पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे के बाद अब राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बयान ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और अनुभवी सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की कार्यशैली, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हालात पर सवाल उठाते हुए ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर खुला विद्रोह माना जा रहा है। उनके बयानों के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। “असहनीय अराजकता का अंत हुआ” : सुखेंदु शेखर रॉय सुखेंदु शेखर रॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति की तुलना रोमन साम्राज्य के पतन से की। उन्होंने लिखा कि वर्ष 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या सीनेट में हुई थी, लेकिन बंगाल में जनता ने “असहनीय अराजकता” का अंत कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रॉय का यह बयान सीधे तौर पर टीएमसी शासन और पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। “भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा मिला, बुद्धिजीवियों को किनारे किया गया” एक अन्य पोस्ट में रॉय ने कहा कि जब भ्रष्ट लोग व्यवस्था पर हावी हो जाते हैं और बुद्धिमानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। उन्होंने स्वतंत्र विचारों और आंतरिक लोकतंत्र की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना और अलग राय को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। आरजी कर कांड को लेकर भी जताई नाराजगी सूत्रों के अनुसार, सुखेंदु शेखर रॉय इस बात से बेहद नाराज हैं कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में जनता के गुस्से को पार्टी सही तरीके से समझ नहीं पाई। रॉय का मानना है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के बाद सड़कों पर जो भारी जनआक्रोश दिखा, उसे पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि जब जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध कर रही थी, तब पार्टी के कुछ नेता उसे राजनीतिक साजिश बताने में लगे थे। उनके अनुसार, यही disconnect आगे चलकर चुनावी हार की बड़ी वजह बना। “पार्टी में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका” सुखेंदु शेखर रॉय ने निजी बातचीत में यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार अब “संस्थागत रूप” ले चुका है। उनका मानना है कि इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हुई और कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रॉय का इशारा पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं की तरफ है, जिन पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं सुखेंदु शेखर रॉय? सुखेंदु शेखर रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का बड़ा और अनुभवी चेहरा माने जाते हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने वाले रॉय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के करीबी रहे हैं और संवैधानिक मामलों के जानकार माने जाते हैं। संसद में वे लंबे समय तक टीएमसी के सबसे मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनका खुलकर असंतोष जताना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। टीएमसी में “पुराने बनाम नये” की लड़ाई तेज राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद टीएमसी में “पुराने बनाम नये नेतृत्व” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के पुराने नेता कथित तौर पर आई-पैक और नई रणनीतिक टीम की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार और अब सुखेंदु शेखर रॉय के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। क्या ममता बनर्जी करेंगी संगठन में बड़ा बदलाव? टीएमसी की हार के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द संगठनात्मक सुधार नहीं किए, तो असंतोष और बढ़ सकता है। सुखेंदु शेखर रॉय के बागी तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी बड़ा संघर्ष शुरू हो चुका है।
SIR Impact on Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हार और जीत के कारणों को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गयी है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के पीछे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में यह दावा किया जा रहा है कि जिन सीटों पर मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाये गये, वहां भाजपा को भारी फायदा मिला. मतदाता सूची में बड़े बदलाव और बदला चुनावी गणित चुनाव आयोग की ओर से चलायी गयी SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ा, जहां तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत माना जाता था. बताया जा रहा है कि बंगाल की 177 ऐसी विधानसभा सीटें थीं, जहां हटाये गये मतदाताओं की संख्या 2021 में टीएमसी की जीत के अंतर से अधिक थी. इन सीटों में से 140 से ज्यादा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गयी है कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया. 15 हजार से ज्यादा नाम हटे, कई मंत्री हारे विश्लेषण के मुताबिक, करीब 50 सीटों पर 15 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे. इन्हीं सीटों पर टीएमसी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा ने इन इलाकों में आक्रामक प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत रणनीति अपनायी, जिसका फायदा उसे चुनाव में मिला. SIR प्रक्रिया से कैसे बदला समीकरण? निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में डिजिटल वेरिफिकेशन, आधार लिंकिंग और रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया गया. इसके तहत मृत और पलायन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे कथित फर्जी मतदान की संभावना कम हुई और चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इसे टीएमसी के चुनावी नेटवर्क पर बड़ा झटका बताया. ममता बनर्जी ने पहले ही जतायी थी आशंका चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे. पार्टी का आरोप था कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाये जा रहे हैं. हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया था. अब चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गयी है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची की सफाई से वास्तविक जनमत सामने आया, जबकि टीएमसी इसे अपने वोट बैंक को कमजोर करने की रणनीति बता रही है. भाजपा को मिला बड़ा फायदा राज्य में भाजपा ने 207 सीटों तक पहुंचकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया, सत्ताविरोधी माहौल और बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ने भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिलहाल बंगाल की राजनीति में SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है.
