Infosys Chairman on AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव और इसके कारण नौकरियों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी बीच इंफोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने AI से जुड़ी आशंकाओं पर स्पष्ट और मजबूत राय रखी है। उनका कहना है कि AI पारंपरिक आईटी कंपनियों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमता और उत्पादकता को कई गुना बढ़ाने का काम करेगा। AI से नहीं खत्म होंगी आईटी कंपनियां इंफोसिस की 45वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में बोलते हुए नंदन नीलेकणि ने कहा कि जेनरेटिव AI के आने से पारंपरिक आईटी सर्विसेज मॉडल खत्म होने की बात सही नहीं है। उन्होंने कहा कि: "AI हमारी जैसी कंपनियों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन संगठनों की ताकत बढ़ाएगा जो तेजी से बदलाव के साथ खुद को ढालते हैं और स्पष्ट लक्ष्य के साथ आगे बढ़ते हैं।" नीलेकणि के अनुसार, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल कोड लिखने तक सीमित नहीं है। इसमें डोमेन नॉलेज, सुरक्षा, टेस्टिंग, सिस्टम डिजाइन और आर्किटेक्चर जैसी कई महत्वपूर्ण विशेषज्ञताएं शामिल होती हैं, जिन्हें केवल AI के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ऑटोमेशन के बीच क्यों बढ़ा है डर? दुनियाभर में यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि AI और ऑटोमेशन के कारण कोडिंग, आउटसोर्सिंग और पारंपरिक आईटी सेवाओं की मांग घट सकती है। खासकर भारत के 300 अरब डॉलर से अधिक के तकनीकी उद्योग के लिए यह चिंता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, नंदन नीलेकणि का मानना है कि AI खतरा नहीं बल्कि अवसर है। पुराने सिस्टम को आधुनिक बनाने में मदद कर रहा AI इंफोसिस चेयरमैन ने बताया कि AI की मदद से कंपनियां अपने दशकों पुराने टेक्नोलॉजी सिस्टम को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। उनके मुताबिक, आने वाले समय में सबसे बड़ा अवसर AI मॉडल और एजेंट्स को कंपनियों के महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने में होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इंफोसिस अपने शीर्ष 200 ग्राहकों में से लगभग 90 प्रतिशत के साथ AI आधारित प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। 2030 तक 400 बिलियन डॉलर का हो सकता है बाजार इंफोसिस ने हाल ही में अपना AI-First Value Framework लॉन्च किया है। कंपनी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक AI-फर्स्ट सर्विसेज का वैश्विक बाजार 300 से 400 बिलियन डॉलर के बीच पहुंच सकता है। नंदन नीलेकणि के बयान से यह संकेत मिलता है कि इंफोसिस AI को चुनौती नहीं, बल्कि भविष्य के विकास का सबसे बड़ा अवसर मान रही है।
नई दिल्ली/सैन फ्रांसिस्को: अमेरिकी रियल एस्टेट टेक्नोलॉजी कंपनी Opendoor ने भारत में अपना परिचालन बंद करने का फैसला किया है। इस निर्णय से कंपनी के लगभग 250 कर्मचारी प्रभावित होंगे। कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी नई कारोबारी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत परिचालन संबंधी कार्यों को अमेरिकी बाजार के करीब लाया जा रहा है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। 'Opendoor 2.0' रणनीति के तहत लिया गया फैसला कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी काज नेजातियान ने कर्मचारियों को भेजे गए संदेश में बताया कि भारत में संचालन बंद करने का निर्णय प्रदर्शन से जुड़ा नहीं है। उन्होंने कहा कि कंपनी अपने परिचालन मॉडल को पुनर्गठित कर रही है, ताकि ग्राहकों को अधिक प्रभावी और तेज सेवाएं प्रदान की जा सकें। नेजातियान के अनुसार, Opendoor 2.0 रणनीति के तहत कई भूमिकाओं को अमेरिका स्थानांतरित किया जा रहा है, जहां ग्राहक आधार मौजूद है। इससे टीमों और ग्राहकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। AI के बढ़ते इस्तेमाल से बदला परिचालन मॉडल कंपनी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी क्षमताओं में तेजी से वृद्धि हुई है। AI-सक्षम टीमों और स्वचालित प्रणालियों के इस्तेमाल से कई ऐसे कार्य अब कम मानव संसाधन में पूरे किए जा सकते हैं, जिनके लिए पहले बड़ी परिचालन टीमों की आवश्यकता होती थी। Opendoor का कहना है कि मैन्युअल प्रक्रियाओं पर निर्भरता कम करने और परिचालन को अधिक कुशल बनाने के लिए AI तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है। भारतीय कर्मचारियों के योगदान की सराहना सीईओ काज नेजातियान ने भारत में कार्यरत कर्मचारियों के योगदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय टीम ने कंपनी की वृद्धि और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय कर्मचारियों की क्षमता या प्रदर्शन को लेकर नहीं है, बल्कि बदलती व्यावसायिक जरूरतों और परिचालन संरचना का परिणाम है। उन्होंने प्रभावित कर्मचारियों को प्रतिभाशाली पेशेवर बताते हुए उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। प्रभावित कर्मचारियों को मिलेगा सहायता पैकेज कंपनी ने आश्वासन दिया है कि प्रभावित कर्मचारियों को सेवरेंस पैकेज (Severance Package), करियर ट्रांजिशन सपोर्ट और अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा, कुछ कर्मचारियों को महत्वपूर्ण परियोजनाओं और कार्यभार के सुचारू हस्तांतरण तक अस्थायी रूप से कंपनी में बनाए रखा जाएगा। परिचालन में बदलाव, लेकिन रणनीति बरकरार Opendoor ने स्पष्ट किया है कि भारत में परिचालन बंद करने के बावजूद उसकी समग्र कारोबारी रणनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। कंपनी का फोकस परिचालन को सरल बनाना, तकनीकी प्लेटफॉर्म को मजबूत करना और AI आधारित समाधानों के माध्यम से दक्षता बढ़ाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक टेक उद्योग में बढ़ते AI उपयोग और लागत अनुकूलन की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसके तहत कंपनियां पारंपरिक परिचालन मॉडल को तेजी से बदल रही हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल आजकल तेजी से हो रहा है और इसका असर अब लगभग हर सेक्टर में दिखाई देने लगा है। टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, एजुकेशन, बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में AI आधारित टूल्स के बढ़ते उपयोग ने नौकरी के भविष्य को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है। समय और लागत दोनों कम करने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि AI सिर्फ काम करने के तरीके को नहीं बदल रहा, बल्कि कई पारंपरिक नौकरियों की प्रकृति को भी प्रभावित कर रहा है। कंपनियां अब ऑटोमेशन और AI टूल्स का इस्तेमाल कर समय और लागत दोनों कम करने की कोशिश कर रही हैं। किन नौकरियों पर पड़ सकता है ज्यादा असर? रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों के अनुसार, डेटा एंट्री, बेसिक कस्टमर सपोर्ट, रिपिटेटिव ऑफिस वर्क और कुछ प्रशासनिक भूमिकाओं पर AI का असर ज्यादा देखा जा सकता है। वहीं, AI से जुड़े नए रोल्स भी तेजी से उभर रहे हैं। नए अवसर भी बना रहा AI जानकारों का कहना है कि AI सिर्फ नौकरियां खत्म नहीं कर रहा, बल्कि नए अवसर भी बना रहा है। AI Specialist Data Analyst Prompt Engineer Cyber Security Expert Machine Learning Engineer नई स्किल्स अपनाना जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तकनीकी कौशल, समस्या समाधान क्षमता और डिजिटल स्किल्स ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगी। इसलिए लगातार सीखना और नई स्किल्स अपनाना जरूरी माना जा रहा है। क्या पूरी तरह बदल जाएगी नौकरी की दुनिया? एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI कई कामों को आसान और तेज जरूर बना सकता है, लेकिन पूरी तरह इंसानी भूमिका को खत्म करना फिलहाल आसान नहीं माना जा रहा। AI और इंसानों के साथ मिलकर काम करने का मॉडल ज्यादा मजबूत माना जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता इस्तेमाल नौकरी की दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकता है, लेकिन इसे चुनौती के साथ-साथ अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में वही लोग आगे रह सकते हैं, जो नई तकनीकों के साथ खुद को तेजी से ढाल पाएंगे।
