीर को एक साथ ज्यादा फैट और शुगर को पचाने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। रात के समय शरीर का मेटाबॉलिज्म दिन की तुलना में थोड़ा धीमा हो जाता है। ऐसे में अतिरिक्त कैलोरी और शुगर शरीर में जमा होने लगती है, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पाचन प्रक्रिया हो सकती है धीमी अगर आपने ऑयली या भारी भोजन किया है और उसके तुरंत बाद आइसक्रीम खा लेते हैं, तो इससे: पेट भारी लगना गैस बनना ब्लोटिंग एसिडिटी पेट दर्द सुस्ती महसूस होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फैट और शुगर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं, जिससे भोजन को पूरी तरह पचने में अधिक समय लग सकता है। ब्लड शुगर पर पड़ सकता है असर सामान्य आइसक्रीम में मौजूद अधिक शुगर ब्लड शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकती है। खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए रात में मीठी आइसक्रीम का सेवन जोखिम बढ़ा सकता है। ब्लड शुगर अचानक बढ़ने और फिर गिरने की वजह से: देर रात भूख लगना थकान महसूस होना सुस्ती बढ़ना जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। नींद की गुणवत्ता भी हो सकती है प्रभावित रात में हाई-फैट और हाई-शुगर फूड खाने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। पेट में गैस, एसिडिटी या भारीपन की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है। कुछ लोगों में ठंडी चीजें खाने के बाद शरीर की अलर्टनेस भी बढ़ जाती है, जिससे आसानी से नींद नहीं आती। किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए? रात में आइसक्रीम खाने से इन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए: लैक्टोज इनटॉलरेंस से पीड़ित लोग डायबिटीज के मरीज मोटापे से परेशान लोग एसिडिटी या गैस की समस्या वाले लोग कमजोर पाचन वाले लोग क्या पूरी तरह आइसक्रीम छोड़ देनी चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, डिनर के बाद कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना सामान्य रूप से सुरक्षित माना जा सकता है। लेकिन रोजाना और ज्यादा मात्रा में इसका सेवन पाचन, वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। अगर आपको पहले से डायबिटीज, मोटापा या पाचन संबंधी समस्या है, तो रात में हाई-कैलोरी और अधिक मीठे डेजर्ट से दूरी बनाना बेहतर विकल्प हो सकता है।
गर्मी के मौसम में तेज धूप से बचने की सलाह हर किसी को दी जाती है, क्योंकि इससे सनबर्न, टैनिंग और त्वचा में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन कुछ लोगों के लिए धूप सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर त्वचा समस्या का कारण बन जाती है। यदि धूप में निकलते ही आपकी त्वचा पर खुजली, लाल चकत्ते, सूजन या छोटे-छोटे दाने दिखाई देने लगते हैं, तो यह सन एलर्जी (Sun Allergy) का संकेत हो सकता है। त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार, सन एलर्जी केवल धूप से होने वाली सामान्य परेशानी नहीं है, बल्कि यह शरीर के इम्यून सिस्टम की सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया होती है। इससे त्वचा में सूजन, रैशेज और अन्य लक्षण विकसित हो सकते हैं। क्या होती है सन एलर्जी? सन एलर्जी ऐसी स्थिति है, जिसमें सूर्य की किरणों के संपर्क में आने के बाद त्वचा जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने लगती है। इसका सबसे सामान्य प्रकार पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (Polymorphous Light Eruption) कहलाता है, जिसमें धूप के संपर्क में आने के बाद त्वचा पर खुजली वाले लाल दाने दिखाई देते हैं। सन एलर्जी के प्रमुख प्रकार 1. पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (PMLE) यह सन एलर्जी का सबसे आम प्रकार है। इसमें हाथ, गर्दन और छाती जैसे हिस्सों पर खुजली वाले लाल दाने निकल आते हैं। यह समस्या महिलाओं में अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है। 2. एक्टिनिक प्रुरिगो इस स्थिति में त्वचा पर अत्यधिक खुजली वाले दाने हो सकते हैं और यह समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है। 3. फोटोएलर्जिक रिएक्शन कुछ सनस्क्रीन, परफ्यूम या स्किनकेयर उत्पाद धूप के साथ मिलकर त्वचा पर एलर्जी पैदा कर सकते हैं। 4. सोलर अर्टिकेरिया (Sun Hives) यह सन एलर्जी का गंभीर रूप है, जिसमें धूप के संपर्क में आने के कुछ ही मिनटों के भीतर त्वचा पर पित्ती या उभरे हुए खुजलीदार निशान दिखाई देने लगते हैं। 5. दवाओं के कारण होने वाली संवेदनशीलता कुछ एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं और मुंहासों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं त्वचा को धूप के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। किन लोगों में ज्यादा होता है खतरा? हल्के रंग की त्वचा वाले लोग जिनके परिवार में सन एलर्जी का इतिहास हो कुछ विशेष दवाओं का सेवन करने वाले लोग ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित मरीज सन एलर्जी के सामान्य लक्षण धूप में जाने के बाद खुजली होना त्वचा पर लाल चकत्ते या रैशेज सूजन और जलन छोटे दाने या छाले कुछ मामलों में पित्ती (Hives) ये लक्षण मुख्य रूप से चेहरे, गर्दन, हाथों और शरीर के खुले हिस्सों पर दिखाई देते हैं। कब लें डॉक्टर की सलाह? यदि धूप में जाने के बाद बार-बार त्वचा पर रैशेज या एलर्जी की समस्या हो रही है और इससे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है, तो तुरंत त्वचा रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। सही समय पर उपचार और उचित सावधानियों से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय तेज धूप में निकलते समय पूरी बांह के कपड़े पहनें। SPF 30 या उससे अधिक वाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करें। दोपहर की तेज धूप से बचें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं का सेवन न करें। यदि कोई स्किनकेयर प्रोडक्ट एलर्जी पैदा कर रहा हो, तो उसका इस्तेमाल बंद कर दें। त्वचा पर धूप के कारण होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और सही उपचार से सन एलर्जी के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और त्वचा को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
