झारखंड

Khelari Bridge Crumbling, Urgent Repairs Needed

खलारी में 10–12 साल पुराना पुल हुआ जर्जर, विधायक सुरेश बैठा ने विधानसभा में उठाया मामला

surbhi मार्च 16, 2026 0
MLA Suresh Bhatta urging government to inspect and urgently repair Khelari Bridge.
MLA Suresh Bhatta urging government to inspect and urgently repair Khelari Bridge.

 

रांची–चतरा मार्ग पर आवागमन प्रभावित, पुल की गुणवत्ता पर उठे सवाल; सरकार से जांच और पुनर्निर्माण की मांग

जर्जर हालत में पहुंचा खलारी का पुल

झारखंड के रांची जिले के खलारी प्रखंड में चुरी कॉलोनी और राय दरहा टांड़ के पास बना पुल इन दिनों जर्जर स्थिति में पहुंच गया है। करीब 10 से 12 साल पहले बनाए गए इस पुल की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि यहां से गुजरना लोगों के लिए जोखिम भरा हो गया है।

यह पुल रांची और चतरा जिले को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर स्थित है, इसलिए इसकी खराब स्थिति से इलाके के लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

 

विधानसभा में उठा पुल का मुद्दा

सोमवार को झारखंड विधानसभा के सत्र के दौरान कांके के विधायक सुरेश बैठा ने इस पुल की खराब स्थिति का मुद्दा सदन में उठाया। उन्होंने बताया कि खलारी प्रखंड के चुरी कॉलोनी और राय दरहा टांड़ के पास स्थित यह पुल काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है।

विधायक ने कहा कि महज 10–12 साल पहले बने पुल का इतनी जल्दी जर्जर हो जाना निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सरकार से इस मामले की जांच कराने की मांग की।

 

रांची–चतरा मार्ग पर आवागमन प्रभावित

पुल की खराब हालत के कारण रांची और चतरा को जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर आवागमन प्रभावित हो गया है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन ने इस पुल से भारी वाहनों के गुजरने पर रोक लगा दी है।

इसके चलते व्यापारियों, यात्रियों और स्थानीय लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। रोजाना इस मार्ग से आने-जाने वाले लोगों को अब लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है।

 

सरकार से जांच और कार्रवाई की मांग

विधायक सुरेश बैठा ने सरकार से मांग की है कि पुल निर्माण में यदि किसी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता हुई है तो इसकी जांच कर दोषी अधिकारियों और संबंधित एजेंसी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि पुल की जल्द से जल्द मरम्मत या पुनर्निर्माण कराया जाए, ताकि इस महत्वपूर्ण मार्ग पर आवागमन सामान्य हो सके और लोगों को राहत मिल सके।

 

जनहित के मुद्दों को उठाने का भरोसा

विधायक सुरेश बैठा ने कहा कि क्षेत्र की जनता की समस्याओं को सदन तक पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि खलारी क्षेत्र के इस महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर वह लगातार सरकार के सामने आवाज उठाते रहेंगे, ताकि जल्द समाधान निकल सके।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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Dhanbad: 4 दिन पहले बने स्कूल शौचालय का छज्जा गिरने से एक छात्र घायल

धनबाद। जिले के पूर्वी टुंडी प्रखंड स्थित बरतोल उत्क्रमित मध्य विद्यालय में सोमवार को बड़ा हादसा हो गया। स्कूल परिसर में चार दिन पहले बने शौचालय का छज्जा अचानक गिरने से एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। हादसे के बाद स्कूल में अफरा-तफरी मच गई। घायल छात्र की पहचान गोर हरि दत्ता के रूप में हुई है, जिसे तत्काल स्थानीय निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के अनुसार उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।   चार दिन पहले पूरा हुआ था निर्माण जानकारी के अनुसार, पंचायत समिति की ओर से विद्यालय में नए शौचालय का निर्माण कराया गया था। निर्माण कार्य पूरा हुए अभी चार दिन भी नहीं हुए थे कि शौचालय का भारी-भरकम छज्जा अचानक भरभराकर गिर पड़ा। घटना के समय छात्र वहां मौजूद था और मलबे की चपेट में आ गया।   ग्रामीणों और शिक्षकों ने बचाई जान हादसे के बाद छात्र की चीख सुनकर शिक्षक और आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे। काफी मशक्कत के बाद मलबा हटाकर घायल छात्र को बाहर निकाला गया। इसके बाद उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसका इलाज जारी है।   घटिया निर्माण पर उठे सवाल घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका आरोप है कि निर्माण कार्य में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण महज चार दिन में शौचालय का छज्जा ढह गया। ग्रामीणों ने पंचायत समिति और निर्माण एजेंसी पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।   कार्रवाई की मांग तेज इस हादसे ने सरकारी स्कूलों में कराए जा रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी नहीं की गई तो भविष्य में ऐसे हादसे दोबारा हो सकते हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है।

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पतरातू में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर का बड़ा भरोसा, बोले- विस्थापितों का मुद्दा कैबिनेट में उठेगा, मिलेगा न्याय

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जेपीएससी की विवादित परीक्षाकी सीबीआई जांच एवं पूरी चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हो: आजसू

