अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह तेहरान की ओर से युद्ध रोकने के अमेरिकी प्रस्ताव पर जवाब मिलने का इंतजार कर रहे हैं. ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान की तरफ से “आज रात” कोई आधिकारिक पत्र भेजा जा सकता है. व्हाइट हाउस से रवाना होते समय पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि हालात को लेकर जल्द तस्वीर साफ हो जाएगी. हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या ईरान जानबूझकर बातचीत की प्रक्रिया को धीमा कर रहा है. “हमें जल्द पता चल जाएगा” : ट्रंप सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ईरान बातचीत को लंबा खींच रहा है, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता, लेकिन हमें जल्द ही पता चल जाएगा.” ट्रंप ने आगे कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि ईरान की ओर से जल्द आधिकारिक प्रतिक्रिया मिलेगी और संभवतः “आज रात” तक एक लेटर आ सकता है. फिर शुरू हो सकता है ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की सुरक्षा के लिए “Project Freedom” नामक ऑपरेशन दोबारा शुरू कर सकता है. उन्होंने कहा कि यह मिशन समुद्री जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिखाने के लिए चलाया जाता था. ट्रंप ने कहा, “अगर हालात नहीं सुधरते हैं तो हम Project Freedom पर वापस जा सकते हैं, लेकिन इस बार यह Project Freedom Plus होगा.” हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि “Plus” से उनका क्या मतलब है, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें अतिरिक्त सैन्य और निगरानी उपाय शामिल हो सकते हैं. समझौते को लेकर “बड़ी प्रगति” का दावा ट्रंप ने दावा किया कि युद्ध समाप्त करने को लेकर बातचीत में “बड़ी प्रगति” हुई है. उन्होंने कहा कि फिलहाल कुछ कदम अस्थायी रूप से रोके गए हैं ताकि यह देखा जा सके कि क्या दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते तक पहुंच सकते हैं. उनके मुताबिक, अगर सहमति बनती है तो समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर भी किए जा सकते हैं. ईरान की ओर से सैन्य चेतावनी इधर, ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य अली खेजरियन ने अमेरिका को चेतावनी दी है. ईरानी स्टेट टीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी नौसेना की गतिविधियां बढ़ती हैं, तो ईरान “सैन्य जवाब” दे सकता है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका को अपने युद्धपोतों के साथ अतिरिक्त एस्कॉर्ट रखने चाहिए ताकि किसी हमले की स्थिति में अमेरिकी सैनिकों को बचाया जा सके. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए पूरी दुनिया की नजर अब अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक जटिल वैश्विक समीकरण के बीच फंसे नजर आ रहे हैं। एक ओर ईरान के साथ बढ़ता सैन्य और आर्थिक तनाव है, तो दूसरी ओर 14-15 मई को प्रस्तावित चीन का बेहद अहम दौरा। यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है–क्या पहले ईरान के साथ टकराव सुलझाया जाए या चीन के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दी जाए? क्यों इतना अहम है चीन दौरा? व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, यह दौरा कई वजहों से बेहद महत्वपूर्ण है: अमेरिका-चीन के बीच व्यापार और प्रतिबंधों को लेकर तनाव वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही रुकावटें ऊर्जा संकट और तेल आपूर्ति का मुद्दा दरअसल, अमेरिका यह समझता है कि चीन के साथ सीधी बातचीत के बिना मौजूदा संकटों का समाधान मुश्किल होगा। यही वजह है कि पहले टाले जा चुके इस दौरे को अब हर हाल में पूरा करने की कोशिश की जा रही है। ईरान संकट ने बढ़ाई कूटनीतिक चुनौती ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान से जुड़ी स्थिति है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है, वहां बढ़ते तनाव ने हालात को और गंभीर बना दिया है। इस मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल सप्लाई होता है मार्च की शुरुआत से ही यहां व्यवधान की स्थिति बनी हुई है कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है इसका सीधा असर वैश्विक बाजार, खासकर तेल कीमतों और व्यापार पर पड़ा है। ऊर्जा संकट और वैश्विक असर चीन समेत एशिया के कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं। रास्ता बाधित होने के कारण: तेल की सप्लाई कम हुई कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ी यही वजह है कि अब यह मुद्दा अमेरिका-चीन वार्ता का केंद्र बन चुका है। चीन की भूमिका–मध्यस्थ या रणनीतिक खिलाड़ी? चीन इस पूरे विवाद में खुद को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन स्थिति इतनी सरल नहीं है: अमेरिका ने चीन की कई शिपिंग कंपनियों और तेल रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगाए हैं आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से तेल खरीदकर अमेरिकी नियमों का उल्लंघन कर रही हैं ऐसे में चीन एक तरफ समाधान चाहता है, तो दूसरी तरफ अपने आर्थिक हितों की भी रक्षा कर रहा है। ट्रंप के सामने दो रास्ते इस पूरे घटनाक्रम में ट्रंप प्रशासन के सामने दो बड़े विकल्प हैं: 1. सैन्य दबाव बढ़ाना ईरान पर और कड़े प्रतिबंध सैन्य कार्रवाई की संभावना क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी बढ़ाना 2. कूटनीतिक समाधान चीन की मध्यस्थता का इस्तेमाल ईरान के साथ बातचीत ऊर्जा और व्यापार को स्थिर करने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप फिलहाल दोनों रणनीतियों को साथ लेकर चल रहे हैं–एक तरफ दबाव, दूसरी तरफ बातचीत। दौरे पर पड़ सकता है असर? अगर ईरान के साथ तनाव और बढ़ता है, तो: ट्रंप का चीन दौरा फिर टल सकता है या फिर दौरे का एजेंडा पूरी तरह ईरान संकट पर केंद्रित हो सकता है लेकिन अगर कोई आंशिक समाधान निकलता है, तो यह दौरा वैश्विक राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर 2026 के लिए चर्चा तेज हो गई है। इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी संभावित दावेदारों में बताया जा रहा है। 