कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की अन्नपूर्णा भंडार योजना को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। टीएमसी नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार ने योजना के तहत बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम लाभार्थियों की सूची से हटाकर अपना पहला बड़ा घोटाला किया है। वहीं, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि केवल अपात्र और फर्जी आवेदनों को ही रद्द किया गया है। टीएमसी ने उठाए लाभार्थियों की संख्या पर सवाल साकेत गोखले ने कहा कि ममता बनर्जी सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना के तहत करीब 2.4 करोड़ महिलाओं को लाभ मिल रहा था, जबकि नई अन्नपूर्णा भंडार योजना में लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.3 करोड़ रह गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर 1.1 करोड़ महिलाओं के नाम क्यों हटाए गए। टीएमसी का आरोप है कि भाजपा सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना से महिलाओं को योजना से बाहर किया है। सरकार का दावा- फर्जी आवेदन हटाए गए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सरकार को योजना के लिए करीब 1.6 करोड़ आवेदन मिले थे। विस्तृत जांच के बाद 27 लाख आवेदन रद्द किए गए, जिनमें मृत लाभार्थियों के नाम, डुप्लीकेट बैंक खाते, मतदाता सूची से हटे नाम और नागरिकता या निवास से जुड़ी विसंगतियां पाई गईं। उन्होंने कहा कि सभी पात्र महिलाओं के खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए पहली किस्त भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और लगभग 1.1 करोड़ खातों में राशि जमा कराई जा चुकी है। सरकार का कहना है कि योजना का उद्देश्य केवल पात्र महिलाओं तक पारदर्शी तरीके से लाभ पहुंचाना है, जबकि टीएमसी इसे महिलाओं के अधिकारों पर हमला बताते हुए भाजपा सरकार को लगातार घेर रही है। अन्नपूर्णा भंडार योजना को लेकर दोनों दलों के बीच सियासी टकराव फिलहाल और तेज होने के आसार हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने की दिशा में सरकार एक नए और सख्त कानून को लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए 29 जून को विधानसभा का एक दिवसीय विशेष आपात सत्र बुलाया गया है, जिसमें प्रस्तावित भ्रष्टाचार के खिलाफ विधेयक पेश किया जाएगा। बजट सत्र के बीच लिया गया बड़ा फैसला विधानसभा सूत्रों के अनुसार, वर्तमान बजट सत्र का पहला चरण 25 जून तक चलेगा, जबकि दूसरा चरण 6 जुलाई से शुरू होगा। इसी अंतराल के दौरान सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर विधेयक को पेश करने का निर्णय लिया है। सूत्रों का कहना है कि विधेयक के अंतिम मसौदे को अभी कानूनी विशेषज्ञों द्वारा अंतिम रूप दिया जा रहा है, ताकि उसमें किसी प्रकार की कानूनी खामी न रह जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून में संपत्ति जब्ती का प्रावधान प्रस्तावित कानून के तहत भ्रष्टाचार में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों की अवैध रूप से अर्जित चल और अचल संपत्तियों को जब्त करने का प्रावधान शामिल किया जा रहा है। इसके साथ ही ऐसी संपत्तियों की सार्वजनिक नीलामी का भी प्रस्ताव है, जिससे प्राप्त धनराशि को जनहित कार्यों में उपयोग किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को पूरी तरह समाप्त करना है। मुख्यमंत्री का सख्त रुख विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि नया कानून भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कदम साबित होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब केवल जेल भेजना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को भी जब्त कर नीलाम किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भ्रष्टाचार के जरिए कमाई गई संपत्ति किसी भी स्थिति में सुरक्षित न रहे। विपक्ष पर तीखा हमला विधेयक पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर बिना नाम लिए निशाना साधते हुए कहा कि अब तक कई लोग कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाकर बच निकलते रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था में ऐसे सभी रास्ते बंद किए जाएंगे। सरकार का दावा—भ्रष्टाचार पर लगेगी लगाम सरकार का मानना है कि यह प्रस्तावित कानून राज्य में पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगा। आने वाले दिनों में इस विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति दोहराते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि भ्रष्टाचार और अपराध से अर्जित संपत्तियों को केवल जब्त ही नहीं किया जाएगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उनकी नीलामी भी की जा सकती है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्तियों पर बनेगा