हैदराबाद, एजेंसियां। सनराइजर्स हैदराबाद ने पंजाब किंग्स को 33 रन से हराकर IPL 2026 पॉइंट्स टेबल में टॉप स्थान हासिल कर लिया। वहीं, पंजाब को इस सीजन में लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद टीम पहले स्थान से खिसककर दूसरे नंबर पर पहुंच गई। राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में पंजाब ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। इसके बाद हैदराबाद ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 235 रन बनाए। जवाब में 236 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पंजाब की टीम 20 ओवर में 7 विकेट पर 202 रन ही बना सकी। हैदराबाद की ओर से 2 फिफ्टी लगी पहले बैटिंग करने उतरी हैदराबाद के लिए हेनरिक क्लासन और ईशान किशन ने अर्धशतक लगाए। क्लासन ने 43 बॉल पर 69 और ईशान ने 32 बॉल पर 55 रन बनाए। दोनों के बीच तीसरे विकेट के लिए 88 रन की साझेदारी हुई। क्लासन और नीतीश रेड्डी (29*) के बीच चौथे विकेट के लिए 63 रन की साझेदारी हुई। इसके अलावा अभिषेक शर्मा (35) और ट्रैविस हेड (38) ने 55 रन की ओपनिंग पार्टनरशिप की। पंजाब के लिए लॉकी फर्ग्यूसन, विजयकुमार वैशाख, युजवेंद्र चहल को 1-1 विकेट मिला। काम ना आया कोनोली का शतक पंजाब का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। टीम ने फील्डिंग के दौरान 3 कैच छोड़े, जबकि टारगेट का पीछा करते समय लगातार विकेट गंवाती रही। पंजाब के लिए कूपर कोनोली के अलावा कोई बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। कोनोली ने 59 बॉल पर नाबाद 107 रन बनाए। उनके अलावा मार्कस स्टोयनिस ने 28 और सूर्यांश शेडगे ने 25 रन का योगदान दिया। हैदराबाद के लिए पैट कमिंस और शिवांग कुमार ने 2-2 विकेट लिए। नीतीश रेड्डी, ईशान मलिंगा और साकिब हुसैन को 1-1 विकेट मिला। पैट कमिंस प्लेयर ऑफ द् मैच चुने गये।
West Bengal Election Violence 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राज्य में हिंसा का दौर लगातार जारी है. अलग-अलग जिलों से गोलीबारी, बमबाजी, हत्या और राजनीतिक हमलों की खबरें सामने आ रही हैं. मध्यमग्राम में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (PA) चंद्रनाथ रथ की हत्या ने पूरे राज्य की राजनीति में सनसनी फैला दी है. वहीं हावड़ा, कमरहट्टी, बशीरहाट और आसनसोल में भी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. मध्यमग्राम में शुभेंदु अधिकारी के PA चंद्रनाथ रथ की हत्या बुधवार रात करीब 11:15 बजे मध्यमग्राम में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ पर अंधाधुंध फायरिंग की गयी. हमलावरों ने उन्हें चार गोलियां मारीं, जिनमें तीन गोलियां उनके सीने में लगीं. गंभीर हालत में उन्हें वीवी सिटी हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. इस हमले में उनका ड्राइवर भी गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसका इलाज जारी है. हावड़ा के उलुबेड़िया में बमबाजी, 45 लोग गिरफ्तार हावड़ा जिले के उलुबेड़िया में बुधवार को हिंसा भड़क उठी. बीरशिवपुर इलाके में तृणमूल कांग्रेस कार्यालय में तोड़फोड़ के बाद दो गुटों के बीच जमकर बमबाजी हुई. इलाके में अफरा-तफरी मच गयी और बाजार बंद हो गये. इस दौरान पांच राहगीर घायल हो गये. उदयनारायणपुर में भाजपा कार्यकर्ता की हत्या की खबर सामने आयी, जबकि श्यामपुर में एक टीएमसी नेता के घर लूटपाट का आरोप लगा. पुलिस ने मामले में 45 लोगों को गिरफ्तार किया है. कमरहट्टी में भाजपा कार्यकर्ता के घर हमला उत्तर 24 परगना के कमरहट्टी में भाजपा कार्यकर्ता गोविंद झा के घर पर करीब 50 लोगों ने हमला कर दिया. आरोप है कि लाठी, डंडे और लोहे की रॉड से लैस हमलावरों ने घर का दरवाजा तोड़ दिया और परिवार के सदस्यों की पिटाई की. पीड़ित परिवार ने तृणमूल समर्थकों पर हमला करने का आरोप लगाया है. पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गयी है. बताया जा रहा है कि हमले के बाद परिवार दहशत में है. आसनसोल और पश्चिम बर्धमान में भी तनाव आसनसोल और पश्चिम बर्धमान जिले में भी चुनाव बाद हिंसा के आरोप लगे हैं. तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस आयुक्त डॉ. प्रणव कुमार से मुलाकात कर जिले में हिंसा, लूटपाट और पार्टी कार्यालयों पर कब्जे के आरोप लगाये. टीएमसी नेताओं का दावा है कि उनके कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की जा रही है और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं भी सामने आयी हैं. बशीरहाट में भाजपा कार्यकर्ता को गोली मारी उत्तर 24 परगना के बशीरहाट में भाजपा कार्यकर्ता रोहित राय को गोली मार दी गयी. घायल रोहित राय ने आरोप लगाया कि वह पार्टी का झंडा लगा रहा था, तभी तृणमूल समर्थक वहां पहुंचे और उस पर फायरिंग कर दी. गोली उसके पेट में लगी है और उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है. प्रशासन की अपील, लेकिन हालात तनावपूर्ण राज्य प्रशासन और पुलिस लगातार शांति बनाये रखने की अपील कर रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. भाजपा ने इन घटनाओं को लोकतंत्र पर हमला बताया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कई घटनाओं को स्थानीय विवाद और भाजपा की अंदरूनी लड़ाई करार दिया है. 9 मई को होने वाले शपथ ग्रहण से पहले बंगाल की राजनीतिक स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है.