287 नामांकन, कड़ी टक्कर नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी के मुताबिक, 2026 के शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 नामांकन प्राप्त हुए हैं। इनमें 208 व्यक्ति और 79 संगठन शामिल हैं। हालांकि, आधिकारिक सूची गोपनीय रखी जाती है, लेकिन नामांकन करने वाले कई लोग अपने स्तर पर नाम सार्वजनिक कर देते हैं। ट्रंप का नाम किसने आगे बढ़ाया? रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान, इजरायल और कंबोडिया के नेताओं ने ट्रंप का नाम आगे बढ़ाया है। उनका दावा है कि ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में भूमिका निभाई है। रेस में और कौन-कौन? ट्रंप के अलावा कई बड़े नाम भी चर्चा में हैं: वोलोदिमिर जेलेंस्की – यूक्रेन के राष्ट्रपति ग्रेटा थनबर्ग – जलवायु कार्यकर्ता मैया सैंडू – मोल्दोवा की राष्ट्रपति संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी फ्रांसेस्का अल्बानीज चयन प्रक्रिया कैसी होती है? नोबेल शांति पुरस्कार की चयन प्रक्रिया काफी गोपनीय होती है। नामांकन के बाद: विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है साल के मध्य तक शॉर्टलिस्ट तैयार होती है विजेता का ऐलान आमतौर पर अक्टूबर में किया जाता है 2026 के विजेता की घोषणा 9 अक्टूबर को होने की संभावना है, जबकि 10 दिसंबर को ओस्लो में पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाएगा। वैश्विक हालात का असर यह चयन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया कई संकटों से जूझ रही है–जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा तनाव, ऊर्जा संकट और विभिन्न देशों के बीच बढ़ते टकराव। ऐसे में शांति स्थापित करने वाले नेताओं की भूमिका और अहम मानी जा रही है। क्या ट्रंप के लिए मौका मजबूत? ट्रंप लंबे समय से इस पुरस्कार को पाने की इच्छा जता चुके हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उनकी भूमिका उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है। हालांकि, कड़ी प्रतिस्पर्धा और जटिल चयन प्रक्रिया को देखते हुए यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि आखिर बाजी किसके हाथ लगेगी।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। ओवल ऑफिस में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनकी एक कॉल के बाद ईरान में 8 महिलाओं को दी जाने वाली फांसी रोक दी गई। “एक फोन कॉल से टली फांसी” ट्रंप ने कहा कि ईरान 8 महिलाओं को फांसी देने की तैयारी कर रहा था, लेकिन उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए कहा–“ऐसा मत करो, पूरी दुनिया देख रही है।” उन्होंने दावा किया कि उनकी इस अपील के बाद फांसी रोक दी गई। विरोध प्रदर्शनों पर गंभीर आरोप ट्रंप के अनुसार, पिछले दो महीनों में ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान करीब 42,000 लोगों की मौत हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि ये लोग निहत्थे थे और सिर्फ विरोध करने के कारण मारे गए। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। ईरान की सैन्य ताकत पर दावा ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से ईरान की सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है। उनके मुताबिक: नौसेना लगभग खत्म हो चुकी है वायुसेना भी काफी हद तक निष्क्रिय हो गई है ड्रोन फैक्ट्रियां 82% तक नष्ट मिसाइल फैक्ट्रियां करीब 90% तक तबाह उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अब अमेरिका के साथ समझौता करने को “बेताब” है। अर्थव्यवस्था पर भी असर ट्रंप के अनुसार, अमेरिका की नाकेबंदी (ब्लॉकेड) के चलते ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि ईरान को तेल से लगभग कोई आय नहीं हो रही और आर्थिक स्थिति चरमरा गई है। अन्य मुद्दों का भी जिक्र ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान में एक पहलवान समेत कई लोगों को राजनीतिक बयानों के कारण फांसी दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां विरोध करने वालों पर सख्ती की जा रही है और मौत के वास्तविक आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से ज्यादा हो सकते हैं। बाजार और रणनीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि डॉव जोन्स इंडेक्स और एसएंडपी 500 नई ऊंचाइयों पर पहुंचे, जिसके बाद उन्होंने ईरान पर सख्त रुख अपनाने का फैसला किया। उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। ईरान का जवाब वहीं, ईरान की ओर से जवाब देते हुए संसद अध्यक्ष ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण मजबूत किया जाएगा और फारस की खाड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने अमेरिका के किसी भी हस्तक्षेप का मुकाबला करने की बात कही।
व्हाइट हाउस डिनर में गूंजा शाही हास्य ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय ने व्हाइट हाउस में आयोजित राजकीय भोज के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हल्के-फुल्के अंदाज में चुटकी ली। उनके इस मजाक ने पूरे हॉल में ठहाके गूंजा दिए। चार्ल्स ने कहा, "मिस्टर प्रेसिडेंट, आपने हाल ही में कहा था कि अगर अमेरिका नहीं होता, तो यूरोप जर्मन बोल रहा होता। मैं कहूं कि अगर हम नहीं होते, तो आप आज फ्रेंच बोल रहे होते।" इतिहास के जरिए दिया करारा जवाब राजा चार्ल्स का यह बयान उत्तरी अमेरिका में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुई ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा की ओर इशारा था। अमेरिकी स्वतंत्रता से पहले दोनों यूरोपीय शक्तियां इस क्षेत्र पर कब्जे के लिए संघर्ष कर रही थीं। उनका यह तंज ट्रंप की उस टिप्पणी का जवाब माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका के बिना यूरोप आज जर्मन बोल रहा होता। व्हाइट हाउस जलाने का भी किया जिक्र चार्ल्स ने अपने भाषण में 1814 के 'बर्निंग ऑफ वॉशिंगटन' का भी जिक्र किया, जब ब्रिटिश सेना ने व्हाइट हाउस के कुछ हिस्सों को आग के हवाले कर दिया था। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, "ब्रिटिशों ने भी व्हाइट हाउस के रियल एस्टेट री-डेवलपमेंट की कोशिश की थी।" बोस्टन टी पार्टी पर भी चुटकी राजा ने बोस्टन टी पार्टी का जिक्र करते हुए कहा कि यह शाम उस ऐतिहासिक घटना से कहीं बेहतर साबित हुई है। उनके इस बयान पर मेहमानों ने जोरदार तालियां बजाईं। ट्रंप ने भी दिया मजेदार जवाब ट्रंप ने भी पीछे नहीं हटते हुए चार्ल्स की कांग्रेस में दिए गए भाषण का जिक्र किया। उन्होंने हंसते हुए कहा, "उन्होंने डेमोक्रेट्स को खड़ा कर दिया, जो मैं कभी नहीं कर पाया।" खास रिश्तों पर दिया जोर चार्ल्स ने अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण गठबंधनों में से एक बताया। उन्होंने दोनों देशों से वैश्विक चुनौतियों के बीच एकजुट रहने का आह्वान किया। व्हाइट हाउस की यह शाम कूटनीति, इतिहास और हास्य का शानदार संगम बन गई।
