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The Incredible Ice King Story

जब भारत अमेरिका से मंगाता था बर्फ, 16,000 मील की समुद्री यात्रा कर पहुंचता था ‘सफेद सोना’, जानिए ‘आइस किंग’ की हैरान कर देने वाली कहानी

surbhi जून 1, 2026 0
Large ice blocks unloaded from a ship in colonial India after a long sea voyage from America
America Ice Trade to Colonial India

आज के दौर में फ्रिज और कोल्ड स्टोरेज के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में बर्फ इतनी दुर्लभ और कीमती हुआ करती थी कि इसे हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका से समुद्री जहाजों के जरिए मंगाया जाता था। यह सिर्फ अमीरों की शौकिया चीज नहीं थी, बल्कि औपनिवेशिक भारत में चिकित्सा और दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी।

19वीं सदी का यह अनोखा व्यापार इतिहास के सबसे दिलचस्प वैश्विक कारोबारी प्रयोगों में गिना जाता है। इस कारोबार ने एक अमेरिकी व्यापारी को इतना अमीर बना दिया कि दुनिया उसे “आइस किंग” के नाम से जानने लगी।

अमेरिका के तालाबों से भारत तक पहुंचती थी बर्फ

उस समय आधुनिक रेफ्रिजरेशन तकनीक मौजूद नहीं थी। भारत जैसे गर्म और उष्णकटिबंधीय देश में प्राकृतिक बर्फ का उत्पादन लगभग असंभव था। ऐसे में अमेरिका के New England क्षेत्र के जमे हुए तालाबों और झीलों से विशाल बर्फ के टुकड़े काटकर जहाजों में भरे जाते थे।

इन बर्फ के टुकड़ों को लगभग 16,000 मील की समुद्री यात्रा कर भारत लाया जाता था। इस सफर में जहाजों को भूमध्य रेखा दो बार पार करनी पड़ती थी और यात्रा पूरी होने में करीब चार महीने लग जाते थे। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में बर्फ सुरक्षित भारत पहुंच जाती थी, जो उस समय की एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी।

कौन थे ‘आइस किंग’?

इस असाधारण व्यापार के पीछे अमेरिकी कारोबारी Frederic Tudor का दिमाग था। उन्होंने बर्फ के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को एक बड़े उद्योग का रूप दिया और बाद में “आइस किंग” के नाम से मशहूर हुए।

आंकड़ों के अनुसार, ट्यूडर ने केवल कलकत्ता (अब Kolkata) के बाजार से करीब 2,20,000 डॉलर का शुद्ध मुनाफा कमाया था। आज की कीमतों में यह राशि 50 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर मानी जाती है।

भारत में बर्फ की इतनी मांग क्यों थी?

1. स्थानीय बर्फ की गुणवत्ता खराब थी

भारत में कुछ क्षेत्रों में सर्दियों की रातों में कृत्रिम तरीके से बर्फ बनाने की कोशिश की जाती थी, जिसे “हुगली आइस” कहा जाता था। लेकिन यह बर्फ पतली, गंदी और अक्सर कंकड़-पत्थरों से भरी होती थी। इसका उपयोग खाने-पीने में नहीं किया जा सकता था।

2. अंग्रेज अधिकारियों और अमीरों की जरूरत

ब्रिटिश अधिकारी और भारतीय रईस अपने पेय पदार्थ ठंडे रखना चाहते थे। उन्हें वाइन, शरबत और अन्य पेय पदार्थों के लिए साफ और शुद्ध बर्फ की जरूरत होती थी। इसी बर्फ का इस्तेमाल आइसक्रीम बनाने में भी किया जाता था।

कहा जाता है कि मशहूर उद्योगपति Jamsetjee Jeejeebhoy ने मुंबई की एक डिनर पार्टी में पहली बार अमेरिकी बर्फ से बनी आइसक्रीम परोसी थी।

3. चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ी मांग

बर्फ जल्द ही विलासिता की वस्तु से बढ़कर चिकित्सा का जरूरी साधन बन गई। डॉक्टर इसका उपयोग तेज बुखार कम करने, हैजा के मरीजों को राहत देने और सर्जरी के दौरान विभिन्न उपचार प्रक्रियाओं में करने लगे।

भारत की गर्म जलवायु में यूरोपीय आबादी के लिए यह स्वास्थ्य संबंधी जरूरत बन चुकी थी।

कैसे बचाई जाती थी बर्फ?

सबसे बड़ा सवाल यह था कि चार महीने की समुद्री यात्रा में बर्फ पिघलती क्यों नहीं थी?

