अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान की ओर से एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के करीबी और वरिष्ठ सलाहकार Mohsen Rezaei ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को कड़ी चेतावनी दी है। ‘ईरान की सेना अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर करेगी’ मोहसिन रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिका यह गलतफहमी पाल रहा है कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि ईरान की “लोहे जैसी मजबूत” सशस्त्र सेनाएं अमेरिका को पीछे हटने और आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर देंगी। रेजाई ने ट्रंप के हालिया बयान पर भी निशाना साधा, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया है। ट्रंप ने क्या कहा था? ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका ने ईरान पर संभावित हमला “कुछ समय के लिए” रोक दिया है। उनके मुताबिक, Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates समेत कई खाड़ी देशों ने वॉशिंगटन से अपील की थी कि सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए ताकि बातचीत के जरिए समाधान निकल सके। ट्रंप ने कहा था कि अगर बिना युद्ध और बमबारी के समझौता हो जाए तो यह सबसे बेहतर विकल्प होगा। ईरान बोला- बातचीत का मतलब समर्पण नहीं ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भी साफ किया कि बातचीत का मतलब आत्मसमर्पण नहीं होता। उन्होंने कहा कि ईरान अपने परमाणु अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से पीछे नहीं हटेगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि देश किसी भी दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है। पाकिस्तान के जरिए पहुंचा नया प्रस्ताव रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने हाल ही में पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को संशोधित शांति प्रस्ताव भेजा है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि नए प्रस्ताव में बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं। वॉशिंगटन अब भी यह मानता है कि तेहरान परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त रियायतें देने को तैयार नहीं है। परमाणु कार्यक्रम बना तनाव की सबसे बड़ी वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता लगातार बढ़ रही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान संवर्धित यूरेनियम के भंडार को बढ़ा रहा है, जबकि तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। पश्चिम एशिया में जारी इस तनातनी के बीच अब दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान बातचीत और संभावित समझौते पर टिकी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान की ओर से भेजे गए नए शांति प्रस्ताव को पूरी तरह “अनएक्सेप्टेबल” यानी अस्वीकार्य करार दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अमेरिका के साथ करीब 10 हफ्तों से जारी तनाव और संघर्ष को खत्म करने के लिए कई शर्तें रखी थीं, जिनमें युद्ध के नुकसान का मुआवजा और होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के नियंत्रण को मान्यता देना शामिल है। पाकिस्तान के जरिए भेजा गया प्रस्ताव रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपना प्रस्ताव पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया। प्रस्ताव में कहा गया कि अगर अमेरिका युद्ध रोकना चाहता है तो उसे पहले तत्काल संघर्षविराम लागू करना होगा और भविष्य में किसी भी नए हमले की गारंटी देनी होगी। ईरान ने यह भी मांग की कि युद्ध के दौरान हुए नुकसान की आर्थिक भरपाई की जाए। इसके साथ ही उसने Strait of Hormuz पर अपनी संप्रभुता को औपचारिक रूप से स्वीकार करने की बात कही। तेल प्रतिबंध हटाने की मांग ईरान ने प्रस्ताव में अमेरिकी वित्त विभाग के Office of Foreign Assets Control यानी OFAC द्वारा लगाए गए तेल निर्यात प्रतिबंधों में अस्थायी राहत की मांग भी रखी। तेहरान चाहता है कि कम से कम 30 दिनों के लिए उसके तेल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटाई जाएं और समुद्री घेराबंदी समाप्त की जाए, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा मुद्दा दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में से एक Strait of Hormuz इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। ईरान ने संकेत दिया है कि अगर अमेरिका उसकी कुछ शर्तें मान लेता है, तो इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का