आज के समय में डायबिटीज भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुकी है। मोटापा, अनियमित खानपान और खराब लाइफस्टाइल के कारण बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। आमतौर पर लोगों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि डायबिटीज सिर्फ ज्यादा चीनी या मिठाई खाने से होती है और अगर चीनी खाना बंद कर दिया जाए तो ब्लड शुगर पूरी तरह नियंत्रित हो जाएगा। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है। क्या सिर्फ चीनी खाने से होती है डायबिटीज? विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज केवल चीनी खाने से नहीं होती। यह एक मेटाबॉलिक बीमारी है, जिसमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव, आनुवंशिक कारण और असंतुलित आहार जैसी कई चीजें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो ब्लड में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है। लंबे समय तक यही स्थिति टाइप-2 डायबिटीज का कारण बन सकती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस क्या है? इंसुलिन एक हार्मोन है, जो पैंक्रियाज द्वारा बनाया जाता है और शरीर की कोशिकाओं तक ग्लूकोज पहुंचाने का काम करता है। लेकिन जब शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इस स्थिति में पैंक्रियाज को अधिक इंसुलिन बनाना पड़ता है और धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। परिणामस्वरूप ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। डायबिटीज के प्रमुख कारण मोटापा और बढ़ा हुआ वजन पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ा सकती है। वजन कम करने से डायबिटीज के जोखिम को काफी हद तक घटाया जा सकता है। शारीरिक गतिविधियों की कमी नियमित व्यायाम न करने से शरीर ग्लूकोज का सही उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर प्रभावित होता है। पारिवारिक इतिहास यदि माता-पिता, दादा-दादी या अन्य करीबी रिश्तेदारों को डायबिटीज है, तो इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। तनाव और नींद की कमी लगातार तनाव और पर्याप्त नींद न लेने से शरीर का हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल बढ़ने का जोखिम रहता है। सिर्फ चीनी नहीं, इन चीजों से भी बनाएं दूरी ब्लड शुगर नियंत्रित रखने के लिए केवल मिठाई छोड़ना पर्याप्त नहीं है। इन चीजों का सेवन भी सीमित करना चाहिए— व्हाइट ब्रेड मैदा और उससे बनी चीजें प्रोसेस्ड फूड केक, पेस्ट्री और बेकरी उत्पाद अत्यधिक नमक शुगरी ड्रिंक्स और सॉफ्ट ड्रिंक्स ब्लड शुगर कंट्रोल करने का सही तरीका डायबिटीज को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए इन बातों का पालन जरूरी है— संतुलित और पौष्टिक आहार लें। रोजाना नियमित व्यायाम करें। वजन को नियंत्रित रखें। पर्याप्त नींद लें। तनाव कम करने की कोशिश करें। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं समय पर लें। समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच कराते रहें। डायबिटीज एक बहुआयामी बीमारी है और इसका इलाज सिर्फ चीनी छोड़ने तक सीमित नहीं है। सही जीवनशैली अपनाकर और डॉक्टर की सलाह का पालन करके ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में होने वाली जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है।
आज के दौर में फिटनेस और हेल्दी लाइफस्टाइल को लेकर लोगों की जागरूकता तेजी से बढ़ी है। ऐसे में प्रोटीन को शरीर के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्वों में गिना जाता है। मांसपेशियों की मजबूती से लेकर इम्यून सिस्टम, त्वचा, बाल और शरीर की मरम्मत तक, प्रोटीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, शाकाहारी और वीगन डाइट अपनाने वाले लोगों के सामने अक्सर यह चुनौती रहती है कि वे अपनी दैनिक प्रोटीन जरूरत को कैसे पूरा करें। अधिकतर लोग दाल, दूध, पनीर या सोया को ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत मानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ फलों में भी प्रोटीन पाया जाता है। कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की क्लिनिकल डाइटीशियन फियोना संपत के अनुसार, कुछ फल ऐसे हैं जो विटामिन, मिनरल्स और फाइबर के साथ-साथ शरीर को अतिरिक्त प्रोटीन भी प्रदान करते हैं। 1. अमरूद: विटामिन C के साथ प्रोटीन का भी खजाना अमरूद को आमतौर पर विटामिन C का बेहतरीन स्रोत माना जाता है, लेकिन इसमें प्रोटीन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है। लगभग 150 ग्राम (एक कप) अमरूद में करीब 2 ग्राम प्रोटीन होता है। इसमें फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स भी भरपूर होते हैं। यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाने और इम्यूनिटी मजबूत करने में मदद करता है। नियमित सेवन से ब्लड शुगर और हृदय स्वास्थ्य को भी लाभ मिल सकता है। 2. एवोकाडो: हेल्दी फैट और प्रोटीन का शानदार कॉम्बिनेशन एवोकाडो बाकी फलों की तुलना में थोड़ा महंगा जरूर है, लेकिन पोषण के मामले में बेहद समृद्ध माना जाता है। एक मीडियम एवोकाडो में लगभग 4 से 5 ग्राम प्रोटीन मिलता है। इसमें हेल्दी मोनोअनसैचुरेटेड फैट्स मौजूद होते हैं। पोटैशियम, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर यह फल लंबे समय तक पेट भरा महसूस कराता है। ब्लड प्रेशर और डाइजेशन को बेहतर रखने में मदद करता है। 3. कटहल: वीगन डाइट वालों की पसंद हाल के वर्षों में कटहल यानी जैकफ्रूट की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। एक कप कच्चे कटहल में लगभग 3 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है। इसमें पोटैशियम और फाइबर भी भरपूर मात्रा में मौजूद होता है। यह शरीर को ऊर्जा देने और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायक माना जाता है। गट हेल्थ को बेहतर बनाने में भी मदद करता है। 4. ब्लैकबेरी: छोटा फल, बड़े फायदे ब्लैकबेरी केवल स्वाद में ही नहीं, पोषण के मामले में भी काफी फायदेमंद है। 150 ग्राम ब्लैकबेरी में करीब 1.5 ग्राम प्रोटीन होता है। इसमें एंथोसायनिन्स नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। यह सूजन कम करने, दिमागी कार्यक्षमता बढ़ाने और पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है। विटामिन C की मौजूदगी त्वचा और इम्यूनिटी के लिए भी लाभकारी है। 5. खुबानी (Apricot): आंखों और मांसपेशियों के लिए फायदेमंद खुबानी पोषण से भरपूर फल है, जिसमें प्रोटीन के साथ कई जरूरी विटामिन भी मौजूद होते हैं। 150 ग्राम खुबानी में लगभग 1.5 ग्राम प्रोटीन मिलता है। इसमें विटामिन A, विटामिन C और पोटैशियम अच्छी मात्रा में पाया जाता है। यह आंखों की सेहत, मांसपेशियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए लाभकारी माना जाता है। क्या फल प्रोटीन का पूरा विकल्प हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, फल कभी भी दाल, डेयरी उत्पाद, अंडे, मछली या लीन मीट जैसे मुख्य प्रोटीन स्रोतों का विकल्प नहीं बन सकते। लेकिन इन्हें संतुलित आहार का हिस्सा बनाने से शरीर को अतिरिक्त पोषण, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और थोड़ी मात्रा में प्रोटीन जरूर मिलता है। इसलिए अगर आप अपनी डाइट को और ज्यादा पौष्टिक बनाना चाहते हैं, तो इन फलों को रोजमर्रा के भोजन में शामिल करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
