आज के दौर में फ्रिज और कोल्ड स्टोरेज के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में बर्फ इतनी दुर्लभ और कीमती हुआ करती थी कि इसे हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका से समुद्री जहाजों के जरिए मंगाया जाता था। यह सिर्फ अमीरों की शौकिया चीज नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक भारत में चिकित्सा और दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी।
19वीं सदी का यह अनोखा व्यापार इतिहास के सबसे दिलचस्प वैश्विक कारोबारी प्रयोगों में गिना जाता है। इस कारोबार ने एक अमेरिकी व्यापारी को इतना अमीर बना दिया कि दुनिया उसे “आइस किंग” के नाम से जानने लगी।
उस समय आधुनिक रेफ्रिजरेशन तकनीक मौजूद नहीं थी। भारत जैसे गर्म और उष्णकटिबंधीय देश में प्राकृतिक बर्फ का उत्पादन लगभग असंभव था। ऐसे में अमेरिका के New England क्षेत्र के जमे हुए तालाबों और झीलों से विशाल बर्फ के टुकड़े काटकर जहाजों में भरे जाते थे।
इन बर्फ के टुकड़ों को लगभग 16,000 मील की समुद्री यात्रा कर भारत लाया जाता था। इस सफर में जहाजों को भूमध्य रेखा दो बार पार करनी पड़ती थी और यात्रा पूरी होने में करीब चार महीने लग जाते थे। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में बर्फ सुरक्षित भारत पहुंच जाती थी, जो उस समय की एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी।
इस असाधारण व्यापार के पीछे अमेरिकी कारोबारी Frederic Tudor का दिमाग था। उन्होंने बर्फ के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को एक बड़े उद्योग का रूप दिया और बाद में “आइस किंग” के नाम से मशहूर हुए।
आंकड़ों के अनुसार, ट्यूडर ने केवल कलकत्ता (अब Kolkata) के बाजार से करीब 2,20,000 डॉलर का शुद्ध मुनाफा कमाया था। आज की कीमतों में यह राशि 50 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर मानी जाती है।
भारत में कुछ क्षेत्रों में सर्दियों की रातों में कृत्रिम तरीके से बर्फ बनाने की कोशिश की जाती थी, जिसे “हुगली आइस” कहा जाता था। लेकिन यह बर्फ पतली, गंदी और अक्सर कंकड़-पत्थरों से भरी होती थी। इसका उपयोग खाने-पीने में नहीं किया जा सकता था।
ब्रिटिश अधिकारी और भारतीय रईस अपने पेय पदार्थ ठंडे रखना चाहते थे। उन्हें वाइन, शरबत और अन्य पेय पदार्थों के लिए साफ और शुद्ध बर्फ की जरूरत होती थी। इसी बर्फ का इस्तेमाल आइसक्रीम बनाने में भी किया जाता था।
कहा जाता है कि मशहूर उद्योगपति Jamsetjee Jeejeebhoy ने मुंबई की एक डिनर पार्टी में पहली बार अमेरिकी बर्फ से बनी आइसक्रीम परोसी थी।
बर्फ जल्द ही विलासिता की वस्तु से बढ़कर चिकित्सा का जरूरी साधन बन गई। डॉक्टर इसका उपयोग तेज बुखार कम करने, हैजा के मरीजों को राहत देने और सर्जरी के दौरान विभिन्न उपचार प्रक्रियाओं में करने लगे।
भारत की गर्म जलवायु में यूरोपीय आबादी के लिए यह स्वास्थ्य संबंधी जरूरत बन चुकी थी।
सबसे बड़ा सवाल यह था कि चार महीने की समुद्री यात्रा में बर्फ पिघलती क्यों नहीं थी?