प्रबंधन उसके नियंत्रण में रहेगा। हालांकि, ईरान ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह कौन-सी शर्तें हैं जिनके बदले वह क्षेत्रीय तनाव कम करने को तैयार होगा। परमाणु कार्यक्रम पर भी तनातनी The Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने संकेत दिया है कि वह सीमित समय के लिए यूरेनियम संवर्धन रोकने को तैयार हो सकता है, लेकिन अमेरिका के 20 साल वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। तेहरान ने अपने परमाणु ठिकानों को खत्म करने की मांग को भी साफ तौर पर खारिज कर दिया है। इससे साफ है कि परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच अब भी गहरा मतभेद बना हुआ है। ट्रंप ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव? अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान की शर्तें अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। उनका मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान को ज्यादा नियंत्रण देना और मुआवजे की मांग मानना अमेरिकी रणनीतिक हितों के खिलाफ होगा।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह तेहरान की ओर से युद्ध रोकने के अमेरिकी प्रस्ताव पर जवाब मिलने का इंतजार कर रहे हैं. ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान की तरफ से “आज रात” कोई आधिकारिक पत्र भेजा जा सकता है. व्हाइट हाउस से रवाना होते समय पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि हालात को लेकर जल्द तस्वीर साफ हो जाएगी. हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या ईरान जानबूझकर बातचीत की प्रक्रिया को धीमा कर रहा है. “हमें जल्द पता चल जाएगा” : ट्रंप सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ईरान बातचीत को लंबा खींच रहा है, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता, लेकिन हमें जल्द ही पता चल जाएगा.” ट्रंप ने आगे कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि ईरान की ओर से जल्द आधिकारिक प्रतिक्रिया मिलेगी और संभवतः “आज रात” तक एक लेटर आ सकता है. फिर शुरू हो सकता है ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की सुरक्षा के लिए “Project Freedom” नामक ऑपरेशन दोबारा शुरू कर सकता है. उन्होंने कहा कि यह मिशन समुद्री जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिखाने के लिए चलाया जाता था. ट्रंप ने कहा, “अगर हालात नहीं सुधरते हैं तो हम Project Freedom पर वापस जा सकते हैं, लेकिन इस बार यह Project Freedom Plus होगा.” हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि “Plus” से उनका क्या मतलब है, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें अतिरिक्त सैन्य और निगरानी उपाय शामिल हो सकते हैं. समझौते को लेकर “बड़ी प्रगति” का दावा ट्रंप ने दावा किया कि युद्ध समाप्त करने को लेकर बातचीत में “बड़ी प्रगति” हुई है. उन्होंने कहा कि फिलहाल कुछ कदम अस्थायी रूप से रोके गए हैं ताकि यह देखा जा सके कि क्या दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते तक पहुंच सकते हैं. उनके मुताबिक, अगर सहमति बनती है तो समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर भी किए जा सकते हैं. ईरान की ओर से सैन्य चेतावनी इधर, ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य अली खेजरियन ने अमेरिका को चेतावनी दी है. ईरानी स्टेट टीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी नौसेना की गतिविधियां बढ़ती हैं, तो ईरान “सैन्य जवाब” दे सकता है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका को अपने युद्धपोतों के साथ अतिरिक्त एस्कॉर्ट रखने चाहिए ताकि किसी हमले की स्थिति में अमेरिकी सैनिकों को बचाया जा सके. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए पूरी दुनिया की नजर अब अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई है.