नया कानून विधानसभा में अपने जवाबी भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में गुंडाराज, माफियातंत्र और वसूली की राजनीति को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार इस सत्र में एक नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, जिसके माध्यम से भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से अर्जित संपत्तियों को जब्त करने तथा उनकी नीलामी का कानूनी प्रावधान किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल जेल जाने या लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से कोई बच नहीं सकेगा। यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति अवैध तरीके से अर्जित पाई जाती है तो सरकार उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। आलीशान इमारतों का किया उल्लेख अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कोलकाता के हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड स्थित आलीशान इमारतों का उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी बड़ी संपत्तियों का उपयोग उन लोगों के पुनर्वास के लिए किया जा सकता है, जो आज सड़कों, फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि उन्हें जनहित में उपयोग में लाना भी है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चाएं मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इसे तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी की ओर इशारा माना जा रहा है। हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड क्षेत्र में स्थित कुछ चर्चित संपत्तियों को लेकर पहले भी निर्माण संबंधी अनियमितताओं और अन्य विवादों की चर्चा होती रही है। सरकार की ओर से किसी विशेष व्यक्ति या संपत्ति के खिलाफ आधिकारिक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। सत्ता पक्ष ने किया समर्थन मुख्यमंत्री के बयान के दौरान सत्ता पक्ष के कई विधायकों और मंत्रियों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का यह रुख आने वाले समय में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को और तेज करने का संकेत है। विपक्ष की प्रतिक्रिया पर नजर मुख्यमंत्री के बयान के बाद अब विपक्ष की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े प्रावधानों को लेकर विधानसभा और राज्य की राजनीति में आगे भी तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा का बजट सत्र गुरुवार को शुरू हो गया। सत्र के पहले दिन राज्यपाल आरएन रवि ने अपने अभिभाषण में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की प्राथमिकताओं को सदन के सामने रखा। उन्होंने कहा कि नई सरकार कानून-व्यवस्था बहाल करने, घुसपैठ रोकने, भ्रष्टाचार और वसूली के नेटवर्क को खत्म करने तथा राज्य को औद्योगिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। ‘धमकाने की संस्कृति और भ्रष्टाचार के गिरोह खत्म होंगे’ राज्यपाल ने कहा कि पिछली सरकार के शासनकाल में पनपे असामाजिक तत्वों, वसूली करने वाले गिरोहों और अवैध खनन नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई है। नई सरकार ‘धमकाने की संस्कृति’ और भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। घुसपैठ और अतिक्रमण पर सख्ती राज्यपाल ने कहा कि अवैध रूप से रह रहे विदेशियों और घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है। सीमा सुरक्षा सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण हटाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया। बीएसएफ को भूमि उपलब्ध कराने के फैसले की सराहना आरएन रवि ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को भूमि उपलब्ध कराने के राज्य सरकार के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। महिलाओं और कमजोर वर्गों पर अत्याचार बर्दाश्त नहीं राज्यपाल ने कहा कि सरकार महिलाओं तथा कमजोर एवं वंचित वर्गों के खिलाफ अपराधों को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाएगी। महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस बल में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए भी विशेष कदम उठाए जाएंगे। अवैध खनन और वसूली के नेटवर्क पर प्रहार सरकार अवैध बालू और कोयला खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। राज्य में कथित तौर पर सक्रिय वसूली नेटवर्क को खत्म कर कानून का शासन स्थापित किया जाएगा। उद्योग, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर रहेगा फोकस पश्चिम बंगाल को प्रमुख औद्योगिक केंद्र बनाने की दिशा में काम। अनुपयोगी सरकारी भूमि को औद्योगिक परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। मेट्रो और रेलवे परियोजनाओं में केंद्र के साथ सहयोग। तटीय नौवहन, जलमार्ग, मत्स्य पालन और ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा। उत्तर बंगाल में IIT और AIIMS स्थापित करने की दिशा में प्रयास। स्टार्टअप केंद्र विकसित कर युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) नियमित रूप से आयोजित की जाएगी। पुस्तकालयों का आधुनिकीकरण और ‘पीएम श्री’ स्कूल योजना लागू की जाएगी। राज्य के सभी स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य किया जाएगा। अन्नपूर्णा भंडार योजना और महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा राज्यपाल ने कहा कि सरकार ‘अन्नपूर्णा भंडार योजना’ शुरू करेगी और महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा सुविधा प्रदान करेगी। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत विधवाओं और वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता दी जाएगी। गोरखालैंड मुद्दे पर सभी पक्षों से बातचीत राज्यपाल ने कहा कि दार्जिलिंग और गोरखालैंड से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान के लिए सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जाएगी। राज्यपाल आरएन रवि के अभिभाषण ने पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार के पहले बजट सत्र की दिशा तय कर दी है। यह सत्र ऐसे समय हो रहा है जब भाजपा ने लगभग 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस शासन का अंत कर राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाई है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंतरिक कलह और गहरा गई है। विधानसभा की सर्वदलीय और कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार एवं ममता बनर्जी के करीबी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर बैठक में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया। इस घटनाक्रम को विधानसभा के भीतर बदलते सियासी समीकरणों और बागी गुट की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है। रीतब्रत को मिली मान्यता, शोभनदेव रहे बाहर विधानसभा सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक के लिए जारी सूची में शोभनदेव चट्टोपाध्याय और बेलेघाटा से विधायक कुणाल घोष का नाम शामिल नहीं था। इसके विपरीत, हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र नाथ बसु द्वारा विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त रीतब्रत बनर्जी को बैठक के लिए आमंत्रित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संकेत देता है कि विधानसभा प्रशासन सदन के भीतर उभरी नई संख्या-स्थिति को स्वीकार करने लगा है। बागी गुट के साथ 65 विधायक तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले को खारिज करते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रीतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया था। अब बागी गुट का दावा है कि उसके समर्थन में 65 विधायक हैं, जिससे विधानसभा में रीतब्रत की स्थिति और मजबूत हुई है। सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए अन्य विपक्षी नेता सर्वदलीय बैठक में विभिन्न विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इनमें शामिल थे: नौशाद सिद्दीकी हुमायूं कबीर मुस्तफिजुर रहमान संसद से विधानसभा तक टीएमसी में संकट विधानसभा में बढ़ते संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस को संसद में भी बड़ा झटका लग चुका है। हाल ही में पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला किया और भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की। बजट सत्र से पहले बढ़ा सियासी तापमान बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू हो रहा है। उससे पहले विपक्ष के नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा के भीतर बदलते संख्या बल और टीएमसी की आंतरिक टूट का असर आगामी सत्र की कार्यवाही और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर किस रूप में पड़ता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर मचा सियासी घमासान अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और लंबे समय तक लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने के दावों ने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सुदीप बंद्योपाध्याय ने ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से अलग कर उन्हें केवल ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) की भूमिका में रखने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इस घटनाक्रम को टीएमसी के अंदर चल रही नेतृत्व की लड़ाई में बड़ा झटका माना जा रहा है। ‘दीदी का सम्मान, लेकिन संगठन में बदलाव जरूरी’ एक बांग्ला समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में सुदीप बंद्योपाध्याय ने कथित तौर पर कहा कि पार्टी के कई सांसद और विधायक चाहते हैं कि संगठन का अस्तित्व बचाने के लिए नए