Allahabad High Court

Allahabad High Court rules transgender community has no legal right to demand traditional badhai or neg
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किन्नरों को 'बधाई' मांगने का कानूनी अधिकार नहीं

'नेग' वसूली को कानूनी मान्यता नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किन्नर समुदाय को पारंपरिक 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति से जबरन धन वसूलना कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है। क्षेत्र तय करने की मांग अदालत ने ठुकराई यह फैसला गोंडा जिले की रेखा देवी नामक ट्रांसजेंडर द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिका में उन्होंने जरवल कस्बे के कटी का पुल से घाघरा घाट और कर्नलगंज के सरयू पुल तक के इलाके को 'बधाई' संग्रह के लिए उनके विशेष क्षेत्र के रूप में घोषित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह वर्षों से इस इलाके में नेग लेती आ रही हैं और अन्य लोगों के आने से विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है। कोर्ट ने क्या कहा? न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी प्रकार का टैक्स, शुल्क या धनराशि केवल कानून के तहत ही वसूली जा सकती है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि "किसी भी नागरिक से उसकी इच्छा से या दबाव बनाकर धन लेना स्वीकार्य नहीं है। केवल वही भुगतान वैध है, जिसे कानून की अनुमति हो।" ट्रांसजेंडर कानून में भी नहीं है ऐसा प्रावधान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में भी 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया गया है। जबरन वसूली पर लग सकती हैं आपराधिक धाराएं अदालत ने चेतावनी दी कि यदि किसी से जबरन धन वसूला जाता है, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडनीय अपराध हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी मांग को मान्यता देना अवैध वसूली को वैध ठहराने जैसा होगा, जिससे आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। सामाजिक परंपरा और कानून अलग-अलग यह फैसला स्पष्ट करता है कि सामाजिक परंपराओं और कानूनी अधिकारों में अंतर होता है। किसी परंपरा के लंबे समय से चले आने मात्र से उसे कानूनी संरक्षण नहीं मिल जाता।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Working woman with newborn highlighting maternity leave rights after High Court ruling
दो साल के भीतर दूसरी मातृत्व अवकाश से इनकार नहीं: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

  हाई कोर्ट का स्पष्ट संदेश Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर दूसरी मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) से वंचित नहीं किया जा सकता कि पहली और दूसरी छुट्टी के बीच दो साल का अंतर नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ से जुड़े कानूनी अधिकार किसी भी प्रशासनिक नियम से ऊपर हैं। याचिका पर सुनवाई में आया फैसला यह फैसला जस्टिस करुणेश सिंह पवार की लखनऊ पीठ ने सुनाया। मामला मनीषा यादव की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने 4 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी दूसरी मातृत्व अवकाश की मांग खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि Maternity Benefit Act, 1961 एक कल्याणकारी कानून है और इसके प्रावधानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकारी नियमों पर कानून भारी राज्य सरकार ने अपने पक्ष में वित्तीय हैंडबुक के नियम 153(1) का हवाला देते हुए कहा था कि दो मातृत्व अवकाश के बीच कम से कम दो साल का अंतर होना जरूरी है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए कानून के सामने किसी भी तरह के कार्यकारी निर्देश या नियम टिक नहीं सकते। कोर्ट ने आदेश रद्द कर दी राहत अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 2021 में पहले बच्चे को जन्म दिया था और 2022 में दूसरी मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे गलत आधार पर खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने संबंधित आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि मनीषा यादव को 6 अप्रैल 2026 से 2 अक्टूबर 2026 तक मातृत्व अवकाश दिया जाए। महिलाओं के अधिकारों के लिए अहम फैसला यह निर्णय कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे साफ संदेश गया है कि मातृत्व लाभ जैसे अधिकारों को किसी भी प्रशासनिक शर्त के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।  

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
Supreme Court and Parliament context showing probe closure against Justice Yashwant Verma
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में लोकसभा पैनल की जांच खत्म, रिपोर्ट सौंपी जाएगी

