एक नई मेडिकल स्टडी ने Diabetes से जूझ रहे लोगों के लिए चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, डायबिटीज के मरीजों में Adhesive Capsulitis यानी ‘फ्रोजन शोल्डर’ होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में लगभग 4 गुना ज्यादा होता है।
2026 की इस बड़ी समीक्षा और मेटा-एनालिसिस में 3.5 लाख से ज्यादा लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर होने की संभावना 3.69 गुना अधिक है।
यह स्थिति कंधे में दर्द और धीरे-धीरे मूवमेंट कम होने से जुड़ी होती है, खासकर हाथ को बाहर की ओर घुमाने में परेशानी होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डायबिटीज में लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर (हाइपरग्लाइसीमिया) शरीर में कई बदलाव लाता है:
ये सभी कारक मिलकर कंधे की गतिशीलता को कम कर देते हैं।
स्टडी में कुछ अतिरिक्त जोखिम कारक भी सामने आए:
डॉक्टरों का कहना है कि डायबिटीज के मरीज अगर कंधे में दर्द या जकड़न महसूस करें, तो इसे नजरअंदाज न करें।
शुरुआती पहचान और सही इलाज से कंधे की मूवमेंट को बेहतर किया जा सकता है। लंबे समय से अनियंत्रित डायबिटीज वाले मरीजों के लिए नियमित स्क्रीनिंग भी जरूरी बताई गई है।
हालांकि, यह स्टडी मुख्य रूप से ऑब्जर्वेशनल डेटा पर आधारित है, इसलिए सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। उम्र, वजन और शारीरिक गतिविधि जैसे कारक भी इस संबंध को प्रभावित कर सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
आजकल सोशल मीडिया पर “प्रोफी” यानी प्रोटीन कॉफी का ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है। फिटनेस और हेल्थ को लेकर सजग लोग इसे अपने मॉर्निंग रूटीन में शामिल कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यह आसान ड्रिंक आपके रोजाना के प्रोटीन लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर सकती है। लेकिन सवाल यह है–क्या यह सच में फायदेमंद है या सिर्फ एक ट्रेंड? क्या है प्रोटीन कॉफी? प्रोटीन कॉफी यानी “प्रोफी” दरअसल आपकी सामान्य कॉफी में प्रोटीन पाउडर मिलाकर बनाई जाती है। इसे तैयार करने के लिए दूध या प्लांट-बेस्ड मिल्क में प्रोटीन पाउडर मिलाकर कॉफी के साथ ब्लेंड किया जाता है। कई लोग इसे गर्म कॉफी के रूप में पीते हैं, तो कुछ इसे आइस्ड कॉफी के रूप में पसंद करते हैं। क्यों बढ़ रही है इसकी लोकप्रियता? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, एक वयस्क व्यक्ति को रोजाना अपने वजन के अनुसार 0.8 से 1.5 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है। लेकिन अधिकतर लोग अपनी जरूरत से कम प्रोटीन लेते हैं। ऐसे में प्रोटीन कॉफी एक आसान विकल्प बनकर उभर रही है, जो बिना ज्यादा मेहनत के सुबह-सुबह अच्छी मात्रा में प्रोटीन दे सकती है। उदाहरण के तौर पर, सामान्य नाश्ते में 2 अंडों से लगभग 14 ग्राम प्रोटीन मिलता है, जबकि प्रोटीन कॉफी के जरिए यह मात्रा 30 ग्राम से अधिक तक पहुंच सकती है। इससे दिन की शुरुआत में ही शरीर को जरूरी पोषण मिल जाता है। क्या हैं इसके फायदे? प्रोटीन कॉफी के कई संभावित फायदे बताए जा रहे हैं– मेटाबॉलिज्म बेहतर करने में मदद मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखने में सहायक लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद वर्कआउट के बाद रिकवरी बेहतर क्रेविंग्स को कम करने में सहायक क्या हैं सावधानियां? हालांकि विशेषज्ञ इस ट्रेंड को पूरी तरह से सही नहीं मानते। उनका कहना है कि प्रोटीन पाउडर एक प्रोसेस्ड फूड है, इसलिए इसे नियमित भोजन का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। डायटिशियन सलाह देते हैं कि प्रोटीन का मुख्य स्रोत अंडे, दालें, मांस, मछली और टोफू जैसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थ ही होने चाहिए। प्रोटीन कॉफी को केवल सप्लीमेंट या सहायक विकल्प के रूप में ही लेना बेहतर माना जाता है।
कैंसर इलाज के दौरान समान और सम्मानजनक देखभाल की जरूरत को रेखांकित करते हुए एक नई रिसर्च में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, ट्रांसजेंडर, जेंडर-नॉनकनफॉर्मिंग (GNC) और नॉन-बाइनरी (NB) मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ता है। भेदभाव और खराब स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध रिसर्च में कुल 1,476 कैंसर सर्वाइवर्स को शामिल किया गया, जिनमें 246 ट्रांसजेंडर, GNC और NB व्यक्ति थे। आंकड़ों के मुताबिक: 63.8% ट्रांसजेंडर, GNC और NB मरीजों ने हेल्थकेयर में भेदभाव का अनुभव किया जबकि 48.5% सिसजेंडर महिलाओं और 29.8% सिसजेंडर पुरुषों ने ऐसा अनुभव किया इतना