फ्रेडरिक ट्यूडर ने इसका अनोखा समाधान निकाला। बर्फ को बड़े और एक समान आकार के टुकड़ों में काटा जाता था। फिर इन्हें जहाजों में लकड़ी के बुरादे, चावल के छिलकों और विशेष इंसुलेशन सामग्री के बीच रखा जाता था। यही तकनीक इस व्यापार की सफलता की सबसे बड़ी वजह बनी।

ब्रिटिश सरकार का भी मिला समर्थन

उस दौर में ब्रिटिश शासन को बर्फ की उपयोगिता का महत्व समझ में आ चुका था। इसलिए British East India Company ने इस व्यापार को कई विशेष सुविधाएं दीं।

  • आयात शुल्क से छूट
  • जहाजों को प्राथमिकता
  • रात में माल उतारने की अनुमति
  • कलकत्ता, बंबई और मद्रास में आइसहाउस बनाने के लिए रियायती जमीन

इन सुविधाओं ने इस कारोबार को और अधिक लाभदायक बना दिया।

पहली खेप ने रचा इतिहास

6 सितंबर 1833 को जहाज Tuscany कलकत्ता पहुंचा। यह बोस्टन से 180 टन बर्फ लेकर निकला था और लगभग 100 टन बर्फ सुरक्षित भारत पहुंचाने में सफल रहा।

करीब 55 प्रतिशत बर्फ का सुरक्षित बच जाना उस समय एक असाधारण उपलब्धि माना गया और यहीं से इस व्यापार ने नई ऊंचाइयों को छूना शुरू किया।

‘सफेद सोना’ क्यों कहलाती थी बर्फ?

उस दौर में बर्फ की कीमत इतनी अधिक थी कि इसे “व्हाइट गोल्ड” यानी सफेद सोना कहा जाने लगा।

1833 में इसकी कीमत लगभग 6.5 सेंट प्रति पाउंड थी। जैसे-जैसे मांग बढ़ी, 1853 तक यह बढ़कर लगभग 12 सेंट प्रति पाउंड पहुंच गई।

दिलचस्प बात यह थी कि बर्फ प्राकृतिक रूप से मुफ्त मिलती थी। खर्च केवल उसे काटने, स्टोर करने और समुद्री यात्रा के दौरान सुरक्षित रखने का होता था। यही वजह थी कि इस कारोबार में मुनाफा बेहद ज्यादा था।

कैसे खत्म हुआ यह कारोबार?

1870 के दशक के अंत में मैकेनिकल रेफ्रिजरेशन तकनीक का विकास शुरू हुआ। इसके बाद भारत में ही बर्फ बनाने वाली फैक्ट्रियां स्थापित होने लगीं।

1878 में स्थापित Bengal Ice Company जैसी कंपनियों ने स्थानीय स्तर पर बर्फ उत्पादन शुरू किया। धीरे-धीरे अमेरिका से बर्फ आयात करने की जरूरत खत्म हो गई और दुनिया के सबसे अनोखे व्यापारों में से एक का अंत हो गया।

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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NEET Re-Exam: टेलीग्राम पर सरकारी बैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची कंपनी, प्ले स्टोर से ऐप गायब

नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट री-एग्जाम को पारदर्शी बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध का मामला अब अदालत की चौखट पर पहुंच गया है, जहां आज इस पर अहम सुनवाई होनी है।   मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET) को लेकर चल रहा तनाव अब शिक्षा जगत से निकलकर डिजिटल दुनिया की दहलीज तक पहुंच गया है। नीट री-एग्जाम के दौरान किसी भी तरह की धांधली और पेपर लीक जैसी अफवाहों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने एक सख्त कदम उठाते हुए लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। सरकार के इस अप्रत्याशित फैसले ने टेक जगत में खलबली मचा दी है।   सरकारी आदेश के जारी होते ही इस प्रतिबंध का व्यापक असर दिखने लगा है। टेक दिग्गज गूगल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए भारत में अपने प्ले स्टोर से टेलीग्राम ऐप को हटा दिया है, जबकि एप्पल भी जल्द ही अपने ऐप स्टोर से इसे ब्लॉक करने की तैयारी में है। सरकार का इस बैन के पीछे स्पष्ट तर्क है कि परीक्षा जैसे अत्यधिक संवेदनशील समय में सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल फर्जी प्रश्न पत्र और भ्रामक जानकारियां तेजी से फैलाने के लिए किया जाता है। ऐसे में परीक्षा को बिना किसी रुकावट और पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराने के लिए इस तरह का 'डिजिटल ब्लैकआउट' एक जरूरी एहतियाती कदम है।   दूसरी ओर, सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ टेलीग्राम ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना है। कंपनी ने इस अस्थायी बैन को चुनौती देने के लिए सीधे दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। टेलीग्राम प्रबंधन का तर्क है कि इस फैसले के कारण भारत में मौजूद उसके करोड़ों सामान्य यूज़र्स को बेवजह भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐप का दावा है कि एक विशिष्ट परीक्षा के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद कर देना करोड़ों लोगों के संचार माध्यम को बाधित करने जैसा है।   मामले की गंभीरता और करोड़ों यूज़र्स के हितों के टकराव को ध्यान में रखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर त्वरित सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। बुधवार, 17 जून 2026 को अदालत इस हाई-प्रोफाइल मामले पर अपना रुख स्पष्ट करेगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय परीक्षा की शुचिता बनाए रखने की सरकारी चिंता और डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन अधिकारों के बीच कैसे संतुलन स्थापित करता है।