आज दिनांक 6/7/2026 को अखिल झारखंड छात्र संघ (आजसू ) के प्रदेश अध्यक्ष ओम वर्मा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता लगातार गंभीर सवालों के घेरे में है। जेपीएससी की हालिया प्रतियोगी परीक्षाओं एवं उनके परिणामों ने लाखों अभ्यर्थियों के मन में गहरा अविश्वास पैदा किया है। वर्तमान परिस्थितियों में जेपीएससी योग्यता और निष्पक्ष चयन का माध्यम बनने के बजाय अव्यवस्था, अपारदर्शिता और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का प्रतीक बनता जा रहा है। हालिया सिविल सेवा परीक्षा में 103 पदों के विरुद्ध 2204 अभ्यर्थियों को सफल घोषित कर दिया गया, लेकिन आज तक कटऑफ अंक सार्वजनिक नहीं किए गए। इतना ही नहीं, मेरिट सूची पर आयोग के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर तक नहीं होने से पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। इसी प्रकार बैकलॉग पीटी परीक्षा में 832 अभ्यर्थियों का रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं होने से पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है। यह कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य के साथ किया जा रहा गंभीर अन्याय है। झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाएं अब प्रतिभा की नहीं, बल्कि अनिश्चितता, भ्रम और मानसिक प्रताड़ना की परीक्षा बन गई हैं। वर्षों तक परीक्षाएं आयोजित नहीं होतीं और जब परिणाम आते हैं तो वे विवादों में घिर जाते हैं। कभी मॉडल उत्तर-पुस्तिका पर सवाल उठते हैं, कभी कटऑफ सार्वजनिक नहीं किया जाता, कभी मेरिट सूची पर आवश्यक हस्ताक्षर नहीं होते और कभी सैकड़ों अभ्यर्थियों के रिकॉर्ड ही संदिग्ध हो जाते हैं। ओएमआर शीट के मूल्यांकन में भी बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें किसी अभ्यर्थी को प्रथम प्रश्नपत्र में 100 में से 48 अंक प्राप्त हुए, जबकि सफल होने के लिए दूसरे प्रश्नपत्र में 100 में से 97 अंक प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है। परीक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति अत्यंत असामान्य और संदेहास्पद है। इससे पूरी परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।इन परिस्थितियों को देखते हुए आजसू माँग करती है कि  जेपीएससी की हालिया पीटी पूरी परीक्षा प्रक्रिया एवं हालिया विवादित परिणामों की सीबीआई जांच कराई जाए। सभी परीक्षाओं के कटऑफ, मेरिट निर्धारण की प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली एवं ओएमआर मूल्यांकन का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कानूनी एवं विभागीय कार्रवाई की जाए। राज्य के सभी प्रतियोगी छात्रों से अपील है कि यह संघर्ष किसी एक परीक्षा या एक बैच का नहीं, बल्कि झारखंड के लाखों युवाओं के भविष्य और उनके अधिकारों का प्रश्न है। सभी छात्र लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं। अखिल झारखंड छात्र संघ (आजसू)  प्रत्येक उस छात्र के साथ मजबूती से खड़ी है, जिसके भविष्य के साथ सरकार और जेपीएससी द्वारा अन्याय किया गया है। आजसू  युवाओं के अधिकार, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और निष्पक्ष चयन सुनिश्चित कराने के लिए हर स्तर पर संघर्ष जारी रखेगी।

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वित्त मंत्री की सुरक्षा विवाद पर गरमाई सियासत, सीपी सिंह बोले- दोबारा सुरक्षा लें तो लोग हंसेंगे

रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा सुरक्षा व्यवस्था लौटाए जाने के मुद्दे पर अब राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा विधायक सीपी सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि वित्त मंत्री ने सुरक्षा व्यवस्था छोड़ दी है, तो भविष्य में सरकार दोबारा सुरक्षा उपलब्ध कराए, तब भी उन्हें उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, अन्यथा लोग उनका मजाक उड़ाएंगे।   सीपी सिंह ने कहा  सीपी सिंह ने कहा कि किसी मंत्री का अपनी ही सरकार के खिलाफ पत्र लिखना और उसे सार्वजनिक करना कई सवाल खड़े करता है। उनका मानना है कि ऐसे मामलों का समाधान सरकार के भीतर होना चाहिए, न कि मीडिया के माध्यम से। उन्होंने कहा कि सरकार के वरिष्ठ मंत्री द्वारा लिखे गए पत्र का पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) जवाब तक नहीं देते, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे मामले में डीजीपी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई होनी चाहिए।   भाजपा विधायक ने कहा भाजपा विधायक ने कहा कि फिलहाल वित्त मंत्री बिना सुरक्षा के सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आ रहे हैं और जनता भी इसे देख रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार बाद में उन्हें फिर से सुरक्षा उपलब्ध कराती है, तो उन्हें स्पष्ट रूप से यह कहना चाहिए कि वे बिना सुरक्षा के ही जनता की सेवा करेंगे। तभी उनके फैसले की गंभीरता साबित होगी।   सीपी सिंह ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अपना अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि तत्कालीन डीजीपी एमवी राव के कार्यकाल में उनके बयान के बाद रातोंरात उनके आवास से हाउस गार्ड हटा लिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री को ही प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि उनके तबादले और पदस्थापन का अधिकार मुख्यमंत्री के पास होता है।   उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों की अधिक मौजूदगी कई बार खतरे को भी बढ़ाती है। स्वयं उन्होंने कई यात्राएं बिना सुरक्षा के की हैं। सीपी सिंह ने कहा कि यदि वित्त मंत्री वास्तव में संयुक्त सचिव के पत्र से आहत होकर यह कदम उठा रहे हैं तो उन्हें अपने फैसले पर कायम रहना चाहिए। अन्यथा यदि वे बाद में सुरक्षा स्वीकार करते हैं तो यह केवल राजनीतिक दिखावा माना जाएगा और उनकी छवि पर सवाल उठेंगे।

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