भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद समान प्रतिनिधित्व पर टिकी है, जहां हर नागरिक का वोट बराबर महत्व रखता है। इसी सिद्धांत को “एक व्यक्ति, एक वोट” कहा जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में निर्वाचन क्षेत्रों के बीच मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता इस सिद्धांत को कमजोर करती नजर आ रही है। ऐसे में अब परिसीमन (Delimitation) की जरूरत को लेकर बहस तेज हो गई है।
क्या है समस्या?
देश के अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में बहुत बड़ा अंतर है। उदाहरण के तौर पर:
इसी तरह:
ऐसी स्थिति में कम आबादी वाले क्षेत्र के मतदाता का प्रभाव अधिक हो जाता है, जो लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
‘एक व्यक्ति, एक वोट’ क्यों हो रहा कमजोर?
जब किसी क्षेत्र में बहुत अधिक मतदाता होते हैं:
दूसरी ओर, कम मतदाताओं वाले क्षेत्रों में:
यही असंतुलन “एक व्यक्ति, एक वोट” के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है।
क्या है परिसीमन?
परिसीमन का मतलब है:
जब लोकसभा सीटों का परिसीमन होता है, तो उसके अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों की संरचना भी बदल जाती है।
सरकार का क्या कहना है?
केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने संसद में कहा कि:
उन्होंने यह भी कहा कि “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत तभी सही मायनों में लागू होगा, जब यह असमानता दूर की जाए।
महिला आरक्षण से भी जुड़ा है मामला
सरकार के अनुसार:
जनसंख्या बढ़ी, लेकिन सीटें नहीं
लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या लंबे समय से लगभग स्थिर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
बड़े और छोटे संसदीय क्षेत्र (उदाहरण)
सबसे बड़े क्षेत्र:
सबसे छोटे क्षेत्र:
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव एक बार फिर अपने अनोखे अंदाज को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नई राजनीतिक पार्टी ‘खरगोश जनता पार्टी’ (KJP) लॉन्च कर दी है। यह कदम कथित तौर पर हाल ही में चर्चा में आई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर व्यंग्य के रूप में देखा जा रहा है। एल्विश ने न सिर्फ पार्टी की घोषणा की, बल्कि इसके लिए सोशल मीडिया पर अलग पेज भी बनाया और समर्थकों को जोड़ने का अभियान शुरू कर दिया। ‘तेज दिमाग, लंबे कान, सबका विकास गाजर के साथ’ बना नारा एल्विश यादव ने अपनी पार्टी का मजेदार नारा भी जारी किया है— “तेज दिमाग, लंबे कान, सबका विकास गाजर के साथ।” उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर समर्थकों को जंतर-मंतर पहुंचने का न्योता दिया और लिखा कि वहां सभी को मुफ्त गाजर मिलेगी। इस पोस्ट को इंटरनेट पर खूब शेयर किया जा रहा है और यूजर्स अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। दो घंटे में हजारों फॉलोअर्स जुड़े खरगोश जनता पार्टी का आधिकारिक सोशल मीडिया पेज लॉन्च होते ही तेजी से वायरल हो गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, पेज को महज दो घंटे के भीतर 3,000 से अधिक फॉलोअर्स मिल गए। पेज की बायो में “नेशनलिस्ट जेन जी” लिखा गया है और इसके संस्थापक के रूप में एल्विश यादव का नाम दर्ज है। पार्टी से जुड़े कई पोस्ट और ट्वीट भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। क्या है कॉकरोच जनता पार्टी? दरअसल, यह पूरा विवाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के इर्द-गिर्द शुरू हुआ। इस समूह की शुरुआत अभिजीत दीपके ने एक व्यंग्यात्मक युवा आंदोलन के रूप में की थी। बाद में यह सोशल मीडिया से निकलकर वास्तविक विरोध प्रदर्शनों तक पहुंच गया और NEET पेपर लीक जैसे मुद्दों पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी किया। एल्विश यादव की ‘खरगोश जनता पार्टी’ को कई लोग मनोरंजन और व्यंग्य के रूप में देख रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस का दौर लगातार जारी है।
इम्फाल: मणिपुर में छह लापता नगा लोगों के शव बरामद होने के बाद तनाव का माहौल बन गया है। इम्फाल ईस्ट स्थित जवाहरलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (JNIMS) की मोर्चरी के बाहर बुधवार को बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों को हस्तक्षेप करना पड़ा। शव लेने पहुंचे लोगों की भीड़, बढ़ाई गई सुरक्षा जानकारी के अनुसार, छह नगा लोगों के शव लेने के लिए बड़ी संख्या में परिजन और स्थानीय लोग जेएनआईएमएस मोर्चरी पहुंचे थे। भीड़ बढ़ने के साथ माहौल तनावपूर्ण हो गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने अस्पताल परिसर और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए। स्थिति को नियंत्रित करने के दौरान सुरक्षा बलों ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े। 24 घंटे के सर्च ऑपरेशन के बाद मिले शव मणिपुर पुलिस के मुताबिक, करीब 24 घंटे तक चले व्यापक तलाशी अभियान के बाद छह लोगों के शव बरामद किए गए। इस अभियान में मणिपुर पुलिस, सीआरपीएफ और असम राइफल्स के लगभग 450 जवान शामिल थे। तलाशी अभियान में स्निफर डॉग और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीमों की भी सहायता ली गई। पुलिस का कहना है कि बरामद शवों की पहचान उन लोगों के रूप में की जा रही है, जिन्हें 13 मई 2026 को लीलोन वैफेई गांव से कथित तौर पर अगवा किया गया था। जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी पुलिस ने बताया कि शवों के पोस्टमॉर्टम और पहचान से जुड़ी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं। साथ ही पूरे मामले की विस्तृत जांच भी जारी है, ताकि अपहरण और मौत के कारणों का पता लगाया जा सके। अधिकारियों ने कहा कि मामले से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हाल ही में रिहा हुए थे 14 कुकी बंधक यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब एक दिन पहले ही मणिपुर के सेनापति जिले में कथित तौर पर अगवा किए गए 14 कुकी लोगों को रिहा कराया गया था। नगालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने 14 कुकी बंधकों की रिहाई का स्वागत करते हुए छह नगा लोगों की सुरक्षित वापसी की भी अपील की थी। अब उनके शव मिलने से क्षेत्र में शोक और तनाव दोनों बढ़ गए हैं। प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की मणिपुर प्रशासन ने लोगों से संयम बरतने और अफवाहों से बचने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी गई है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी TMC में मचे अभूतपूर्व आंतरिक घमासान के बीच देश के सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिल्ली में हुई मुलाकात और उसके बाद अभिषेक बनर्जी व राहुल गांधी की बैठक ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं? हालांकि टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही अधिकारिक तौर पर इसे 'अफवाह' और 'निराधार' बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे संकट में घिरी ममता बनर्जी के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने वाली ममता बनर्जी अगर आज दोबारा कांग्रेस का दामन थामती हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आइए विश्लेषण करते हैं कि इस संभावित कदम से ममता बनर्जी को कितना फायदा और कितना नुकसान हो सकता है: यदि फायदों की बात करें, तो ममता बनर्जी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कवच और राजनीतिक वजूद की रक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला ले सकती हैं। इससे उन्हें बगावत और बिखराव से बचने का 'सेफ पैसेज' मिल सकता है। दरअसल, हालिया चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद ममता बनर्जी की पार्टी गहरे संकट में है। टीएमसी के विधायकों और सांसदों में भारी असंतोष है। खबर है कि 20 के करीब लोकसभा सांसद और 60 से अधिक विधायक बागी रुख अपनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि टीएमसी का कांग्रेस में विलय होता है, तो दल-बदल विरोधी कानून मतलब Anti-Defection Law के तहत बागियों के मंसूबों पर पानी फिर सकता है और ममता को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय 'मदरशिप' मिल जाएगी। राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका टीएमसी एक क्षेत्रीय दल है, जिसकी ताकत मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक ही सीमित रही है। कांग्रेस के साथ आने से ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को सीधे राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच पर एंट्री मिल जाएगी। वह विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) और संसद में कांग्रेस के बड़े चेहरे के रूप में उभर सकती हैं, जिससे उनका कद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगा। केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबाव से राहत बीजेपी और एनडीए के आक्रामक रुख के सामने फिलहाल ममता बनर्जी राज्य में अकेली पड़ती दिख रही हैं। कांग्रेस जैसी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और कानूनी सेल का साथ मिलने से वह केंद्रीय जांच एजेंसियों मसलन CBI, ED और अन्य राजनीतिक हमलों का मुकाबला अधिक संस्थागत तरीके से कर पाएंगी। अब यदि इस विलय से होनेवाले नुकसान की बात करें, तो इससे बंगाल में 'दीदी' के ब्रांड और वर्चस्व का अंत होना सुनिश्चित है। इसे 'बंगाल की बेटी' की अपनी पहचान और संप्रभुता का समर्पण ही समझा जायेगा। ममता बनर्जी की पूरी राजनीति 'अस्मिता' और स्वायत्तता पर टिकी है। उन्होंने हमेशा दिल्ली के नियंत्रण के खिलाफ लड़कर अपनी छवि बनाई है। कांग्रेस में विलय का सीधा मतलब होगा कि अब बंगाल टीएमसी के फैसले कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट से नहीं, बल्कि दिल्ली के 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय से तय होंगे। इससे 'दीदी' का वह कड़क और स्वतंत्र नेतृत्व वाला ब्रांड कमजोर हो जाएगा, जिसने उन्हें तीन दशक तक पहचान दी। जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर में निराशा बंगाल में टीएमसी का काडर सालों तक कांग्रेस और वामपंथियों यानी Left दोनों के खिलाफ संघर्ष करके बड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर आज भी कई जगह कांग्रेस और टीएमसी के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं। अचानक हुए इस बदलाव से जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम और निराशा फैल सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को जमीन मजबूत करने में मिलेगा। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का आंतरिक विरोध भले ही दिल्ली में सोनिया-ममता के बीच गर्मजोशी दिख रही हो, लेकिन बंगाल कांग्रेस के नेता (जैसे अधीर रंजन चौधरी और अन्य गुट) सालों तक ममता की राजनीति के पीड़ित रहे हैं। बंगाल कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा इस विलय के खिलाफ है। उनका मानना है कि टीएमसी के खिलाफ जनता के गुस्से (Anti-incumbency) का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है, जिससे पार्टी को आंतरिक कलह का सामना करना पड़ेगा। क्या मजबूरी बन गई है 'घर वापसी'? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी एक 'शतरंज की माहिर खिलाड़ी' हैं और वह कभी भी आसानी से घुटने नहीं टेकतीं। लेकिन, मौजूदा वक्त में जब उनकी अपनी ही पार्टी के कई सांसद और विधायक पाला बदलने को तैयार बैठे हैं, तो कांग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूत करना या विलय की दिशा में सोचना उनकी रणनीतिक मजबूरी हो सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ संजय सिंह के अनुसार: "यह कदम ममता बनर्जी के लिए अपनी राजनीतिक विरासत को पूरी तरह खत्म होने से बचाने और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने का आखिरी दांव साबित हो सकता है।" क्या ममता बनर्जी अपनी शर्तों पर कांग्रेस के साथ आगे बढ़ेंगी या फिर यह केवल विपक्षी एकजुटता को और धार देने की एक कोशिश है? इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।