  जांच प्रक्रिया का औपचारिक समापन लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रही जांच को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है। यह फैसला मंगलवार को लिया गया। समिति अब अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा को सौंपेगी, जिसमें कहा गया है कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। तीन सदस्यीय इस पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार कर रहे थे। समिति का मानना है कि 9 अप्रैल को दिए गए इस्तीफे के बाद जांच प्रक्रिया जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बचता। इस्तीफे के बाद थमी महाभियोग प्रक्रिया जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंपा था। उन्होंने इसे “गहरे दुख” के साथ लिया गया फैसला बताया था। उसी दिन उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी इसकी जानकारी दी थी। उनका इस्तीफा उस समय आया, जब वह जांच समिति के सामने अपना पक्ष रखने वाले थे। 10 से 14 अप्रैल के बीच उन्हें अपनी सफाई पेश करनी थी, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, महाभियोग की प्रक्रिया केवल पद पर मौजूद जज के खिलाफ ही चल सकती है। ऐसे में इस्तीफे के साथ ही यह प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो गई। गंभीर आरोपों से जुड़ा था मामला यह पूरा मामला मार्च 2025 की एक घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लगने के बाद कथित तौर पर भारी मात्रा में बिना हिसाब का जला हुआ नकद बरामद हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच में उनकी सफाई संतोषजनक नहीं पाई गई थी। इसी के आधार पर संसद में उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया गया। लोकसभा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर जांच समिति बनाई, जबकि राज्यसभा ने प्रक्रिया में खामियों का हवाला देते हुए इसे मंजूरी नहीं दी थी। जज ने लगाए थे पक्षपात के आरोप जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे के दिन ही 13 पन्नों का एक पत्र भेजकर जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच शुरू से ही पक्षपातपूर्ण थी और उन्हें उचित मौका नहीं दिया गया। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए समिति की कार्यवाही को निष्पक्ष बताया। समिति ने केंद्र के जवाब को भी रिकॉर्ड में शामिल किया है। आगे क्या हो सकता है? हालांकि संसदीय जांच अब खत्म हो चुकी है, लेकिन इससे आपराधिक जांच की संभावना खत्म नहीं होती। अब जब जस्टिस वर्मा पद पर नहीं हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी। अगर जांच एजेंसियों को पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तो सामान्य कानून के तहत मामला आगे बढ़ सकता है।  

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
legal gavel symbolizing EWS certificate judgment in Uttar Pradesh recruitment case
EWS प्रमाण पत्र पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी भर्ती में उम्मीदवारों की याचिका खारिज

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने Uttar Pradesh की एक भर्ती प्रक्रिया में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी के तहत आरक्षण मांगने वाले उम्मीदवारों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि अमान्य आय प्रमाण पत्र के आधार पर EWS आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता। क्या है पूरा मामला: मामला उत्तर प्रदेश में महिला स्वास्थ्य कर्मियों के 9,000 से अधिक पदों की भर्ती से जुड़ा कुछ उम्मीदवार लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद अंतिम सूची से बाहर कर दिए गए उम्मीदवारों ने Allahabad High Court के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा कहा कि उम्मीदवार संबंधित वित्तीय वर्ष का वैध EWS प्रमाण पत्र पेश करने में विफल रहे गलत या समय से पहले जारी प्रमाण पत्र को मान्य नहीं माना जा सकता कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां: अगर प्रमाण पत्र गलत वित्तीय वर्ष का है, तो वह पात्रता का आधार नहीं बन सकता आवेदन के लिए जरूरी है कि प्रमाण पत्र पिछले वित्तीय वर्ष से संबंधित और कट-ऑफ तारीख तक वैध हो समय से पहले जारी प्रमाण पत्र में “स्पष्ट त्रुटि” मानी जाएगी ऐसे प्रमाण पत्र के आधार पर दावा करना स्वीकार्य नहीं उम्मीदवारों की दलील और कोर्ट का रुख: उम्मीदवारों ने कहा कि गलती अधिकारियों की थी और वित्तीय वर्ष को लेकर भ्रम हुआ कोर्ट ने दलील खारिज करते हुए कहा: उम्मीदवार अधिकारियों को दोष नहीं दे सकते उनके पास सही प्रमाण पत्र बनवाने का पर्याप्त समय था क्यों अहम है फैसला: EWS आरक्षण के नियमों को लेकर स्पष्टता भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए सख्त मानक तय दस्तावेजों की वैधता और समय-सीमा पर जोर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेने के लिए दस्तावेजों की शुद्धता और समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। किसी भी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि को आधार बनाकर पात्रता का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा।  

surbhi अप्रैल 14, 2026 0
Allahabad High Court building symbolizing transfer of 1,086 judicial officers in Uttar Pradesh.
UP में बड़ा न्यायिक फेरबदल: 1,086 जजों का ट्रांसफर, अदालतों की कार्यप्रणाली सुधारने की तैयारी

