Primary Sclerosing Cholangitis (PSC) जैसी गंभीर लिवर बीमारी के जोखिम का पहले से ज्यादा सटीक अनुमान लगाने में अब नई इमेजिंग तकनीक मदद कर सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय मल्टी-सेंटर स्टडी में दावा किया गया है कि Quantitative MRCP यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस कोलांजियोपैंक्रियाटोग्राफी आधारित नई तकनीक PSC मरीजों में बीमारी की गंभीरता और भविष्य के जोखिम को बेहतर तरीके से पहचान सकती है। क्या है PSC बीमारी? Primary Sclerosing Cholangitis एक क्रॉनिक लिवर डिजीज है, जिसमें बाइल डक्ट्स यानी पित्त नलिकाओं में सूजन और फाइब्रोसिस होने लगता है। इससे धीरे-धीरे: लिवर को नुकसान पहुंचता है बाइल डक्ट्स संकरी हो जाती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है इस बीमारी में: Cholangiocarcinoma (बाइल डक्ट कैंसर) और Gallbladder Carcinoma (गॉलब्लैडर कैंसर) का जोखिम भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक PSC का पता चलने के बाद मरीजों में लिवर ट्रांसप्लांट या मृत्यु तक का औसत समय लगभग 13 से 21 साल माना जाता है। फिलहाल लिवर ट्रांसप्लांट ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। स्टडी में क्या सामने आया? इस रिसर्च में 457 PSC मरीजों के Quantitative MRCP डेटा का विश्लेषण किया गया। इनमें से 320 मरीजों पर विस्तृत प्रोग्नोस्टिक एनालिसिस किया गया। शोधकर्ताओं ने एक नया रिस्क मॉडल तैयार किया जिसमें: MRCP इमेजिंग डेटा उम्र Inflammatory Bowel Disease की स्थिति लिवर बायोकेमिस्ट्री और बाइल डक्ट्स में बदलाव जैसे फैक्टर्स शामिल किए गए। पुराने स्कोरिंग सिस्टम से बेहतर निकला मॉडल रिसर्च में पाया गया कि Quantitative MRCP आधारित नया मॉडल PSC के जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा कई स्कोरिंग सिस्टम्स से बेहतर साबित हुआ। यह मॉडल: MayoRisk Score और अन्य पारंपरिक प्रोग्नोस्टिक मॉडल्स से ज्यादा सटीक पाया गया। Bootstrap analysis में qmAOM मॉडल का प्रदर्शन: qmAOM: 0.82 AOM: 0.75 M+BA: 0.70 रिकॉर्ड किया गया। डॉक्टरों को कैसे मिलेगा फायदा? अभी तक PSC की जांच में इस्तेमाल होने वाले कई रेडियोलॉजिकल स्कोरिंग सिस्टम डॉक्टरों की विजुअल व्याख्या पर निर्भर करते हैं। इससे अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच रिपोर्टिंग में अंतर आ सकता है। लेकिन नई MRCP+ तकनीक: एल्गोरिदम आधारित है ऑब्जेक्टिव डेटा देती है और इंटरऑब्जर्वर वैरिएशन कम करती है यानी मरीज की स्थिति का ज्यादा भरोसेमंद आकलन संभव हो सकता है। दवा रिसर्च में भी मिल सकती है मदद शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में: PSC के लिए नई दवाओं के ट्रायल क्लिनिकल रिसर्च और प्रोग्नोस्टिक टूल्स को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
यूरोप में न्यूरोइमेजिंग यानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले CT और MRI स्कैन का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। नई स्टडी के मुताबिक 2015 से 2022 के बीच यूरोप के 29 देशों में CT और MRI जांचों की संख्या 40% से ज्यादा बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ती निर्भरता जहां बेहतर डायग्नोसिस की ओर इशारा करती है, वहीं दूसरी तरफ हेल्थकेयर सिस्टम पर बढ़ते दबाव और रेडियोलॉजिस्ट्स में बर्नआउट जैसी चिंताएं भी सामने ला रही है। किन बीमारियों में बढ़ा इस्तेमाल? Neuroimaging का इस्तेमाल खासतौर पर इन बीमारियों की पहचान और निगरानी में किया जाता है: Stroke Brain Tumor Multiple Sclerosis CT और MRI स्कैन में कितनी बढ़ोतरी हुई? स्टडी में Eurostat और OECD के डेटा का विश्लेषण किया गया। CT स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 10,872 स्कैन 2022 में: बढ़कर 15,312 स्कैन कुल वृद्धि: 40.8% MRI स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 5,746 स्कैन 2022 में: बढ़कर 8,244 स्कैन कुल वृद्धि: 43.5% स्कैन मशीनों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ी जहां स्कैनिंग की मांग तेजी से बढ़ी, वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। CT स्कैनर 2015: प्रति 1 लाख आबादी पर 2.3 मशीनें 2022: बढ़कर 2.68 MRI स्कैनर 2015: 1.43 मशीनें 2022: बढ़कर 2.11 रिपोर्ट के मुताबिक: पश्चिमी यूरोप में सबसे ज्यादा स्कैनिंग हुई जबकि पूर्वी यूरोप में सबसे तेज ग्रोथ दर्ज की गई हालांकि कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में स्कैनिंग गतिविधियों में अस्थायी गिरावट देखी गई थी। क्यों बढ़ रही है Neuroimaging की जरूरत? विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं: 1. बदलते इलाज के तरीके अब स्ट्रोक जैसी बीमारियों में: मल्टीमोडल इमेजिंग और परफ्यूजन स्टडीज का इस्तेमाल बढ़ गया है। 2. उम्रदराज आबादी यूरोपीय यूनियन की 20% से ज्यादा आबादी अब 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की है। बढ़ती उम्र के साथ दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। 3. बेहतर तकनीक नई इमेजिंग तकनीक: ज्यादा तेज ज्यादा सटीक और पहले से ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गई है, जिससे डॉक्टर ज्यादा स्कैन लिख रहे हैं। बढ़ती चिंता: रेडियोलॉजिस्ट्स पर दबाव स्टडी में चेतावनी दी गई है कि स्कैन की संख्या इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्कफोर्स की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। इससे: वेटिंग टाइम बढ़ सकता है डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ सकता है और बर्नआउट का खतरा बढ़ सकता है रिपोर्ट के अनुसार रेडियोलॉजी क्षेत्र में बर्नआउट की दर 33% से 88% तक देखी गई है। “Low-Value Imaging” पर भी सवाल रिसर्चर्स ने “Low-Value Imaging” को लेकर भी चिंता जताई। इसका मतलब ऐसे स्कैन से है जिनका मरीज को बहुत कम या कोई वास्तविक क्लिनिकल फायदा नहीं होता। अनुमान है कि दुनियाभर में: 20% से 50% तक इमेजिंग टेस्ट कम उपयोगी या अनावश्यक हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि यूरोप में Evidence-Based Imaging Guidelines को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि संसाधनों का सही इस्तेमाल हो सके और मरीजों को बेहतर देखभाल मिलती रहे।
देशभर में 20 मई को मेडिकल स्टोर बंद रहने वाले हैं। अखिल भारतीय दवा विक्रेता संगठन (AIOCD) ने ई-फार्मेसी और कॉर्पोरेट कंपनियों की कथित गैर-प्रतिस्पर्धी नीतियों के विरोध में राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। संगठन के मुताबिक इस बंद में देशभर के 15 लाख से अधिक दवा विक्रेता शामिल हो सकते हैं। AIOCD का कहना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री करने वाली कंपनियां लगातार औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act) के नियमों का उल्लंघन कर रही हैं। संगठन का आरोप है कि बिना उचित निगरानी और नियमों के ऑनलाइन दवाओं की बिक्री मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। इसी मुद्दे को लेकर दवा विक्रेताओं ने एक दिन की हड़ताल का फैसला लिया है। क्या-क्या रहेगा बंद? हड़ताल के दौरान कई निजी मेडिकल स्टोर और खुदरा दवा दुकानें बंद रह सकती हैं। ऐसे में लोगों को सलाह दी गई है कि वे अपनी जरूरी दवाएं पहले से खरीद लें ताकि किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। कौन-सी सेवाएं रहेंगी चालू? हालांकि, राहत की बात यह है कि देशभर में प्रमुख फार्मेसी चेन, अस्पतालों से जुड़े मेडिकल