भारत समेत दुनिया भर में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के बाद ओवेरियन कैंसर सबसे गंभीर और आम कैंसरों में गिना जाता है। यह बीमारी अंडाशय (Ovary) से शुरू होती है और समय पर पहचान न होने पर जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि, आज भी ओवेरियन कैंसर को लेकर महिलाओं के बीच कई गलत धारणाएं प्रचलित हैं, जिनकी वजह से सही समय पर जांच और इलाज में देरी हो सकती है। आइए जानते हैं ओवेरियन कैंसर से जुड़े 5 बड़े मिथक और उनकी सच्चाई। मिथक 1: ओवेरियन कैंसर सिर्फ अधिक उम्र की महिलाओं को होता है बहुत सी महिलाओं का मानना है कि यह बीमारी केवल बुजुर्ग महिलाओं को होती है। जबकि सच्चाई यह है कि उम्र बढ़ने के साथ जोखिम जरूर बढ़ता है, लेकिन कम उम्र की महिलाएं भी इसकी शिकार हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी उम्र की महिला में ओवेरियन कैंसर विकसित हो सकता है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर खतरे को नजरअंदाज करना सही नहीं है। मिथक 2: HPV या Pap Smear टेस्ट से ओवेरियन कैंसर का पता चल जाता है यह एक आम गलतफहमी है। HPV टेस्ट और Pap Smear मुख्य रूप से सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा कैंसर) की जांच के लिए किए जाते हैं। फिलहाल ऐसा कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है, जो शुरुआती अवस्था में ओवेरियन कैंसर की सटीक पहचान कर सके। इसलिए इन टेस्टों को ओवेरियन कैंसर की जांच मानना गलत है। मिथक 3: टैल्कम पाउडर से ओवेरियन कैंसर होता है कई वर्षों से टैल्कम पाउडर और ओवेरियन कैंसर के संबंध को लेकर बहस चल रही है। कुछ पुरानी रिसर्च में संभावित संबंध की बात कही गई थी, लेकिन हाल की बड़ी स्टडी में दोनों के बीच कोई मजबूत वैज्ञानिक संबंध साबित नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी भी शोध जारी है और केवल टैल्कम पाउडर को कैंसर का कारण मान लेना सही नहीं होगा। मिथक 4: केवल अल्ट्रासाउंड या CA-125 टेस्ट से कैंसर की पुष्टि हो जाती है अल्ट्रासाउंड और CA-125 ब्लड टेस्ट महत्वपूर्ण जांच हैं, लेकिन अकेले इनके आधार पर ओवेरियन कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती। CA-125 का स्तर कई अन्य सामान्य स्थितियों में भी बढ़ सकता है, जबकि कुछ कैंसर मरीजों में यह सामान्य भी रह सकता है। अंतिम पुष्टि के लिए बायोप्सी और पैथोलॉजी जांच की आवश्यकता होती है। मिथक 5: हर ओवेरियन सिस्ट कैंसर बन जाती है यह सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। अधिकांश ओवेरियन सिस्ट सामान्य (Benign) होती हैं और कई मामलों में बिना इलाज के अपने आप ठीक भी हो जाती हैं। डॉक्टर सिस्ट का आकार, महिला की उम्र, लक्षण और अन्य जांच रिपोर्टों के आधार पर तय करते हैं कि सर्जरी की जरूरत है या नहीं। हर सिस्ट कैंसर में नहीं बदलती। क्यों जरूरी है सही जानकारी? ओवेरियन कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य समस्याओं जैसे पेट फूलना, पेट दर्द, भूख कम लगना या बार-बार पेशाब आने जैसे हो सकते हैं। इसलिए किसी भी लगातार बने रहने वाले लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान और सही जानकारी ही इस गंभीर बीमारी से बचाव और सफल इलाज की सबसे बड़ी कुंजी है।
भीषण गर्मी और तेज धूप के बीच हीट स्ट्रोक यानी लू लगने के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जाती है। कई लोग इसे सामान्य कमजोरी या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार हीट स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है। गंभीर स्थिति में मरीज कोमा तक में जा सकता है। गुरुग्राम स्थित मारेंगो एशिया हॉस्पिटल्स की कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. दीक्षा गोयल के अनुसार, यदि लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए और तुरंत प्राथमिक उपचार शुरू कर दिया जाए, तो गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है। क्या होता है हीट स्ट्रोक? जब शरीर का तापमान नियंत्रित करने वाला सिस्टम अत्यधिक गर्मी के कारण काम करना बंद कर देता है, तब हीट स्ट्रोक की स्थिति पैदा होती है। इस दौरान शरीर का तापमान 104 डिग्री फारेनहाइट या उससे अधिक पहुंच सकता है, जिससे दिमाग, हृदय और अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता है। हीट स्ट्रोक के 5 प्रमुख लक्षण 1. शरीर का तापमान तेजी से बढ़ना शरीर का तापमान 102 से 105 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच सकता है। 2. त्वचा का लाल और गर्म होना त्वचा गर्म, लाल और सूखी हो सकती है। कुछ मामलों में पसीना भी दिखाई दे सकता है। 3. मानसिक स्थिति में बदलाव मरीज भ्रमित हो सकता है, बड़बड़ाने लग सकता है या बेहोश भी हो सकता है। 4. पसीना आना बंद होना कई बार शरीर पसीना निकालना बंद कर देता है, जिससे शरीर का तापमान और बढ़ जाता है। 5. तेज और मजबूत नाड़ी दिल की धड़कन सामान्य से अधिक तेज महसूस हो सकती है। हीट स्ट्रोक से हो सकती हैं ये गंभीर जटिलताएं विशेषज्ञों के अनुसार, हीट स्ट्रोक के कारण: दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और मरीज कोमा में जा सकता है। मांसपेशियों के टूटने से शरीर में विषैले तत्व बढ़ सकते हैं। शरीर में खून और ऑक्सीजन का प्रवाह कम हो सकता है। किडनी, लिवर, फेफड़े और हृदय जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। हीट स्ट्रोक होने पर तुरंत क्या करें? मरीज को धूप या गर्म वातावरण से हटाकर ठंडी जगह पर ले जाएं। शरीर पर ठंडा पानी डालें और हवा करें। बर्फ के पानी में भीगा तौलिया शरीर पर रखें और समय-समय पर बदलते रहें। गर्दन, बगल और जांघों के पास बर्फ या कोल्ड पैक लगाएं। जितनी जल्दी हो सके इमरजेंसी मेडिकल सहायता के लिए संपर्क करें। विशेषज्ञों के अनुसार, लक्षण शुरू होने के 30 मिनट के भीतर शरीर का तापमान कम करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। हीट स्ट्रोक में क्या नहीं करना चाहिए? 1. बुखार की दवा न दें पैरासिटामोल या अन्य बुखार कम करने वाली दवाएं हीट स्ट्रोक में फायदेमंद नहीं होतीं और नुकसान पहुंचा सकती हैं। 2. जबरन पानी या कोई तरल पदार्थ न पिलाएं यदि मरीज की चेतना प्रभावित हो चुकी है, तो तरल पदार्थ सांस की नली में जा सकते हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो सकती है। कैसे करें बचाव? दोपहर के समय तेज धूप में निकलने से बचें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें। हल्के और ढीले कपड़े पहनें। बाहर निकलते समय टोपी, छाता या सनस्क्रीन का उपयोग करें। बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखें।
