अमेरिकी सेना ने पूर्वी प्रशांत महासागर में नशीले पदार्थों की तस्करी में कथित रूप से शामिल एक नाव पर हमला किया है। इस कार्रवाई में तीन लोगों की मौत हो गई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस सप्ताह ड्रग्स तस्करी के खिलाफ यह तीसरा सैन्य अभियान है। हालिया कार्रवाई के बाद इन अभियानों में मारे गए लोगों की कुल संख्या 200 के पार पहुंच गई है। ड्रग्स विरोधी अभियान के तहत हुई कार्रवाई अमेरिकी सेना की United States Southern Command (यूएस सदर्न कमांड) ने बताया कि यह कार्रवाई कैरिबियन सागर और पूर्वी प्रशांत महासागर में चल रहे व्यापक ड्रग्स विरोधी अभियान का हिस्सा थी। सेना का दावा है कि जिस नाव को निशाना बनाया गया, उसका इस्तेमाल नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए किया जा रहा था। अधिकारियों ने यह भी कहा कि नाव का संचालन एक घोषित आतंकवादी संगठन से जुड़े तत्व कर रहे थे, इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र सबूत सार्वजनिक नहीं किया गया है। हमले का वीडियो भी किया गया जारी अमेरिकी सेना ने हमले का वीडियो भी जारी किया है। वीडियो में समुद्र में चल रही एक छोटी नाव दिखाई देती है, जिस पर मिसाइल या अन्य हथियार से हमला किया जाता है। हमले के बाद नाव आग के गोले में तब्दील होती नजर आती है। वीडियो के अगले हिस्से में जलती हुई नाव और उसके आसपास पानी में तैरते पैकेट दिखाई देते हैं। माना जा रहा है कि ये पैकेट तस्करी से जुड़े सामान या नशीले पदार्थ हो सकते हैं। सितंबर से जारी है सैन्य अभियान अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से ड्रग्स तस्करी के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। शुक्रवार की कार्रवाई के बाद इस अभियान में मारे गए लोगों की संख्या 202 तक पहुंच गई है। इससे पहले मंगलवार और बुधवार को भी दो अलग-अलग अभियानों में तस्करी से जुड़े जहाजों को निशाना बनाया गया था। ट्रंप प्रशासन का सख्त रुख Donald Trump प्रशासन ने हाल के महीनों में लैटिन अमेरिकी ड्रग कार्टेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिका में अवैध मादक पदार्थों की आपूर्ति के पीछे संगठित ड्रग कार्टेल की बड़ी भूमिका है और उनसे निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई भी जरूरी हो सकती है। अमेरिकी अधिकारियों ने इन अभियानों को राष्ट्रीय सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने की रणनीति का हिस्सा बताया है। क्यूबा के अधिकारियों से भी हुई मुलाकात यूएस सदर्न कमांड ने बताया कि यह कार्रवाई लैटिन अमेरिका क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कमांडर General Francis L. Donovan के निर्देश पर की गई। इसी दिन जनरल डोनोवन ने Guantanamo Bay Naval Base के पास क्यूबा के सैन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की। बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। अभियानों पर उठ रहे सवाल ड्रग्स तस्करी के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों देखने को मिल रही है। समर्थकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि ऐसे अभियानों में पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत है, खासकर तब जब सैन्य कार्रवाई में लोगों की जान जा रही हो।
अमेरिकी सरकार में लगातार बड़े बदलाव, सेना नेतृत्व पर असर अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बड़ा फैसला लेते हुए नौसेना सचिव जॉन फेलन को पद से हटा दिया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के बीच स्थिति पहले से ही तनावपूर्ण बनी हुई है। इससे पहले इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी आर्मी चीफ जनरल रैंडी जॉर्ज सहित दो अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को भी पद से हटाया गया था, जिससे अमेरिकी रक्षा व्यवस्था में अस्थिरता की आशंका और गहरी हो गई है। अचानक हटाने का फैसला पेंटागन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि नौसेना