कोलकाता, एजेंसियां। 5 रायों में हुए चुनाव में बीजेपी को 3 राज्यों में प्रचंड जीत मिली है। इसमें पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं। 206 सीटें जीत कर बीजेपी बंगाल में सरकार बनाने जा रही है। पर बड़ा सावल यह है कि मुख्यमंत्री कौन होगा? क्योंकि, बंगाल में भाजपा ने बिना चेहरे के चुनाव लड़ा, इसलिए अब बड़ा सवाल यह है कि कौन मुख्यमंत्री होगा। संभावित नामों में सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष और समिक भट्टाचार्य का नाम सबसे आगे है। कयास यह भी लगाये जा रहे हैं कि पार्टी किसी महिला चेहरे को भी ला सकती है। क्या कहा था अमित शाह ने अमित शाह ने कहा था कि बंगाली बोलने वाला ही बंगाल में नया सीएम बनेगा। ऐसे में यहां मुख्यमंत्री के रूप में सुवेंदु अधिकारी प्रबल दावेदार हैं। हालांकि चर्चा सामिक भट्टाचार्य के नाम की भी है। हालांकि कई मौकों पर बीजेपी ने सीएम का नाम घोषित कर लोगों को चौंकाया भी है। बीजेपी के सीएम फेस 1. सुवेंदु अधिकारी सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। वह टीएमसी के पूर्व नेता रह चुके हैं। उन्होंने ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। बाद में वह बीजेपी में शामिल हो गए। सुवेंदु की प्रदेश में जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ है। साथ ही उन्होंने चुनाव के दौरान ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती दी। इससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। उन्होंने मुख्यमंत्री को दो-दो बार हराने का रिकॉर्ड भी बनाया है। 2. सामिक भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बीजेपी के वरिष्ठ नेता शामिक भट्टाचार्य के नाम की भी चर्चा है। उन्हें पार्टी के अंदर सर्वसम्मति स्थापित करने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। वह पार्टी के दूसरे नेताओं जितने चर्चित तो नहीं हैं, लेकिन उनका अनुभव और लोकप्रियता उन्हें मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे रखती है। वह पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष और राज्यसभा मेंबर भी हैं। 3. दिलीप घोष मुख्यमंत्री पद के दौड़ में दिलीप घोष का नाम भी काफी आगे है। वह पश्चिम बंगाल के बेबाक नेता के रूप में जाने जाते हैं। कई मौकों पर उन्होंने ममता बनर्जी को कटघरे में खड़ा किया है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी का विस्तार और आधार मजबूत करने में दिलीप घोष की अहम भूमिका रही है। उनका संगठनात्मक अनुभव और मजबूत वैचारिक स्थिति मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे रखती है। कई महिला नेत्रियां भी रेस मेः वहीं यदि बीजेपी महिला नेत्रियों की ओर जाती है, तो कई ऐसे नाम हैं, जो इस रेस में शामिल कही जा सकती हैं। अग्निमित्रा पॉल: यह बंगाल बीजेपी का एक बेहद फायरब्रांड चेहरा हैं। फैशन डिजाइनर से नेता बनीं अग्निमित्रा पॉल ने बीजेपी महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काम किया है और अपनी आक्रामक छवि के लिए जानी जाती हैं। 2026 में, उन्हें मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में से एक माना जा रहा है। फाल्गुनी पात्रा: इन्हें बीजेपी महिला मोर्चा, पश्चिम बंगाल का प्रदेश अध्यक्ष फिर से नियुक्त किया गया है, जो पार्टी संगठन में उनकी मजबूत पकड़ और जमीनी स्तर पर महिलाओं को सशक्त बनाने की भूमिका को दर्शाता है। लॉकेट चटर्जी: अभिनेत्री से नेता बनीं लॉकेट चटर्जी बंगाल में बीजेपी का एक प्रमुख महिला चेहरा रही हैं। वह पहले भी महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। संदेशखाली प्रकरण के दौरान वह खूब चर्चा में रही थीं। मौसमी विश्वास: ये बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी में एक महत्वपूर्ण महिला नेता हैं। मीना पुरोहित: यह भी बीजेपी की राज्य कार्यकारिणी का हिस्सा हैं। क्या फिर से चौंकाएगी बीजेपी? बीजेपी जीत के बाद पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री किसे बनाएगी, इसका फैसला चौंकाने वाला भी हो सकता है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी ऐसा कर चुकी है। दिल्ली में रेखा गुप्ता को जब सीएम बनाया था, तो उनका नाम दूर-दूर तक नहीं था। ऐसा ही उदाहरण राजस्थान में भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दिया था। ऐसे में हो सकता है कि बीजेपी किसी ऐसे शख्स को मुख्यमंत्री बना दे जिसकी चर्चा अभी दूर-दूर तक नहीं है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में मई 2026 का यह हफ्ता एक युगांतकारी मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले हैं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा को भी एक नई परिभाषा दी है। पूर्व से दक्षिण तक चली 'प्रो-इंकंबेंसी' और 'परिवर्तन' की लहर ने कई मिथकों को तोड़ दिया है। इस महा-संग्राम का सबसे बड़ा केंद्र रहा पश्चिम बंगाल, जहां 15 साल के ममता बनर्जी के शासन का सूर्यास्त हो गया है। वहीं, दक्षिण में तमिलनाडु ने एक नए सुपरस्टार राजनेता के उदय के साथ इतिहास रचा है, तो केरल में वामपंथ का आखिरी किला भी ढह गया है। बंगाल: 'दीदी' की विदाई और भाजपा का ऐतिहासिक उदय पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम सबसे चौंकाने वाले और ऐतिहासिक रहे। साल 2011 में वामपंथ को उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी को खुद 'परिवर्तन' के उसी नारे का सामना करना पड़ा। सत्ता परिवर्तन: भ्रष्टाचार के आरोपों, संदेशखाली जैसी घटनाओं और एंटी-इंकंबेंसी ने टीएमसी के 'मां, माटी, मानुष' के किले में सेंध लगा दी। भाजपा ने भारी बहुमत के साथ राज्य में पहली बार सत्ता हासिल की है। रणनीति की जीत भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के 'बूथ चलो' अभियान ने ग्रामीण बंगाल में टीएमसी के वर्चस्व को चुनौती दी। महिलाओं के साइलेंट वोटर टर्नआउट ने इस जीत में निर्णायक भूमिका निभाई। इनका सूपड़ा साफ कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन एक बार फिर शून्य पर सिमट गया, जिससे मुकाबला पूरी तरह से द्विध्रुवीय हो गया। तमिलनाडु: थलपति विजय का 'धमाका' दक्षिण भारत की राजनीति हमेशा से फिल्मी सितारों और द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन, 2026 में एक्टर विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) ने जो कर दिखाया, उसने स्थापित दिग्गजों—डीएमके और एआईएडीएमके—की नींद उड़ा दी। तीसरा विकल्प विजय ने न केवल युवाओं के वोट बटोरे, बल्कि एक विश्वसनीय तीसरे विकल्प के रूप में खुद को स्थापित किया। उनकी पार्टी ने दोहरे अंकों में सीटें जीतकर राज्य की राजनीति को त्रिकोणीय बना दिया है। द्रविड़ राजनीति में बदलाव हालांकि डीएमके ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन विजय के उदय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु का युवा अब पारंपरिक राजनीति से आगे देखना चाहता है। वामपंथ का अंत: केरल में लाल किला ध्वस्त इस चुनाव की सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक है भारत से वामपंथ का पूरी तरह सफाया। केरल, जो दशकों से एलडीएफ और यूडीएफ के बीच झूलता रहा था, वहां इस बार जनता ने एक अलग रास्ता चुना। केरल में कांग्रेस की वापसी शुरुआती रुझानों और नतीजों के अनुसार, केरल में कांग्रेस नीत गठबंधन ने शानदार वापसी की है। वामपंथ सूपड़ा साफ त्रिपुरा और बंगाल के बाद अब केरल से भी वामपंथी सरकार की विदाई ने भारतीय राजनीति में 'कम्युनिज्म' के भविष्य पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है। असम में भाजपा की हैट्रिक और JMM का प्रवेश असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता का स्वाद चखा है। विकास बनाम विरासत भाजपा के विकास कार्ड और घुसपैठ के खिलाफ सख्त रुख ने मतदाताओं को एकजुट किया। JMM का प्रदर्शन दिलचस्प बात यह रही कि झारखंड की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने भी असम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मजबात और डिगबोई जैसी सीटों पर JMM के उम्मीदवारों ने दूसरे स्थान पर रहकर सबको हैरान कर दिया, जिससे पता चलता है कि चाय बागान क्षेत्रों में पार्टी का प्रभाव बढ़ रहा है। क्या कहते हैं ये नतीजे? इन पांच राज्यों के नतीजों ने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के 'अजेय' होने के नैरेटिव को और मजबूत किया है। बंगाल जैसी बड़ी जीत 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ है। क्षेत्रीय क्षत्रपों का कमजोर होना ममता बनर्जी की हार ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय पहचान और करिश्मा तब तक ही काम करता है, जब तक सुशासन और पारदर्शिता बनी रहे। टीएमसी का यह पतन अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक चेतावनी है। 'न्यू इंडिया' का नया वोट बैंक इन चुनावों ने दिखाया है कि अब जाति और धर्म के साथ-साथ 'लाभार्थी वर्ग' (Beneficiary Class) एक नया वोट बैंक बन चुका है। मुफ्त राशन, आवास योजना और महिला सशक्तिकरण की योजनाओं ने भाषा और भूगोल की सीमाओं को पार कर भाजपा को जीत दिलाई है। पुराने ढर्रे की राजनीति अब नहीं चलेगी 2026 के ये चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति के "री-एलाइनमेंट" (पुनर्गठन) का संकेत हैं। जहां एक ओर भाजपा अपने वैचारिक और सांगठनिक विस्तार के चरम पर है, वहीं विपक्ष को अब नए चेहरों और नई विचारधारा के साथ खुद को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। एक्टर विजय का तमिलनाडु में उदय और केरल से वामपंथ की विदाई बताती है कि भारत की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है और स्पष्ट परिणाम चाहती है।अगला पड़ाव अब दिल्ली है, लेकिन आज की जीत का जश्न कोलकाता से लेकर गुवाहाटी तक गूंज रहा है।