हमारे शरीर में मौजूद थायरॉइड ग्रंथि आकार में भले ही छोटी हो, लेकिन इसका काम बेहद महत्वपूर्ण होता है। यह ग्रंथि मेटाबॉलिज्म, हृदय की कार्यप्रणाली और रक्त संचार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह पर्याप्त मात्रा में थायरॉइड हार्मोन नहीं बना पाती, तो हाइपोथायरॉइडिज्म की स्थिति पैदा होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या केवल थकान या वजन बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) के खतरे को भी बढ़ा सकती है। क्या होता है हाइपोथायरॉइडिज्म? हाइपोथायरॉइडिज्म वह स्थिति है, जब थायरॉइड ग्रंथि शरीर के लिए जरूरी T3 और T4 हार्मोन पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाती। इसके कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है। इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं: लगातार थकान महसूस होना वजन बढ़ना अधिक ठंड लगना त्वचा का सूखापन कब्ज की समस्या बालों का झड़ना हाई ब्लड प्रेशर क्या है? जब रक्त धमनियों की दीवारों पर लगातार अधिक दबाव डालता है, तो उसे हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन कहा जाता है। इसे "साइलेंट किलर" भी कहा जाता है क्योंकि शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। हाइपोथायरॉइडिज्म और हाई बीपी के बीच क्या है संबंध? इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-4) के आंकड़ों के अनुसार, हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हर तीन में से एक व्यक्ति में थायरॉइड ग्रंथि की कार्यक्षमता कम पाई गई। विशेषज्ञों के मुताबिक, थायरॉइड हार्मोन रक्त वाहिकाओं की लोच और हृदय की पंपिंग क्षमता को प्रभावित करते हैं। जब हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, तो धमनियां कठोर होने लगती हैं, जिससे रक्त प्रवाह पर दबाव बढ़ता है और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। हाइपोथायरॉइडिज्म किस तरह बढ़ाता है ब्लड प्रेशर? 1. हृदय की कार्यक्षमता पर असर अध्ययनों के अनुसार, हाइपोथायरॉइडिज्म हृदय की धड़कन को धीमा कर सकता है और शरीर में रक्त पंप करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। 2. खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ना इस बीमारी से LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) का स्तर बढ़ सकता है, जिससे धमनियों में प्लाक जमा होने लगता है और हाई ब्लड प्रेशर का जोखिम बढ़ जाता है। 3. रक्त वाहिकाओं का कठोर होना थायरॉइड हार्मोन की कमी से रक्त वाहिकाओं की लचक कम हो सकती है, जिससे विशेष रूप से डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर बढ़ने की संभावना रहती है। किन लोगों में अधिक होता है जोखिम? अमेरिकन थायरॉइड एसोसिएशन के अनुसार, इन लोगों में थायरॉइड संबंधी समस्याओं का खतरा अधिक रहता है: 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग महिलाएं मोटापे से ग्रसित व्यक्ति डायबिटीज के मरीज जिनके परिवार में पहले से थायरॉइड की हिस्ट्री हो क्या थायरॉइड का इलाज ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकता है? विशेषज्ञों के अनुसार, यदि हाई ब्लड प्रेशर का मुख्य कारण हाइपोथायरॉइडिज्म है, तो थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी से ब्लड प्रेशर में सुधार देखा जा सकता है। हालांकि, सभी मरीजों में इसका प्रभाव समान नहीं होता और कुछ मामलों में ब्लड प्रेशर की अलग दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है।
दर्द के इलाज में बदल सकती है सोच दुनियाभर में लंबे समय से गंभीर और लगातार रहने वाले दर्द के इलाज के लिए ओपिओइड दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि, इन दवाओं से जुड़ी लत और दुष्प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच वैज्ञानिक अब सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसी कड़ी में सामने आए एक नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द से राहत दिलाने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। UCSF अध्ययन में क्या सामने आया? अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को (UCSF) के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किए गए एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि कई गैर-ओपिओइड दवाएं सामान्य दर्द संबंधी समस्याओं के उपचार में उपयोगी साबित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं ने पीठ दर्द, नसों के दर्द और अन्य पुरानी दर्द संबंधी स्थितियों में राहत देने के सकारात्मक संकेत दिखाए हैं। इससे उन मरीजों को फायदा मिल सकता है जो ओपिओइड दवाओं के जोखिम से बचना चाहते हैं। ओपिओइड्स की जगह क्यों खोजे जा रहे विकल्प? ओपिओइड दवाएं दर्द कम करने में प्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन इनके लंबे समय तक इस्तेमाल से लत लगने, ओवरडोज और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। कई देशों में ओपिओइड संकट सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसी दवाओं की तलाश कर रहे हैं जो दर्द में राहत तो दें, लेकिन उनमें लत लगने का खतरा कम हो। किन दवाओं को बताया गया उपयोगी? अध्ययन में विभिन्न प्रकार के दर्द के लिए अलग-अलग गैर-ओपिओइड दवाओं का उल्लेख किया गया है। कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को पीठ दर्द के उपचार में उपयोगी पाया गया। मसल रिलैक्सेंट्स को भी कमर दर्द से राहत के विकल्प के रूप में देखा गया। कुछ मामलों में पेट दर्द और सिरदर्द के लिए एंटीसाइकोटिक दवाओं के उपयोग की संभावना पर चर्चा की गई। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि हर मरीज के लिए एक ही दवा उपयुक्त नहीं होती और उपचार का निर्णय डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही लिया जाना चाहिए। विशेषज्ञों की क्या है राय? विशेषज्ञों का मानना है कि दर्द केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और न्यूरोलॉजिकल कारकों से भी जुड़ा हो सकता है। ऐसे में कुछ एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दर्द को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका मार्गों पर प्रभाव डालकर राहत प्रदान कर सकती हैं। हालांकि, इन दवाओं का उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह के तहत ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इनके भी अपने दुष्प्रभाव और सीमाएं हो सकती हैं। भविष्य में बदल सकता है दर्द उपचार का तरीका अध्ययन से संकेत मिलता है कि दर्द प्रबंधन के क्षेत्र में गैर-ओपिओइड उपचारों की भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। यदि आगे के शोध इन निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं, तो लाखों मरीजों को दर्द से राहत पाने के लिए अधिक सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन या बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