स्टोर, जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी स्टोर खुले रहेंगे। इससे मरीजों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध होती रहेंगी। कई राज्यों ने हड़ताल से बनाई दूरी कई राज्य स्तरीय फार्मेसी संगठनों ने इस हड़ताल में शामिल न होने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, सिक्किम, उत्तराखंड और लद्दाख के खुदरा फार्मेसी संघों ने लिखित रूप से आश्वासन दिया है कि वे 20 मई को दवाओं की उपलब्धता बाधित नहीं होने देंगे। इन संगठनों का कहना है कि जनहित को देखते हुए दवाओं की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है। इसलिए उन्होंने बंद से अलग रहने का निर्णय लिया है। लोगों के लिए जरूरी सलाह यदि आप नियमित दवाएं लेते हैं या घर में किसी मरीज के लिए दवाओं की आवश्यकता पड़ती है, तो 20 मई से पहले आवश्यक दवाओं का इंतजाम कर लेना बेहतर होगा। हालांकि अस्पताल आधारित मेडिकल स्टोर और सरकारी फार्मेसी सेवाएं चालू रहेंगी, फिर भी स्थानीय स्तर पर कुछ दवा दुकानों के बंद रहने की संभावना है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। महिलाओं में तेजी से बढ़ रही हार्मोनल समस्या पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) का नाम अब बदलकर पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कर दिया गया है। मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित नए अध्ययन के अनुसार यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि बीमारी को समझने के नजरिए में बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर की करीब 17 करोड़ महिलाओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि लंबे समय से PCOS को केवल ओवरी या सिस्ट से जुड़ी समस्या माना जा रहा था, जबकि यह शरीर के कई हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलावों से जुड़ी जटिल स्थिति है। क्यों बदला गया नाम? डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का मानना है कि “पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम” नाम कई मामलों में भ्रम पैदा करता था। अक्सर यह माना जाता था कि यदि महिला की ओवरी में सिस्ट नहीं है तो उसे PCOS नहीं हो सकता। लेकिन हालिया शोधों में सामने आया कि कई महिलाएं बिना सिस्ट के भी इस बीमारी से प्रभावित होती हैं। इसी वजह से बीमारी की पहचान और इलाज में देरी होती थी। नई परिभाषा में “एंडोक्राइन” और “मेटाबॉलिक” शब्द जोड़कर यह स्पष्ट किया गया है कि यह केवल प्रजनन तंत्र की समस्या नहीं, बल्कि हार्मोन, इंसुलिन, वजन, मानसिक स्वास्थ्य और त्वचा से भी जुड़ी बीमारी है। हर 8 में से 1 महिला प्रभावित अध्ययन के मुताबिक दुनिया में हर आठ में से एक महिला इस समस्या से जूझ रही है। PMOS महिलाओं की फर्टिलिटी, पीरियड्स, वजन, मानसिक स्थिति और हार्मोनल संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है। कई महिलाओं को लंबे समय तक यह पता ही नहीं चल पाता कि उनके शरीर में जो बदलाव हो रहे हैं, वे इसी बीमारी के संकेत हैं। किन लक्षणों के आधार पर होगा निदान? अब PMOS की पहचान केवल ओवरी सिस्ट से नहीं होगी। डॉक्टर कई अन्य संकेतों को भी ध्यान में रखेंगे। इनमें अनियमित पीरियड्स, ओवुलेशन की समस्या, चेहरे पर अधिक बाल आना, मुंहासे, वजन बढ़ना, हाई ब्लड शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, डिप्रेशन, एंग्जायटी और बाल झड़ना जैसे लक्षण शामिल हैं। 20 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में कम से कम दो प्रमुख लक्षण होने पर बीमारी की पुष्टि की जा सकती है, जबकि किशोरियों में हार्मोनल और ओवुलेशन संबंधी संकेतों को प्राथमिक आधार माना जाएगा। इलाज और जागरूकता में मिलेगी मदद विशेषज्ञों का मानना है कि नए नाम से बीमारी की समझ अधिक व्यापक होगी। इससे डॉक्टर समय रहते सही जांच कर सकेंगे और महिलाओं को जल्दी इलाज मिल सकेगा। साथ ही यह बदलाव उन महिलाओं के लिए भी राहत भरा हो सकता है जो वर्षों तक सही निदान का इंतजार करती रही हैं।
कनाडा में की गई एक नई जनसंख्या-आधारित स्टडी में यह सामने आया है कि अपेक्षाकृत कम स्तर का वायु प्रदूषण भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक फाइन पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के संपर्क में रहने से संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive performance) कमजोर हो सकती है और मस्तिष्क में “छुपी हुई” वेस्कुलर क्षति का खतरा बढ़ सकता है। क्या कहती है यह रिसर्च? यह अध्ययन Canadian Alliance for Healthy Hearts and Minds Cohort Study के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2014 से 2018 के बीच 5 प्रांतों के 6,878 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 57.6 वर्ष थी, जिनमें 55% से अधिक महिलाएं थीं। शोध में वायु प्रदूषण के 5 साल के औसत एक्सपोजर को मापा गया और उसका असर दिमागी टेस्ट और MRI स्कैन पर देखा गया। प्रदूषण और दिमागी प्रदर्शन के बीच संबंध स्टडी में पाया गया कि: PM2.5 के हर 5 μg/m³ बढ़ने पर MoCA स्कोर में गिरावट देखी गई इसी तरह NO₂ के बढ़ने से भी मानसिक क्षमता परीक्षण के स्कोर कम हुए कार्य-आधारित स्मृति और स्पीड टेस्ट (Digit Symbol Substitution Test) पर भी नकारात्मक असर पाया गया शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि NO₂ के संपर्क से “covert vascular brain injury” यानी छुपी हुई मस्तिष्क रक्तवाहिका क्षति का जोखिम बढ़ सकता है। खास बात: कम प्रदूषण में भी असर यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल क्षेत्रों में प्रदूषण स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसके बावजूद दिमागी कार्यक्षमता पर असर देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि: केवल अत्यधिक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि कम स्तर का लंबे समय का संपर्क भी जोखिम पैदा कर सकता है अन्य फैक्टरों का सीमित असर स्टडी में यह भी देखा गया कि: कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर और ग्रीन स्पेस (हरियाली) इनका इस संबंध पर कोई बड़ा असर नहीं दिखा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए क्या संकेत? शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित समस्या नहीं है यह सीधे तौर पर ब्रेन हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है लंबे समय में यह डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है आगे की जरूरत वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि: लंबी अवधि के (longitudinal) अध्ययन जरूरी हैं यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने से क्या वास्तव में ब्रेन डिक्लाइन को रोका जा सकता है