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MBA graduates exploring government job opportunities in banking, PSUs, civil services, and insurance sectors.
MBA के बाद सरकारी नौकरी में बना सकते हैं शानदार करियर, जानिए 4 बेहतरीन विकल्प और संभावित सैलरी

नई दिल्ली: एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल करने के बाद ज्यादातर उम्मीदवार निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख करते हैं, लेकिन सरकारी क्षेत्र में भी MBA प्रोफेशनल्स के लिए कई शानदार अवसर मौजूद हैं। बैंकिंग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs), प्रशासनिक सेवाएं और बीमा क्षेत्र ऐसे विकल्प हैं, जहां न सिर्फ आकर्षक वेतन मिलता है बल्कि नौकरी की स्थिरता और कई अतिरिक्त सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं। आइए जानते हैं MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध चार प्रमुख करियर विकल्पों के बारे में। 1. बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर MBA ग्रेजुएट्स के लिए बैंकिंग क्षेत्र सबसे लोकप्रिय विकल्पों में गिना जाता है। RBI Grade B Officer रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) में ग्रेड बी अधिकारी का पद बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। यहां वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत कार्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां मिलती हैं। अनुमानित शुरुआती वेतन (भत्तों सहित): लगभग ₹1.5 लाख प्रतिमाह अधिक जानकारी: RBI की आधिकारिक वेबसाइट सरकारी बैंकों में PO और SO पद सरकारी बैंकों में प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और स्पेशलिस्ट ऑफिसर (SO) के पदों पर MBA उम्मीदवारों को अवसर मिलते हैं। SEBI और IRDAI जैसे संस्थान वित्तीय रणनीति, निवेश और नियामकीय कार्यों से जुड़े पदों पर भी MBA प्रोफेशनल्स की मांग रहती है। 2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs) देश की प्रमुख सरकारी कंपनियां MBA उम्मीदवारों की भर्ती करती हैं। प्रमुख कंपनियां: ONGC NTPC BHEL GAIL इन संस्थानों में मैनेजमेंट ट्रेनी, HR, मार्केटिंग और ऑपरेशंस जैसे पदों पर नियुक्तियां होती हैं। अनुमानित वार्षिक पैकेज: ₹12 लाख से ₹25 लाख तक 3. UPSC और प्रशासनिक सेवाएं MBA ग्रेजुएट्स संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में भी हिस्सा ले सकते हैं। सिविल सेवा (IAS, IPS, IRS) MBA डिग्री धारक IAS, IPS और IRS जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं। अनुमानित वेतन (भत्तों सहित): ₹80,000 से ₹1 लाख प्रतिमाह Indian Economic Service (IES) आर्थिक नीति और वित्तीय मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पदों के लिए भी MBA उम्मीदवार अवसर प्राप्त कर सकते हैं। 4. बीमा क्षेत्र में सरकारी नौकरियां LIC और अन्य सरकारी बीमा कंपनियों में MBA प्रोफेशनल्स की अच्छी मांग रहती है। इन संस्थानों में: रिस्क मैनेजमेंट प्रशासन मैनेजमेंट ऑपरेशनल रोल्स जैसे पदों पर भर्ती की जाती है। अनुमानित शुरुआती वेतन: ₹1 लाख से ₹1.25 लाख प्रतिमाह MBA के बाद सरकारी नौकरी क्यों है अच्छा विकल्प? आकर्षक वेतन नौकरी की सुरक्षा पेंशन और अन्य भत्ते करियर में स्थिरता बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में करियर बनाने वाले उम्मीदवारों के लिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। सही तैयारी और उचित परीक्षा चयन के माध्यम से एक सफल और स्थायी करियर बनाया जा सकता है।  

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