हम अक्सर इस बात पर ध्यान देते हैं कि क्या खाना है, लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि कुछ खाद्य पदार्थ एक-दूसरे के साथ मिलकर ज्यादा फायदेमंद साबित होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कई विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट तभी शरीर में बेहतर तरीके से अवशोषित होते हैं जब उन्हें सही खाद्य पदार्थों के साथ खाया जाए। फैमिली फिजिशियन और न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. सिल्जा शेफर के मुताबिक, कोई एक सुपरफूड या फूड कॉम्बिनेशन खराब खानपान की भरपाई नहीं कर सकता, लेकिन कुछ खास संयोजन शरीर को पोषक तत्वों का अधिक लाभ दिलाने में मदद करते हैं। 1. गाजर या कद्दू के साथ ऑलिव ऑयल गाजर और कद्दू में बीटा-कैरोटीन पाया जाता है, जो शरीर में विटामिन A में बदलता है। यह पोषक तत्व वसा की मौजूदगी में बेहतर तरीके से अवशोषित होता है। फायदा: आंखों, त्वचा और इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी। 2. टमाटर के साथ एवोकाडो या अच्छा तेल टमाटर में मौजूद लाइकोपीन एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। इसे शरीर में बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने के लिए हेल्दी फैट की जरूरत होती है। फायदा: हृदय और कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में मदद। 3. सब्जियों पर नट्स और बीजों की टॉपिंग बादाम, अखरोट, चिया सीड्स या कद्दू के बीज जैसी चीजें हेल्दी फैट और फाइबर प्रदान करती हैं। फायदा: फैट-सॉल्युबल विटामिन्स के अवशोषण में मदद और अतिरिक्त पोषण। 4. प्रोटीन और विटामिन C का संयोजन कोलेजन के निर्माण के लिए शरीर को प्रोटीन के साथ विटामिन C की भी आवश्यकता होती है। बेहतरीन उदाहरण: दही और बेरीज दाल और शिमला मिर्च मछली और नींबू फायदा: त्वचा, कनेक्टिव टिश्यू और घाव भरने की प्रक्रिया को समर्थन। 5. ओट्स के साथ बेरीज या सेब ओट्स में मौजूद प्लांट-बेस्ड आयरन विटामिन C के साथ ज्यादा अच्छी तरह अवशोषित होता है। फायदा: आयरन की कमी से बचाव में मदद। 6. दाल या बीन्स के साथ टमाटर और शिमला मिर्च दालों में मौजूद नॉन-हीम आयरन को शरीर बेहतर तरीके से उपयोग कर सके, इसके लिए विटामिन C जरूरी है। फायदा: शाकाहारी लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी। 7. हल्दी के साथ काली मिर्च हल्दी में मौजूद करक्यूमिन अपने आप में कम अवशोषित होता है, लेकिन काली मिर्च में मौजूद पाइपरीन इसकी जैव उपलब्धता को कई गुना बढ़ा देता है। फायदा: सूजन और इंफ्लेमेशन से जुड़ी समस्याओं में मददगार। 8. प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स का साथ प्रीबायोटिक्स (फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ) अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करते हैं, जबकि प्रोबायोटिक्स सीधे फायदेमंद बैक्टीरिया प्रदान करते हैं। बेहतरीन उदाहरण: दही या केफिर के साथ फल दलिया और योगर्ट फायदा: आंतों के स्वास्थ्य और माइक्रोबायोम को बेहतर बनाने में मदद। सिर्फ फूड कॉम्बिनेशन ही नहीं, संतुलित जीवनशैली भी जरूरी विशेषज्ञों का कहना है कि पोषक तत्वों का अवशोषण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकता है। आंतों का स्वास्थ्य, हार्मोनल बदलाव, तनाव और कुछ बीमारियां भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। इसलिए संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद और तनाव नियंत्रण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
गर्मी का मौसम सिर्फ थकान और डिहाइड्रेशन ही नहीं लाता, बल्कि पहले से हर्निया से जूझ रहे लोगों के लिए अतिरिक्त परेशानी भी पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, गर्म मौसम सीधे तौर पर हर्निया का कारण नहीं बनता, लेकिन शरीर में होने वाले कुछ बदलाव दर्द, सूजन और असहजता को बढ़ा सकते हैं। अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर के सीनियर कंसल्टेंट (जनरल एंड लैपरोस्कोपिक सर्जरी) डॉ. रत्नेश जेनवा के मुताबिक, गर्मियों में शरीर को सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इस दौरान ज्यादा पसीना, पानी की कमी, मांसपेशियों की कमजोरी और पेट पर दबाव बढ़ने जैसी समस्याएं हर्निया के लक्षणों को गंभीर बना सकती हैं। क्यों बढ़ सकता है हर्निया का दर्द? 1. डिहाइड्रेशन से कमजोर होती हैं मांसपेशियां अत्यधिक पसीने के कारण शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है। इससे पेट की दीवार की मांसपेशियां कमजोर पड़ सकती हैं और हर्निया वाली जगह पर दर्द और बेचैनी बढ़ सकती है। 2. कब्ज और पेट फूलने से बढ़ता है दबाव गर्मी के मौसम में पाचन संबंधी समस्याएं और कब्ज आम हैं। शौच के दौरान जोर लगाने से पेट के अंदर दबाव बढ़ता है, जिससे हर्निया की समस्या और गंभीर हो सकती है। 3. पसीने से त्वचा में जलन हर्निया वाले हिस्से के आसपास लगातार पसीना आने से खुजली, जलन और सूजन हो सकती है। खासतौर पर इंग्वाइनल हर्निया के मरीजों को यह समस्या ज्यादा परेशान कर सकती है। 4. थकान से कम होता है मांसपेशियों का सहारा अधिक गर्मी के कारण शरीर जल्दी थक जाता है। इससे प्रभावित हिस्से के आसपास की मांसपेशियों का सपोर्ट कम हो सकता है और सामान्य गतिविधियों में भी दर्द महसूस हो सकता है। 5. ज्यादा शारीरिक गतिविधियां भी बढ़ा सकती हैं परेशानी गर्मियों में यात्रा, एक्सरसाइज या भारी सामान उठाने से पेट की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हर्निया के लक्षण बढ़ सकते हैं। हर्निया के मरीज गर्मियों में इन बातों का रखें खास ध्यान दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें। कब्ज से बचने के लिए फाइबर युक्त भोजन लें। भारी सामान उठाने से बचें। ढीले और सूती कपड़े पहनें। लंबे समय तक खड़े रहने से बचें। शरीर का वजन नियंत्रित रखें। अत्यधिक गर्मी के समय ठंडी जगह पर रहने की कोशिश करें। एक बार में ज्यादा खाने के बजाय हल्का और कम मात्रा में भोजन करें। दर्द, सूजन या बेचैनी अचानक बढ़ने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हर्निया की जगह पर अचानक तेज दर्द, अत्यधिक सूजन, उल्टी या गंभीर असहजता महसूस हो, तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत सर्जन या डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
नई दिल्ली: गर्मी के मौसम में डिहाइड्रेशन, थकान और स्किन संबंधी समस्याएं आम बात हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य स्वास्थ्य संस्थाओं के अनुसार, अत्यधिक गर्मी तनाव, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और मानसिक थकान को बढ़ा सकती है। क्यों बिगड़ सकता है मानसिक स्वास्थ्य? विशेषज्ञों के अनुसार, जब तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है तो शरीर को अपना सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इसका असर दिमाग की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है। गर्मी के कारण शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे व्यक्ति बेचैनी, गुस्सा या मानसिक थकान महसूस कर सकता है। कई शोधों में यह भी पाया गया है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि देखी जाती है। नींद और डिहाइड्रेशन भी बनते हैं समस्या गर्मी के मौसम में पर्याप्त नींद न मिलना, मूड स्विंग्स और एंग्जायटी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं डिहाइड्रेशन