AI और नौकरियों पर नई बहस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर पिछले कुछ वर्षों से यह आशंका जताई जा रही थी कि यह तकनीक लाखों लोगों की नौकरियां खत्म कर सकती है। तकनीकी विशेषज्ञों और उद्योग जगत के कई नेताओं ने चेतावनी दी थी कि AI कई पेशों को पूरी तरह बदल देगा और रोजगार बाजार पर बड़ा असर डालेगा। लेकिन अब इस बहस में नया मोड़ आता दिखाई दे रहा है। OpenAI के सीईओ Sam Altman ने हाल ही में कहा है कि वास्तविक स्थिति उन आशंकाओं से अलग हो सकती है जो अब तक सामने आती रही हैं। उनके अनुसार, जिन कंपनियों ने AI को सबसे अधिक अपनाया है, वे ही सबसे ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती भी कर रही हैं। "AI अपनाने वाली कंपनियां भर्ती बढ़ा रही हैं" एक साक्षात्कार के दौरान सैम ऑल्टमैन ने कहा कि उनके अनुभव में AI का व्यापक उपयोग करने वाली कंपनियां अपने कार्यबल को कम नहीं कर रहीं, बल्कि नए लोगों को नियुक्त कर रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि जो कंपनियां छंटनी के लिए AI को जिम्मेदार ठहरा रही हैं, उनमें से कई वास्तव में AI में सबसे कम निवेश कर रही हैं। ऑल्टमैन के मुताबिक, कई मामलों में AI को कर्मचारियों की कटौती का कारण बताना वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। AI कर्मचारियों की जगह नहीं, उनकी क्षमता बढ़ा रहा ऑल्टमैन का कहना है कि AI को लेकर उनकी अपनी सोच भी समय के साथ बदली है। OpenAI के कोडिंग टूल्स और अन्य AI मॉडल्स के उपयोग को करीब से देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यह तकनीक कुछ कार्यों में बेहद सक्षम है, लेकिन अभी भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इसकी सीमाएं मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि AI छोटे और विशिष्ट कार्यों को तेजी से पूरा कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि की योजना बनाना, जटिल परियोजनाओं का प्रबंधन करना और लगातार निगरानी जैसे कार्य अभी भी इंसानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाए रखते हैं। क्या छंटनी के लिए AI को बहाना बनाया जा रहा है? ऑल्टमैन ने "AI वॉशिंग" शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि कई बार कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी को AI से जोड़ देती हैं, जबकि इसके पीछे अन्य व्यावसायिक कारण भी हो सकते हैं। उनका मानना है कि AI का रोजगार बाजार पर प्रभाव जरूर पड़ेगा, लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म कर रहा है। उनके अनुसार, AI का दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है और इस पर गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। हम समाज में बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं ऑल्टमैन ने स्वीकार किया कि AI को लेकर लोगों की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं हैं। उनका कहना है कि दुनिया एक ऐसे तकनीकी बदलाव को देख रही है जो लंबे समय में समाज, अर्थव्यवस्था और कार्यस्थलों को गहराई से प्रभावित कर सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि AI की वर्तमान क्षमताओं को लेकर कई बार अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए हैं, जिससे लोगों के बीच अनावश्यक भय भी पैदा हुआ। OpenAI ने भी मानी अपनी गलती OpenAI प्रमुख ने स्वीकार किया कि उनकी कंपनी के कुछ पुराने दावों ने भी नौकरी खोने की आशंकाओं को बढ़ावा दिया हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय कंपनी ने दावा किया था कि उसका मॉडल कई पेशों में पेशेवरों से बेहतर प्रदर्शन करता है। अब ऑल्टमैन का कहना है कि उस दावे को अधिक स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार, AI पूरे पेशे में नहीं बल्कि उन पेशों से जुड़े कुछ विशेष कार्यों में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। AI पर चर्चा हो रही अधिक संतुलित AI तकनीक के तेजी से विकास के बीच अब उद्योग जगत में इस विषय पर अधिक संतुलित चर्चा देखने को मिल रही है। जहां एक ओर AI से जुड़े जोखिमों को स्वीकार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके जरिए उत्पादकता बढ़ाने, नए अवसर पैदा करने और व्यवसायों को विस्तार देने की संभावनाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI नौकरियों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय कार्य करने के तरीकों को बदल सकता है, जिससे नए कौशल और नई भूमिकाओं की मांग बढ़ेगी।