हाल ही में सामने आई एक पायलट स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) और कोरोनरी आर्टेरियोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज के बीच गट माइक्रोबायोटा और मेटाबोलिक बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये बदलाव कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियों के संभावित बायोमार्कर हो सकते हैं। स्टडी में क्या किया गया अध्ययन? शोधकर्ताओं ने कुल 30 प्रतिभागियों के फीकल और प्लाज्मा सैंपल का विश्लेषण किया, जिनमें शामिल थे— 10 स्वस्थ व्यक्ति 10 टाइप-2 डायबिटीज मरीज 10 ऐसे मरीज जिनमें डायबिटीज के साथ हार्ट डिजीज भी थी इस दौरान मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग और लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) तकनीक का उपयोग किया गया। गट माइक्रोबायोटा में क्या बदलाव मिले? स्टडी में कई बैक्टीरियल स्पीशीज में अंतर पाया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: Prevotella disiens Bacteroides sp._CAG_875 Sutterella wadsworthensis Paraprevotella clara Anaerobutyricum hallii शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर Bacteroides sp._CAG_875 एक महत्वपूर्ण संभावित बायोमार्कर के रूप में उभरा, जो स्वस्थ व्यक्तियों और T2DM-CAD मरीजों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने में सक्षम रहा। हालांकि कुल माइक्रोबायोटा विविधता में बड़ा अंतर नहीं पाया गया, लेकिन विशिष्ट बैक्टीरिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। मेटाबोलिक बदलाव और संभावित संकेत शोध में 42 अलग-अलग मेटाबोलाइट्स की पहचान की गई, जिनमें शामिल हैं: फ्रक्टोज गैलिक एसिड पाइरोग्लूटामिक एसिड एडिपिक एसिड सबेरिक एसिड 12-ketolithocholic acid (12-ketoLCA) इनमें 12-ketoLCA को सबसे अहम संभावित बायोमार्कर माना गया, जो बाइल एसिड मेटाबॉलिज्म और मेटाबोलिक डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है। “गट-हार्ट एक्सिस” पर बड़ा संकेत स्टडी में यह भी पाया गया कि गट माइक्रोब्स और मेटाबोलाइट्स के बीच गहरा संबंध है, जो “gut–heart axis” की ओर संकेत करता है। यह डायबिटीज से जुड़ी हार्ट बीमारियों में एक अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा अमीनो एसिड, लिनोलिक एसिड और ग्लूटामेट मेटाबॉलिज्म जैसे पाथवे में भी बदलाव देखे गए, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस और कार्डियोवस्कुलर डिजीज से जुड़े हैं। सीमाएं और आगे की जरूरत शोधकर्ताओं ने माना कि यह एक छोटा पायलट अध्ययन था, इसलिए निष्कर्षों को अभी शुरुआती स्तर का माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि: सैंपल साइज छोटा था मेकैनिज्म की पुष्टि बाकी है बड़े और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत है
फ्रांस में नई रिसर्च के बाद गर्भवती महिलाओं में बढ़ी Cytomegalovirus जांच और एंटीवायरल इलाज गर्भावस्था के दौरान होने वाले संक्रमणों को लेकर एक नई स्टडी में अहम जानकारी सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, Cytomegalovirus Infection की जांच और इलाज में फ्रांस में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखा गया है। 2020 में प्रकाशित एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बाद गर्भवती महिलाओं में CMV स्क्रीनिंग और Valacyclovir उपचार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। खास बात यह रही कि जांच बढ़ने के बावजूद गर्भपात (Termination of Pregnancy) के मामलों में वृद्धि नहीं हुई। क्या है Cytomegalovirus (CMV)? Cytomegalovirus Infection एक वायरल संक्रमण है, जो नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और मानसिक विकास में देरी जैसी गंभीर दिक्कतों का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार: फ्रांस में लगभग 0.4% नवजात congenital CMV infection से प्रभावित होते हैं गर्भावस्था की शुरुआती तिमाही में संक्रमण होने पर खतरा ज्यादा बढ़ जाता है स्क्रीनिंग में बड़ा उछाल स्टडी में 2017 से 2023 के बीच 451 गर्भावस्थाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि: 2017-2020 के बीच CMV स्क्रीनिंग दर 22% थी 2021-2023 में यह बढ़कर 40% हो गई वहीं महिलाओं द्वारा खुद टेस्ट की मांग करने के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। Valacyclovir इलाज से क्या फायदा मिला? 2020 की स्टडी में पाया गया था कि गर्भावस्था की शुरुआती अवस्था में Valacyclovir देने से मां से बच्चे में संक्रमण फैलने का खतरा लगभग दो-तिहाई तक कम हो सकता है। इसके बाद: एंटीवायरल थेरेपी का इस्तेमाल 27.7% से बढ़कर 59.8% हो गया यूरोप के कई विशेषज्ञ समूहों ने शुरुआती गर्भावस्था में CMV संक्रमण होने पर Valacyclovir इस्तेमाल की सिफारिश भी की। MRI और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट ने तय किए फैसले स्टडी में पाया गया कि जिन मामलों में: MRI या अल्ट्रासाउंड में दिमाग से जुड़ी गंभीर असामान्यताएं दिखीं, उन्हीं मामलों में गर्भपात के फैसले लिए गए। इन समस्याओं में शामिल थीं: Microcephaly Ventriculomegaly Brain calcifications Cerebellar hypoplasia गर्भपात के मामलों में आई कमी शुरुआती CMV संक्रमण वाले मामलों में कुल Termination Rate 20.7% रही। हालांकि 2020 के बाद इसमें गिरावट देखी गई: पहले: 25.9% बाद में: 13% रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं को Valacyclovir नहीं मिला, उनमें गर्भपात की संभावना ज्यादा रही। अब भी बने हुए हैं कई सवाल हालांकि फ्रांस ने मई 2025 में ही राष्ट्रीय स्तर पर CMV स्क्रीनिंग की सिफारिशें लागू की हैं, लेकिन पूरे यूरोप में अभी भी अलग-अलग नीतियां अपनाई जा रही हैं। विशेषज्ञों की कुछ चिंताएं अब भी बनी हुई हैं: गर्भवती महिलाओं में मानसिक तनाव हाई-डोज Valacyclovir के संभावित साइड इफेक्ट्स जरूरत से ज्यादा मेडिकल हस्तक्षेप फिर भी रिसर्चर्स का मानना है कि अब CMV जांच और इलाज को नियमित गर्भावस्था देखभाल का हिस्सा बनाने की दिशा में स्वीकार्यता बढ़ रही है।
इंजेक्शन बंद करने के बाद भी वजन कंट्रोल रखने में मददगार साबित हुई नई ओरल GLP-1 दवा मोटापे और वजन घटाने की दवाओं को लेकर नई रिसर्च में अहम जानकारी सामने आई है। एक नए क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि Orforglipron नाम की ओरल दवा उन लोगों में वजन को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकती है, जिन्होंने पहले GLP-1 इंजेक्शन थेरेपी से वजन कम किया था। ATTAIN-MAINTAIN ट्रायल के निष्कर्षों के अनुसार, जिन मरीजों ने इंजेक्शन बंद करने के बाद रोजाना Orforglipron पिल ली, उनमें वजन दोबारा बढ़ने की संभावना काफी कम रही। क्या था ट्रायल? इस स्टडी में अमेरिका के 376 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। ये सभी लोग पहले: Tirzepatide या Semaglutide जैसी इंजेक्टेबल GLP-1 दवाओं का इस्तेमाल कर चुके थे और एक साल से ज्यादा समय में उनका वजन कम हुआ था। इसके बाद प्रतिभागियों को एक साल तक: Orforglipron पिल या Placebo (डमी दवा) दी गई। Tirzepatide लेने वालों में क्या रहा असर? जिन लोगों ने पहले Tirzepatide इंजेक्शन लिया था और बाद में Orforglipron पिल शुरू की: उन्होंने अपने पहले घटे वजन का 74.7% तक बनाए रखा वहीं placebo लेने वालों में यह आंकड़ा केवल 49.2% रहा। Semaglutide ग्रुप में और बेहतर नतीजे Semaglutide इंजेक्शन बंद करने वाले मरीजों में: Orforglipron लेने वालों ने 79.3% वजन घटाव बनाए रखा Placebo ग्रुप में यह केवल 37.6% रहा यानी दोनों समूहों के बीच लगभग 41.7% का बड़ा अंतर देखा गया। रिसर्चर्स ने क्या कहा? विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीज और कुछ डॉक्टर यह मान लेते हैं कि एक बार वजन कम हो जाने के बाद मोटापे की दवाएं बंद की जा सकती हैं। लेकिन दवा बंद करने के बाद वजन दोबारा बढ़ना आम समस्या है। रिसर्चर्स के अनुसार: वजन दोबारा बढ़ने से cardiometabolic फायदे कम हो सकते हैं वजन में बार-बार उतार-चढ़ाव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है ऐसे में Orforglipron जैसी दवाएं लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखने में मददगार हो सकती हैं। कितनी हुई औसत वजन में कमी? ट्रायल में Orforglipron लेने वाले प्रतिभागियों में: Tirzepatide ग्रुप: औसतन 5 किलोग्राम अतिरिक्त वजन कम हुआ Semaglutide ग्रुप: लगभग 1 किलोग्राम वजन कम हुआ क्यों खास मानी जा रही है यह दवा? अब तक GLP-1 आधारित अधिकतर लोकप्रिय वजन घटाने वाली दवाएं इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध हैं। लेकिन Orforglipron एक ओरल पिल है, जिसे रोजाना लिया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि: गोली के रूप में दवा लेना कई मरीजों के लिए आसान होगा यह बड़े स्तर पर उपलब्ध कराना ज्यादा सरल हो सकता है लंबे समय तक वजन प्रबंधन में यह नई उम्मीद बन सकती है फिलहाल यह दवा अमेरिका में उपलब्ध है और जल्द ही ब्रिटेन में भी लॉन्च हो सकती है।