के कारण कमजोरी, एकाग्रता में कमी और काम पर फोकस करने में परेशानी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग पहले से मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दवाएं ले रहे हैं, वे गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे रखें मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। संतुलित और हल्का भोजन करें। मौसमी फलों और ताजे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करें। नियमित योग, व्यायाम और मेडिटेशन करें। दोपहर की तेज धूप से बचें। प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लें। सेल्फ-केयर भी है जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सेल्फ-केयर केवल आराम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को समझना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि लंबे समय तक तनाव, चिंता या उदासी महसूस हो रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय रहते डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
नई दिल्ली: गर्मियों का मौसम आते ही बाजार में आमों की बहार दिखाई देने लगती है। फलों के राजा कहे जाने वाले आम का स्वाद हर किसी को पसंद होता है, लेकिन कई बार जल्दी मुनाफा कमाने के लिए व्यापारियों द्वारा आमों को कृत्रिम तरीके से पकाकर बाजार में उतार दिया जाता है। ऐसे आम स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने लोगों को केमिकल से पके आमों की पहचान करने के लिए कुछ आसान तरीके बताए हैं। कैल्शियम कार्बाइड से पकाए जाते हैं कई आम एफएसएसएआई के अनुसार, कुछ व्यापारी आमों को जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल करते हैं। इस रसायन से एसिटिलीन गैस निकलती है, जिसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। कई शोधों में इसके अंदर मौजूद विषैले तत्वों को शरीर के लिए खतरनाक बताया गया है। केमिकल से पके आम की 5 पहचान पूरा आम एक समान चमकीले पीले रंग का दिखाई देता है। आम में प्राकृतिक खुशबू नहीं होती। बाहर से मुलायम लेकिन अंदर से सख्त महसूस होता है। स्वाद फीका या असामान्य होता है। छिलके पर सफेद पाउडर जैसे कण दिखाई दे सकते हैं। प्राकृतिक रूप से पके आम की 5 पहचान आम पर हरे और पीले रंग के मिश्रित पैच दिखाई देते हैं। डंठल के पास मीठी और प्राकृतिक खुशबू आती है। हल्का दबाने पर आम थोड़ा नरम महसूस होता है। स्वाद मीठा और रसदार होता है। छिलके पर प्राकृतिक काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं। क्यों खतरनाक है कैल्शियम कार्बाइड? विशेषज्ञों के अनुसार, कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और अन्य विषैले तत्वों की अशुद्धियां हो सकती हैं। कुछ शोधों में ऐसे रसायनों के लंबे समय तक संपर्क को कैंसर, डायबिटीज और थायरॉइड संबंधी समस्याओं के बढ़ते जोखिम से भी जोड़ा गया है। इसलिए आम खरीदते समय केवल उसका रंग देखकर फैसला न करें, बल्कि उसकी खुशबू, बनावट और स्वाद पर भी ध्यान दें। थोड़ी सी सावधानी आपकी सेहत को सुरक्षित रख सकती है।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट जहां नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने का अवसर देते हैं, वहीं इनका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर और दिमाग पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऑनलाइन रहने की आदत मानसिक थकान को बढ़ा रही है और सिर्फ नींद लेने से इस समस्या से पूरी तरह राहत नहीं मिलती। कैलाश दीपक हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार शर्मा के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने से मस्तिष्क को लगातार भारी मात्रा में जानकारी प्रोसेस करनी पड़ती है, जिससे मानसिक ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है। क्यों थकने लगता है दिमाग? विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करने से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है। यह हिस्सा निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। जब यह हिस्सा लगातार ओवरलोड रहता है, तो व्यक्ति में निम्न समस्याएं दिखाई देने लगती हैं— ध्यान लगाने में कठिनाई चिड़चिड़ापन भावनात्मक सुन्नता लगातार थकान महसूस होना मानसिक तनाव बढ़ना डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की मानसिक थकान केवल अच्छी नींद से पूरी तरह दूर नहीं होती, बल्कि दिमाग को डिजिटल आराम (Digital Detox) की भी जरूरत होती है। कैसे बदल रहा है इंटरनेट हमारे दिमाग को? लगातार स्क्रॉलिंग और बार-बार ऐप्स बदलने की आदत मस्तिष्क को तेज उत्तेजनाओं का आदी बना देती है। इससे किसी एक काम पर लंबे समय तक फोकस बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा— नोटिफिकेशन और लाइक्स डोपामाइन को बार-बार सक्रिय करते हैं। धीरे-धीरे डिजिटल कंटेंट पर निर्भरता बढ़ने लगती है। आत्म-नियंत्रण और निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिसर्च के अनुसार, अत्यधिक इंटरनेट उपयोग मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में ग्रे मैटर के घनत्व को भी प्रभावित कर सकता है। सिर्फ दिमाग ही नहीं, शरीर के अन्य अंग भी होते हैं प्रभावित आंखों पर असर लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। इसके लक्षण हैं— आंखों में सूखापन जलन धुंधला दिखाई देना सिरदर्द गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर दबाव लंबे समय तक झुककर मोबाइल देखने से "टेक नेक" की समस्या हो सकती है, जिससे गर्दन और ऊपरी रीढ़ में दर्द बढ़ सकता है। मांसपेशियों में तनाव कीबोर्ड और टचस्क्रीन के लगातार उपयोग से कंधों, हाथों और कलाइयों में दर्द या रिपिटिटिव स्ट्रेन इंजरी की समस्या हो सकती है। दिल और वजन पर असर अधिक स्क्रीन टाइम शारीरिक गतिविधियों को कम कर देता है, जिससे— मोटापे का खतरा बढ़ता है ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है नींद और इम्यूनिटी पर प्रभाव स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जिससे हार्मोनल संतुलन, मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। क्या करें? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि— स्क्रीन टाइम सीमित करें। हर 30-40 मिनट में छोटा ब्रेक लें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद करें। नियमित व्यायाम और आउटडोर गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की कुंजी है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, घंटों बैठकर काम करने की आदत और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कमर और जोड़ों का दर्द आम समस्या बन गया है। अक्सर लोग दर्द निवारक दवाओं के सहारे अस्थायी राहत तो पा लेते हैं, लेकिन लगातार बने रहने वाले दर्द को नजरअंदाज करना कई बार गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) कराने की सलाह दे सकते हैं, जिससे दर्द के वास्तविक कारण का पता लगाया जा सके। MRI क्या है और यह कैसे काम करता है? MRI एक नॉन-इनवेसिव स्कैनिंग तकनीक है, जिसमें शरीर के अंदर की विस्तृत तस्वीरें लेने के लिए मैग्नेटिक फील्ड और रेडियो वेव्स का उपयोग किया जाता है। यह रीढ़ की हड्डी, नसों, मांसपेशियों, लिगामेंट्स और अन्य सॉफ्ट टिश्यू की स्थिति को विस्तार से दिखाने में मदद करता है। किन स्थितियों में कमर दर्द के लिए MRI की जरूरत पड़ती है? 