2027 तक AGI आने का दावा, बड़े बदलाव की चेतावनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच पूर्व Google X बिजनेस प्रमुख Mo Gawdat ने दुनिया को लेकर एक बड़ी चेतावनी दी है। उनका मानना है कि आने वाले तीन वर्षों के भीतर AI इतना शक्तिशाली हो सकता है कि यह रोजगार, अर्थव्यवस्था और समाज की मौजूदा संरचना को पूरी तरह बदल दे। एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में गॉडेट ने कहा कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) या तो व्यावहारिक रूप से आ चुकी है या फिर 2027 तक इसका आगमन हो सकता है। उनके अनुसार, यह बदलाव मानव इतिहास के सबसे बड़े तकनीकी परिवर्तनों में से एक साबित हो सकता है। आज के AI टूल्स सिर्फ शुरुआत हैं ChatGPT, Gemini, Claude और Grok जैसे AI टूल्स आज लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। ये ईमेल लिखने, दस्तावेजों का विश्लेषण करने, यात्रा की योजना बनाने और कई अन्य कार्यों में मदद कर रहे हैं। लेकिन गॉडेट का कहना है कि आम लोग AI की जो क्षमताएं देख रहे हैं, वह उसकी वास्तविक शक्ति का केवल एक छोटा हिस्सा है। उनका दावा है कि रिसर्च लैब्स में विकसित हो रहे सिस्टम कहीं अधिक उन्नत हैं और वे खुद अपने कोड को बेहतर बनाने की क्षमता हासिल कर रहे हैं। उनके मुताबिक, आम जनता AI को चैटबॉट और वायरल वीडियो के रूप में देख रही है, जबकि पर्दे के पीछे इसकी प्रगति कहीं ज्यादा तेज और गंभीर है। सबसे पहले सफेदपोश नौकरियों पर असर गॉडेट का मानना है कि AI का पहला बड़ा प्रभाव व्हाइट-कॉलर यानी दफ्तर आधारित नौकरियों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कॉल सेंटर एजेंट, प्रशासनिक सहायक, ट्रैवल एजेंट और अन्य नियमित कंप्यूटर आधारित भूमिकाएं सबसे पहले प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा पैरालीगल, वित्तीय विश्लेषक, ग्राफिक डिजाइनर, संगीतकार, मिडिल मैनेजर और कुछ मेडिकल डायग्नोस्टिक भूमिकाओं में भी AI कार्यभार को काफी हद तक कम कर सकता है। उनका तर्क है कि AI की मदद से एक कर्मचारी वह काम कर सकेगा जिसके लिए पहले कई लोगों की जरूरत पड़ती थी। अचानक नहीं, धीरे-धीरे आएगा बदलाव हालांकि गॉडेट का मानना है कि नौकरियों पर असर एकदम से नहीं दिखेगा। शुरुआत में कंपनियां नए कर्मचारियों की भर्ती कम कर सकती हैं, खासकर एंट्री-लेवल पदों पर। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कई कंपनियों ने शुरुआती स्तर की नियुक्तियों को सीमित करना शुरू कर दिया है। इसका मतलब यह नहीं कि बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है, लेकिन कार्यबल की वृद्धि की रफ्तार जरूर धीमी पड़ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकारें समय रहते तैयारी नहीं करतीं, तो बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है। मैन्युअल काम भी नहीं बचेंगे गॉडेट का मानना है कि फिलहाल शारीरिक श्रम से जुड़े कई कार्य AI और रोबोट्स से सुरक्षित दिखाई देते हैं, लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहेगी। उन्होंने स्वचालित वाहनों का उदाहरण देते हुए कहा कि रोबोटिक्स का विस्तार भविष्य में परिवहन, लॉजिस्टिक्स, सैन्य क्षेत्र और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। विशेष प्रकार की मशीनें धीरे-धीरे कई मैन्युअल कार्यों को संभाल सकती हैं। AI खतरा नहीं, अवसर भी बन सकता है हालांकि उनकी भविष्यवाणी पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। गॉडेट का मानना है कि यदि AI का जिम्मेदारी से उपयोग किया गया, तो यह मानवता की कई बड़ी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है। उनके अनुसार, अत्यधिक बुद्धिमान AI सिस्टम वैज्ञानिक खोजों को तेज कर सकते हैं, चिकित्सा अनुसंधान में क्रांति ला सकते हैं और वैश्विक उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। युवाओं के लिए क्या है सलाह? AI युग में करियर बनाने को लेकर गॉडेट की सलाह स्पष्ट है—AI से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उसके साथ काम करना सीखें। उन्होंने कहा कि लोगों को ऐसे कौशल विकसित करने चाहिए जिन्हें मशीनें आसानी से नहीं दोहरा सकतीं। सहानुभूति, प्रभावी संवाद, रचनात्मकता, नेतृत्व और मजबूत मानवीय रिश्ते भविष्य में सबसे मूल्यवान गुण साबित हो सकते हैं। उनका मानना है कि जैसे-जैसे AI कई तकनीकी कार्यों में इंसानों से बेहतर होता जाएगा, वैसे-वैसे मानवता से जुड़े गुण लोगों की सबसे बड़ी ताकत बनेंगे। विशेषज्ञों में मतभेद भी मौजूद हालांकि AI के भविष्य को लेकर सभी विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। कई तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि AGI के आने का समय अभी अनिश्चित है और AI के प्रभाव का वास्तविक स्वरूप कई आर्थिक, सामाजिक और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा। फिर भी, गॉडेट की चेतावनी इस बात की ओर संकेत करती है कि AI केवल एक नई तकनीक नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार को प्रभावित करने वाली बड़ी शक्ति बन सकती है।
