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TCS Nashik Harassment Row

TCS नासिक केस में चौंकाने वाला खुलासा: शिकायत पर चुप रहने की सलाह, पीड़िताओं ने लगाए गंभीर आरोप

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
Woman employee distressed in office environment highlighting workplace harassment and corporate negligence
TCS Nashik Workplace Harassment Case

 

नासिक स्थित TCS की शाखा से सामने आए यौन उत्पीड़न मामले ने कॉर्पोरेट जगत में महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। जहां एक ओर दफ्तरों में सुरक्षित और पेशेवर वातावरण की उम्मीद की जाती है, वहीं इस मामले में पीड़िताओं ने डर, दबाव और अनदेखी का माहौल होने का आरोप लगाया है।

शिकायत के बाद भी नहीं हुई कोई ठोस कार्रवाई

पीड़ित महिलाओं का कहना है कि उन्होंने कई बार कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों, यहां तक कि ऑपरेशन हेड तक से शिकायत की, लेकिन हर बार उन्हें नजरअंदाज किया गया। एक महिला के मुताबिक, जब उसने सीधे शीर्ष अधिकारी से शिकायत की, तो उसे कहा गया–“क्यों खुद को हाइलाइट करना है, जाने दो।”

यह प्रतिक्रिया न केवल असंवेदनशीलता दर्शाती है, बल्कि कंपनी की शिकायत प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।

‘खुद सावधान रहो’ कहकर टाल दिया गया मामला

पीड़िता ने बताया कि उसने जून 2023 में अपने ट्रेनिंग और क्वालिटी मैनेजर को मौखिक रूप से पूरी घटना की जानकारी दी थी। लेकिन कार्रवाई के बजाय उसे सलाह दी गई कि आरोपी का व्यवहार पहले से खराब है, इसलिए वह खुद ही सतर्क रहे और अकेले रहने से बचे। टीम लीडर ने भी इसी तरह का रवैया अपनाया।

ट्रेनिंग के दौरान शुरू हुआ उत्पीड़न

महिला कर्मचारी के अनुसार, आरोपी ने ट्रेनिंग के समय ही उसे अकेले पाकर नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की थी। इसके बाद उसने लगातार पीछा करना, घूरना और अनुचित तरीके से छूना शुरू कर दिया। साथ ही, इस बात को किसी से न बताने का दबाव भी बनाया गया।

शिकायत के बाद बढ़ी प्रताड़ना और बदनाम करने की कोशिश

पीड़िता का आरोप है कि जब आरोपी को शिकायत की जानकारी मिली, तो उसने बदले की भावना से अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं। ऑफिस में उसके चरित्र को लेकर गलत बातें कही गईं और निजी जीवन पर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं।

काम के दबाव से मानसिक प्रताड़ना का आरोप

महिला का यह भी कहना है कि आरोपी और उसके सहयोगियों ने काम के जरिए उसे परेशान करने की कोशिश की। सिस्टम में बदलाव कर कॉल्स की संख्या असामान्य रूप से बढ़ा दी गई, जिससे उस पर अत्यधिक दबाव बनाया गया।

पीड़िता ने बताया कि गुड़ी पड़वा के दिन भी एक अन्य आरोपी ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया और आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए बाहर चलने का प्रस्ताव रखा।

जांच के दायरे में कंपनी प्रबंधन

अब इस पूरे मामले की पुलिस जांच जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि क्या कंपनी के अन्य अधिकारी भी आरोपियों को बचाने में शामिल थे। यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे कॉर्पोरेट सेक्टर में महिला सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Kedarnath Yatra
केदारनाथ धाम के कपाट खुले, भक्ति और उल्लास के बीच यात्रा का शुभारंभ

देहरादून, एजेंसियां। केदारनाथ मंदिर के कपाट बुधवार सुबह शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। जैसे ही कपाट खुले, पूरा धाम “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा। सेना के बैंड की भक्तिमय धुनों और मंत्रोच्चार के बीच परंपरा अनुसार पहले मंदिर के पूर्व द्वार को खोला गया और मुख्य पुजारी ने अंदर प्रवेश कर पूजा संपन्न की।   हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा, श्रद्धालुओं में उत्साह कपाट खुलने के पावन अवसर पर भारतीय सेना के हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश की गई, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और उल्लास से भर गया। करीब 10 हजार से अधिक श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने। पिछले वर्ष कपाट बंद करते समय ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाई गई भस्म को हटाकर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया गया।   प्रधानमंत्री के नाम पहली पूजा कपाट खुलने के बाद पहली पूजा नरेंद्र मोदी के नाम से संपन्न की गई। इस दौरान पिष्कार सिंह धामी भी मौजूद रहे और उन्होंने वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा कराई। बदरी-केदार मंदिर समिति के अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की।   श्रद्धालुओं को सीएम धामी की शुभकामनाएं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं देते हुए राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की। उन्होंने विश्वास जताया कि इस वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचेंगे।   आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा माहौल कपाट खुलते ही केदारनाथ यात्रा का विधिवत आगाज हो गया है। चारधाम यात्रा के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्ति, आस्था और परंपरा का संगम एक बार फिर हिमालय की वादियों में देखने को मिल रहा है।