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक साथ 1,086 न्यायिक अधिकारियों के तबादले का आदेश जारी किया है। इस व्यापक ट्रांसफर को राज्य की अदालतों में लंबित मामलों को कम करने और कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। किन-किन जजों का हुआ ट्रांसफर? जारी आदेश के अनुसार: 408 एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज (ADJ) 277 सिविल जज (सीनियर डिवीजन) 401 सिविल जज (जूनियर डिवीजन) इन सभी न्यायिक अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है। यह हाल के दिनों में दूसरी बार है जब इतनी बड़ी संख्या में ट्रांसफर किए गए हैं। क्यों किया गया इतना बड़ा फेरबदल? सूत्रों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य: जिला अदालतों में कामकाज को सुव्यवस्थित करना लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाना न्यायिक प्रशासन में संतुलन और दक्षता बढ़ाना न्यायपालिका में समय-समय पर इस तरह के ट्रांसफर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में तबादले यह संकेत देते हैं कि सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। किसके आदेश पर हुआ फैसला? यह पूरा फैसला अरुण भंसाली के निर्देश पर लिया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि सभी न्यायिक अधिकारी 15 अप्रैल तक अपनी नई पोस्टिंग पर कार्यभार संभाल लें। प्रशासनिक स्तर पर भी बदलाव इस ट्रांसफर के तहत कुछ अहम पदों पर भी बदलाव किए गए हैं। बुलंदशहर के ADJ वरुण मोहित निगम को हाई कोर्ट में रजिस्ट्रार (लिस्टिंग) नियुक्त किया गया है, जो न्यायिक कार्यों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस बड़े पैमाने के ट्रांसफर से: मामलों के निपटारे में तेजी आएगी न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी अलग-अलग जिलों में कार्यभार संतुलित होगा हालांकि, इतने बड़े बदलाव के बाद शुरुआती दिनों में प्रशासनिक समन्वय की चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।  

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
Allahabad High Court granting anticipatory bail in Shankaracharya case with legal scrutiny
प्रयागराज से बड़ी खबर: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत, अदालत के आदेश में उठे कई अहम सवाल

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके सह-आरोपी स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि को अग्रिम जमानत प्रदान की है। यह मामला दो लड़कों, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है, के साथ कथित यौन उत्पीड़न से जुड़ा है, जिसमें POCSO Act के तहत केस दर्ज किया गया था। यह आदेश जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ द्वारा दिया गया, जिसमें अदालत ने केवल जमानत ही नहीं दी बल्कि एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया और मामले के कई पहलुओं पर गंभीर सवाल भी खड़े किए। अदालत ने किन बिंदुओं पर उठाए सवाल? अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिलाया: 1. शिकायत दर्ज करने में देरी और प्रक्रिया पर सवाल एफआईआर 21 फरवरी 2026 को दर्ज की गई, जबकि कथित घटना की जानकारी 18 जनवरी को मिलने की बात कही गई। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने पुलिस को जानकारी देने में देरी का कारण पूजा-पाठ में व्यस्तता बताया, जिसे अदालत ने संदिग्ध माना। 2. पीड़ितों का व्यवहार ‘सामान्य नहीं’ कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों ने अपने अभिभावकों के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को घटना की जानकारी दी, जो सामान्य मानवीय व्यवहार के अनुरूप नहीं है। 3. मेडिकल जांच और साक्ष्यों की कमी पीड़ितों का समय पर मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया। डॉक्टर की रिपोर्ट में किसी बाहरी चोट का उल्लेख नहीं है और यौन उत्पीड़न की पुष्टि भी स्पष्ट रूप से नहीं की गई। एफएसएल रिपोर्ट भी लंबित है। 4. घटनास्थल और समय में विरोधाभास एफआईआर में घटना की अवधि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 बताई गई, जबकि एक पीड़ित ने जून 2024 में अलग-अलग स्थानों पर घटना होने का दावा किया। इससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। 5. पीड़ित की उम्र को लेकर भ्रम अदालत ने पाया कि एक पीड़ित कथित अवधि में वयस्क था, जबकि दूसरी अवधि में नाबालिग, जिससे आरोपों की प्रकृति पर असर पड़ता है। 6. आश्रम से संबंध पर सवाल कोर्ट ने कहा कि संबंधित पीड़ित आश्रम का छात्र नहीं है, बल्कि हरदोई के एक संस्कृत विद्यालय का छात्र है। 7. विवाद और शिकायत की तारीख एक ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित अपराध की जानकारी मिलने और संगम स्नान को लेकर विवाद की तारीख (18 जनवरी 2026) एक ही है, जिससे मामले में और जांच की आवश्यकता बताई गई।   किन शर्तों पर मिली अग्रिम जमानत? अदालत ने दोनों आरोपियों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों के साथ जमानत दी, साथ ही पांच सख्त शर्तें लगाईं: साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे ट्रायल में सहयोग करेंगे बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे मामले पर मीडिया से बातचीत नहीं करेंगे कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है।  