एक नई 52-सप्ताह की Phase 3b क्लिनिकल स्टडी में सामने आया है कि Tildrakizumab दवा का असर मोटापे से प्रभावित नहीं होता। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह दवा मध्यम से गंभीर स्कैल्प सोरायसिस से पीड़ित मरीजों में समान रूप से प्रभावी और सुरक्षित पाई गई, चाहे मरीज मोटापे से ग्रस्त हों या नहीं। यह अध्ययन ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि मोटापा और शरीर में बढ़ी हुई सूजन बायोलॉजिक थेरेपी की प्रभावशीलता को कम कर सकती है। हालांकि इस शोध ने संकेत दिया है कि IL-23 को टारगेट करने वाली बायोलॉजिक थेरेपी मोटापे वाले मरीजों में भी असरदार बनी रह सकती है। 16वें सप्ताह में बेहतर परिणाम शोधकर्ताओं ने मरीजों को दो समूहों में बांटा। एक समूह को Tildrakizumab 100 mg दिया गया, जबकि दूसरे को प्लेसीबो। मरीजों को BMI के आधार पर मोटापे और गैर-मोटापे वाली श्रेणियों में विभाजित किया गया। अध्ययन में शामिल लगभग आधे मरीज मोटापे की श्रेणी में थे। 16वें सप्ताह तक दोनों समूहों में दवा लेने वाले मरीजों में बेहतर सुधार देखने को मिला। मोटापे वाले मरीजों में: 48.8% मरीजों ने स्कैल्प रिस्पॉन्स हासिल किया प्लेसीबो लेने वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 10% रहा गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 50% मरीजों में सकारात्मक सुधार देखा गया प्लेसीबो समूह में केवल 4.8% मरीजों को फायदा मिला PSSI 90 स्कोर में भी शानदार सुधार स्टडी में Psoriasis Scalp Severity Index (PSSI) 90 स्कोर में भी महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया। यह स्कोर स्कैल्प सोरायसिस में 90% तक सुधार को दर्शाता है। मोटापे वाले मरीजों में: 62.8% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में केवल 10% मरीज इस स्तर तक पहुंचे गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 58.7% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में कोई भी मरीज इस लक्ष्य तक नहीं पहुंचा 52 सप्ताह तक बना रहा असर अध्ययन में यह भी सामने आया कि मरीजों में स्कैल्प की खुजली और प्रभावित हिस्से में उल्लेखनीय कमी आई। शोधकर्ताओं के अनुसार, Tildrakizumab का असर पूरे 52 सप्ताह तक स्थिर और प्रभावी बना रहा। सुरक्षा के लिहाज से भी दवा सुरक्षित पाई गई। मोटापे और गैर-मोटापे वाले मरीजों में किसी नए साइड इफेक्ट या गंभीर सुरक्षा जोखिम की पहचान नहीं हुई। सोरायसिस और मोटापे के संबंध पर नई उम्मीद Psoriasis को मोटापे से जुड़ी प्रमुख बीमारियों में से एक माना जाता है। पहले के कई अध्ययनों में यह दावा किया गया था कि मोटापे के कारण शरीर में बढ़ने वाली सूजन दवाओं के असर को कम कर सकती है। हालांकि इस नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि Tildrakizumab जैसी आधुनिक बायोलॉजिक दवाएं BMI से प्रभावित हुए बिना लंबे समय तक प्रभावी रह सकती हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उप-विश्लेषण सांख्यिकीय अंतर को पूरी तरह मापने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, इसलिए भविष्य में बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत हो सकती है। इसके बावजूद विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह दवा मोटापे और गैर-मोटापे दोनों तरह के मरीजों में सुरक्षित और प्रभावी साबित हुई है।
लखनऊ, एजेंसियां। प्रतीक यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे और भाजपा नेत्री अपर्णा यादव के पति, का बुधवार सुबह लखनऊ में निधन हो गया। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनकी उम्र मात्र 38 वर्ष थी। पल्मोनरी एम्बोलिज्म से थे पीड़ित जानकारी के अनुसार, प्रतीक यादव फेफड़ों की गंभीर बीमारी ‘पल्मोनरी एम्बोलिज्म’ से जूझ रहे थे। यह एक बेहद खतरनाक बीमारी है, जिसमें खून का थक्का फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में फंस जाता है। इससे शरीर में रक्त संचार बाधित हो जाता है और मरीज की स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है। इस बीमारी के दौरान मरीज को अचानक सांस फूलना, सीने में तेज दर्द, खांसी और ऑक्सीजन लेवल गिरने जैसी समस्याएं होती हैं। डॉक्टर इसे मेडिकल इमरजेंसी मानते हैं और तुरंत इलाज की जरूरत होती है। कुछ दिन पहले अस्पताल में थे भर्ती सूत्रों के मुताबिक, कुछ समय पहले प्रतीक यादव की हालत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह ICU में रहकर इलाज करा रहे थे। हालांकि बताया जा रहा है कि इलाज पूरा होने से पहले ही वह अस्पताल छोड़कर घर चले गए थे। अपर्णा यादव की करीबी मित्र रीना सिंह ने बताया कि करीब चार महीने पहले उनके फेफड़ों में गंभीर इंफेक्शन हुआ था, जिसके बाद उनका ऑपरेशन भी हुआ था। परिवार और समर्थकों में शोक प्रतीक यादव के निधन की खबर से राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर है। परिवार, समर्थक और करीबी लोग गहरे सदमे में हैं। कई नेताओं ने अखिलेश यादव और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। उनके निधन के बाद लखनऊ में बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा भ्रामक दावा Hantavirus Pulmonary Syndrome को लेकर सोशल मीडिया पर एक दावा तेजी से वायरल हो रहा है। पोस्ट्स में कहा जा रहा है कि Pfizer-BioNTech COVID-19 Vaccine के साइड इफेक्ट्स की सूची में Hantavirus संक्रमण शामिल है। कुछ यूजर्स ने Pfizer के एक पुराने रेगुलेटरी दस्तावेज़ का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए दावा किया कि COVID वैक्सीन में Hantavirus मौजूद था या वैक्सीन इसकी वजह बन सकती है। हालांकि फैक्ट-चेक में यह दावा भ्रामक पाया गया है। क्या था वायरल दस्तावेज़? वायरल स्क्रीनशॉट उस दस्तावेज़ का हिस्सा था, जिसे Pfizer ने 2021 में अमेरिकी एजेंसी U.S. Food and Drug Administration (FDA) को वैक्सीन लाइसेंस के लिए जमा किया था। इस दस्तावेज़ में “List of Adverse Events of Special Interest” नाम की सूची थी, जिसमें अध्ययन अवधि के दौरान सामने आए विभिन्न मेडिकल इवेंट्स का जिक्र किया गया था। इसी सूची में Hantavirus Pulmonary Infection का भी नाम था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैक्सीन ने यह बीमारी पैदा की। Pfizer ने क्या कहा? Pfizer के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि सूची में शामिल सभी मेडिकल इवेंट्स जरूरी नहीं कि वैक्सीन से जुड़े हों। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच जिन लोगों ने वैक्सीन लगवाई, उनके साथ हुई किसी भी स्वास्थ्य समस्या को रिकॉर्ड किया गया था, चाहे उसका संबंध वैक्सीन से हो या नहीं। यह डेटा अलग-अलग रिपोर्टिंग सिस्टम जैसे Vaccine Adverse Event Reporting System (VAERS) से लिया गया था, जहां कोई भी व्यक्ति रिपोर्ट दर्ज करा सकता है। वैक्सीन में Hantavirus नहीं है रिपोर्ट के अनुसार Comirnaty यानी Pfizer की COVID वैक्सीन के आधिकारिक इंग्रीडिएंट्स में कहीं भी Hantavirus शामिल नहीं है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक इस वैक्सीन में कोई जीवित वायरस नहीं होता। इसके अलावा ब्रिटेन समेत कई देशों ने वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावशीलता की समीक्षा के बाद इसे पूरी मंजूरी दी थी। वैक्सीन के आधिकारिक प्रोडक्ट लीफलेट में भी Hantavirus का कोई उल्लेख नहीं है। क्या है Hantavirus? Hantavirus Pulmonary Syndrome एक दुर्लभ लेकिन गंभीर संक्रमण है, जो कुछ विशेष प्रकार के Hantavirus से होता है। World Health Organization (WHO) के अनुसार Andes strain ऐसा इकलौता Hantavirus है, जिसमें इंसान से इंसान संक्रमण के कुछ मामले देखे गए हैं। हालांकि यह बेहद दुर्लभ माना जाता है और आमतौर पर लंबे एवं करीबी संपर्क से फैलता है। क्रूज शिप में सामने आया था संक्रमण हाल ही में एक डच-फ्लैग्ड क्रूज शिप पर Hantavirus संक्रमण का प्रकोप सामने आया था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई। South Africa के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया था कि दो पीड़ितों में Andes strain पाया गया था, जिन्हें जहाज से निकालकर इलाज के लिए लाया गया था। क्या है निष्कर्ष? फैक्ट-चेक के मुताबिक यह दावा गलत और भ्रामक है कि Pfizer-BioNTech COVID-19 Vaccine से Hantavirus संक्रमण होता है। वायरल दस्तावेज़ में सिर्फ उन मेडिकल घटनाओं का रिकॉर्ड था, जो अध्ययन अवधि के दौरान रिपोर्ट की गई थीं। बाद में जिन साइड इफेक्ट्स को वैक्सीन से सीधे जुड़ा पाया गया, उनकी आधिकारिक सूची में Hantavirus शामिल नहीं है।
गर्मियों में ज्यादा फल खाना भी बन सकता है परेशानी गर्मी का मौसम आते ही बाजार आम, तरबूज, लीची और पपीते जैसे फलों से भर जाते हैं। लोग इन्हें हेल्दी मानकर बिना सोचे-समझे खूब खाते हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा फल खाना शरीर के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है, खासकर डायबिटीज, मोटापा और फैटी लिवर से जूझ रहे लोगों के लिए। विशेषज्ञों के मुताबिक फलों में प्राकृतिक शुगर यानी फ्रक्टोज होता है। सीमित मात्रा में यह फायदेमंद है, लेकिन ज्यादा सेवन करने पर यह लिवर पर दबाव बढ़ा सकता है और ब्लड शुगर भी बढ़ा सकता है। आम खाते समय रखें मात्रा का ध्यान आम गर्मियों का सबसे पसंदीदा फल माना जाता है, लेकिन इसमें कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट काफी ज्यादा होते हैं। डॉक्टरों के अनुसार: डायबिटीज वाले लोग एक दिन में आधा मध्यम आकार का आम ही खाएं। सामान्य लोग एक छोटा या मध्यम आकार का आम खा सकते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि आम को भोजन के तुरंत बाद खाने के बजाय स्नैक की तरह खाएं। इसके साथ दही, पनीर, भुना चना या ड्राई फ्रूट्स लेने से शुगर तेजी से नहीं बढ़ती। मैंगो शेक, आमरस और पैकेज्ड जूस से बचने की सलाह दी गई है। तरबूज ज्यादा खाने से भी बढ़ सकती है शुगर तरबूज में पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए लोग इसे बड़ी मात्रा में खा लेते हैं। हालांकि यह हल्का फल माना जाता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन ब्लड शुगर बढ़ा सकता है। डायबिटीज मरीजों के लिए 100-150 ग्राम तरबूज पर्याप्त माना गया है। अन्य लोग करीब 200 ग्राम तक खा सकते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि तरबूज का जूस पीने से बचना चाहिए, क्योंकि उसमें फाइबर कम हो जाता है और शुगर तेजी से शरीर में पहुंचती है। लीची खाते समय बरतें सावधानी लीची स्वादिष्ट जरूर होती है, लेकिन इसमें फ्रक्टोज की मात्रा काफी ज्यादा होती है। विशेषज्ञों के अनुसार: डायबिटीज वाले लोग 3-4 लीची तक सीमित रहें। सामान्य लोग 7-8 लीची खा सकते हैं। डॉक्टरों ने यह भी बताया कि कच्ची लीची खाली पेट खाना बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है। बिहार में पहले भी इससे जुड़ी गंभीर बीमारियों के मामले सामने आ चुके हैं। पपीता और आड़ू बेहतर विकल्प पपीता अपेक्षाकृत हल्का और सुरक्षित फल माना जाता है। डायबिटीज मरीज 100 ग्राम तक पपीता खा सकते हैं। अन्य लोग 150-200 ग्राम तक सेवन कर सकते हैं। वहीं आड़ू और आलूबुखारा जैसे फल भी सीमित मात्रा में अच्छे विकल्प माने जाते हैं। फ्रूट प्लेटर भी बन सकता है खतरा डॉक्टरों का कहना है कि कई लोग एक साथ आम, तरबूज, लीची, खरबूजा और पपीता मिलाकर बड़ा फ्रूट बाउल खा लेते हैं। देखने में यह हेल्दी लगता है, लेकिन इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा काफी ज्यादा हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि: अलग-अलग फल खाने पर भी कुल मात्रा नियंत्रित रखें। डायबिटीज वाले लोग कुल मिलाकर करीब 100 ग्राम फल ही लें। सामान्य लोग 200 ग्राम तक फल खा सकते हैं। कब खाना चाहिए फल? डॉक्टरों के मुताबिक फल खाने का सही समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। फलों को भोजन के बीच में खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है। रात में भारी मात्रा में फल खाने से बचना चाहिए। सुबह या दिन में फल खाना शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद रहता है। जूस नहीं, साबुत फल खाएं विशेषज्ञों का कहना है कि ताजे और साबुत फल हमेशा जूस से बेहतर होते हैं। जूस में फाइबर कम हो जाता है और शुगर तेजी से शरीर में पहुंचती है, जिससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ सकती है।
MV Hondius जहाज पर संक्रमण के बाद एहतियात बढ़ाए गए हंटावायरस संक्रमण के खतरे को देखते हुए MV Hondius जहाज के दो भारतीय क्रू मेंबर्स को नीदरलैंड में क्वारंटीन किया गया है। स्पेन स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, जहाज पर मौजूद सभी यात्रियों और कर्मचारियों को सुरक्षित तरीके से उतार दिया गया है। यह जहाज हाल ही में सामने आए हंटावायरस संक्रमण के मामलों के कारण चर्चा में आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जानकारी के मुताबिक जहाज पर अब तक आठ संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जिनमें से पांच संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है। इस संक्रमण से अब तक तीन लोगों की मौत भी हो चुकी है। क्या है हंटावायरस? हंटावायरस एक ऐसा वायरस है जो मुख्य रूप से चूहों और अन्य कृंतकों से इंसानों में फैलता है। संक्रमित जानवरों के पेशाब, मल या लार के संपर्क में आने से यह संक्रमण हो सकता है। इसके अलावा संक्रमित कण हवा में फैल जाएं और व्यक्ति उन्हें सांस के जरिए अंदर ले ले, तब भी संक्रमण का खतरा रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार बंद और कम हवादार जगहों में इसका खतरा अधिक होता है। जहाज, गोदाम और स्टोरेज एरिया जैसी जगहों पर संक्रमण फैलने की आशंका ज्यादा रहती है। लंबी incubation period क्यों बढ़ा रही चिंता? डॉक्टरों के मुताबिक हंटावायरस की incubation period यानी शरीर में वायरस प्रवेश करने और लक्षण दिखने के बीच का समय एक से आठ सप्ताह तक हो सकता है। ज्यादातर मामलों में लक्षण दो से छह सप्ताह के बीच दिखाई देते हैं। इसी वजह से संक्रमित व्यक्ति शुरुआत में पूरी तरह सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन कई हफ्तों बाद अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ सकता है। यही कारण है कि संक्रमित लोगों को लंबे समय तक निगरानी में रखा जाता है। शुरुआती लक्षण दिखते हैं सामान्य फ्लू जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे हो सकते हैं। इनमें बुखार, शरीर दर्द, थकान, सिरदर्द और कमजोरी शामिल हैं। लेकिन गंभीर मामलों में यह तेजी से फेफड़ों और किडनी को प्रभावित कर सकता है। कुछ मरीजों में सांस लेने में तकलीफ, लो ब्लड प्रेशर और respiratory failure जैसी स्थिति बन सकती है। वहीं कुछ मामलों में Haemorrhagic Fever with Renal Syndrome (HFRS) भी विकसित हो सकता है, जिससे किडनी फेल होने और अंदरूनी रक्तस्राव का खतरा रहता है। क्या इंसान से इंसान में फैलता है वायरस? डॉक्टरों के अनुसार हंटावायरस का इंसानों के बीच फैलना बेहद दुर्लभ है। अधिकांश मामलों में यह सीधे संक्रमित कृंतकों के संपर्क से ही फैलता है। केवल दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले Andes strain में व्यक्ति से व्यक्ति संक्रमण के कुछ मामले सामने आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य संपर्क से संक्रमण का खतरा बहुत कम है और आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। अभी तक नहीं है कोई खास दवा फिलहाल हंटावायरस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार इलाज करते हैं। गंभीर मामलों में ऑक्सीजन सपोर्ट, ICU निगरानी और किडनी प्रभावित होने पर डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यदि किसी व्यक्ति को संक्रमित क्षेत्र या जहाज से संपर्क के बाद कई दिनों तक बुखार, कमजोरी, सांस लेने में परेशानी या तेज सिरदर्द जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। भारत में कितना बड़ा खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल भारत और एशिया में आम लोगों के लिए इसका खतरा काफी कम माना जा रहा है। इसे अभी व्यापक सामुदायिक संक्रमण नहीं बल्कि यात्रा और पर्यावरण से जुड़ा जोखिम माना जा रहा है।
Psoriasis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली systemic therapies को लेकर लंबे समय से यह चिंता बनी हुई है कि क्या ये दवाएं मरीजों में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ाती हैं। अब ब्रिटेन के बड़े रियल-वर्ल्ड डेटा रजिस्टर BADBIR पर आधारित एक नई स्टडी ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर systemic treatments के बीच गंभीर संक्रमण के खतरे में बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखा, हालांकि कुछ दवाओं के साथ संक्रमण का जोखिम थोड़ा अधिक पाया गया। क्या है BADBIR स्टडी? यह अध्ययन British Association of Dermatologists Biologic Interventions Register (BADBIR) के डेटा पर आधारित था। इसमें Psoriasis से पीड़ित 18,976 वयस्क मरीजों के 46,770 treatment episodes का विश्लेषण किया गया। मरीजों को इलाज शुरू होने से लेकर दवा बंद होने, मृत्यु या अंतिम फॉलो-अप तक ट्रैक किया गया। इस स्टडी में “serious infection” उन मामलों को माना गया, जिनमें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, IV एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी की जरूरत पड़ी या संक्रमण के कारण मृत्यु हुई। कितने मरीजों में दिखा गंभीर संक्रमण? अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत आयु 45.6 वर्ष थी और औसत BMI 31.6 kg/m² दर्ज किया गया। पूरे अध्ययन के दौरान गंभीर संक्रमण की दर 27.67 घटनाएं प्रति 1,000 person-years रही। हालांकि जिन मरीजों को पहले भी गंभीर संक्रमण हो चुका था, उनमें दोबारा संक्रमण का खतरा काफी ज्यादा पाया गया। इस समूह में संक्रमण की दर 78.70 प्रति 1,000 person-years रही। किन दवाओं के साथ दिखा ज्यादा जोखिम? शोधकर्ताओं ने पाया कि Apremilast और Secukinumab के साथ गंभीर संक्रमण का खतरा Adalimumab की तुलना में थोड़ा अधिक दिखाई दिया। हालांकि sensitivity analyses में ये परिणाम पूरी तरह स्थिर नहीं रहे, इसलिए वैज्ञानिकों ने इन निष्कर्षों को सावधानी से देखने की सलाह दी है। किस दवा में दिखा कम संक्रमण जोखिम? अध्ययन में recurrent event analysis भी किया गया, जिसमें एक ही मरीज में बार-बार होने वाले संक्रमणों को शामिल किया गया। इस विश्लेषण में Risankizumab के साथ गंभीर संक्रमण का जोखिम कई अन्य therapies की तुलना में कम पाया गया। विशेष रूप से इसकी तुलना Brodalumab, Etanercept और standard systemic therapies से की गई। संक्रमण से मौत के मामले कितने गंभीर? स्टडी के मुताबिक गंभीर संक्रमण से जुड़ी मौतें बहुत कम दर्ज की गईं। इसकी दर केवल 1.81 प्रति 1,000 person-years रही। मरीजों और डॉक्टरों के लिए क्या है इसका मतलब? विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन Psoriasis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली systemic therapies की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण real-world evidence देता है। रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर दवाओं के बीच संक्रमण जोखिम में कोई बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन जिन मरीजों को पहले संक्रमण हो चुका हो या जिनकी immunity कमजोर हो, उनके लिए इलाज चुनते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए treatment selection हमेशा individual risk profile को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
Topical Corticosteroids यानी त्वचा पर इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। इनका इस्तेमाल एक्जिमा, सोरायसिस और अन्य सूजन वाली त्वचा संबंधी बीमारियों के इलाज में लंबे समय से किया जाता रहा है। लेकिन अब एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि इन दवाओं का लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली मात्रा में इस्तेमाल Type 2 Diabetes के खतरे को बढ़ा सकता है। लाखों लोगों पर हुई स्टडी यह बड़ी रिसर्च दक्षिण कोरिया में की गई, जिसमें 6.85 लाख से ज्यादा वयस्कों के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया। स्टडी में शामिल सभी लोग शुरुआत में डायबिटीज से मुक्त थे। शोधकर्ताओं ने पांच साल की अवधि में Topical Corticosteroids के इस्तेमाल का अध्ययन किया। इसमें दवा की ताकत (Potency), उपयोग की अवधि और कितनी बार दवा लिखी गई, जैसे पहलुओं को शामिल किया गया। इसके बाद प्रतिभागियों को अगले छह साल तक फॉलो किया गया ताकि नए Type 2 Diabetes मामलों की पहचान की जा सके। सामान्य इस्तेमाल में नहीं मिला बड़ा खतरा रिसर्च में यह पाया गया कि सामान्य तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयड क्रीम और लोशन से डायबिटीज का जोखिम उल्लेखनीय रूप से नहीं बढ़ा। हालांकि, जब शोधकर्ताओं ने दवा के उपयोग के तरीके और अवधि का विस्तार से अध्ययन किया, तब कुछ अहम जोखिम सामने आए। ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड से बढ़ा जोखिम स्टडी के अनुसार– High-Potency स्टेरॉयड इस्तेमाल करने वालों में Type 2 Diabetes का खतरा 15% ज्यादा पाया गया जिन लोगों को 10 या उससे ज्यादा बार यह दवाएं प्रिस्क्राइब की गईं, उनमें जोखिम 26% तक बढ़ा छह महीने या उससे ज्यादा समय तक लगातार इस्तेमाल करने वालों में डायबिटीज का खतरा 45% तक बढ़ गया वहीं कम ताकत वाली स्टेरॉयड, कम अवधि तक इस्तेमाल और 10 से कम प्रिस्क्रिप्शन वाले मरीजों में जोखिम काफी कम या सामान्य रहा। क्यों बढ़ सकता है खतरा? शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक या ज्यादा ताकत वाली स्टेरॉयड के इस्तेमाल से शरीर में दवा का अवशोषण बढ़ सकता है। इससे ग्लूकोज कंट्रोल और मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो सकता है, जो आगे चलकर डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है। डॉक्टरों को क्या सलाह दी गई? विशेषज्ञों ने कहा कि इस रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि Topical Steroids का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए। लेकिन डॉक्टरों को सलाह दी गई है कि वे– कम से कम प्रभावी ताकत वाली दवा दें इलाज की अवधि छोटी रखें लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों की नियमित मॉनिटरिंग करें मरीजों के लिए क्या जरूरी है? विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक स्टेरॉयड क्रीम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। खासकर वे लोग जो पहले से मोटापा, हाई ब्लड शुगर या डायबिटीज के जोखिम से जूझ रहे हैं, उन्हें अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। यह रिसर्च Topical Steroids की सामान्य सुरक्षा को लेकर भरोसा तो देती है, लेकिन साथ ही लंबे और ज्यादा शक्तिशाली इस्तेमाल के दौरान सतर्क रहने की भी सलाह देती है।