अमेरिका में राष्ट्रपति Donald Trump की हत्या की कोशिश के आरोप में एक व्यक्ति पर गंभीर संघीय आरोप लगाए गए हैं। यह घटना White House Correspondents' Association Dinner के दौरान हुई, जब भारी सुरक्षा के बीच अफरा-तफरी मच गई। कौन है आरोपी? आरोपी की पहचान 31 वर्षीय Cole Tomas Allen के रूप में हुई है, जो कैलिफोर्निया के टॉरेंस का निवासी है। अदालत ने उसे फिलहाल न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। क्या हुआ था? शनिवार रात वॉशिंगटन के Washington Hilton में आयोजित डिनर के दौरान आरोपी कथित तौर पर सुरक्षा घेरा तोड़कर बॉलरूम की ओर बढ़ा। उसके पास एक शॉटगन, पिस्तौल और कई चाकू थे। इस दौरान United States Secret Service के एजेंटों के साथ गोलीबारी हुई। ट्रंप को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। वह पूरी तरह सुरक्षित हैं। सुरक्षा अधिकारी घायल गोलीबारी में एक सीक्रेट सर्विस अधिकारी घायल हुआ, हालांकि उसने बुलेट-रेसिस्टेंट जैकेट पहन रखी थी, जिससे उसकी जान बच गई। पहले से रची गई थी साजिश एफबीआई के अनुसार, आरोपी ने 6 अप्रैल को ही होटल में कमरा बुक कर लिया था। वह कैलिफोर्निया से ट्रेन द्वारा वॉशिंगटन पहुंचा था। जांच एजेंसियों का मानना है कि हमले की योजना कई सप्ताह पहले बनाई गई थी। ईमेल से मिला सुराग गिरफ्तारी से ठीक पहले आरोपी ने अपने परिवार और पूर्व नियोक्ता को एक ईमेल भेजा था, जिसमें उसने खुद को "Friendly Federal Assassin" बताया। ईमेल में ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर नाराजगी झलक रही थी। क्या-क्या आरोप लगे? राष्ट्रपति की हत्या के प्रयास का आरोप हिंसक अपराध के दौरान हथियार चलाने का आरोप अवैध हथियार रखने और इस्तेमाल करने के आरोप दोष सिद्ध होने पर आरोपी को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। जांच जारी Federal Bureau of Investigation और न्याय विभाग मामले की गहन जांच कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थानों पर हिंसा किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जाएगी।
Iran ने अमेरिका के साथ जारी तनाव खत्म करने के लिए एक नया चरणबद्ध प्रस्ताव दिया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इससे संतुष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। इससे युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों को झटका लगा है। ईरान ने क्या प्रस्ताव दिया? ईरान की तीन-स्तरीय योजना में शामिल हैं: पहले अमेरिका-इज़राइल के साथ युद्धविराम फिर Strait of Hormuz में नौवहन बहाल करना और समुद्री नाकेबंदी हटाना उसके बाद परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर बातचीत तेहरान चाहता है कि परमाणु मुद्दे पर चर्चा युद्ध खत्म होने और समुद्री विवाद सुलझने के बाद हो। अमेरिका क्यों नाराज? वॉशिंगटन का कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अलग नहीं किया जा सकता। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि किसी भी समझौते की शुरुआत ही परमाणु हथियारों के मुद्दे से हो। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने साफ कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा जो ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता दे। होर्मुज बना वैश्विक चिंता का केंद्र Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। यहां जारी तनाव से वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया है और महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। कूटनीति की राह कठिन प्रस्ताव पर गतिरोध के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता भी टल गई। इस बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान, ओमान और रूस का दौरा किया है। फिलहाल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं, जिससे निकट भविष्य में समझौते की संभावना कमजोर दिख रही है।
ईरान को सीधी सैन्य चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि अगर ईरान की छोटी नौकाएं हॉरमुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंग बिछाने की कोशिश करें, तो उन्हें तुरंत "shoot and kill" किया जाए। यह आदेश ऐसे समय आया है जब ईरान ने एक बार फिर इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। क्यों अहम है हॉरमुज जलडमरूमध्य? हॉरमुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक कच्चे तेल और गैस व्यापार का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है। यहां किसी भी तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है। इसी वजह से अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा: "मैंने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि हॉरमुज में बारूदी सुरंग बिछाने वाली किसी भी छोटी नौका को तुरंत मार गिराया जाए।" उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी माइंस्वीपर्स फिलहाल जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं। अमेरिकी सेना ने ईरानी तेल टैंकर भी पकड़ा तनाव को और बढ़ाते हुए अमेरिकी सेना ने भारतीय महासागर में ईरानी तेल तस्करी से जुड़े एक और टैंकर को जब्त कर लिया। बताया जा रहा है कि यह जहाज चीन की ओर जा रहा था और पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ चुका था। ईरान ने भी दिखाई ताकत एक दिन पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने हॉरमुज में तीन मालवाहक जहाजों को निशाना बनाया था, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख ने इसे "इस्लामी ईरान की ताकत का प्रदर्शन" बताया। बातचीत पर अभी भी संशय हालांकि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता कराने की कोशिश जारी है, लेकिन फिलहाल कोई बैठक तय नहीं हो सकी है। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नाकेबंदी हटाए। अमेरिका चाहता है कि ईरान पहले समुद्री मार्ग पूरी तरह खोले। लेबनान में सीजफायर बढ़ाया गया ट्रंप ने साथ ही घोषणा की कि इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच लागू युद्धविराम को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। हालांकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। वैश्विक बाजारों पर असर संभव हॉरमुज में बढ़ते तनाव से: तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है शिपिंग बीमा महंगा हो सकता है वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है दुनिया की नजरें अब इस क्षेत्र पर टिकी हैं।
व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बयानबाजी तेज अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर सख्त बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन साथ ही यह भी चेतावनी दी कि ईरान के पास शांति समझौते के लिए “बहुत कम समय बचा है”। यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व में अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी और बढ़ा दी है। ट्रंप का दावा: “पारंपरिक तरीके से ईरान को भारी नुकसान” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने बिना परमाणु हथियारों के ही ईरान को काफी नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार, ईरान की सैन्य क्षमता पहले ही “काफी हद तक कमजोर” हो चुकी है और अब स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किसी भी देश के लिए पूरी तरह गलत है और इसे कभी भी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। “टिक-टॉक का समय शुरू हो चुका है”: ट्रंप की चेतावनी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि ईरान के लिए “समय तेजी से खत्म हो रहा है”। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की स्थिति मजबूत है और ईरान की सैन्य और नेतृत्व संरचना पहले से कमजोर हो चुकी है। उनके अनुसार, अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान के पास समझौता करने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं। मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसैनिक ताकत में इजाफा रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए तीसरा विमानवाहक पोत (aircraft carrier) भी तैनात कर दिया है। इससे क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की ताकत और बढ़ गई है। पहले से ही दो बड़े विमानवाहक पोत मध्य पूर्व और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जिससे तनावपूर्ण स्थिति और गंभीर हो गई है। ईरान-हॉर्मुज स्ट्रेट विवाद से बढ़ी चिंता मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बना हुआ है, जो वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का अहम मार्ग है। स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई है कि इस समुद्री मार्ग से होने वाली व्यापारिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा खतरे बढ़ गए हैं। सैन्य टकराव की आशंका, लेकिन कूटनीति अभी भी अधर में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित शांति वार्ता की कोशिशें फिलहाल अनिश्चित हैं। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद कमजोर स्थिति में बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बातचीत दोबारा शुरू नहीं होती, तो यह तनाव आगे चलकर बड़े सैन्य टकराव में बदल सकता है। युद्ध की नहीं, लेकिन दबाव की राजनीति तेज ट्रंप के बयान और अमेरिका की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने मध्य पूर्व की स्थिति को और जटिल बना दिया है। हालांकि उन्होंने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से इनकार किया है, लेकिन उनके बयानों से साफ है कि दबाव की रणनीति तेज हो चुकी है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह तनाव कूटनीति की ओर बढ़ेगा या फिर टकराव और गहरा होगा।
सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ कूटनीतिक विवाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक पॉडकास्टर की विवादित पोस्ट को शेयर किए जाने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में हल्का तनाव देखने को मिला है। इस पोस्ट में भारत को “hell-hole” जैसे आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित किया गया था, जिससे राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया: “अज्ञानपूर्ण और अस्वीकार्य टिप्पणी” भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस मामले पर स्पष्ट और सख्त बयान जारी किया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सोशल मीडिया पर की गई यह टिप्पणी “स्पष्ट रूप से अज्ञानपूर्ण, अनुचित और खराब स्वाद वाली” है। MEA ने यह भी कहा कि ये टिप्पणियां भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता को नहीं दर्शातीं, जो लंबे समय से आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित रहे हैं। अमेरिका की सफाई और बैकफुट पर बयान विवाद बढ़ने के बाद अमेरिकी दूतावास की ओर से एक स्पष्टीकरण जारी किया गया। इसमें कहा गया कि डोनाल्ड ट्रंप भारत को एक “महान देश” मानते हैं और वहां के नेतृत्व के प्रति उनके सकारात्मक संबंध हैं। यह बयान भारतीय मीडिया में उठे सवालों के जवाब में दिया गया, ताकि विवाद को शांत किया जा सके। सोशल मीडिया पोस्ट पर हंगामा और वैश्विक प्रतिक्रिया यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने एक रेडियो होस्ट की टिप्पणी साझा की थी, जिसमें भारत, चीन और कुछ अन्य देशों को आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित किया गया था। पोस्ट वायरल होते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। भारतीय मूल के संगठनों ने भी