मुंबई, एजेंसियां। Dhurandhar 2: The Revenge रिलीज होते ही अपने जबरदस्त एक्शन और सस्पेंस के साथ चर्चा में आ गई है। खासकर फिल्म का क्लाइमेक्स दर्शकों को चौंका रहा है, जहां कहानी एक बड़े ट्विस्ट के साथ नया मोड़ लेती है। फिल्म के अंत में एक ऐसे रहस्यमयी किरदार की एंट्री होती है, जिसे “असली धुरंधर” बताया गया है।
फिल्म के अंतिम हिस्से में रणवीरसिंह का किरदार मेजर इकबाल को खत्म करने के बाद पाकिस्तानी एजेंसियों के हाथों पकड़ लिया जाता है। इसके बाद उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया जाता है और उनकी हालत बेहद गंभीर हो जाती है।इसी दौरान एक बड़ा ट्विस्ट आता है, जब R. Madhavan का किरदार सामने आता है और दुश्मन अधिकारियों को ब्लैकमेल कर डील करने पर मजबूर कर देता है। इस डील के बाद रणवीर के किरदार को रिहा तो कर दिया जाता है, लेकिन उन्हें अधमरी हालत में सुनसान जगह पर छोड़ दिया जाता है।
कहानी का सबसे बड़ा सरप्राइज तब आता है, जब एक कार रणवीर को लेने पहुंचती है। इस कार में बैठा शख्स ही “असली धुरंधर” होता है। जब उसका चेहरा सामने आता है, तो पता चलता है कि यह किरदार Rakesh Bedi निभा रहे हैं, जो फिल्म में पाकिस्तानी नेता जमील जमाली के रूप में नजर आते हैं।फिल्म में खुलासा होता है कि जमील जमाली पिछले 45 सालों से पाकिस्तान में रहकर एक अंडरकवर एजेंट के तौर पर काम कर रहा है। उसने वहां की राजनीति और सिस्टम में अपनी गहरी पैठ बना ली है और लंबे समय से दुश्मन देश के खिलाफ काम कर रहा है।
क्लाइमेक्स में जमील जमाली यह भी बताता है कि वह दुश्मन के बड़े अपराधी नेटवर्क को पहले ही कमजोर कर चुका है। यह खुलासा कहानी को और ज्यादा रोमांचक बना देता है।इसके बाद वह रणवीर के किरदार को सुरक्षित भारत पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाता है और उसे आगे बढ़ने की सलाह देता है। फिल्म का अंत रणवीर के अपने गांव लौटने और नई शुरुआत की तैयारी के साथ होता है।
फिल्म का क्लाइमेक्स देशभक्ति, रहस्य और इमोशन का जबरदस्त मिश्रण पेश करता है। “असली धुरंधर” की एंट्री न सिर्फ कहानी को ऊंचाई देती है, बल्कि दर्शकों के मन में लंबे समय तक छाप छोड़ती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर ऐसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, जहां अब उनका मुकाबला किसी और स्टार से नहीं, बल्कि खुद रणवीर सिंह से होता दिख रहा है। उनकी फिल्म ‘धुरंधर 2’ ने कमाई के मामले में नया इतिहास रचने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। फिल्म की रिकॉर्डतोड़ ओपनिंग और लगातार शानदार प्रदर्शन ने रणवीर को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां वे बतौर लीड स्टार 1000 करोड़ क्लब में शामिल होने वाले पहले बॉलीवुड अभिनेता बन सकते हैं। ओपनिंग से ही बना दिया बड़ा रिकॉर्ड ‘धुरंधर 2’ ने रिलीज के साथ ही हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी ओपनिंग फिल्मों में अपनी जगह बना ली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म ने पहले दिन की कमाई में कई बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। रणवीर ने सिर्फ दूसरे सितारों के रिकॉर्ड नहीं तोड़े, बल्कि अपने ही करियर की बड़ी फिल्मों जैसे ‘सिंबा’, ‘पद्मावत’ और पहली ‘धुरंधर’ को भी पीछे छोड़ दिया। इससे साफ है कि उनकी लोकप्रियता और स्टारडम लगातार नए स्तर पर पहुंच रहा है। 