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे अमेरिकी नौसेना के तीन युद्धपोतों पर हमला किया गया. हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिकी जहाज सुरक्षित रहे, लेकिन जवाबी कार्रवाई में ईरानी हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया. ट्रंप का दावा- अमेरिकी जहाजों पर हुआ हमला ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी नौसेना के तीन आधुनिक डेस्ट्रॉयर युद्धपोत सफलतापूर्वक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे थे, तभी उन पर हमला किया गया. उनके मुताबिक, अमेरिकी सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया. हालांकि ट्रंप ने यह साफ नहीं किया कि हमला किस प्रकार का था और इसमें कितना नुकसान हुआ. अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से भी इस घटना को लेकर विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है. ईरान को दी बड़ी धमकी ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तेहरान जल्द किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करता, तो अमेरिका भविष्य में और ज्यादा कठोर तथा हिंसक कार्रवाई कर सकता है. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब भी डील के लिए तैयार है, लेकिन ईरान को तेजी से फैसला लेना होगा. ट्रंप के इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नियंत्रित नहीं हुए, तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है. संघर्ष विराम के बाद फिर बढ़ा तनाव यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब 8 अप्रैल को लागू संघर्ष विराम के बाद क्षेत्र में हालात कुछ शांत माने जा रहे थे. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव कुछ कम हुआ था, लेकिन अब फिर हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. ईरान की सेना ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में मौजूद एक ईरानी तेल टैंकर और दूसरे जहाज को निशाना बनाया. ईरानी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाई संघर्ष विराम का उल्लंघन है. ईरान का पलटवार का दावा ईरानी सेना के संयुक्त कमांड ने कहा कि उसने जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से और चाबहार बंदरगाह के दक्षिण में मौजूद अमेरिकी सैन्य जहाजों को निशाना बनाया. इसके अलावा ईरान ने अमेरिका पर किश्म द्वीप और बंदर खमीर व सीरिक जैसे तटीय इलाकों में हवाई हमले करने का भी आरोप लगाया है. ईरान का कहना है कि इन हमलों में नागरिक क्षेत्रों को भी नुकसान पहुंचा. परमाणु विवाद बना बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह तनाव परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से भी जुड़ा हुआ है. वॉशिंगटन अभी भी ईरान से अपने प्रस्ताव पर जवाब का इंतजार कर रहा है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर नई शर्तों को स्वीकार करे, जबकि तेहरान कई मुद्दों पर अब भी सख्त रुख अपनाए हुए है. वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है असर होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है. यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करता है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच हालात और बिगड़ते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है.
मिडिल ईस्ट: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। अमेरिकी वायुसेना का KC-135 Stratotanker इमरजेंसी सिग्नल भेजने के बाद अचानक रडार से गायब हो गया, जिससे सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच गया है। 7700 कोड भेजते ही गायब हुआ विमान फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, इस टैंकर विमान ने कतर के पास उड़ान के दौरान “7700” स्क्वॉक कोड ट्रांसमिट किया। यह एक अंतरराष्ट्रीय इमरजेंसी सिग्नल होता है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब विमान किसी गंभीर संकट का सामना कर रहा हो। इसके कुछ ही समय बाद विमान रडार से गायब हो गया। आखिरी लोकेशन: होर्मुज़ जलडमरूमध्य रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान ने अपनी ऊंचाई कम की और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के ऊपर सिग्नल खो दिया। माना जा रहा है कि यह उस समय एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग मिशन पर था और किसी सैन्य बेस की ओर बढ़ रहा था। एक घंटे बाद पूरी तरह बंद हुआ सिग्नल मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इमरजेंसी कोड भेजे जाने के करीब एक घंटे बाद विमान का ट्रांसपोंडर सिग्नल पूरी तरह बंद हो गया। हालांकि केवल सिग्नल खोना किसी दुर्घटना की पुष्टि नहीं करता, लेकिन इमरजेंसी अलर्ट के बाद ऐसा होना चिंता बढ़ा रहा है। क्या हो सकती हैं वजहें? विशेषज्ञों के अनुसार 7700 कोड कई कारणों से ट्रिगर हो सकता है, जैसे: तकनीकी खराबी इंजन या सिस्टम फेल होना आग लगना मेडिकल इमरजेंसी बाहरी खतरा या हमले की आशंका फिलहाल किसी भी वजह की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। नहीं मिला कोई मलबा या SOS संकेत अब तक न तो किसी मलबे का पता चला है, न ही कोई डिस्टेस कॉल (SOS) या रेस्क्यू ऑपरेशन की पुष्टि हुई है। विमान में मौजूद क्रू मेंबर्स