1. इलाज के बाद भी दर्द बना रहे अगर आराम, दवाओं, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव के बावजूद दर्द लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर डिस्क की समस्या, नसों पर दबाव या सॉफ्ट टिश्यू की बीमारी का पता लगाने के लिए MRI कराने की सलाह दे सकते हैं। 2. दर्द के साथ नसों से जुड़े लक्षण दिखाई दें यदि कमर दर्द के साथ निम्न समस्याएं भी हों, तो MRI जरूरी हो सकता है— दर्द का हाथों या पैरों तक फैलना सुन्नपन या झनझनाहट कमजोरी महसूस होना चलने-फिरने में परेशानी हाथों की पकड़ कमजोर होना ये लक्षण स्लिप डिस्क, स्पाइनल स्टेनोसिस या नसों पर दबाव जैसी गंभीर समस्याओं का संकेत हो सकते हैं। 3. चोट या अंदरूनी नुकसान की आशंका हो यदि किसी दुर्घटना, खेल या अन्य कारणों से लिगामेंट, कार्टिलेज, मेनिस्कस या रोटेटर कफ को नुकसान पहुंचने की आशंका हो, तो MRI सबसे प्रभावी जांच मानी जाती है। X-ray केवल हड्डियों की स्थिति दिखाता है, जबकि MRI सॉफ्ट टिश्यू की विस्तृत जानकारी देता है। 4. गंभीर बीमारी के संकेत दिखाई दें यदि कमर दर्द के साथ— बुखार अचानक वजन कम होना कैंसर का पुराना इतिहास संक्रमण की आशंका ऑस्टियोपोरोसिस लंबे समय तक स्टेरॉयड का उपयोग जैसी स्थितियां मौजूद हों, तो MRI तुरंत करवाने की आवश्यकता पड़ सकती है। MRI किन समस्याओं की पहचान में मदद करता है? स्लिप्ड डिस्क और नसों पर दबाव लिगामेंट और कार्टिलेज की चोट घुटने और कंधे की स्पोर्ट्स इंजरी स्पाइनल इंफेक्शन ट्यूमर इंफ्लेमेटरी अर्थराइटिस अस्पष्ट और गंभीर दर्द के कारण क्या हर कमर दर्द में MRI जरूरी है? विशेषज्ञों के अनुसार, नहीं। शुरुआती चरण में हर मरीज को MRI कराने की आवश्यकता नहीं होती। कई बार MRI में दिखाई देने वाले बदलाव वास्तविक दर्द का कारण नहीं होते, जिससे अनावश्यक भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए डॉक्टर मरीज के लक्षण, शारीरिक जांच, उपचार के परिणाम और दर्द की गंभीरता को ध्यान में रखकर ही MRI की सलाह देते हैं। कब नहीं करनी चाहिए लापरवाही? यदि दर्द लगातार बढ़ रहा हो, लंबे समय तक बना रहे, चोट के बाद शुरू हुआ हो या अन्य गंभीर लक्षणों के साथ दिखाई दे रहा हो, तो डॉक्टर से तुरंत परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।
एक समय था जब कमर और पीठ दर्द को बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह परेशानी युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। बदलती जीवनशैली, वर्क फ्रॉम होम कल्चर, घंटों मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल तथा शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कम उम्र में ही लोग कमर दर्द से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार एक ही स्थिति में बैठे रहना, गलत पोश्चर अपनाना और बढ़ता मोटापा रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे पीठ और कमर में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए तो यह दैनिक जीवन और कार्यक्षमता दोनों को प्रभावित कर सकती है। युवाओं में कमर दर्द बढ़ने के प्रमुख कारण गलत पोश्चर में बैठना या खड़े रहना ऑफिस में काम करते समय या मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय झुककर बैठने से रीढ़ की हड्डी पर लगातार दबाव पड़ता है। इससे गर्दन, कंधों और पीठ के निचले हिस्से में दर्द शुरू हो सकता है। सुस्त जीवनशैली आज अधिकांश लोग दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं। पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने से रीढ़ को सहारा देने वाली मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, जिससे अकड़न और दर्द की समस्या बढ़ जाती है। तनाव और मानसिक दबाव मानसिक तनाव का असर केवल दिमाग पर ही नहीं, बल्कि शरीर पर भी पड़ता है। तनाव के कारण गर्दन, कंधे और पीठ की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं, जिससे दर्द और थकान बढ़ सकती है। बढ़ता स्क्रीन टाइम मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप के लंबे इस्तेमाल से "टेक नेक" और लोअर बैक पेन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार स्क्रीन देखने की आदत रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति को प्रभावित करती है। मोटापा और कसरत की कमी शरीर का अतिरिक्त वजन रीढ़ की हड्डी और जोड़ों पर अधिक दबाव डालता है। पेट और पीठ की कमजोर मांसपेशियां रीढ़ के संतुलन को प्रभावित करती हैं, जिससे दर्द की संभावना बढ़ जाती है। कमर दर्द से बचने के आसान उपाय बैठने और खड़े होने का सही तरीका अपनाएं। हर 30 से 40 मिनट में कुछ देर के लिए उठकर चलें। नियमित रूप से योग, स्ट्रेचिंग और एक्सरसाइज करें। मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल सीमित रखें। आरामदायक और सपोर्ट देने वाली कुर्सी का उपयोग करें। वजन को नियंत्रित रखें। रीढ़ को सहारा देने वाले अच्छे गद्दे पर सोएं। भारी सामान उठाते समय सही तकनीक अपनाएं। कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है? अगर कमर दर्द कई दिनों तक लगातार बना रहे, दर्द के साथ सुन्नपन महसूस हो, चलने-फिरने में परेशानी होने लगे या दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जाए, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फिटनेस और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं। ऐसे में योग का एक खास आसन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसे विशेषज्ञ 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर प्रभावी मानते हैं। यह आसन है नौकासन (Navasana) या Boat Pose, जो न केवल पेट और कोर मसल्स को मजबूत बनाता है बल्कि तनाव कम करने और शरीर को संतुलित रखने में भी मदद करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नौकासन शरीर की गहरी मांसपेशियों पर काम करता है और नियमित अभ्यास से शरीर की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार लाता है। यही कारण है कि इसे योग की सबसे प्रभावशाली कोर-स्ट्रेंथ एक्सरसाइज में गिना जाता है। 