kalpana मार्च 26, 2026 0
Ancient Jain Tirthankar idol discovered in Etah, now ordered to be kept in Prayagraj museum
1100 साल पुरानी जैन मूर्ति पर विवाद: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, अब संग्रहालय में रहेगी सुरक्षित

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में मिली 9वीं-10वीं शताब्दी की प्राचीन जैन तीर्थंकर मूर्ति को लेकर चल रहे विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अहम आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि इस ऐतिहासिक प्रतिमा को अब पुलिस कस्टडी से हटाकर प्रयागराज केंद्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा जाए। खुदाई में मिली थी दुर्लभ मूर्ति यह प्राचीन मूर्ति जून 2025 में एटा जिले के रिजोर क्षेत्र में जल जीवन मिशन की खुदाई के दौरान मिली थी। शुरुआती जांच में इसे लगभग 1100 साल पुरानी बताया गया, जो जैन धर्म के इतिहास और कला के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दिगंबर और श्वेतांबर के बीच विवाद मूर्ति मिलने के बाद जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय-दिगंबर जैन संप्रदाय और श्वेतांबर जैन संप्रदाय-ने इस पर अपना-अपना दावा ठोक दिया। दोनों पक्षों ने इसे अपने संप्रदाय से जुड़ा बताते हुए अदालत का रुख किया, जिससे मामला संवेदनशील हो गया। कोर्ट का आदेश: 11 अप्रैल तक संग्रहालय में शिफ्ट हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने आदेश दिया कि किसी भी स्थिति में 11 अप्रैल 2026 तक मूर्ति को संग्रहालय के निदेशक को सौंप दिया जाए। कोर्ट ने एटा के जिला मजिस्ट्रेट को इसकी सुरक्षित ट्रांसफर प्रक्रिया सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक मूर्ति की वास्तविक पहचान स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक इसे सुरक्षित और तटस्थ स्थान पर रखना जरूरी है। ASI की रिपोर्ट में स्पष्टता नहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जांच में यह सामने आया कि मूर्ति की शैलीगत विशेषताएं दोनों संप्रदायों से मिलती-जुलती हैं। इसलिए इसे किसी एक संप्रदाय से जोड़ना फिलहाल संभव नहीं है। ASI ने सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति बनाई जाए, जिसमें दोनों संप्रदायों के प्रतिनिधि शामिल हों। विशेषज्ञ समिति करेगी अंतिम जांच हाई कोर्ट ने इस मामले में एक विशेषज्ञ टीम गठित करने का आदेश दिया है। यह टीम मूर्ति के स्वरूप, काल, और धार्मिक संबंधों का विस्तृत अध्ययन करेगी और तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश करेगी। रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय होगा कि मूर्ति किस संप्रदाय से संबंधित है और आगे इसका स्वामित्व किसे मिलेगा। सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा जाएगा कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि संग्रहालय में रखने के बाद इस ऐतिहासिक प्रतिमा को आम लोगों के दर्शन के लिए भी प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि इसकी सांस्कृतिक विरासत सभी तक पहुंच सके।  

surbhi मार्च 20, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0