11 दिनों में पहले पार्ट को पीछे छोड़ा फिल्म की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘धुरंधर 2’ ने महज 11 दिनों में ‘धुरंधर’ के लाइफटाइम कलेक्शन को पार कर लिया। यानी रणवीर सिंह किसी और से नहीं, बल्कि खुद के बनाए मानकों को भी पीछे छोड़ते जा रहे हैं। देश ही नहीं, विदेश में भी जबरदस्त पकड़ रणवीर सिंह का स्टारडम अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। ‘धुरंधर 2’ ने ओवरसीज मार्केट में भी शानदार प्रदर्शन किया है। खासकर नॉर्थ अमेरिका में रणवीर की फिल्मों का दबदबा देखने को मिल रहा है। ‘धुरंधर’, ‘धुरंधर 2’, ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ और ‘पद्मावत’ जैसी फिल्मों ने विदेशी बाजार में बेहतरीन कमाई की है। अभिनय और स्टारडम का दुर्लभ संतुलन रणवीर सिंह की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे सिर्फ कमाई करने वाले स्टार नहीं, बल्कि दमदार अभिनय के लिए भी जाने जाते हैं। यही वजह है कि वे व्यावसायिक सफलता और कलात्मक पहचान दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या रणवीर सिंह सच में 1000 करोड़ का नया इतिहास रचकर बॉलीवुड में एक अलग ही लीग बना पाएंगे।
मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव ने हाल ही में अपने जीवन के उस मुश्किल दौर को याद किया, जब उन्हें चेक बाउंस मामले में कुछ दिन जेल में बिताने पड़े थे। मशहूर फिल्ममेकर और कोरियोग्राफर फराह खान के यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान राजपाल यादव ने पहली बार जेल के अंदर के अपने अनुभवों को खुलकर साझा किया। इस दौरान वे भावुक भी नजर आए। फराह खान के सवाल पर खोला दिल का हाल बातचीत के दौरान फराह खान ने जब राजपाल यादव से पूछा कि क्या जेल के अंदर उनके फैंस भी थे, तो उन्होंने बेहद सादगी और गंभीरता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वहां फैंस जैसी कोई बात नहीं होती, बल्कि वहां केवल सिस्टम, कानून और अनुशासन सबसे बड़ा होता है। राजपाल ने कहा कि जेल के अंदर रहने का अनुभव उन्हें जीवन की सच्चाई और अनुशासन की अहमियत और गहराई से समझा गया। ‘हर हाल में जीना सीख लिया’ जब फराह ने उनसे पूछा कि क्या इस पूरे अनुभव ने उन्हें गुस्सा या तकलीफ दी, तो राजपाल यादव ने शांत अंदाज में कहा कि उन्होंने हर परिस्थिति में जीना सीख लिया है। उन्होंने बताया कि जेल में उन्हें कोई विशेष ड्यूटी नहीं दी गई थी, लेकिन वहां जो नियम और अनुशासन थे, उनका पूरी तरह पालन करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि उन्हें वहीं रहकर समय बिताना था और उसी स्थिति को स्वीकार करना पड़ा। मदद करने वालों का जताया आभार राजपाल यादव ने इस मुश्किल समय में उनका साथ देने वाले फैंस, दोस्तों और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का भी दिल से धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि जिन्होंने भी सोशल मीडिया या व्यक्तिगत रूप से उनका समर्थन किया, वे उन सभी के प्रति कृतज्ञ हैं। अब ‘भूत बंगला’ में आएंगे नजर वर्कफ्रंट की बात करें तो राजपाल यादव जल्द ही अक्षय कुमार के साथ फिल्म भूत बंगला में नजर आएंगे। यह फिल्म 17 अप्रैल 2026 को रिलीज होगी। इसके अलावा, वे वेलकम टू द जंगल और हैवान जैसी फिल्मों में भी दिखाई देंगे।