नेतृत्व और नई कार्यशैली की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे संपर्क कर बताया कि वे ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी की ‘मुख्य सलाहकार’ बनाकर मार्गदर्शक की भूमिका में रखना चाहते हैं। सुदीप के मुताबिक, इस प्रस्ताव ने उन्हें प्रभावित किया और उन्होंने बागी खेमे के साथ जाने का फैसला किया। बागी गुट का दावा- 22 सांसद हुए साथ बागी गुट का दावा है कि दो और लोकसभा सांसद उनके साथ आ गए हैं, जिसके बाद विद्रोही सांसदों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। सूत्रों के अनुसार, यह गुट संसद में एक अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता हासिल करने की कोशिश में जुटा है। बताया जा रहा है कि बागी नेता जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर स्वतंत्र संसदीय समूह के तौर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। कल्याण बनर्जी का पलटवार सुदीप बंद्योपाध्याय के कथित फैसले पर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने सुदीप बंद्योपाध्याय के राजनीतिक जीवन में हमेशा उनका साथ दिया और संकट के समय उनके लिए ढाल बनकर खड़ी रहीं। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं को ममता बनर्जी ने आगे बढ़ाया, वही आज उन्हें केवल ‘सलाहकार’ बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक गद्दारी’ और ‘दीदी की पीठ में छुरा घोंपने’ जैसा बताया। टीएमसी में बढ़ सकती है अंदरूनी खींचतान राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं, तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित हो सकता है। इससे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और पार्टी नेतृत्व की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी के हालिया दिल्ली दौरे ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और असंतोष की अटकलों को और हवा दे दी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कुछ असंतुष्ट सांसदों ने नेतृत्व से दूरी बना ली है, जिससे टीएमसी की राष्ट्रीय राजनीति में स्थिति को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं. सांसदों से संपर्क की कोशिशों को नहीं मिला अपेक्षित समर्थन सूत्रों के अनुसार, दिल्ली पहुंचने के बाद ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कई सांसदों से संपर्क साधने की कोशिश की. कई सांसदों से संपर्क नहीं हो सका. बताया जा रहा है कि कुछ सांसदों के फोन बंद थे, जबकि कुछ ने बातचीत से परहेज किया. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब टीएमसी को संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. बागी खेमे की गतिविधियों पर बनी हुई है नजर टीएमसी के भीतर असंतोष को लेकर चर्चाएं पहले से चल रही थीं. अब खबरें हैं कि कुछ सांसद अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर किसी बड़े विभाजन की पुष्टि नहीं की गई है. सूत्रों का दावा है कि असंतुष्ट नेताओं के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर विचार-विमर्श जारी है. अभिषेक बनर्जी ने संभाला मोर्चा दिल्ली प्रवास के दौरान ममता बनर्जी अपने भतीजे और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी के आवास पर ठहरीं. बताया जा रहा है कि अभिषेक ने पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को मनाने और संवाद कायम रखने की कोशिश की. सूत्रों के मुताबिक अब तक इन प्रयासों को बड़ी सफलता नहीं मिली है. पार्टी नेतृत्व लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है. विपक्षी राजनीति में टीएमसी की भूमिका पर उठे सवाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक मजबूत स्थिति रखने वाली टीएमसी के सामने मौजूदा परिस्थितियां नई चुनौती बनकर उभरी हैं. INDIA गठबंधन की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के बीच पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति आने वाले दिनों में टीएमसी की रणनीति को प्रभावित कर सकती है. फिलहाल पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य स्थापना दिवस को लेकर बड़ा फैसला लिया है। बुधवार को राज्य सचिवालय में आयोजित कैबिनेट बैठक में यह तय किया गया कि अब हर वर्ष 20 जून को आधिकारिक रूप से ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ मनाया जाएगा। सरकार का कहना है कि यह निर्णय राज्य के ऐतिहासिक और राजनीतिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को ध्यान में रखकर लिया गया है। मंत्री ने बताई फैसले की पृष्ठभूमि कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री दिलीप घोष ने बताया कि 20 जून की तारीख बंगाल के इतिहास में विशेष महत्व रखती है। उनके अनुसार, वर्ष 1947 में इसी दिन तत्कालीन संयुक्त बंगाल विधानसभा में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान हुआ था, जिसने बाद में पश्चिम बंगाल के गठन की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक घटना को औपचारिक मान्यता देना चाहती है। पूर्व व्यवस्था से अलग नया दृष्टिकोण इस निर्णय के साथ राज्य सरकार ने उस परंपरा से अलग रास्ता अपनाया है, जिसमें बंगाली नववर्ष ‘पोइला बोइशाख’ के अवसर पर पश्चिम बंगाल दिवस मनाया जाता था। नई सरकार का मानना है कि राज्य के गठन से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों को आधार बनाकर स्थापना दिवस मनाना अधिक उपयुक्त होगा। राज्यभर में होंगे विशेष कार्यक्रम सरकार ने 20 जून के आयोजन को व्यापक रूप देने की योजना बनाई है। इसके लिए संस्कृति और गृह विभाग को आवश्यक तैयारियां करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य सचिवालय से लेकर जिला, ब्लॉक और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों तक विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें सांस्कृतिक आयोजन, व्याख्यान, प्रदर्शनी और इतिहास से जुड़े विशेष कार्यक्रम शामिल होंगे। ऐतिहासिक विरासत को प्रमुखता देने की कोशिश सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को पश्चिम बंगाल के गठन और उससे जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रमों की जानकारी देना है। इसके तहत राज्य के विभिन्न हिस्सों में इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विकास से संबंधित कार्यक्रम आयोजित कर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। राजनीतिक चर्चा का नया विषय बना फैसला राज्य स्थापना दिवस की नई तिथि तय किए जाने के बाद राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। विभिन्न राजनीतिक दल इस फैसले को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह निर्णय ऐतिहासिक तथ्यों और राज्य की विरासत को सम्मान देने की भावना से लिया गया है। 20 जून को पहली बार होगा सरकारी स्तर पर आयोजन सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2026 से 20 जून को पूरे पश्चिम बंगाल में आधिकारिक कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य स्थापना दिवस मनाया जाएगा। प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं और सभी विभागों को कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे उथल-पुथल भरे दौर के बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को शिक्षक भर्ती मामले में नया नोटिस जारी किया है। बुधवार को ईडी की एक टीम केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ कोलकाता के कालीघाट स्थित उनके आवास पहुंची और कानूनी प्रक्रिया पूरी की। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई कार्रवाई जांच एजेंसी के पहुंचने के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई। केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बीच आवास के आसपास निगरानी रखी गई और स्थिति पर नजर बनाए रखी गई। घटना की जानकारी मिलते ही पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की आवाजाही भी बढ़ गई। भर्ती मामले की जांच में नए पहलुओं की तलाश ईडी लंबे समय से कथित शिक्षक भर्ती अनियमितताओं से जुड़े वित्तीय पहलुओं की जांच कर रही है। एजेंसी विभिन्न दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों की समीक्षा कर रही है ताकि मामले से जुड़े आर्थिक लेन-देन की पूरी तस्वीर सामने लाई जा सके। जांच के दौरान कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका भी जांच के दायरे में है। कारोबारी संस्थाओं और वित्तीय नेटवर्क पर नजर सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियां उन कंपनियों और वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल कर रही हैं जिनका नाम जांच के दौरान सामने आया है। उद्देश्य यह समझना है कि कथित तौर पर धन का प्रवाह किस प्रकार हुआ और उससे जुड़े नेटवर्क कैसे काम कर रहे थे। इसी क्रम में कुछ अतिरिक्त जानकारियां जुटाने के लिए नोटिस जारी किए जा रहे हैं। राजनीतिक संकट के बीच नई चुनौती यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब तृणमूल कांग्रेस पहले से ही संगठनात्मक चुनौतियों और आंतरिक मतभेदों से जूझ रही है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर चर्चा और गतिविधियों को बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में ईडी की यह कार्रवाई राजनीतिक महत्व भी रखती है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विपक्ष इसे जांच प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा बता रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के नेता केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई क्या होगी और पूछताछ या जांच के अगले चरण में कौन-से नए तथ्य सामने आते हैं। शिक्षक भर्ती मामला पहले से ही पश्चिम बंगाल के सबसे