इस पर नाराजगी जताई। हिंदू-अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां भारतीय और एशियाई समुदायों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देती हैं और सामाजिक तनाव को और बढ़ा सकती हैं। भारत-अमेरिका संबंधों पर असर की चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी से दोनों देशों के रिश्तों पर अस्थायी असर पड़ सकता है, हालांकि सरकारों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संवाद अभी भी मजबूत बना हुआ है। MEA ने अपने बयान में साफ किया कि दोनों देशों के बीच साझेदारी रणनीतिक और लंबे समय से स्थिर रही है, जिसे इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणियां प्रभावित नहीं कर सकतीं। राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई भारत में राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई नेताओं ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस बयान की आलोचना की और इसे भारत की छवि के खिलाफ बताया। कूटनीति मजबूत, लेकिन बयानबाजी से तनाव पूरा विवाद भले ही सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह दिखाया कि वैश्विक राजनीति में शब्दों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सम्मान और तथ्यहीन टिप्पणियों के बीच संतुलन जरूरी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति के ऐलान के बाद इज़राइल को युद्ध रोकने पर मजबूर होना पड़ा लेबनान में जारी संघर्ष के बीच अब एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसके बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी सैन्य रणनीति बदलनी पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप करते हुए इज़राइल के फैसलों को प्रभावित किया है। ट्रंप की घोषणा से पहले ही तय हो गया युद्धविराम जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम जल्द लागू होगा। इसके कुछ ही घंटों बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि संघर्ष रोक दिया गया है और दोनों पक्षों को सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी। इसके बाद इज़राइल सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे और उसे युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा। नेतन्याहू की सैन्य योजना पर फिर पड़ा असर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हाल ही में हिज़बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की बात कर रहे थे। इज़राइली सेना भी नए हमलों की योजना तैयार कर रही थी। लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद स्थिति बदल गई और सरकार को युद्ध रोकने का निर्णय लेना पड़ा। देश को जानकारी ट्रंप के पोस्ट से मिली सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इज़राइल के नागरिकों और कई नेताओं को युद्धविराम की जानकारी अपने प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट से मिली। इससे इज़राइली राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। ट्रंप बनते जा रहे हैं निर्णायक शक्ति विश्लेषकों का कहना है कि हाल के महीनों में ट्रंप ने कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में सीधे हस्तक्षेप किया है, जिनमें गाजा, ईरान और अब लेबनान शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कई मौकों पर उन्होंने: युद्धविराम लागू कराया सैन्य कार्रवाई रोकने का दबाव बनाया और क्षेत्रीय नेताओं से सीधे बातचीत को प्रभावित किया गाजा और ईरान संघर्ष पर भी असर इससे पहले गाजा और ईरान से जुड़े संघर्षों में भी अमेरिका ने इज़राइल की रणनीति पर प्रभाव डाला था। कई मामलों में इज़राइल को अपने सैन्य अभियान सीमित करने पड़े, जिससे उसे निर्णायक जीत हासिल नहीं हो सकी। हिज़बुल्लाह अभी भी बड़ा खतरा युद्धविराम के बावजूद लेबनान में हिज़बुल्लाह की स्थिति मजबूत बनी हुई है। संगठन ड्रोन और रॉकेट हमलों की क्षमता रखता है, जिससे इज़राइल की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। नेतन्याहू का बयान: शांति और युद्ध दोनों तैयार युद्धविराम के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल ने अमेरिका के अनुरोध पर समझौता किया है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सेना फिर से कार्रवाई के लिए तैयार है। उन्होंने कहा: “हमारे एक हाथ में हथियार है, और दूसरा हाथ शांति के लिए बढ़ा हुआ है।” स्थिति अभी भी नाजुक हालांकि युद्धविराम लागू हो चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अस्थायी है और क्षेत्र में तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में हालात फिर बदल सकते हैं।
हॉर्मुज संकट के बाद ट्रंप का तीखा बयान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर था, तब NATO ने कोई प्रभावी मदद नहीं की, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद सहायता की पेशकश की गई। “अब आपकी मदद की जरूरत नहीं” – ट्रंप एरिजोना में आयोजित Turning Point USA कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि NATO ने अमेरिका से तब संपर्क किया जब हालात लगभग स्थिर हो चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर मदद चाहिए थी, तो “दो महीने पहले चाहिए थी, अब नहीं।” ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे उस समय पूरी तरह बेकार साबित हुए जब हमें उनकी जरूरत थी। लेकिन सच यह है कि हमें उनकी जरूरत कभी नहीं थी, उन्हें हमारी जरूरत थी।” हॉर्मुज संकट और वैश्विक तनाव यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सुर्खियों में रहा। यह वही समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है। हालांकि अब स्थिति कुछ हद तक स्थिर बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाटो को बताया ‘पेपर टाइगर’ ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया। उन्होंने लिखा कि संकट के दौरान संगठन कमजोर और निष्क्रिय रहा, लेकिन अब जब स्थिति सुधर रही है, तो मदद की बात कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर NATO को सहयोग करना ही है, तो वे “तेल ले जाने के लिए जहाज भर सकते हैं।” क्षेत्रीय देशों की तारीफ अपने बयान में ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों की तारीफ भी की। उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने संकट के दौरान स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। ईरान और हॉर्मुज को लेकर स्थिति ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि युद्धविराम अवधि में सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हालांकि अमेरिका ने इस क्षेत्र में कड़ा रुख बनाए रखा है और नौसैनिक दबाव जारी है। ट्रंप का यह बयान एक बार फिर अमेरिका और NATO के बीच मतभेद को उजागर करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हॉर्मुज संकट ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा असर डाला है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी है कि अगर बुधवार तक कोई बड़ा समझौता नहीं होता, तो युद्धविराम खत्म किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि हालात बिगड़े तो एक बार फिर सैन्य कार्रवाई शुरू हो सकती है। “फिर शुरू हो सकती हैं बमबारी” – ट्रंप एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो “हमें फिर से बमबारी शुरू करनी पड़ सकती है।” साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के बंदरगाहों पर लगा प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा। ईरान-अमेरिका बातचीत में गतिरोध दोनों देशों के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशें अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं। हाल ही में पाकिस्तान में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत भी विफल रही, जिससे तनाव और बढ़ गया है। प्रमुख मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है, वह इस विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि यह मार्ग सुरक्षित और खुला है, जबकि ईरान बार-बार चेतावनी दे रहा है कि दबाव बढ़ा तो रास्ता प्रभावित हो सकता है। नौसेना नाकेबंदी और बढ़ता तनाव अमेरिका ने अप्रैल के मध्य से ईरानी बंदरगाहों पर समुद्री नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिससे जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। ईरान ने इसे अवैध और उकसाने वाला कदम बताया है। वैश्विक बाजारों में चिंता तनाव बढ़ने के साथ ही वैश्विक तेल बाजारों में भी चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति और बिगड़ी तो तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है और ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकता है। बुधवार की डेडलाइन अब पूरी दुनिया के लिए अहम बन गई है। अगर बातचीत सफल नहीं होती, तो मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।
अमेरिका और Iran के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump बातचीत और समझौते के संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी ओर अमेरिकी सेना ने ईरान के समुद्री रास्तों पर भारी सैन्य घेराबंदी कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, इस मिशन में 10,000 से ज्यादा सैनिक, 12 से अधिक युद्धपोत और 100 से ज्यादा लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। समुद्र में अमेरिका की ताकत का प्रदर्शन इस ऑपरेशन में एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln और गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत शामिल हैं, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय इलाकों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। CENTCOM का कहना है कि कोई भी जहाज अगर ईरानी बंदरगाहों की ओर जाता है या वहां से निकलता है, तो उसे रोका जाएगा और जांच की जाएगी। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, लेकिन निगरानी कड़ी जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने स्पष्ट किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह घेराबंदी केवल ईरान के बंदरगाहों और तटीय सीमा तक सीमित है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भी अमेरिकी सेना पूरी तरह सक्रिय है और हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। ‘डार्क फ्लीट’ पर भी शिकंजा अमेरिका ने उन जहाजों पर भी कार्रवाई के संकेत दिए हैं, जिन्हें ‘डार्क फ्लीट’ कहा जाता है। ये ऐसे जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय नियमों को दरकिनार कर गुप्त रूप से ईरानी तेल की ढुलाई करते हैं। ट्रंप बोले- ईरान डील के लिए तैयार इसी बीच ट्रंप ने दावा किया कि ईरान अब समझौते के लिए पहले से ज्यादा तैयार है। उन्होंने कहा, “ईरान आज उन शर्तों को मानने को तैयार है, जिनके लिए वह पहले राजी नहीं था।” ट्रंप ने साफ किया कि किसी भी संभावित डील की सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार न बनाए। सीजफायर टूटा तो फिर जंग राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत असफल रही, तो युद्ध दोबारा शुरू हो सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर प्रधानमंत्री Narendra Modi की तारीफ करते हुए उन्हें “अच्छा काम करने वाला नेता” बताया है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और सीजफायर की कोशिशों के बीच दोनों नेताओं के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत हुई, जिसे ट्रंप ने “बहुत सकारात्मक” करार दिया। ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनकी पीएम मोदी के साथ बातचीत काफी अच्छी रही। उन्होंने कहा, “वह मेरे अच्छे मित्र हैं और बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।” सीजफायर और मिडिल ईस्ट पर चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, इस बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति, खासकर इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका इस क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति स्थापित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखे हुए है। पाकिस्तान दौरे के दिए संकेत ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर ईरान के साथ सीजफायर समझौता होता है, तो वह पाकिस्तान का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर इस्लामाबाद में डील साइन होती है, तो मैं वहां जा सकता हूं।” उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि वह शांति प्रक्रिया में अच्छा काम कर रहा है और अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है। कूटनीतिक कोशिशें तेज यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका मिडिल ईस्ट में कई स्तर पर कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। इसमें ईरान के साथ बातचीत, इजरायल-लेबनान सीमा पर तनाव कम करना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है। ट्रंप ने यह भी उम्मीद जताई कि हिजबुल्लाह जैसे समूह सीजफायर का पालन करेंगे और क्षेत्र में हिंसा कम होगी।