फ्रेडरिक ट्यूडर ने इसका अनोखा समाधान निकाला। बर्फ को बड़े और एक समान आकार के टुकड़ों में काटा जाता था। फिर इन्हें जहाजों में लकड़ी के बुरादे, चावल के छिलकों और विशेष इंसुलेशन सामग्री के बीच रखा जाता था। यही तकनीक इस व्यापार की सफलता की सबसे बड़ी वजह बनी।
उस दौर में ब्रिटिश शासन को बर्फ की उपयोगिता का महत्व समझ में आ चुका था। इसलिए British East India Company ने इस व्यापार को कई विशेष सुविधाएं दीं।
इन सुविधाओं ने इस कारोबार को और अधिक लाभदायक बना दिया।
6 सितंबर 1833 को जहाज Tuscany कलकत्ता पहुंचा। यह बोस्टन से 180 टन बर्फ लेकर निकला था और लगभग 100 टन बर्फ सुरक्षित भारत पहुंचाने में सफल रहा।
करीब 55 प्रतिशत बर्फ का सुरक्षित बच जाना उस समय एक असाधारण उपलब्धि माना गया और यहीं से इस व्यापार ने नई ऊंचाइयों को छूना शुरू किया।
उस दौर में बर्फ की कीमत इतनी अधिक थी कि इसे “व्हाइट गोल्ड” यानी सफेद सोना कहा जाने लगा।
1833 में इसकी कीमत लगभग 6.5 सेंट प्रति पाउंड थी। जैसे-जैसे मांग बढ़ी, 1853 तक यह बढ़कर लगभग 12 सेंट प्रति पाउंड पहुंच गई।
दिलचस्प बात यह थी कि बर्फ प्राकृतिक रूप से मुफ्त मिलती थी। खर्च केवल उसे काटने, स्टोर करने और समुद्री यात्रा के दौरान सुरक्षित रखने का होता था। यही वजह थी कि इस कारोबार में मुनाफा बेहद ज्यादा था।
1870 के दशक के अंत में मैकेनिकल रेफ्रिजरेशन तकनीक का विकास शुरू हुआ। इसके बाद भारत में ही बर्फ बनाने वाली फैक्ट्रियां स्थापित होने लगीं।
1878 में स्थापित Bengal Ice Company जैसी कंपनियों ने स्थानीय स्तर पर बर्फ उत्पादन शुरू किया। धीरे-धीरे अमेरिका से बर्फ आयात करने की जरूरत खत्म हो गई और दुनिया के सबसे अनोखे व्यापारों में से एक का अंत हो गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट री-एग्जाम को पारदर्शी बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध का मामला अब अदालत की चौखट पर पहुंच गया है, जहां आज इस पर अहम सुनवाई होनी है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET) को लेकर चल रहा तनाव अब शिक्षा जगत से निकलकर डिजिटल दुनिया की दहलीज तक पहुंच गया है। नीट री-एग्जाम के दौरान किसी भी तरह की धांधली और पेपर लीक जैसी अफवाहों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने एक सख्त कदम उठाते हुए लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। सरकार के इस अप्रत्याशित फैसले ने टेक जगत में खलबली मचा दी है। सरकारी आदेश के जारी होते ही इस प्रतिबंध का व्यापक असर दिखने लगा है। टेक दिग्गज गूगल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए भारत में अपने प्ले स्टोर से टेलीग्राम ऐप को हटा दिया है, जबकि एप्पल भी जल्द ही अपने ऐप स्टोर से इसे ब्लॉक करने की तैयारी में है। सरकार का इस बैन के पीछे स्पष्ट तर्क है कि परीक्षा जैसे अत्यधिक संवेदनशील समय में सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल फर्जी प्रश्न पत्र और भ्रामक जानकारियां तेजी से फैलाने के लिए किया जाता है। ऐसे में परीक्षा को बिना किसी रुकावट और पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराने के लिए इस तरह का 'डिजिटल ब्लैकआउट' एक जरूरी एहतियाती कदम है। दूसरी ओर, सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ टेलीग्राम ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना है। कंपनी ने इस अस्थायी बैन को चुनौती देने के लिए सीधे दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। टेलीग्राम प्रबंधन का तर्क है कि इस फैसले के कारण भारत में मौजूद उसके करोड़ों सामान्य यूज़र्स को बेवजह भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐप का दावा है कि एक विशिष्ट परीक्षा के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद कर देना करोड़ों लोगों के संचार माध्यम को बाधित करने जैसा है। मामले की गंभीरता और करोड़ों यूज़र्स के हितों के टकराव को ध्यान में रखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर त्वरित सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। बुधवार, 17 जून 2026 को अदालत इस हाई-प्रोफाइल मामले पर अपना रुख स्पष्ट करेगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय परीक्षा की शुचिता बनाए रखने की सरकारी चिंता और डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन अधिकारों के बीच कैसे संतुलन स्थापित करता है।