की संख्या भी स्पष्ट नहीं है, हालांकि KC-135 आमतौर पर सीमित क्रू के साथ उड़ान भरता है। क्यों अहम है यह घटना? होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है। इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य या तकनीकी घटना का असर सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में इस अमेरिकी टैंकर विमान का अचानक गायब होना रणनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तनाव के बीच बढ़ी चिंता ईरान-अमेरिका तनाव के बीच इस तरह की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं–क्या यह तकनीकी खराबी थी या किसी बड़े घटनाक्रम का संकेत? फिलहाल सभी की नजरें आधिकारिक बयान और आगे आने वाली जानकारी पर टिकी हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी है कि अगर बुधवार तक कोई बड़ा समझौता नहीं होता, तो युद्धविराम खत्म किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि हालात बिगड़े तो एक बार फिर सैन्य कार्रवाई शुरू हो सकती है। “फिर शुरू हो सकती हैं बमबारी” – ट्रंप एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो “हमें फिर से बमबारी शुरू करनी पड़ सकती है।” साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के बंदरगाहों पर लगा प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा। ईरान-अमेरिका बातचीत में गतिरोध दोनों देशों के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशें अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं। हाल ही में पाकिस्तान में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत भी विफल रही, जिससे तनाव और बढ़ गया है। प्रमुख मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है, वह इस विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि यह मार्ग सुरक्षित और खुला है, जबकि ईरान बार-बार चेतावनी दे रहा है कि दबाव बढ़ा तो रास्ता प्रभावित हो सकता है। नौसेना नाकेबंदी और बढ़ता तनाव अमेरिका ने अप्रैल के मध्य से ईरानी बंदरगाहों पर समुद्री नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिससे जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। ईरान ने इसे अवैध और उकसाने वाला कदम बताया है। वैश्विक बाजारों में चिंता तनाव बढ़ने के साथ ही वैश्विक तेल बाजारों में भी चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति और बिगड़ी तो तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है और ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकता है। बुधवार की डेडलाइन अब पूरी दुनिया के लिए अहम बन गई है। अगर बातचीत सफल नहीं होती, तो मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच J. D. Vance ने Iran पर बड़ा आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को रोककर “आर्थिक आतंकवाद” कर रहा है। ‘आर्थिक आतंकवाद’ का आरोप Fox News को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा: ईरान जहाजों की आवाजाही रोककर वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रहा है “अगर ईरान आर्थिक आतंकवाद करेगा, तो अमेरिका भी सख्त जवाब देगा” उन्होंने साफ किया कि अमेरिका ऐसी स्थिति में ईरानी जहाजों की आवाजाही भी रोक सकता है। ट्रंप की नीति का हवाला वेंस ने कहा कि Donald Trump ने यह दिखा दिया है कि: “यह खेल दोनों तरफ से खेला जा सकता है” अमेरिका जवाबी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र Strait of Hormuz इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है यहां किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है न्यूक्लियर मुद्दे पर भी सख्ती वेंस ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी कड़ा रुख अपनाया: ईरान को यूरेनियम संवर्धन पर नियंत्रण देना होगा एक मजबूत जांच प्रणाली लागू होनी चाहिए ताकि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके इस्लामाबाद वार्ता का जिक्र Islamabad में हुई हालिया वार्ता का जिक्र करते हुए वेंस ने कहा: बातचीत में “काफी प्रगति” हुई लेकिन अंतिम समझौता नहीं हो सका “अब गेंद ईरान के पाले में है” बढ़ता टकराव इस बयान के बाद साफ है कि: अमेरिका और Iran के बीच तनाव और बढ़ सकता है कूटनीतिक बातचीत जारी है, लेकिन सैन्य और आर्थिक दबाव भी बढ़ रहा है दुनिया की नजर अब इस पर है कि क्या दोनों देश समझौते की दिशा में आगे बढ़ते हैं या टकराव और गहरा होता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच J. D. Vance ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि Islamabad में हुई शांति वार्ता में “अच्छी प्रगति” हुई है, लेकिन अब अगला कदम Tehran को उठाना होगा। वेंस ने साफ कहा–“गेंद अब ईरान के पाले में है।” 