Islamabad में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली हाई-लेवल बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। इस वार्ता के टूटने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है। अराघची का आरोप–अमेरिका ‘वादे से मुकरा’ ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि समझौता लगभग तय था, लेकिन आखिरी समय में अमेरिका ने अपनी शर्तें बदल दीं। उन्होंने ‘मैक्सिमलिज्म’ का आरोप लगाते हुए कहा कि वॉशिंगटन ने जरूरत से ज्यादा मांग रखकर बातचीत को विफल कर दिया। अराघची ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर अमेरिका अच्छी नीयत दिखाता, तो जवाब भी वैसा ही मिलता–लेकिन अब “दुश्मनी का जवाब दुश्मनी से दिया जाएगा।” जेडी वेंस का तंज अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance भी इस बैठक में शामिल थे। उन्होंने कहा कि कुछ मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन अंतिम समझौता नहीं हो सका। वेंस ने कहा कि यह विफलता अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए नुकसानदायक है। किन मुद्दों पर फंसी बात? रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत दो बड़े मुद्दों पर अटक गई: Strait of Hormuz पर नियंत्रण ईरान का परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन ईरानी मीडिया ने अमेरिकी रुख को ‘अवास्तविक’ बताया और कहा कि बुनियादी समझौते का ढांचा तक तैयार नहीं हो पाया। ट्रंप की धमकियों पर ईरान का जवाब ईरान की संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि Donald Trump की धमकियों का कोई असर नहीं होगा। उन्होंने चेतावनी दी–“अगर अमेरिका लड़ाई चाहता है, तो हम भी तैयार हैं, और अगर बातचीत करेगा तो हम भी तर्क से जवाब देंगे।”
Donald Trump और Pope Leo XIV के बीच विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। ट्रंप ने खुद को Jesus Christ जैसा दिखाते हुए एक AI तस्वीर शेयर की, जिससे नया बवाल खड़ा हो गया है। AI फोटो से छिड़ा विवाद ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर जो तस्वीर शेयर की, उसमें वे लंबे चोगे में एक बीमार व्यक्ति को हाथ लगाकर ठीक करते नजर आते हैं। बैकग्राउंड में अमेरिकी झंडा, मिलिट्री प्लेन और फरिश्तों जैसी छवियां दिखती हैं–जो बाइबिल में वर्णित चमत्कारों की ओर इशारा करती हैं। पोप पर ट्रंप का हमला ट्रंप ने पोप लियो XIV को विदेशी मामलों में “बेकार” और अपराध रोकने में “कमजोर” बताया। उनका कहना है कि चर्च को राजनीति से दूर रहकर शांति पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर वे राष्ट्रपति न होते, तो पोप इस पद तक नहीं पहुंच पाते। ईरान-वेनेजुएला पर टकराव ईरान और वेनेजुएला के मुद्दे पर दोनों के बीच मतभेद और गहरा गया है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि पोप अमेरिका के सख्त रुख की आलोचना कर रहे हैं, जबकि वे खुद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं। कोविड और चर्च का मुद्दा ट्रंप ने कोविड काल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय धार्मिक संगठनों को दबाव झेलना पड़ा, लेकिन पोप इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोले। उन्होंने पोप के भाई लुईस की तारीफ करते हुए उन्हें ‘MAGA’ समर्थक बताया। ‘लेफ्ट’ नेताओं से करीबी पर सवाल ट्रंप ने पोप की कथित तौर पर वामपंथी नेताओं से नजदीकी पर भी सवाल उठाए और कहा कि इससे चर्च की छवि प्रभावित हो रही है। विवाद क्यों बढ़ा? दरअसल, पोप लगातार युद्ध के खिलाफ शांति और कूटनीति की बात कर रहे हैं, जबकि ट्रंप इसे अपनी नीतियों में दखल मानते हैं। 60 Minutes की एक रिपोर्ट में भी अमेरिकी चर्च नेताओं ने ट्रंप की नीतियों पर नैतिक सवाल उठाए हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर कर रख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा Strait of Hormuz में नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी कच्चा तेल (WTI) करीब 8 प्रतिशत बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड लगभग 7 प्रतिशत चढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। इस घटनाक्रम ने न केवल ऊर्जा बाजार बल्कि वैश्विक शेयर बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ा दी है। Dow Jones Futures में गिरावट देखी गई, जिससे निवेशकों में चिंता साफ झलक रही है। सप्लाई संकट की आशंका से बढ़ी कीमतें विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की कीमतों में अचानक उछाल का सबसे बड़ा कारण सप्लाई बाधित होने का डर है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और अन्य खाड़ी देश इसी समुद्री मार्ग के जरिए बड़े पैमाने पर तेल निर्यात करते हैं। अमेरिकी प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि जब तक ईरान अपनी “आक्रामक गतिविधियों” पर रोक नहीं लगाता, यह नाकेबंदी जारी रहेगी। ऐसे में बाजार में अनिश्चितता और जोखिम की भावना बढ़ गई है। ईरान पर अमेरिका की सख्त कार्रवाई राष्ट्रपति Donald Trump ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी नौसेना उन जहाजों को रोकेगी जो ईरान को कथित तौर पर अवैध टैक्स या टोल का भुगतान कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में माइन (समुद्री बम) होने का डर फैलाकर वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि यदि किसी शांतिपूर्ण जहाज पर हमला हुआ तो अमेरिका कड़ी सैन्य प्रतिक्रिया