Psilocybin यानी मैजिक मशरूम में पाया जाने वाला साइकेडेलिक कंपाउंड एक बार की हाई डोज लेने के बाद इंसानी दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि सिर्फ 25 mg की एक डोज दिमाग की कार्यप्रणाली और संरचना में ऐसे बदलाव ला सकती है, जिन्हें एक घंटे से लेकर एक महीने तक देखा जा सकता है। यह स्टडी 2026 में 28 स्वस्थ लोगों पर की गई, जिन्होंने पहले कभी साइकेडेलिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया था। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने EEG और fMRI तकनीक की मदद से दिमाग में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया। पहले दी गई प्लेसीबो डोज, फिर 25 mg की हाई डोज रिसर्च के दौरान प्रतिभागियों को सबसे पहले 1 mg की बहुत छोटी डोज दी गई, जिसे प्लेसीबो जैसा माना गया। इसके एक महीने बाद उन्हें 25 mg की हाई डोज दी गई, जो एक गहरा साइकेडेलिक अनुभव पैदा करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। सिर्फ एक घंटे में दिखने लगे बदलाव रिसर्च के मुताबिक, डोज लेने के एक घंटे के भीतर EEG स्कैन में “ब्रेन एंट्रॉपी” में तेजी देखी गई। इसका मतलब है कि दिमाग सामान्य से ज्यादा विविध तरीके से जानकारी प्रोसेस करने लगा और मानसिक अवस्थाओं की संभावनाएं बढ़ गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति दिमाग को ज्यादा खुला और लचीला बना सकती है। दिमाग की संरचना में भी दिखे बदलाव रिसर्च में इस्तेमाल की गई Diffusion Tensor Imaging तकनीक से पता चला कि एक महीने बाद प्रतिभागियों के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सबकॉर्टिकल हिस्सों में व्हाइट मैटर फाइबर्स पतले हुए। हालांकि शोधकर्ताओं ने कहा कि स्वस्थ लोगों में लंबे समय तक रहने वाले फंक्शनल बदलाव उतने मजबूत नहीं दिखे, जितने मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में देखे जाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य और सोचने की क्षमता में सुधार स्टडी में यह भी सामने आया कि एक महीने बाद प्रतिभागियों में– Cognitive Flexibility (सोचने की क्षमता में लचीलापन) Psychological Insight (आत्म-समझ) Wellbeing (मानसिक संतुलन और खुशी) इनमें सुधार देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि साइकेडेलिक अनुभव के दौरान मिलने वाली गहरी मानसिक समझ, लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य में सुधार का कारण बन सकती है। प्रतिभागियों ने बताया “जीवन का सबसे अलग अनुभव” 25 mg डोज लेने वाले लगभग सभी प्रतिभागियों ने इसे अपने जीवन का “सबसे असामान्य चेतन अनुभव” बताया। सिर्फ एक प्रतिभागी ने इसे अपने जीवन के “टॉप 5 सबसे अलग अनुभवों” में शामिल किया। क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च साइकेडेलिक थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल केवल मेडिकल रिसर्च और विशेषज्ञ निगरानी में ही होना चाहिए। मैजिक मशरूम कई देशों में नियंत्रित या प्रतिबंधित पदार्थों की श्रेणी में आते हैं और इनके अनियंत्रित उपयोग से मानसिक और शारीरिक जोखिम भी हो सकते हैं।
नई रिसर्च ने शराब सेवन को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार, कम या कभी-कभार शराब पीना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे Hyperuricaemia का खतरा बढ़ सकता है। यह स्थिति शरीर में यूरिक एसिड के बढ़े स्तर को दर्शाती है, जो आगे चलकर गठिया (गाउट) और हृदय व मेटाबॉलिक बीमारियों का कारण बन सकती है। क्या है स्टडी का आधार? यह एक बड़े स्तर का रेट्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट अध्ययन था, जिसमें 5,153 जापानी प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इन सभी में शुरुआत में हाइपरयूरिसीमिया नहीं था और इन्हें औसतन 5.5 वर्षों तक फॉलो किया गया। शराब और जोखिम का सीधा संबंध अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे शराब की मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे हाइपरयूरिसीमिया का जोखिम भी बढ़ता जाता है। पुरुषों में: न पीने वालों में दर: 33.7 प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष रोजाना 66 ग्राम या अधिक सेवन करने वालों में: 92.7 महिलाओं में: न पीने वालों में दर: 6.1 ज्यादा सेवन करने वालों में: 13.4 सबसे अहम बात यह रही कि कम या कभी-कभार शराब पीने वालों में भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। डोज-डिपेंडेंट असर विश्लेषण में यह भी सामने आया कि शराब का प्रभाव “डोज-डिपेंडेंट” है–यानी जितनी अधिक मात्रा, उतना ज्यादा खतरा। शराब शरीर में यूरिक एसिड को कई तरीकों से बढ़ाती है: प्यूरीन मेटाबॉलिज्म को बढ़ाना किडनी से यूरिक एसिड के उत्सर्जन को कम करना क्या कहता है पब्लिक हेल्थ मैसेज? यह स्टडी उस धारणा को चुनौती देती है कि “थोड़ी-बहुत शराब सुरक्षित होती है।” विशेषज्ञों का मानना है कि खासकर उन लोगों को, जिन्हें गाउट या मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा है, शराब सेवन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। डॉक्टरों के लिए क्या संकेत? डॉक्टरों को अब मरीजों के इलाज और सलाह में शराब सेवन को एक अहम जोखिम कारक के रूप में शामिल करना चाहिए। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए जरूरी है, जिनमें पहले से Gout या दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा है।
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। Indian National Congress ने लंबे समय से चले आ रहे अपने सहयोगी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) से गठबंधन तोड़ दिया है और अब Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) को समर्थन देने का ऐलान किया है। इस फैसले से राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है। विजय की पार्टी को मिला बड़ा समर्थन एक्टर से नेता बने Vijay की पार्टी TVK ने इस चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया है। सरकार गठन की प्रक्रिया के बीच कांग्रेस का समर्थन मिलने से TVK की स्थिति और मजबूत हो गई है। माना जा रहा है कि विजय अब सरकार बनाने के प्रमुख दावेदार बन गए हैं। कांग्रेस ने बताई गठबंधन की शर्त कांग्रेस ने साफ किया है कि TVK को दिया गया समर्थन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य के चुनाव—जैसे लोकसभा, राज्यसभा और स्थानीय निकाय चुनाव में भी यह गठबंधन जारी रह सकता है। हालांकि पार्टी ने यह शर्त रखी है कि इस गठबंधन में भाजपा या उसके किसी सहयोगी दल को शामिल नहीं किया जाएगा। केंद्र में बना रहेगा ‘INDIA’ गठबंधन दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु में DMK से अलग होने के बावजूद कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘INDIA’ गठबंधन में DMK के साथ उसके संबंध बने रह सकते हैं। यानी राज्य और केंद्र की राजनीति में अलग-अलग समीकरण देखने को मिल सकते हैं। बदले राजनीतिक समीकरण इस घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति को पूरी तरह से नई दिशा दे दी है। जहां पहले DMK-कांग्रेस गठबंधन मजबूत माना जाता था, वहीं अब TVK-कांग्रेस का नया समीकरण उभरकर सामने आया है।