21 घंटे चली वार्ता, लेकिन समझौता नहीं अमेरिका और Iran के बीच वीकेंड पर इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत किसी ठोस समझौते पर खत्म नहीं हो सकी। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान ने न्यूक्लियर फ्यूल एनरिचमेंट रोकने की शर्त मानने से इनकार कर दिया। ‘सही दिशा में बढ़ी बातचीत’ Fox News को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि हालात बिगड़े नहीं हैं, बल्कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ी है। उन्होंने कहा: “कुछ पॉजिटिव संकेत मिले हैं” “सामने वाला पक्ष भी आगे बढ़ा” “हालांकि, उम्मीद के मुताबिक प्रगति नहीं हुई” न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका सख्त वेंस ने जोर देकर कहा कि अगर ईरान अपने न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका की शर्तें मान लेता है, तो दोनों देशों के बीच बड़ा समझौता संभव है। उन्होंने कहा, “क्या हम आगे बातचीत करेंगे? क्या समझौता होगा? यह अब ईरान पर निर्भर करता है।” क्यों रुकी बातचीत? वेंस के मुताबिक, ईरानी डेलिगेशन के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा: “टीम को तेहरान लौटना पड़ा” “अंतिम मंजूरी के लिए शीर्ष नेतृत्व से सहमति जरूरी है” किन नेताओं ने लिया हिस्सा? इस हाई-लेवल वार्ता में दोनों देशों के बड़े नेता शामिल हुए: अमेरिका की ओर से: J. D. Vance, Steve Witkoff, Jared Kushner ईरान की ओर से: Mohammad Bagher Ghalibaf, Abbas Araghchi आगे क्या? इस्लामाबाद वार्ता के बाद अब नजरें तेहरान पर हैं। अगर ईरान अमेरिका की शर्तों पर नरमी दिखाता है, तो क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है। फिलहाल, कूटनीतिक हल की उम्मीद कायम है, लेकिन स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को हर हाल में खोला जाएगा - चाहे इसके लिए किसी समझौते का इंतजार करना पड़े या नहीं। “डील हो या न हो, रास्ता खुलेगा” अमेरिका के जॉइंट बेस एंड्रयूज में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान अब सैन्य रूप से कमजोर हो चुका है और अमेरिका इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को खोलने के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर बातचीत में देरी होती है, तो अमेरिका “दूसरे विकल्प” अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। पाकिस्तान में शांति वार्ता की पहल इस बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय टीम Islamabad पहुंच चुकी है। इस टीम में Steve Witkoff Jared Kushner जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। यह प्रतिनिधिमंडल ईरान के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ईरान की दो सख्त शर्तें दूसरी ओर, ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf के नेतृत्व में ईरानी प्रतिनिधिमंडल भी पाकिस्तान पहुंच चुका है। ईरान ने बातचीत से पहले दो बड़ी शर्तें रखी हैं: लेबनान में तत्काल सीजफायर ईरान के रोके गए फंड की रिहाई ईरानी टीम में विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। सीजफायर पर उलझन बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर को लेकर अब भी मतभेद बने हुए हैं। Islamic Republic of Iran Broadcasting के अनुसार, ईरान चाहता है कि लेबनान में इजरायली हमले भी इस समझौते में शामिल हों। हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने साफ किया है कि Hezbollah के खिलाफ ऑपरेशन इस सीजफायर का हिस्सा नहीं होगा। दुनिया की नजर इस्लामाबाद बैठक पर व्हाइट हाउस के मुताबिक, 11 अप्रैल को Islamabad में पहली औपचारिक बैठक है। इस बातचीत को पश्चिम एशिया में जारी तनाव को खत्म करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब सवाल यही है - क्या ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा रहेगा या बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकलेगा? पूरी दुनिया की नजरें इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग पर टिकी हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक ईरान के साथ हुआ समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो जाता, तब तक अमेरिकी सेना ईरान के आसपास तैनात रहेगी। ट्रंप की सीधी चेतावनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर ट्रंप ने लिखा कि अमेरिका के सभी जहाज, विमान और सैन्य बल ईरान के भीतर और आसपास मौजूद रहेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि समझौते का किसी भी तरह उल्लंघन होता है, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया “अब तक की सबसे बड़ी, मजबूत और घातक” होगी। परमाणु मुद्दे पर सख्त रुख ट्रंप ने दोहराया कि Iran को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह अमेरिका की नीति का प्रमुख हिस्सा है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बड़ा बयान ट्रंप ने यह भी कहा कि Strait of Hormuz पूरी तरह खुला और सुरक्षित रहेगा। उन्होंने इसे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम बताते हुए कहा कि इसके बंद होने की आशंकाएं “फर्जी” हैं। ‘अमेरिका इज बैक’ - सैन्य तैयारी का संकेत अपने बयान के अंत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना लगातार खुद को और मजबूत कर रही है और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उन्होंने ‘America is back’ लिखते हुए यह संदेश दिया कि अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपनी ताकत दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि अमेरिका फिलहाल ईरान को लेकर कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर वैश्विक राजनीति और कूटनीति में और तेज़ी देखने को मिल सकती है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर Mojtaba Khamenei मारे जा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी मीडिया में उनके नाम से लगातार नए संदेश सामने आ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस और अनिश्चितता पैदा कर दी है। ट्रंप का बड़ा दावा, लेकिन सवाल बरकरार रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने 27 मार्च को कहा था कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो चुका है और देश में कोई सक्रिय सुप्रीम लीडर नहीं है। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि मोजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, इस दावे की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ जारी हो रहे संदेश ट्रंप के दावे के विपरीत, ईरान की तरफ से मोजतबा खामेनेई के नाम से लिखित संदेश जारी किए जा रहे हैं। एक हालिया संदेश में उन्होंने: अमेरिका और इजरायल के खिलाफ संघर्ष में समर्थन के लिए इराक की जनता का धन्यवाद किया खास तौर पर Ali al-Sistani का उल्लेख किया यह संदेश बगदाद में हुई एक बैठक के बाद सामने आया, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरानी नेतृत्व सक्रिय है। सार्वजनिक रूप से नहीं आए सामने मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं। केवल लिखित बयान जारी किए जा रहे हैं उनके बयान टीवी पर दूसरे लोग पढ़कर सुनाते हैं उनकी ताजा तस्वीरों को लेकर भी संशय बना हुआ है इससे उनकी स्थिति और लोकेशन को लेकर अटकलें और तेज हो गई हैं। पृष्ठभूमि: युद्ध और सत्ता का संकट ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी यह संघर्ष अब एक महीने से ज्यादा समय से चल रहा है। पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की युद्ध की शुरुआत में ही मौत हो चुकी है इसके बाद मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी और विरोधाभासी खबरें सत्ता को लेकर असमंजस पैदा कर रही हैं क्या है इसका वैश्विक असर? यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल खड़े करता है: क्या ट्रंप का दावा सही है या यह रणनीतिक बयान है? क्या ईरान में नेतृत्व संकट गहराता जा रहा है? क्या इससे युद्ध और भड़क सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की विरोधाभासी सूचनाएं वैश्विक बाजार, कूटनीति और सुरक्षा स्थिति पर बड़ा असर डाल सकती हैं।
मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध और अमेरिका-ईरान तनाव का असर अब खेल जगत पर भी दिखाई देने लगा है। खबर है कि Iran FIFA World Cup 2026 में हिस्सा लेने से इनकार कर सकता है। अमेरिकी हमले के विरोध में ईरान की सरकार इस टूर्नामेंट का बहिष्कार करने पर विचार कर रही है। इसी कारण ईरान ने पिछले सप्ताह आयोजित फीफा प्लानिंग समिट में भी हिस्सा नहीं लिया। 