देगा। क्या पूरी तरह बंद होगा समुद्री रास्ता? US Central Command के अनुसार, यह नाकेबंदी पूरी तरह से वैश्विक जहाजरानी को रोकने के लिए नहीं है। गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा करने वाले जहाजों को सीमित अनुमति दी जाएगी। अमेरिका का उद्देश्य ईरान की तेल आय को नियंत्रित करना है, न कि पूरी दुनिया के व्यापार को बाधित करना। हालांकि, बढ़ते सैन्य तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही में पहले ही कमी आने लगी है, जिससे सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है। आगे क्या? वर्तमान हालात यह संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव जल्द कम होने वाला नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप के “लॉक्ड एंड लोडेड” बयान से यह स्पष्ट है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए भी तैयार है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजरें अब कूटनीतिक प्रयासों पर टिकी हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो तेल की बढ़ती कीमतें वैश्विक महंगाई को और बढ़ा सकती हैं, जिसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
ईरान के साथ तनाव कम होने के बाद Donald Trump ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। इस बार उन्होंने न सिर्फ NATO पर तीखा हमला बोला, बल्कि Greenland को लेकर अपनी पुरानी महत्वाकांक्षा को भी दोहराया। ईरान के बाद बदला अमेरिकी फोकस हाल ही में Iran के साथ हुए सीजफायर के बाद ट्रंप का रुख फिर आक्रामक नजर आया। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अभियान के दौरान सहयोगी देशों से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला, जिससे पश्चिमी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए। NATO पर करारा हमला ट्रंप ने NATO को “पेपर टाइगर” बताते हुए कहा कि जब अमेरिका को जरूरत थी, तब सहयोगी देश साथ नहीं आए। उनका यह बयान न सिर्फ आलोचना, बल्कि NATO की विश्वसनीयता पर सीधा हमला माना जा रहा है। यह टिप्पणी ट्रंप की ‘America First’ नीति को फिर से उजागर करती है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से ज्यादा एकतरफा रणनीति को प्राथमिकता देते हैं। ग्रीनलैंड पर फिर जताई दिलचस्पी ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड को लेकर टिप्पणी करते हुए अपनी पुरानी योजना की ओर इशारा किया। इससे पहले भी वह डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दे चुके हैं, जिसे खारिज कर दिया गया था। ग्रीनलैंड का महत्व सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है- आर्कटिक क्षेत्र में अहम स्थिति रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर दुर्लभ खनिज और ऊर्जा संसाधन अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की संभावनाएं ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर ट्रंप के इस बयान से अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है। NATO जैसे गठबंधन में भरोसे की कमी और कूटनीतिक खींचतान तेज होने की आशंका है। नई जियोपॉलिटिक्स की ओर संकेत विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का यह रुख दिखाता है कि अमेरिका अब मिडिल ईस्ट के साथ-साथ आर्कटिक क्षेत्र में भी अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है। यह बदलाव आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को और जटिल बना सकता है। ईरान सीजफायर के तुरंत बाद ट्रंप का NATO और ग्रीनलैंड पर बयान साफ करता है कि अमेरिकी विदेश नीति में आक्रामकता और तेजी से बदलती प्राथमिकताएं बनी हुई हैं। ग्रीनलैंड का मुद्दा आने वाले समय में बड़ा कूटनीतिक विवाद बन सकता है।
अमेरिका की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां Donald Trump के युद्ध संबंधी अधिकारों को सीमित करने की तैयारी हो रही है। United States Congress में एक प्रस्ताव लाया जा रहा है, जिसके तहत ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति को संसद की मंजूरी लेनी होगी। डेमोक्रेट्स का बड़ा कदम डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता Chuck Schumer ने कहा कि मौजूदा हालात में कांग्रेस को अपने संवैधानिक अधिकारों को फिर से लागू करना चाहिए। उनका मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा बिना अनुमति के युद्ध जैसे फैसले लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसी कड़ी में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक नेता Hakeem Jeffries ने भी इस प्रस्ताव पर वोटिंग कराने की मांग की है। ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता हाल ही में Iran के साथ तनाव के बीच ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए धमकी दी थी कि अगर Strait of Hormuz नहीं खोला गया तो अमेरिका बड़ा सैन्य हमला कर सकता है। उनके इस बयान ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी। हालांकि बाद में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन ट्रंप की आक्रामक भाषा और नीति को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर बना हुआ है। संविधान क्या कहता है? अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध की घोषणा करने का अधिकार कांग्रेस के पास होता है, न कि राष्ट्रपति के पास। हालांकि, आपातकालीन स्थितियों में राष्ट्रपति सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। आरोप है कि ट्रंप इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट टकराव कांग्रेस में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के पास मामूली बहुमत है, जिसके चलते इस तरह के प्रस्ताव पहले भी पारित नहीं हो पाए हैं। लेकिन डेमोक्रेट्स लगातार इस मुद्दे को उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रस्ताव सिर्फ ईरान नीति तक सीमित नहीं, बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन की बड़ी बहस का हिस्सा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि ट्रंप की सैन्य नीतियों पर लगाम लगती है या नहीं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।