कोलकाता, एजेंसियां। बंगाल की 293 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। एक सीट (फालता) पर 21 मई को फिर से चुनाव होगा। शुरुआती रुझान में भाजपा 105 और टीएमसी 125 सीटों पर आगे चल रही है। झाड़ग्राम में भाजपा चारों सीटों पर आगे चल रही है। झाड़ग्राम इस चुनाव में काफी चर्चा में रहा। पीएम मोदी ने यहां एक दुकान पर रुककर झालमुड़ी खाई थी। भवानीपुर में ममता आगे भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी आगे हैं। नंदीग्राम से सुवेंदु बनर्जी को बढ़त है। राज्य में ममता बनर्जी 15 साल से सत्ता में हैं। वहीं आरजी कर रेप विक्टिम की मां रत्ना देबनाथ को बढ़त है।
पश्चिम बंगाल के Asansol में विधानसभा चुनाव के बीच एक दर्दनाक हादसा सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सभा खत्म होने के तुरंत बाद एक बेकाबू बस भीड़ में घुस गई, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। इस घटना में एक मासूम बच्ची समेत करीब 12 लोग घायल हो गए, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। सभा खत्म होते ही हुआ हादसा घटना Railpar इलाके की है, जहां तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उम्मीदवार Malay Ghatak के समर्थन में एक बड़ी चुनावी सभा आयोजित की गई थी। सभा समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में लोग बाहर निकल रहे थे, तभी अचानक तेज रफ्तार से आ रही एक बस भीड़ की तरफ मुड़ गई और कई लोगों को कुचलते हुए आगे बढ़ गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला और कुछ ही सेकंड में पूरा माहौल चीख-पुकार और भगदड़ में बदल गया। कैसे बेकाबू हुई बस? स्थानीय लोगों के अनुसार: बस चालक ने अचानक वाहन पर नियंत्रण खो दिया बस कब्रिस्तान की दीवार तोड़ते हुए सड़क किनारे जा घुसी इस दौरान कई दुकानों, ऑटो और टोटो को जोरदार टक्कर मारी बताया जा रहा है कि बस की रफ्तार काफी तेज थी, जिससे नुकसान और ज्यादा बढ़ गया। चालक पर लगे गंभीर आरोप हादसे के बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा देखा गया। लोगों का आरोप है कि: बस पर “पश्चिम बंगाल पुलिस” लिखा हुआ था वाहन चला रहा व्यक्ति Central Industrial Security Force (CISF) का जवान था वह कथित तौर पर नशे की हालत में था हालांकि पुलिस ने अभी इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। चालक को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया है और उससे पूछताछ जारी है। घायलों की हालत गंभीर इस हादसे में घायल हुए लोगों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। घायलों में एक 7 साल की बच्ची भी शामिल है कई लोगों की हालत नाजुक बताई जा रही है डॉक्टरों की टीम लगातार इलाज में जुटी है कुछ घायलों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर करने की भी तैयारी की जा रही है। घटना के बाद बवाल और विरोध हादसे के बाद इलाके में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा: भीड़ ने बस में तोड़फोड़ की सड़क जाम कर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया कुछ समय के लिए स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई हालात को काबू में करने के लिए भारी संख्या में पुलिस और केंद्रीय बलों को मौके पर तैनात किया गया। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। मौके पर पहुंचे नेता, की शांति की अपील घटना की सूचना मिलते ही Malay Ghatak मौके पर पहुंचे और घायलों का हाल जाना। उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की और भरोसा दिलाया कि सभी घायलों को बेहतर इलाज मुहैया कराया जाएगा। जांच जारी, कई सवाल बरकरार पुलिस ने इस मामले में जांच शुरू कर दी है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि: हादसा महज लापरवाही का नतीजा था या इसके पीछे कोई साजिश थी साथ ही, यह भी जांच का विषय है कि बस किसकी थी और उसे उस समय वहां क्यों चलाया जा रहा था। चुनावी सुरक्षा पर उठे सवाल चुनावी माहौल के बीच हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतनी बड़ी सभा के बाद भीड़ नियंत्रण और यातायात व्यवस्था में चूक साफ नजर आई, जो भविष्य के लिए एक चेतावनी है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हाई-प्रोफाइल सीट भवानीपुर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद वोटरों की संख्या में भारी कमी ने टीएमसी की चिंता बढ़ा दी है, जबकि भाजपा इस स्थिति को अपने पक्ष में मान रही है। भवानीपुर में घटे हजारों वोटर रिपोर्ट्स के मुताबिक, भवानीपुर सीट पर करीब 51,000 वोटर कम हुए यह कुल मतदाताओं का लगभग 25% हिस्सा है SIR से पहले यहां करीब 2.06 लाख वोटर थे कैसे घटे वोट? पहला चरण: मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट आदि आधार पर 44,000+ नाम हटाए गए दूसरा चरण: 2,300 से ज्यादा नाम और हटाए गए सिर्फ 18 नए वोटर जोड़े गए जांच प्रक्रिया: 14,000+ नाम जांच में गए 10,000+ बहाल, लेकिन 3,875 नाम स्थायी रूप से हटे वोटबैंक पर असर का डर हटाए गए वोटरों में: 23% मुस्लिम 77% गैर-मुस्लिम भवानीपुर में मुस्लिम वोटर TMC का पारंपरिक आधार रहे हैं ऐसे में वोट कटने से ममता बनर्जी की स्थिति कमजोर पड़ सकती है भाजपा vs टीएमसी: बढ़ी सियासी टक्कर भाजपा ने भवानीपुर को “गेम चेंजर सीट” बताया गृह मंत्री अमित शाह ने यहां रोड शो कर माहौल बनाया BJP का दावा: भवानीपुर जीतते ही बंगाल में सत्ता परिवर्तन संभव TMC का गुस्सा और एक्शन TMC ने चुनाव आयोग से शिकायत की ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट जाने के संकेत दिए पार्टी का आरोप-SIR के जरिए वोटबैंक को टारगेट किया गया मुस्लिम वोट पर सियासी नजर बंगाल में करीब 30% मुस्लिम आबादी मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में असर AIMIM जैसे दलों की एंट्री से वोट बंटने की आशंका क्यों अहम है भवानीपुर सीट? 2021 उपचुनाव में ममता बनर्जी ने यहां से 85,000 वोटों से जीत दर्ज की थी भाजपा को मिले थे 26,000 वोट इस बार वोटरों की संख्या घटने से चुनाव का समीकरण बदल सकता है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कोलकाता दौरे के दौरान ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने भी जोरदार जवाब दिया। कालीघाट से शुरू हुआ सियासी वार कोलकाता के कालीघाट मंदिर में पूजा के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने बंगाल की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी योजनाओं पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि: मिड-डे मील और किताबों के लिए आए केंद्रीय फंड का दुरुपयोग हुआ शिक्षा व्यवस्था “पूरी तरह बर्बाद” हो चुकी है शिक्षक भर्ती प्रक्रिया भ्रष्टाचार से प्रभावित है “45 साल में बर्बाद हुई विरासत” प्रधान ने कहा कि स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान हस्तियों की शैक्षणिक विरासत को पिछले दशकों में नुकसान पहुंचा है। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार स्वपन दासगुप्ता के समर्थन में भी प्रचार किया। घुसपैठ और वोटर लिस्ट पर सवाल धर्मेंद्र प्रधान ने चुनावी मुद्दों को उठाते हुए कहा: वोटर लिस्ट में “घुसपैठियों” की भूमिका पर सवाल युवाओं को रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा भाजपा की प्राथमिकता TMC का पलटवार प्रधान के आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस ने सख्त प्रतिक्रिया दी: केंद्र सरकार पर 2 लाख करोड़ रुपये रोकने का आरोप लगाया इसे बंगाल के विकास में बाधा बताया आरोपों को पूरी तरह राजनीतिक करार दिया चुनावी शेड्यूल कुल सीटें: 294 मतदान: 23 और 29 अप्रैल (दो चरणों में) नतीजे: 4 मई क्या कहता है राजनीतिक समीकरण? बंगाल में यह चुनाव सीधे तौर पर भाजपा और TMC के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है। जहां एक ओर केंद्र सरकार राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के आरोप लगा रही है, वहीं TMC केंद्र पर फंड रोकने का आरोप लगाकर जवाबी रणनीति अपना रही है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए कांग्रेस ने पहले चरण के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। इस सूची में पार्टी के शीर्ष राष्ट्रीय नेता शामिल हैं, जो राज्य में व्यापक चुनाव प्रचार करेंगे। चेहरे जो करेंगे प्रचार कांग्रेस की स्टार लिस्ट में शामिल प्रमुख नाम: सोनिया गांधी राहुल गांधी प्रियंका गांधी वाड्रा मल्लिकार्जुन खरगे (कांग्रेस अध्यक्ष) सुखविंदर सिंह सुक्खू (हिमाचल CM) इसके अलावा कई दिग्गज नेता भी मैदान में उतरेंगे: के.सी. वेणुगोपाल शशि थरूर अशोक गहलोत सलमान खुर्शीद रणदीप सुरजेवाला कन्हैया कुमार मोहम्मद अजहरुद्दीन बंगाल के स्थानीय नेताओं को भी अहम भूमिका राज्य कांग्रेस के नेता भी प्रचार में सक्रिय रहेंगे: अधीर रंजन चौधरी दीपा दासमुंशी प्रदीप भट्टाचार्य शुभंकर सरकार (प्रदेश अध्यक्ष) ईशा खान चौधरी चुनाव की तारीखें पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल मतगणना: 4 मई कुल सीटें: 294 कांग्रेस की रणनीति कांग्रेस नेता के मुताबिक: इस बार पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ रही है लक्ष्य है कि पहले चरण में सभी सीटों पर सीधे मतदाताओं तक पहुंच बनाई जाए राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी से पार्टी मजबूत मुकाबले की कोशिश में है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 राज्य की राजनीति के लिए निर्णायक माना जा रहा है। 