100 सिट-अप्स जितना असरदार क्यों माना जाता है नौकासन? अमेरिका की Auburn University at Montgomery द्वारा किए गए एक अध्ययन में नौकासन को योग और पिलेट्स की सबसे प्रभावी कोर एक्सरसाइज में शामिल किया गया। प्रसिद्ध योग शिक्षक Sharath Jois का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति इस आसन को 25 गहरी सांसों तक सही तरीके से होल्ड करता है, तो इसका प्रभाव 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर हो सकता है। पेट, पीठ और कूल्हों को बनाता है मजबूत योग प्रशिक्षकों के अनुसार, नौकासन केवल एब्स तक सीमित नहीं है। यह पेट की मांसपेशियों, हिप फ्लेक्सर्स, ग्लूट्स, पेल्विक मसल्स और पीठ को भी मजबूत करता है। इस आसन के दौरान कोर को सक्रिय रखने से पेट के अंदरूनी अंगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर काम करता है और मेटाबॉलिज्म को भी समर्थन मिलता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित अभ्यास पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कम करने में भी सहायक हो सकता है। तनाव कम करने में भी मददगार नौकासन का फायदा केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। साल 2023 में जर्नल Biomedicine में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि नियमित योग और ध्यान का अभ्यास करने वाले छात्रों में छह सप्ताह के भीतर कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम हुआ। नौकासन करते समय संतुलन बनाए रखना, सांसों को नियंत्रित करना और मन को केंद्रित रखना पड़ता है। यही प्रक्रिया तंत्रिका तंत्र को शांत करने और तनाव को नियंत्रित करने में मदद करती है। दिमाग की क्षमता भी बढ़ाता है नौकासन एक ऐसा आसन है जिसमें शरीर को संतुलन और स्थिरता दोनों बनाए रखनी होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के बैलेंसिंग अभ्यास मस्तिष्क और शरीर के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं। नियमित अभ्यास से एकाग्रता, फोकस और न्यूरोमस्कुलर कनेक्शन बेहतर होता है। यही वजह है कि इसे शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। नौकासन करने का सही तरीका जमीन पर सीधे बैठ जाएं और पैरों को सामने फैलाएं। घुटनों को मोड़ें और पैरों को जमीन से ऊपर उठाएं। धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके शरीर को V आकार में लाने का प्रयास करें। रीढ़ को सीधा रखें और छाती को खुला रखें। दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाएं। नजर हल्की ऊपर रखें और कोर को सक्रिय रखें। 5 से 10 गहरी सांसों तक इस स्थिति में बने रहें। आराम करें और 3 से 5 बार दोहराएं। शुरुआती लोग घुटनों को मोड़कर आसान रूप में भी इसका अभ्यास कर सकते हैं। इन गलतियों से बचें पीठ को गोल कर लेना सांस रोककर रखना कंधों में अनावश्यक तनाव पैदा करना क्षमता से अधिक पैरों को ऊपर उठाने की कोशिश करना विशेषज्ञों का कहना है कि इस आसन में ऊंचाई से ज्यादा स्थिरता महत्वपूर्ण होती है। किन लोगों को नहीं करना चाहिए नौकासन? निम्न समस्याओं से जूझ रहे लोगों को विशेषज्ञ की सलाह के बिना नौकासन नहीं करना चाहिए: कमर की गंभीर चोट हिप फ्लेक्सर स्ट्रेन हर्निया हाल ही में हुई पेट की सर्जरी गर्भावस्था के कुछ चरण
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फिटनेस और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं। ऐसे में योग का एक खास आसन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसे विशेषज्ञ 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर प्रभावी मानते हैं। यह आसन है नौकासन (Navasana) या Boat Pose, जो न केवल पेट और कोर मसल्स को मजबूत बनाता है बल्कि तनाव कम करने और शरीर को संतुलित रखने में भी मदद करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नौकासन शरीर की गहरी मांसपेशियों पर काम करता है और नियमित अभ्यास से शरीर की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार लाता है। यही कारण है कि इसे योग की सबसे प्रभावशाली कोर-स्ट्रेंथ एक्सरसाइज में गिना जाता है। 100 सिट-अप्स जितना असरदार क्यों माना जाता है नौकासन? अमेरिका की Auburn University at Montgomery द्वारा किए गए एक अध्ययन में नौकासन को योग और पिलेट्स की सबसे प्रभावी कोर एक्सरसाइज में शामिल किया गया। प्रसिद्ध योग शिक्षक Sharath Jois का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति इस आसन को 25 गहरी सांसों तक सही तरीके से होल्ड करता है, तो इसका प्रभाव 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर हो सकता है। पेट, पीठ और कूल्हों को बनाता है मजबूत योग प्रशिक्षकों के अनुसार, नौकासन केवल एब्स तक सीमित नहीं है। यह पेट की मांसपेशियों, हिप फ्लेक्सर्स, ग्लूट्स, पेल्विक मसल्स और पीठ को भी मजबूत करता है। इस आसन के दौरान कोर को सक्रिय रखने से पेट के अंदरूनी अंगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर काम करता है और मेटाबॉलिज्म को भी समर्थन मिलता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित अभ्यास पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कम करने में भी सहायक हो सकता है। तनाव कम करने में भी मददगार नौकासन का फायदा केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। साल 2023 में जर्नल Biomedicine में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि नियमित योग और ध्यान का अभ्यास करने वाले छात्रों में छह सप्ताह के भीतर कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम हुआ। नौकासन करते समय संतुलन बनाए रखना, सांसों को नियंत्रित करना और मन को केंद्रित रखना पड़ता है। यही प्रक्रिया तंत्रिका तंत्र को शांत करने और तनाव को नियंत्रित करने में मदद करती है। दिमाग की क्षमता भी बढ़ाता है नौकासन एक ऐसा आसन है जिसमें शरीर को संतुलन और स्थिरता दोनों बनाए रखनी होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के बैलेंसिंग अभ्यास मस्तिष्क और शरीर के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं। नियमित अभ्यास से एकाग्रता, फोकस और न्यूरोमस्कुलर कनेक्शन बेहतर होता है। यही वजह है कि इसे शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। नौकासन करने का सही तरीका जमीन पर सीधे बैठ जाएं और पैरों को सामने फैलाएं। घुटनों को मोड़ें और पैरों को जमीन से ऊपर उठाएं। धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके शरीर को V आकार में लाने का प्रयास करें। रीढ़ को सीधा रखें और छाती को खुला रखें। दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाएं। नजर हल्की ऊपर रखें और कोर को सक्रिय रखें। 5 से 10 गहरी सांसों तक इस स्थिति में बने रहें। आराम करें और 3 से 5 बार दोहराएं। शुरुआती लोग घुटनों को मोड़कर आसान रूप में भी इसका अभ्यास कर सकते हैं। इन गलतियों से बचें पीठ को गोल कर लेना सांस रोककर रखना कंधों में अनावश्यक तनाव पैदा करना क्षमता से अधिक पैरों को ऊपर उठाने की कोशिश करना विशेषज्ञों का कहना है कि इस आसन में ऊंचाई से ज्यादा स्थिरता महत्वपूर्ण होती है। किन लोगों को नहीं करना चाहिए नौकासन? निम्न समस्याओं से जूझ रहे लोगों को विशेषज्ञ की सलाह के बिना नौकासन नहीं करना चाहिए: कमर की गंभीर चोट हिप फ्लेक्सर स्ट्रेन हर्निया हाल ही में हुई पेट की सर्जरी गर्भावस्था के कुछ चरण
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।