ही नहीं, इन मरीजों में खराब स्वास्थ्य की शिकायत करने की संभावना तीन गुना से अधिक पाई गई। मरीजों ने यह भी बताया कि उन्हें अक्सर नजरअंदाज किया गया, कम सम्मान मिला और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी कमजोर रही। कैंसर देखभाल में असमानताएं क्यों चिंता का विषय हैं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज लंबा और जटिल होता है। ऐसे में मरीज का अनुभव, डॉक्टर का व्यवहार और समय पर सही इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है। लेकिन जब किसी समूह को बार-बार भेदभाव का सामना करना पड़े, तो उनका इलाज और रिकवरी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। डॉक्टरों की तैयारी में कमी रिपोर्ट के अनुसार, National Institutes of Health द्वारा फंड किए गए प्रोजेक्ट्स में से सिर्फ 0.8% ही जेंडर और सेक्सुअल माइनॉरिटी हेल्थ पर केंद्रित हैं। वहीं, एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका में केवल 5 में से 1 ऑन्कोलॉजिस्ट ही ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों का इलाज करने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, हालांकि अधिकांश डॉक्टर इस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं। यूरोप और UK में भी समान स्थिति यूरोप में भी LGBTQ+ समुदाय के कैंसर मरीजों को इलाज में देरी, स्क्रीनिंग की कमी और भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह British Medical Association ने भी ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों के लिए बेहतर और समान स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है। स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस में भी अंतर रिपोर्ट के अनुसार: LGBTQ+ समुदाय में मैमोग्राफी और सर्वाइकल स्क्रीनिंग की दर सामान्य आबादी से कम है इससे कैंसर का समय पर पता नहीं चल पाता और इलाज में देरी होती है आगे का रास्ता: सिस्टम स्तर पर बदलाव जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ भेदभाव खत्म करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। इसमें शामिल हैं: डॉक्टरों की बेहतर ट्रेनिंग समावेशी (inclusive) स्क्रीनिंग नीतियां सामाजिक स्तर पर जागरूकता और समर्थन हालांकि यह अध्ययन स्वयं-रिपोर्टेड डेटा पर आधारित है और इससे कारण-परिणाम का सीधा निष्कर्ष निकालना सीमित हो सकता है, फिर भी यह स्वास्थ्य सेवाओं में गहरी असमानताओं की ओर इशारा करता है।
चोट या सर्जरी के बाद बनने वाले दाग (scars) लंबे समय से चिकित्सा क्षेत्र के लिए चुनौती रहे हैं। अब एक नए अध्ययन ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है। शोध में पाया गया है कि Pirfenidone से लोड किए गए एक्सोसोम्स (PFD-exosomes) घाव को बिना दाग के भरने में मदद कर सकते हैं। एक्सोसोम तकनीक: बिना सेल के इलाज का नया तरीका घाव भरने के दौरान त्वचा में फाइब्रोब्लास्ट (fibroblast) नामक कोशिकाएं अत्यधिक सक्रिय हो जाती हैं, जिससे कोलेजन ज्यादा बनता है और स्कार बनता है। Pirfenidone पहले से ही एक एंटी-फाइब्रोटिक दवा के रूप में इस्तेमाल होती है, लेकिन इसे सही तरीके से प्रभावित जगह तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने Exosomes का इस्तेमाल किया–ये छोटे-छोटे कण होते हैं जो कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। यह एक “cell-free therapy” है, यानी इसमें सीधे कोशिकाओं का उपयोग नहीं होता। कैसे तैयार किए गए PFD-exosomes शोधकर्ताओं ने मानव त्वचा की कोशिकाओं (dermal fibroblasts) से एक्सोसोम्स निकाले और उनमें Pirfenidone को लोड किया। इसके लिए दो तकनीकों–PEG precipitation और affinity-based methods–का इस्तेमाल किया गया, जिसमें affinity-based तकनीक ज्यादा शुद्ध और बेहतर साबित हुई। दवा को एक्सोसोम्स में डालने के लिए “sonication” तकनीक अपनाई गई, जिससे उनकी संरचना सुरक्षित रखते हुए दवा को सफलतापूर्वक लोड किया गया। क्या मिले नतीजे? एक्सोसोम्स अकेले भी फाइब्रोब्लास्ट की वृद्धि और मूवमेंट को बेहतर बनाते हैं PFD-exosomes ने दवा के एंटी-फाइब्रोटिक असर को और बढ़ाया जानवरों पर किए गए परीक्षण में घाव तेजी से भरे त्वचा में कोलेजन का निर्माण संतुलित रहा, जिससे दाग कम बने भविष्य की चिकित्सा में बड़ी भूमिका यह तकनीक भविष्य में घाव के इलाज को पूरी तरह बदल सकती है। PFD-exosomes न केवल घाव को जल्दी भरने में मदद करते हैं, बल्कि दाग बनने की संभावना भी कम करते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को आम मरीजों तक पहुंचाने से पहले क्लीनिकल ट्रायल और लंबी अवधि की सुरक्षा जांच जरूरी होगी।