294 सीटों पर होने वाला यह चुनाव मुख्य रूप से TMC बनाम BJP की सीधी टक्कर बन चुका है। चुनाव शेड्यूल (2 चरण) पहला चरण: 23 अप्रैल 2026 (152 सीटें) दूसरा चरण: 29 अप्रैल 2026 (142 सीटें) मतगणना: 4 मई 2026 प्रक्रिया पूरी: 6 मई 2026 294 सीटों का गणित कुल सीटें: 294 बहुमत का आंकड़ा: 148 सीटें SC सीटें: 68 ST सीटें: 16 सामान्य सीटें: 210 SC आबादी (~23.5%) लगभग 127 सीटों पर असर डालती है क्षेत्रीय समीकरण (Game Changer) उत्तर बंगाल (54 सीटें): निर्णायक भूमिका दार्जिलिंग: गोरखा पहचान मुद्दा जलपाईगुड़ी/अलीपुरदुआर: चाय बागान + आदिवासी वोट मालदा-मुर्शिदाबाद: मुस्लिम बहुल दिनाजपुर: कृषि आधारित क्षेत्र मुख्य मुकाबला TMC (ममता बनर्जी) नारा: “बंगाल बचाओ” फोकस: महिला योजनाएं (लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री) मजबूत संगठन + “बंगाल की बेटी” छवि BJP नारा: “परिवर्तन, सोनार बांग्ला” मुद्दे: भ्रष्टाचार, हिंसा, CAA-NRC चेहरा: मोदी-शाह + शुभेंदु अधिकारी अन्य खिलाड़ी कांग्रेस: अकेले चुनाव वाम मोर्चा + ISF: सीमित प्रभाव लेकिन ये वोट कटवा फैक्टर बन सकते हैं वोटर प्रोफाइल कुल मतदाता: ~7.4 करोड़ पुरुष: 3.60 करोड़ महिला: 3.44 करोड़ पहली बार वोटर: 5.23 लाख 20–29 आयु वर्ग: 1.31 करोड़ चुनाव के बड़े मुद्दे बेरोजगारी और विकास राजनीतिक हिंसा पहचान की राजनीति (CAA/NRC) किसान और ग्रामीण संकट केंद्र vs राज्य टकराव 2021 vs अब (पॉलिटिकल बैकग्राउंड) TMC: 215 सीटें (48%) BJP: 77 सीटें (38%) TMC अभी मजबूत स्थिति में, लेकिन BJP चुनौती दे रही निर्णायक फैक्टर SC/ST वोट (खासकर मतुआ, नमशूद्र) उत्तर बंगाल की सीटें मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण शहरी मध्यम वर्ग का रुख चुनावी हिंसा पर नियंत्रण
कोलकाता,एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूची को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। गुरुवार सुबह पुराने मालदा ब्लॉक के मंगलबाड़ी इलाके में लोगों ने फिर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वैध दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इसी मुद्दे पर नाराज लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-12 (NH-12) को एक बार फिर जाम कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने टायरों में आग लगाई और बांस लगाकर सड़क अवरुद्ध कर दी। स्थिति को देखते हुए इलाके में भारी पुलिस बल और केंद्रीय अर्धसैनिक बल (CAPF) की तैनाती की गई है। मालदा पुलिस, स्थानीय प्रशासन और खुफिया शाखा को अलर्ट पर रखा गया है। मालदा-मोथाबारी राज्य राजमार्ग और NH-12 के कई हिस्सों पर सुरक्षा चौकियां स्थापित की गई हैं। बुधवार को कालियाचक में हुए बवाल यह विरोध प्रदर्शन बुधवार को कालियाचक में हुए बवाल के बाद और तेज हो गया। बुधवार को भी लोगों ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया था। उस दौरान सात न्यायिक अधिकारियों को भी प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया था और करीब नौ घंटे तक बंधक बनाए रखा। बाद में जिला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में भारी पुलिस बल ने मौके पर पहुंचकर अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने इस गंभीर घटना पर पश्चिम बंगाल पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने खासतौर पर उन मामलों पर चिंता जताई है, जिनमें मतदाताओं को “तार्किक विसंगति” श्रेणी में रखकर उनके नाम सूची से हटाए गए। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया है, खासकर ऐसे समय में जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मालदा जिले के बैष्णवनगर में चुनावी रैली करने वाली हैं। अब यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप भी लेता दिख रहा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राजनीति में एक बड़ा और दिलचस्प मोड़ देखने को मिला है। भारत के दिग्गज टेनिस खिलाड़ी Leander Paes ने औपचारिक रूप से Bharatiya Janata Party (BJP) का दामन थाम लिया है। उनकी एंट्री ऐसे समय पर हुई है जब राज्य में चुनावी माहौल तेजी से गरमा रहा है और सभी पार्टियां अपने-अपने स्तर पर रणनीति को धार दे रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुआ औपचारिक स्वागत Leander Paes को पार्टी में शामिल करने के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju और भाजपा नेता Sukanta Majumdar मौजूद रहे। Kiren Rijiju ने पेस की उपलब्धियों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर पहचान दिलाई और अब वे राजनीति के जरिए देश की सेवा करेंगे। “अब देश और युवाओं की सेवा का समय” BJP में शामिल होने के बाद Leander Paes ने भावुक अंदाज में कहा कि उन्होंने पिछले 40 वर्षों में खेल के जरिए देश का प्रतिनिधित्व किया है और अब वे युवाओं और देश की सेवा के लिए राजनीति में कदम रख रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi, गृह मंत्री Amit Shah और पार्टी नेतृत्व का आभार भी जताया। खेल से राजनीति तक का सफर Leander Paes भारत के सबसे सफल टेनिस खिलाड़ियों में से एक रहे हैं: 1996 बार्सिलोना ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल डेविस कप और ग्रैंड स्लैम में शानदार प्रदर्शन विंबलडन समेत कई अंतरराष्ट्रीय खिताब उनकी लोकप्रियता और पहचान को देखते हुए BJP को उम्मीद है कि यह कदम खासकर युवाओं और शहरी वोटर्स के बीच असर डाल सकता है। चुनावी समीकरण पर क्या असर? Leander Paes की एंट्री को BJP के लिए एक “स्टार पावर” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे पार्टी की छवि को मजबूती मिल सकती है युवा मतदाताओं को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बन सकता है हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी लोकप्रियता वोट में कितनी तब्दील होती है। निष्कर्ष पश्चिम बंगाल की राजनीति में Leander Paes की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है। खेल के मैदान से राजनीति के मैदान तक उनका यह सफर BJP के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा, इसका जवाब आने वाले चुनावी नतीजे ही देंगे।
आगामी West Bengal Legislative Assembly Election को लेकर Bharatiya Janata Party ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में राज्य की आधे से अधिक सीटों पर उम्मीदवारों के नाम लगभग तय कर लिए गए हैं और पहली सूची जल्द जारी की जा सकती है। बताया जा रहा है कि करीब 160 सीटों के उम्मीदवारों के नाम तय किए जा चुके हैं। संभावना है कि कोलकाता में प्रधानमंत्री Narendra Modi की बड़ी रैली के बाद पार्टी आधिकारिक तौर पर अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी कर दे। कई बड़े नेताओं को मिल सकता है टिकट सूत्रों के अनुसार पहली सूची में राज्य बीजेपी के कई प्रमुख नेताओं के नाम शामिल होंगे। इनमें विधानसभा में विपक्ष के नेता Suvendu Adhikari और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष Dilip Ghosh जैसे बड़े चेहरे शामिल हो सकते हैं। पार्टी कुछ पूर्व सांसदों को भी विधानसभा चुनाव में उतारने की योजना बना रही है। हालांकि इस बार रणनीति के तहत मौजूदा सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने से परहेज किया गया है। उम्मीदवार चयन में लिया गया जमीनी फीडबैक पार्टी नेताओं के मुताबिक इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा सावधानी से की गई है। करीब एक महीने से चल रही इस प्रक्रिया के दौरान जमीनी स्तर से फीडबैक लिया गया और विभिन्न सर्वेक्षणों के जरिए संभावित उम्मीदवारों की लोकप्रियता का आकलन किया गया। उम्मीदवार तय करते समय संगठन के प्रति निष्ठा, अनुशासन और जीतने की क्षमता को प्रमुख मानदंड बनाया गया है। जमीनी नेताओं पर दांव सूत्रों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण में स्थानीय और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को भी ध्यान में रखा गया है। पार्टी ने यह भी तय किया है कि इस बार दलबदल कर आए नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा। पिछले चुनाव की तुलना में इस रणनीति में बदलाव किया गया है। इसके अलावा बीजेपी ने इस बार फिल्म या टीवी इंडस्ट्री के चर्चित चेहरों को टिकट देने से भी परहेज किया है और उनकी जगह जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से जुड़े नेताओं पर भरोसा जताया है। बाकी सीटों पर जल्द होगा फैसला पार्टी सूत्रों के अनुसार शेष सीटों के उम्मीदवारों के चयन के लिए केंद्रीय चुनाव समिति की एक और बैठक जल्द बुलाई जा सकती है। इसके बाद बाकी सीटों की सूची भी जारी की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बीजेपी पश्चिम बंगाल में संगठन आधारित चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है, जिसमें स्थानीय नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क को प्राथमिकता दी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।