रांची। रांची विश्वविद्यालय (आरयू) अपने शैक्षणिक ढांचे में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रहा है। कुलपति प्रो. सरोज शर्मा की अध्यक्षता में 17 जून को होने वाली एकेडमिक काउंसिल की बैठक में 27 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। इनमें प्रोफेशनल विभागों को स्कूल मॉडल में बदलने, नए रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम शुरू करने, करियर काउंसिलिंग सेंटर की स्थापना, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम लागू करने और विभिन्न पाठ्यक्रमों में संशोधन जैसे अहम निर्णय शामिल हैं। स्कूल मॉडल के तहत बदलेगी विभागों की पहचान नई व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय के चार प्रोफेशनल और वोकेशनल विभागों को 'यूनिवर्सिटी स्कूल' के रूप में विकसित किया जाएगा। इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) का नाम बदलकर यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज किया जाएगा। वहीं एमसीए और एमएससी आईटी विभागों का विलय कर यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंस एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी बनाया जाएगा। इसके अलावा मास कम्युनिकेशन विभाग को यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन तथा लीगल स्टडीज विभाग को यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है। पहली बार शुरू होगी डेटा साइंस की पढ़ाई रांची विश्वविद्यालय पहली बार एमएससी डेटा साइंस और एमए/एमएससी स्टैटिस्टिक्स के नए पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स जैसे तेजी से उभरते क्षेत्रों में बढ़ती मांग को देखते हुए इन कोर्सों को तैयार किया गया है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य छात्रों को आधुनिक तकनीकी कौशल से लैस कर रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप होंगे बदलाव बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की नई गाइडलाइन के अनुरूप पाठ्यक्रमों और प्रमाणपत्रों के स्वरूप में बदलाव पर भी निर्णय लिया जाएगा। साथ ही करियर काउंसिलिंग सेंटर, दो नए विशेष केंद्रों की स्थापना और गुमला के कार्तिक उरांव कॉलेज सहित अन्य संस्थानों में शैक्षणिक संसाधनों के विस्तार के प्रस्ताव भी एजेंडे में शामिल हैं।
नई दिल्ली: एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल करने के बाद ज्यादातर उम्मीदवार निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख करते हैं, लेकिन सरकारी क्षेत्र में भी MBA प्रोफेशनल्स के लिए कई शानदार अवसर मौजूद हैं। बैंकिंग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs), प्रशासनिक सेवाएं और बीमा क्षेत्र ऐसे विकल्प हैं, जहां न सिर्फ आकर्षक वेतन मिलता है बल्कि नौकरी की स्थिरता और कई अतिरिक्त सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं। आइए जानते हैं MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध चार प्रमुख करियर विकल्पों के बारे में। 1. बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर MBA ग्रेजुएट्स के लिए बैंकिंग क्षेत्र सबसे लोकप्रिय विकल्पों में गिना जाता है। RBI Grade B Officer रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) में ग्रेड बी अधिकारी का पद बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। यहां वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत कार्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां मिलती हैं। अनुमानित शुरुआती वेतन (भत्तों सहित): लगभग ₹1.5 लाख प्रतिमाह अधिक जानकारी: RBI की आधिकारिक वेबसाइट सरकारी बैंकों में PO और SO पद सरकारी बैंकों में प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और स्पेशलिस्ट ऑफिसर (SO) के पदों पर MBA उम्मीदवारों को अवसर मिलते हैं। SEBI और IRDAI जैसे संस्थान वित्तीय रणनीति, निवेश और नियामकीय कार्यों से जुड़े पदों पर भी MBA प्रोफेशनल्स की मांग रहती है। 2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs) देश की प्रमुख सरकारी कंपनियां MBA उम्मीदवारों की भर्ती करती हैं। प्रमुख कंपनियां: ONGC NTPC BHEL GAIL इन संस्थानों में मैनेजमेंट ट्रेनी, HR, मार्केटिंग और ऑपरेशंस जैसे पदों पर नियुक्तियां होती हैं। अनुमानित वार्षिक पैकेज: ₹12 लाख से ₹25 लाख तक 3. UPSC और प्रशासनिक सेवाएं MBA ग्रेजुएट्स संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में भी हिस्सा ले सकते हैं। सिविल सेवा (IAS, IPS, IRS) MBA डिग्री धारक IAS, IPS और IRS जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं। अनुमानित वेतन (भत्तों सहित): ₹80,000 से ₹1 लाख प्रतिमाह Indian Economic Service (IES) आर्थिक नीति और वित्तीय मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पदों के लिए भी MBA उम्मीदवार अवसर प्राप्त कर सकते हैं। 4. बीमा क्षेत्र में सरकारी नौकरियां LIC और अन्य सरकारी बीमा कंपनियों में MBA प्रोफेशनल्स की अच्छी मांग रहती है। इन संस्थानों में: रिस्क मैनेजमेंट प्रशासन मैनेजमेंट ऑपरेशनल रोल्स जैसे पदों पर भर्ती की जाती है। अनुमानित शुरुआती वेतन: ₹1 लाख से ₹1.25 लाख प्रतिमाह MBA के बाद सरकारी नौकरी क्यों है अच्छा विकल्प? आकर्षक वेतन नौकरी की सुरक्षा पेंशन और अन्य भत्ते करियर में स्थिरता बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में करियर बनाने वाले उम्मीदवारों के लिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। सही तैयारी और उचित परीक्षा चयन के माध्यम से एक सफल और स्थायी करियर बनाया जा सकता है।