दिल्ली के एक साधारण परिवार से निकलकर इंजीनियरिंग करने वाली तापसी पन्नू ने कभी नहीं सोचा था कि वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाएंगी। लेकिन किस्मत और मेहनत ने उन्हें यहां तक पहुंचा दिया। शुरुआत मॉडलिंग से हुई, जहां उनका मकसद सिर्फ एक्स्ट्रा कमाई था। लेकिन धीरे-धीरे यही शौक करियर बन गया और उन्हें साउथ फिल्म इंडस्ट्री में मौका मिला। हालांकि, वहां उन्हें लंबे समय तक सिर्फ ग्लैमरस रोल्स तक सीमित रखा गया। जब फ्लॉप फिल्मों ने दिया ‘पनौती’ का टैग साउथ में कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलीं, जिसके बाद तापसी को ‘पनौती’ तक कहा गया। इस टैग ने उनके आत्मविश्वास को हिला दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बॉलीवुड में एंट्री भी आसान नहीं रही। ‘चश्मे बद्दूर’ से शुरुआत के बाद कई फिल्में औसत या फ्लॉप रहीं। इस दौरान तापसी खुद को लेकर असुरक्षित महसूस करती थीं-उन्हें लगता था कि वह हीरोइन बनने के लायक नहीं हैं। आत्म-संदेह और स्ट्रगल का दौर तापसी ने खुद स्वीकार किया कि वह अपने लुक, स्टाइल और कॉन्फिडेंस को लेकर काफी परेशान रहती थीं। हर फिल्म उनके लिए एक डर की तरह थी। उन्हें यह भी लगता था कि वह बाकी हीरोइनों जितनी खूबसूरत नहीं हैं, इसलिए शायद इंडस्ट्री उन्हें स्वीकार नहीं करेगी। यह दौर उनके लिए मानसिक रूप से भी काफी कठिन रहा। ‘पिंक’ से बदली किस्मत 2016 में आई फिल्म ‘पिंक’ उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। इस फिल्म ने उनकी इमेज पूरी तरह बदल दी और उन्हें एक गंभीर अभिनेत्री के रूप में पहचान दिलाई। कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों से बनाई अलग पहचान ‘पिंक’ के बाद तापसी ने सिर्फ वही फिल्में चुननी शुरू कीं जिनकी कहानी मजबूत हो। उन्होंने ‘मुल्क’, ‘मनमर्जियां’, ‘बदला’, ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों से साबित किया कि वह सिर्फ ग्लैमरस एक्ट्रेस नहीं, बल्कि एक दमदार परफॉर्मर हैं। खासकर ‘थप्पड़’ में उनके अभिनय को काफी सराहा गया और उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड भी मिला। आउटसाइडर से इंडस्ट्री की मजबूत आवाज तक तापसी ने हमेशा कंटेंट को प्राथमिकता दी, न कि सिर्फ कमर्शियल सफलता को। उन्होंने अपने फैसलों से यह साबित किया कि टैलेंट और सही चुनाव के दम पर इंडस्ट्री में जगह बनाई जा सकती है। पर्सनल लाइफ और शुरुआती सफर जन्म: 1 अगस्त 1987, नई दिल्ली परिवार: जाट सिख परिवार शिक्षा: कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग करियर शुरुआत: मॉडलिंग और एड्स 1984 के सिख दंगों का असर उनके परिवार ने भी झेला, लेकिन मुश्किल समय में पड़ोसियों की मदद से वे सुरक्षित रहे। सीख क्या मिलती है? तापसी पन्नू की कहानी बताती है कि: असफलता अंत नहीं होती आत्म-संदेह सबसे बड़ी बाधा है सही मौके और मेहनत से पहचान बदली जा सकती है