सचिव जॉन फेलन तुरंत प्रभाव से अपने पद से हट रहे हैं। हालांकि, इस फैसले के पीछे किसी भी प्रकार का आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है। उनकी जगह अंतरिम रूप से अंडरसेक्रेटरी हंग काओ को जिम्मेदारी सौंपी गई है। लगातार हो रहे बदलावों से बढ़ी चिंता यह पहला मामला नहीं है जब ट्रंप प्रशासन ने सैन्य नेतृत्व में बड़े बदलाव किए हैं। इससे पहले भी कई शीर्ष अधिकारियों को बिना स्पष्ट कारण के हटाया गया है, जिनमें जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल चार्ल्स ब्राउन भी शामिल हैं। इसके अलावा नौसेना, कोस्ट गार्ड, नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी और अन्य प्रमुख सैन्य पदों पर भी बदलाव किए जा चुके हैं। ईरान युद्ध के बीच प्रशासनिक उथल-पुथल अमेरिका इस समय ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल बताया जा रहा है, जो पिछले कई हफ्तों से जारी है। ऐसे में लगातार सैन्य नेतृत्व में बदलाव ने रणनीतिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप दावा कर रहे हैं कि अमेरिकी सेना ने ईरान की सैन्य क्षमता को बड़ा नुकसान पहुंचाया है, लेकिन अंदरूनी बदलावों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। राजनीतिक बहस तेज, विपक्ष ने जताई चिंता रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि राष्ट्रपति अपने अनुसार नेतृत्व चुन रहे हैं। हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने चिंता जताई है कि लगातार बदलावों से अमेरिकी सेना की निष्पक्षता और स्थिरता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर सैन्य नेतृत्व में फेरबदल युद्ध जैसी स्थिति में रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।
वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि ईरानी तेल ले जा रहे चीनी जहाजों को रोका जाएगा। यह कार्रवाई वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के सबसे अहम रास्ते Strait of Hormuz पर लागू की जा रही है। 10,000 सैनिक और नेवल शिप्स तैनात अमेरिकी सेना ने नाकाबंदी को लागू करने के लिए: 10,000 से ज्यादा सैनिक करीब 12 नौसैनिक जहाज (Naval Ships) तैनात किए हैं। सेना के अनुसार, नाकाबंदी के पहले 24 घंटों में एक भी जहाज होर्मुज स्ट्रेट पार नहीं कर पाया। 6 व्यापारिक जहाजों को वापस लौटने का आदेश दिया गया हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में 4 जहाजों के गुजरने का दावा भी किया गया हर देश के जहाजों पर लागू नियम अमेरिका की यह कार्रवाई: ईरान के बंदरगाहों में जाने या निकलने वाले सभी जहाजों पर लागू जहाज किसी भी देश का हो, नियम समान रहेगा बातचीत की कोशिश भी जारी तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं: वॉशिंगटन में लेबनान-इजराइल सीजफायर पर पहले दौर की बातचीत हुई इसे सकारात्मक बताया गया, अगली बैठक की तैयारी जारी 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स 1. छूट खत्म होने की चेतावनी अमेरिकी ट्रेजरी ने कहा कि ईरानी तेल बिक्री पर दी गई अस्थायी छूट जल्द खत्म होगी। 2. यूरोप का अलग मिशन यूरोपीय देश होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए नया अंतरराष्ट्रीय मिशन बना रहे हैं–खास बात, इसमें अमेरिका शामिल नहीं है। 3. कनाडा की मदद Canada ने Lebanon के लिए 40 मिलियन डॉलर की सहायता का ऐलान किया। 4. हिजबुल्लाह के हमले Hezbollah ने दावा किया कि उसने 24 घंटे में 34 हमले किए, जिनमें Israel के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। 5. ट्रंप का बयान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत अगले 2 दिनों में फिर शुरू हो सकती है। होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नाकाबंदी ने वैश्विक तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार को सीधे प्रभावित किया है। जहां एक ओर सैन्य दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं–आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।