महिलाओं पर AI का असर पुरुषों से ज्यादा पड़ने की आशंका Artificial Intelligence तेजी से दुनिया भर के कामकाज और नौकरियों का स्वरूप बदल रहा है। बड़ी टेक कंपनियां लगातार AI में निवेश कर रही हैं, जिसके चलते कई जगह कर्मचारियों की छंटनी भी देखने को मिल रही है। अब एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि AI की वजह से महिलाओं की नौकरियों पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा खतरा मंडरा सकता है। अमेरिका की संस्था National Partnership for Women & Families की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं उन नौकरियों में बड़ी संख्या में काम कर रही हैं जिन्हें भविष्य में AI सबसे ज्यादा प्रभावित कर सकता है। 15 सबसे जोखिम वाली नौकरियों में महिलाओं की संख्या ज्यादा रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 47 प्रतिशत है, लेकिन AI से सबसे ज्यादा प्रभावित मानी जा रही 15 नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 83 प्रतिशत तक है। इन नौकरियों में सचिव, रिसेप्शनिस्ट, ऑफिस क्लर्क और इंश्योरेंस एजेंट जैसे प्रोफेशन शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 60 लाख महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जहां AI के कारण नौकरी पर खतरा बढ़ सकता है। हेल्थ और केयर सेक्टर में अभी कम खतरा स्टडी में बताया गया कि नर्सिंग, चाइल्ड केयर और होम हेल्थ केयर जैसे क्षेत्रों में अभी पूरी तरह ऑटोमेशन संभव नहीं है, क्योंकि इन कामों में इंसानी भावनाएं, देखभाल और व्यक्तिगत संपर्क जरूरी होता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई कि इन क्षेत्रों में भी AI आधारित निगरानी और मैनेजमेंट सिस्टम कर्मचारियों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। AI डेवलपमेंट में महिलाओं की कम भागीदारी रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की संख्या अभी भी AI डेवलपमेंट, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और टेक लीडरशिप जैसी भूमिकाओं में काफी कम है। स्टडी में कहा गया कि AI सिस्टम कैसे डिजाइन होंगे, उनका इस्तेमाल कैसे होगा और उन्हें कैसे नियंत्रित किया जाएगा, इन फैसलों में महिलाओं की भागीदारी सीमित है। इसका असर उनके कार्यस्थल पर भी पड़ सकता है। AI में जेंडर बायस का भी दावा रिपोर्ट में AI सिस्टम में जेंडर बायस को लेकर भी चिंता जताई गई है। एक रिसर्च का उदाहरण देते हुए बताया गया कि जब ChatGPT से पुरुष और महिला नामों के आधार पर रिज्यूमे तैयार करवाए गए, तो महिलाओं के रिज्यूमे को कम अनुभवी और कम प्रभावशाली दिखाया गया। बाद में जब AI से उन्हीं रिज्यूमे का मूल्यांकन कराया गया, तो पुरुष उम्मीदवारों को ज्यादा बेहतर रेटिंग मिली। महिलाओं को AI इस्तेमाल पर ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ती है स्टडी के अनुसार, कार्यस्थल पर AI टूल्स इस्तेमाल करने पर महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। एक रिसर्च में पाया गया कि जब किसी महिला के बारे में बताया गया कि उसने AI की मदद से काम किया है, तो उसकी क्षमता को पुरुषों की तुलना में ज्यादा कम आंका गया। ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी बढ़ी चिंता रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि AI ने महिलाओं को ऑनलाइन टारगेट करने के नए तरीके पैदा कर दिए हैं। AI आधारित डीपफेक और फर्जी तस्वीरों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में xAI के चैटबॉट Grok का भी जिक्र किया गया, जिसे लेकर पहले विवाद हो चुका है। महिलाएं AI टूल्स कम इस्तेमाल कर रही हैं स्टडी में दावा किया गया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच जनरेटिव AI टूल्स का इस्तेमाल लगभग 25 प्रतिशत कम है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के बीच AI उपयोग तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार 2022 से 2024 के बीच ChatGPT के करीब 42 प्रतिशत यूजर्स महिला नामों से जुड़े थे। विशेषज्ञों का मानना है कि AI का असर पूरी तरह तय नहीं है और आने वाले समय में सरकारी नीतियां, कंपनियों के नियम और कार्यस्थल की व्यवस्था यह तय करेगी कि इसका प्रभाव महिलाओं पर कितना पड़ेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।