हृदय रोग के इलाज में लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि सर्जरी बेहतर है या स्टेंटिंग। हालिया रिसर्च ने इस बहस को नई दिशा दी है। Coronary Artery Disease के इलाज में Coronary Artery Bypass Graft (CABG) और Percutaneous Coronary Intervention (PCI) के बीच तुलना करने वाली एक व्यापक स्टडी से कई अहम निष्कर्ष सामने आए हैं। क्या कहती है स्टडी? यह अध्ययन कई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स पर आधारित है, जिनमें कम से कम 3 साल का फॉलो-अप शामिल था। मुख्य फोकस था–मृत्यु दर (all-cause mortality), जबकि सेकेंडरी पैरामीटर्स में हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसे गंभीर इवेंट्स और दोबारा इलाज (revascularisation) शामिल थे। मृत्यु दर में बड़ा अंतर नहीं स्टडी के अनुसार, CABG और PCI के बीच कुल मृत्यु दर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। रिलेटिव रिस्क: 0.90 95% कॉन्फिडेंस इंटरवल: 0.78–1.04 हालांकि, जिन मरीजों में आर्टरी ब्लॉकेज कम जटिल था (SYNTAX स्कोर 23 से कम), उनमें CABG से मृत्यु का जोखिम कुछ कम देखा गया। गंभीर हार्ट इवेंट्स में CABG आगे भले ही मृत्यु दर लगभग समान रही, लेकिन अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर्स में CABG बेहतर साबित हुआ: मेजर कार्डियोवैस्कुलर और सेरेब्रोवैस्कुलर इवेंट्स (MACCE) का जोखिम कम रिलेटिव रिस्क: 0.75 दोबारा प्रक्रिया (revascularisation) की जरूरत आधी तक कम (RR: 0.50) यह फायदे अलग-अलग मरीज समूहों में भी समान रूप से देखे गए। इलाज के फैसले पर क्या असर? यह निष्कर्ष डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर लक्ष्य सिर्फ जीवन बचाना है, तो दोनों विकल्प लगभग समान हैं लेकिन लंबे समय में जटिलताओं और दोबारा इलाज से बचना है, तो CABG बेहतर विकल्प हो सकता है क्या होना चाहिए अगला कदम? विशेषज्ञों का मानना है कि हर मरीज के लिए एक ही इलाज सही नहीं हो सकता। इलाज का चयन करते समय मरीज की स्थिति, आर्टरी की जटिलता और व्यक्तिगत जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी है।
नई दिल्ली: दुनिया अभी तक कोविड-19 जैसी महामारी के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाई है, ऐसे में एक नई स्टडी ने वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स की चिंता बढ़ा दी है। शोध में पाया गया है कि Influenza D virus इंसानी श्वसन तंत्र की कोशिकाओं को संक्रमित करने में सक्षम है और शुरुआती इम्यून प्रतिक्रिया से बच निकलने की क्षमता रखता है। क्या है Influenza D Virus? Influenza D virus आमतौर पर मवेशियों–खासकर गाय और सूअर–में पाया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में इसके इंसानों तक पहुंचने (zoonotic spillover) की संभावना पर रिसर्च तेज हुई है, खासकर उन लोगों में जो पशुपालन या कृषि से जुड़े हैं। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने 2011 से 2020 के बीच पशुओं से लिए गए वायरस सैंपल्स पर अध्ययन किया। इन सैंपल्स को मानव फेफड़ों की कोशिकाओं और श्वसन तंत्र जैसे लैब मॉडल्स पर टेस्ट किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे: वायरस ने इंसानी कोशिकाओं में प्रभावी रूप से खुद को रिप्लिकेट किया कुछ मामलों में इसका स्तर Influenza A virus के बराबर पाया गया इम्यून सिस्टम को कैसे चकमा देता है? इस वायरस की सबसे बड़ी चिंता इसकी “चुपके से हमला” करने की क्षमता है। यह शरीर के शुरुआती इम्यून रिस्पॉन्स को कमजोर कर देता है खासतौर पर Interferon signaling को कम सक्रिय करता है इससे शरीर को वायरस का पता देर से चलता है हालांकि, अगर शरीर में पहले से एंटीवायरल एक्टिविटी बढ़ाई जाए, तो यह वायरस कमजोर पड़ जाता है। क्या महामारी का खतरा है? फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि यह वायरस इंसानों में तेजी से फैल रहा है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि: बहुत छोटे जेनेटिक बदलाव इसे इंसानों में फैलने लायक बना सकते हैं इसकी मौजूदा क्षमता “स्पिलओवर” का संकेत देती है किन लोगों को ज्यादा खतरा? पशुपालक डेयरी और फार्म वर्कर्स मवेशियों के संपर्क में रहने वाले लोग इन समूहों में पहले ही एंटीबॉडी पाए जाने के संकेत मिले हैं। आगे क्या जरूरी? विशेषज्ञों का कहना है कि: पशुओं में फैल रहे वायरस की निगरानी बढ़ानी होगी इंसान और पशु के बीच संपर्क वाले क्षेत्रों पर खास ध्यान देना होगा समय रहते रिसर्च और तैयारी जरूरी है
क्रोनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई स्टडी ने अहम जानकारी सामने रखी है। Chronic Kidney Disease से जुड़ी खुजली, जिसे CKD-associated pruritus कहा जाता है, होम हीमोडायलिसिस लेने वाले मरीजों में भी एक आम और गंभीर समस्या बनी हुई है। करीब एक-तिहाई मरीज प्रभावित इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में घर पर हीमोडायलिसिस करवा रहे 59 मरीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि करीब 31% मरीज (18 लोग) CKD-प्रुरिटस से प्रभावित थे। यह आंकड़ा उन मरीजों के बराबर है जो अस्पताल या डायलिसिस सेंटर में इलाज कराते हैं, जिससे साफ होता है कि घर पर इलाज करने के बावजूद यह समस्या बनी रहती है। जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा असर स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों को खुजली की समस्या थी, उनकी जीवन गुणवत्ता (Quality of Life) काफी खराब पाई गई। EQ-5D स्कोर के अनुसार, प्रुरिटस वाले मरीजों का स्कोर 0.760 रहा, जबकि बिना इस समस्या वाले मरीजों का स्कोर 1.00 था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह लक्षण रोजमर्रा के जीवन और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता है। खुजली की तीव्रता और असर में नहीं मिला सीधा संबंध दिलचस्प बात यह है कि खुजली की गंभीरता (इंटेंसिटी) और मरीजों के अनुभव–जैसे एंग्जायटी, डिप्रेशन या नींद की समस्या–के बीच सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी हल्की खुजली भी मरीजों के जीवन पर बड़ा असर डाल सकती है, या फिर अन्य कारक भी उनकी स्थिति को प्रभावित कर रहे हो सकते हैं। इलाज और मैनेजमेंट पर नया फोकस जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि CKD-associated pruritus और मरीजों के अनुभव के बीच संबंध अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। इसलिए बड़े और लंबी अवधि वाले शोध की जरूरत है, ताकि बेहतर इलाज और मैनेजमेंट रणनीतियां विकसित की जा सकें। भविष्य के लिए अहम संकेत जैसे-जैसे होम हीमोडायलिसिस का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ऐसे लक्षणों की पहचान और उनका प्रभावी समाधान जरूरी हो गया है। मरीजों के समग्र स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए इस दिशा में और ध्यान देने की आवश्यकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।