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पहलगाम हमले की बरसी पर पीएम मोदी का संकल्प: आतंक के आगे भारत नहीं झुकेगा

  शहीदों को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि इस हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को देश कभी नहीं भूलेगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह हमला देश की आत्मा को झकझोर देने वाला था और पीड़ित परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। “भारत आतंक के सामने नहीं झुकेगा” पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि भारत किसी भी तरह के आतंक के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने कहा कि आतंकियों की साजिशें कभी सफल नहीं होंगी और देश मजबूती से उनका मुकाबला करेगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि देश दुख की इस घड़ी में एकजुट है और पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा है। 2025 में हुआ था भीषण हमला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के Pahalgam में आतंकियों ने हमला कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसके बाद बड़े स्तर पर सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई की गई थी। ऑपरेशन सिंदूर और महादेव से जवाब हमले के बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकियों के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इस दौरान कई आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया गया। इसके बाद “ऑपरेशन महादेव” के तहत सुरक्षा बलों ने हमले में शामिल तीन आतंकियों को भी ढेर कर दिया। सुरक्षा बढ़ी, स्मारक बना हमले की बरसी को देखते हुए पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। यहां अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं और निगरानी बढ़ा दी गई है। हमले में मारे गए लोगों की याद में एक स्मारक भी बनाया गया है, जिसमें सभी 26 पीड़ितों के नाम दर्ज हैं। यह स्मारक लिद्दर नदी के किनारे बनाया गया है और लोगों के लिए श्रद्धांजलि का केंद्र बन गया है।  

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जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में लोकसभा पैनल की जांच खत्म, रिपोर्ट सौंपी जाएगी

  जांच प्रक्रिया का औपचारिक समापन लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रही जांच को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है। यह फैसला मंगलवार को लिया गया। समिति अब अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा को सौंपेगी, जिसमें कहा गया है कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। तीन सदस्यीय इस पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार कर रहे थे। समिति का मानना है कि 9 अप्रैल को दिए गए इस्तीफे के बाद जांच प्रक्रिया जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बचता। इस्तीफे के बाद थमी महाभियोग प्रक्रिया जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंपा था। उन्होंने इसे “गहरे दुख” के साथ लिया गया फैसला बताया था। उसी दिन उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी इसकी जानकारी दी थी। उनका इस्तीफा उस समय आया, जब वह जांच समिति के सामने अपना पक्ष रखने वाले थे। 10 से 14 अप्रैल के बीच उन्हें अपनी सफाई पेश करनी थी, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, महाभियोग की प्रक्रिया केवल पद पर मौजूद जज के खिलाफ ही चल सकती है। ऐसे में इस्तीफे के साथ ही यह प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो गई। गंभीर आरोपों से जुड़ा था मामला यह पूरा मामला मार्च 2025 की एक घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लगने के बाद कथित तौर पर भारी मात्रा में बिना हिसाब का जला हुआ नकद बरामद हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच में उनकी सफाई संतोषजनक नहीं पाई गई थी। इसी के आधार पर संसद में उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया गया। लोकसभा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर जांच समिति बनाई, जबकि राज्यसभा ने प्रक्रिया में खामियों का हवाला देते हुए इसे मंजूरी नहीं दी थी। जज ने लगाए थे पक्षपात के आरोप जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे के दिन ही 13 पन्नों का एक पत्र भेजकर जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच शुरू से ही पक्षपातपूर्ण थी और उन्हें उचित मौका नहीं दिया गया। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए समिति की कार्यवाही को निष्पक्ष बताया। समिति ने केंद्र के जवाब को भी रिकॉर्ड में शामिल किया है। आगे क्या हो सकता है? हालांकि संसदीय जांच अब खत्म हो चुकी है, लेकिन इससे आपराधिक जांच की संभावना खत्म नहीं होती। अब जब जस्टिस वर्मा पद पर नहीं हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी। अगर जांच एजेंसियों को पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तो सामान्य कानून के तहत मामला आगे बढ़ सकता है।  

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