2026 का फुटबॉल विश्व कप संयुक्त रूप से United States, Canada और Mexico में आयोजित होगा। यह टूर्नामेंट 11 जून से 19 जुलाई 2026 के बीच खेला जाना है और इस बार इसमें रिकॉर्ड 48 टीमें हिस्सा लेंगी। अमेरिका की मेजबानी पर ईरान की नाराज़गी ईरान के खेल मंत्री Ahmad Donyamali ने सरकारी टीवी से बातचीत में कहा कि मौजूदा हालात में उनका देश विश्व कप में भाग नहीं ले सकता। उनका आरोप है कि अमेरिका ने ईरान पर हमला कर हालात को युद्ध में बदल दिया है, जिससे देश के लिए खेल आयोजनों में भाग लेना मुश्किल हो गया है। ईरानी सरकार का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाई के कारण देश में भारी जनहानि हुई है और मौजूदा हालात में विश्व कप में हिस्सा लेना उचित नहीं होगा। क्वालिफाई कर चुका है ईरान दिलचस्प बात यह है कि Iran national football team पहले ही 2026 विश्व कप के लिए क्वालिफाई कर चुका है और एशिया की मजबूत टीमों में गिना जाता है। हालांकि टीम अब तक विश्व कप के नॉकआउट चरण में नहीं पहुंच पाई है। ट्रंप का बयान-ईरान का स्वागत है इस बीच FIFA के अध्यक्ष Gianni Infantino ने बताया कि उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump से आश्वासन मिला है कि यदि ईरान की टीम विश्व कप में भाग लेने आती है तो उसका स्वागत किया जाएगा। इन्फेंटिनो ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात के बाद कहा कि खेल को राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए और सभी टीमों को सुरक्षित माहौल दिया जाएगा। बॉयकॉट पर हो सकती है कार्रवाई अगर ईरान क्वालिफाई करने के बावजूद टूर्नामेंट से हटने का फैसला करता है, तो फीफा उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। नियमों के अनुसार: लगभग 275,000 से 555,000 यूरो तक जुर्माना लगाया जा सकता है। टीम पर स्पोर्टिंग बैन भी लग सकता है, जिससे भविष्य के विश्व कप में हिस्सा लेने पर रोक लग सकती है। इतिहास में बहुत कम ऐसे उदाहरण हैं जब किसी टीम ने क्वालिफाई करने के बाद विश्व कप से नाम वापस लिया हो। 1950 में भारत और फ्रांस ने यात्रा खर्च का हवाला देकर टूर्नामेंट से हटने का फैसला किया था। मौजूदा हालात में दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ईरान वास्तव में 2026 विश्व कप का बहिष्कार करेगा या फिर कूटनीतिक हल निकलने के बाद मैदान में उतरने का फैसला करेगा।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच United States ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz की सुरक्षा सुनिश्चित करने का संकल्प जताया है। अमेरिका का कहना है कि वह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के मुक्त प्रवाह को बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा, क्योंकि Iran के साथ बढ़ते तनाव के कारण इस क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने अमेरिकी टीवी कार्यक्रम 60 Minutes को दिए इंटरव्यू में कहा कि अमेरिकी सेना पहले से ही ईरान की नौसैनिक क्षमताओं को कमजोर करने की दिशा में कार्रवाई कर रही है और जरूरत पड़ने पर आगे भी सैन्य कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि अमेरिका का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा बनी रहे और किसी भी तरह की बाधा वैश्विक व्यापार या ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित न करे। हेगसेथ के अनुसार, ईरान की नौसेना की क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी है। अमेरिकी सेना उन जहाजों और सैन्य संसाधनों को लगातार निशाना बना रही है जो समुद्री सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज सुरक्षित रहें और इस क्षेत्र में काम कर रहे वाणिज्यिक जहाजों का भरोसा बहाल हो सके। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी कारण अमेरिका अपने सहयोगी देशों और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि वैश्विक बाजारों पर किसी भी संभावित झटके को कम किया जा सके। होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है और यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। हेगसेथ ने यह भी कहा कि ईरान के खिलाफ चल रहा अभियान केवल समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक प्रयास है। इसका उद्देश्य तेहरान की उस क्षमता को कमजोर करना है जिससे वह अमेरिकी सेना, क्षेत्रीय सहयोगियों और वैश्विक व्यापार को खतरा पहुंचा सकता है। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान को दी गई “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की चेतावनी का भी जिक्र किया। हेगसेथ ने कहा कि इसका मतलब है कि अमेरिका इस संघर्ष में जीत हासिल करने के लिए लड़ रहा है और अंतिम शर्तें वही तय करेगा। उनके अनुसार, लक्ष्य ऐसी स्थिति तक पहुंचना है जहां ईरान सैन्य अभियान जारी रखने की स्थिति में न रहे और उसे संघर्ष समाप्त करने के लिए मजबूर होना पड़े। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर क्षेत्र में तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।