कोलकाता, एजेंसियां। 5 रायों में हुए चुनाव में बीजेपी को 3 राज्यों में प्रचंड जीत मिली है। इसमें पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं। 206 सीटें जीत कर बीजेपी बंगाल में सरकार बनाने जा रही है। पर बड़ा सावल यह है कि मुख्यमंत्री कौन होगा? क्योंकि, बंगाल में भाजपा ने बिना चेहरे के चुनाव लड़ा, इसलिए अब बड़ा सवाल यह है कि कौन मुख्यमंत्री होगा। संभावित नामों में सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष और समिक भट्टाचार्य का नाम सबसे आगे है। कयास यह भी लगाये जा रहे हैं कि पार्टी किसी महिला चेहरे को भी ला सकती है।
अमित शाह ने कहा था कि बंगाली बोलने वाला ही बंगाल में नया सीएम बनेगा। ऐसे में यहां मुख्यमंत्री के रूप में सुवेंदु अधिकारी प्रबल दावेदार हैं। हालांकि चर्चा सामिक भट्टाचार्य के नाम की भी है। हालांकि कई मौकों पर बीजेपी ने सीएम का नाम घोषित कर लोगों को चौंकाया भी है।
1. सुवेंदु अधिकारी
सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। वह टीएमसी के पूर्व नेता रह चुके हैं। उन्होंने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। बाद में वह बीजेपी में शामिल हो गए।
सुवेंदु की प्रदेश में जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ है। साथ ही उन्होंने चुनाव के दौरान ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती दी। इससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। उन्होंने मुख्यमंत्री को दो-दो बार हराने का रिकॉर्ड भी बनाया है।
2. सामिक भट्टाचार्य
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बीजेपी के वरिष्ठ नेता शामिक भट्टाचार्य के नाम की भी चर्चा है। उन्हें पार्टी के अंदर सर्वसम्मति स्थापित करने वाले नेता के रूप में देखा जाता है।
वह पार्टी के दूसरे नेताओं जितने चर्चित तो नहीं हैं, लेकिन उनका अनुभव और लोकप्रियता उन्हें मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे रखती है। वह पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष और राज्यसभा मेंबर भी हैं।
3. दिलीप घोष
मुख्यमंत्री पद के दौड़ में दिलीप घोष का नाम भी काफी आगे है। वह पश्चिम बंगाल के बेबाक नेता के रूप में जाने जाते हैं। कई मौकों पर उन्होंने ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा किया है।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी का विस्तार और आधार मजबूत करने में दिलीप घोष की अहम भूमिका रही है। उनका संगठनात्मक अनुभव और मजबूत वैचारिक स्थिति मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे रखती है।
वहीं यदि बीजेपी महिला नेत्रियों की ओर जाती है, तो कई ऐसे नाम हैं, जो इस रेस में शामिल कही जा सकती हैं।
अग्निमित्रा पॉल:
यह बंगाल बीजेपी का एक बेहद फायरब्रांड चेहरा हैं। फैशन डिजाइनर से नेता बनीं अग्निमित्रा पॉल ने बीजेपी महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काम किया है और अपनी आक्रामक छवि के लिए जानी जाती हैं। 2026 में, उन्हें मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में से एक माना जा रहा है।
फाल्गुनी पात्रा:
इन्हें बीजेपी महिला मोर्चा, पश्चिम बंगाल का प्रदेश अध्यक्ष फिर से नियुक्त किया गया है, जो पार्टी संगठन में उनकी मजबूत पकड़ और जमीनी स्तर पर महिलाओं को सशक्त बनाने की भूमिका को दर्शाता है।
लॉकेट चटर्जी:
अभिनेत्री से नेता बनीं लॉकेट चटर्जी बंगाल में बीजेपी का एक प्रमुख महिला चेहरा रही हैं। वह पहले भी महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। संदेशखाली प्रकरण के दौरान वह खूब चर्चा में रही थीं।
मौसमी विश्वास:
ये बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी में एक महत्वपूर्ण महिला नेता हैं।
मीना पुरोहित:
यह भी बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी का हिस्सा हैं।
बीजेपी जीत के बाद पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री किसे बनाएगी, इसका फैसला चौंकाने वाला भी हो सकता है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी ऐसा कर चुकी है। दिल्ली में रेखा गुप्ता को जब सीएम बनाया था, तो उनका नाम दूर-दूर तक नहीं था। ऐसा ही उदाहरण राजस्थान में भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दिया था। ऐसे में हो सकता है कि बीजेपी किसी ऐसे शख्स को मुख्यमंत्री बना दे जिसकी चर्चा अभी दूर-दूर तक नहीं है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
Tamil Nadu Government Formation: तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है. TVK प्रमुख विजय के मुख्यमंत्री पद की शपथ को लेकर बना सस्पेंस अभी खत्म नहीं हुआ है. राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा बहुमत साबित करने के लिए 118 विधायकों के समर्थन पत्र मांगे जाने के बाद विजय का प्रस्तावित शपथग्रहण फिलहाल टल गया है. TVK ने सौंपा 112 विधायकों का समर्थन पत्र सूत्रों के मुताबिक, TVK ने कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन सहित कुल 112 विधायकों का समर्थन पत्र राज्यपाल को सौंप दिया है. हालांकि सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है, इसलिए अभी भी TVK बहुमत के आंकड़े से पीछे है. विजय दो विधानसभा सीटों से चुनाव जीते हैं, जिसके कारण पार्टी की प्रभावी संख्या 107 मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि TVK फिलहाल VCK, PMK और वामपंथी दलों के साथ समर्थन को लेकर बातचीत कर रही है. राज्यपाल के रुख से बढ़ा राजनीतिक तनाव राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर के अतिरिक्त समर्थन पत्र मांगने के बाद राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी है और विजय को अनावश्यक रूप से बहुमत साबित करने के लिए दबाव में डाला जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, TVK ने अब इस पूरे मामले में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेने का फैसला किया है. विजय की प्रोटोकॉल सुरक्षा वापस सरकार गठन में देरी के बीच राज्य सरकार ने विजय को दी गयी प्रोटोकॉल कॉन्वॉय सुरक्षा वापस ले ली है. हालांकि उनकी बेसिक पायलट सुरक्षा अभी जारी रहेगी. इस फैसले के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गयी हैं. AIADMK में टूट का खतरा, विधायक पहुंचे रिसॉर्ट इसी बीच AIADMK के भीतर भी हलचल तेज हो गयी है. पार्टी ने अपने कई विधायकों को पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया है. सूत्रों का कहना है कि ये विधायक सीवी षणमुगम गुट से जुड़े हैं. अब तक 28 विधायक रिसॉर्ट पहुंच चुके हैं, जबकि कुल 32 विधायकों के वहां पहुंचने की संभावना जतायी जा रही है. पार्टी को आशंका है कि सरकार गठन के दौरान विधायकों में टूट-फूट हो सकती है. 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी TVK हालिया विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी TVK ने 108 सीटें जीतकर तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया. हालांकि पार्टी बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गयी. चुनाव परिणाम आने के बाद TVK विधायकों ने विजय को विधायक दल का नेता चुना था, जिसके बाद उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया. कांग्रेस पहले ही TVK को सशर्त समर्थन दे चुकी है, जबकि अन्य छोटे दलों और वामपंथी पार्टियों के भीतर अभी चर्चा जारी है. DMK की बैठक पर भी नजर आज DMK विधायक दल की बैठक भी होने जा रही है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के चयन और आगे की रणनीति पर चर्चा होगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं.
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। Indian National Congress ने लंबे समय से चले आ रहे अपने सहयोगी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) से गठबंधन तोड़ दिया है और अब Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) को समर्थन देने का ऐलान किया है। इस फैसले से राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है। विजय की पार्टी को मिला बड़ा समर्थन एक्टर से नेता बने Vijay की पार्टी TVK ने इस चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया है। सरकार गठन की प्रक्रिया के बीच कांग्रेस का समर्थन मिलने से TVK की स्थिति और मजबूत हो गई है। माना जा रहा है कि विजय अब सरकार बनाने के प्रमुख दावेदार बन गए हैं। कांग्रेस ने बताई गठबंधन की शर्त कांग्रेस ने साफ किया है कि TVK को दिया गया समर्थन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य के चुनाव—जैसे लोकसभा, राज्यसभा और स्थानीय निकाय चुनाव में भी यह गठबंधन जारी रह सकता है। हालांकि पार्टी ने यह शर्त रखी है कि इस गठबंधन में भाजपा या उसके किसी सहयोगी दल को शामिल नहीं किया जाएगा। केंद्र में बना रहेगा ‘INDIA’ गठबंधन दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु में DMK से अलग होने के बावजूद कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘INDIA’ गठबंधन में DMK के साथ उसके संबंध बने रह सकते हैं। यानी राज्य और केंद्र की राजनीति में अलग-अलग समीकरण देखने को मिल सकते हैं। बदले राजनीतिक समीकरण इस घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति को पूरी तरह से नई दिशा दे दी है। जहां पहले DMK-कांग्रेस गठबंधन मजबूत माना जाता था, वहीं अब TVK-कांग्रेस का नया समीकरण उभरकर सामने आया है।
नई दिल्ली: राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर ‘वोट चोरी’ का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अगर अभी निष्पक्ष तरीके से लोकसभा चुनाव कराए जाएं, तो BJP 140 सीटों से ज्यादा नहीं जीत पाएगी। उनके इस बयान के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। ‘हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता’ राहुल गांधी ने दावा किया कि BJP के मौजूदा 240 सांसदों में से “हर छठा सांसद” कथित रूप से वोट चोरी के जरिए जीतकर आया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि BJP की अपनी भाषा में ऐसे सांसदों को “घुसपैठिया” कहा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यही तर्क लागू किया जाए, तो हरियाणा की पूरी सरकार को भी “घुसपैठिया” कहा जा सकता है। ‘एक्स’ पर पोस्ट कर साधा निशाना राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “वोट चोरी से कभी सीटें चुराई जाती हैं, कभी पूरी सरकार।” उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में हेरफेर कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। चुनाव आयोग पर भी उठाए सवाल कांग्रेस नेता ने भारतीय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ संस्थाओं को “जेब में रखने” और चुनावी प्रक्रिया को “तोड़-मरोड़” कर परिणाम प्रभावित किए जा रहे हैं। असम और बंगाल के नतीजों के बाद बयान राहुल गांधी का यह बयान असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में BJP की जीत के बाद आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन राज्यों में भी चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। राजनीतिक माहौल गरम राहुल गांधी के इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। BJP की ओर से अभी इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो सकते हैं।