चर्चित मामलों में शामिल है और ताजा घटनाक्रम ने इसे एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले के बाद उनके इलाज को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। ममता बनर्जी ने दावा किया कि दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में हुई घटना के बाद अस्पताल प्रशासन और डॉक्टरों पर दबाव बनाया गया ताकि अभिषेक बनर्जी को अस्पताल में भर्ती न किया जाए। उन्होंने इस पूरे मामले को राजनीतिक हस्तक्षेप बताते हुए सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए। अस्पताल प्रशासन को धमकी भरे फोन आने का दावा ममता बनर्जी ने कहा कि एक अस्पताल प्रशासक ने उन्हें बताया था कि पुलिस की ओर से लगातार धमकी भरे फोन किए जा रहे थे। उनके अनुसार, इलाज की प्रक्रिया को प्रभावित करने और अस्पताल पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया गया। इलाज की प्रक्रिया पर उठाए सवाल मुख्यमंत्री ने पूछा कि यदि अभिषेक बनर्जी की स्थिति गंभीर नहीं थी और भर्ती की आवश्यकता नहीं थी, तो उन्हें पहले आईटीयू में क्यों रखा गया। उन्होंने कहा कि करीब दो घंटे तक डॉक्टरों की निगरानी में रखने और कई मेडिकल जांच व स्कैन कराने की सलाह दिए जाने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी क्यों दी गई। ममता ने पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग की है। शरीर पर मिले चोट के निशान ममता बनर्जी के मुताबिक, हमले के बाद अभिषेक बनर्जी को शाम से रात तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया। चिकित्सकों ने उनके चेहरे, पीठ, छाती और गर्दन पर चोट के निशान पाए थे। संभावित अंदरूनी चोट या हड्डी टूटने की आशंका को खारिज करने के लिए कई जांच कराने की सलाह दी गई थी। सोनारपुर में क्या हुआ था? पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी के पहुंचते ही माहौल तनावपूर्ण हो गया था। आरोप है कि कुछ लोगों ने उनके खिलाफ नारेबाजी की, पत्थर और अंडे फेंके तथा धक्का-मुक्की की कोशिश की। हालात बिगड़ते देख सुरक्षाकर्मियों ने मानव शृंखला बनाकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। घटना के बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के गठन के बाद सोमवार को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार का पहला और अब तक का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल विस्तार हुआ। राज्य सचिवालय नबन्ना में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल आर.एन. रवि ने 35 नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस विस्तार को नई सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। कई प्रमुख नेताओं को मिली मंत्रिमंडल में जगह नए मंत्रिमंडल में कई चर्चित और अनुभवी नेताओं को शामिल किया गया है। शपथ लेने वालों में स्वपन दासगुप्ता, अशोक डिंडा, मनोज ओरांव, जगन्नाथ चट्टोपाध्याय, मालती रॉय, इंद्रनील खान, गौरीशंकर घोष, कल्याण चक्रवर्ती, राजेश महतो, अर्जुन सिंह और तापस राय जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। माना जा रहा है कि इनमें से कई नेताओं को महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। चुनावी जीत के बाद सरकार का बड़ा कदम हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत हासिल कर तृणमूल कांग्रेस के लगभग 15 वर्षों के शासन का अंत किया था। सत्ता संभालने के बाद यह पहला बड़ा मंत्रिमंडलीय विस्तार है, जिससे सरकार प्रशासनिक ढांचे को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। विभागों के बंटवारे पर जल्द होगा फैसला सूत्रों के अनुसार, मंत्रिमंडल विस्तार के बाद विभागों के आवंटन को लेकर भी जल्द महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएंगे। पहली बार विधायक बने कई नेताओं को भी मंत्री पद देकर सरकार ने नए चेहरों पर भरोसा जताया है। संभावित रूप से शंकर घोष, शारद्वत मुखोपाध्याय, दुधकुमार मंडल और अन्य नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक दिन पहले सोशल मीडिया मंच एक्स पर मंत्रिमंडल विस्तार की जानकारी साझा की थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विस्तार सरकार की कार्यक्षमता बढ़ाने और चुनावी वादों को तेजी से लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के गठन के लगभग एक महीने बाद सोमवार (1 जून) को मंत्रिमंडल विस्तार होने जा रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार में 35 नए मंत्री शपथ लेंगे। इसके साथ ही राज्य मंत्रिमंडल लगभग पूर्ण आकार में पहुंच जाएगा और मंत्रियों की कुल संख्या 41 हो जाएगी। राजभवन की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, शपथ ग्रहण समारोह सुबह 11 बजे लोकभवन में आयोजित होगा, जहां राज्यपाल आर.एन. रवि नए मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे। सरकार गठन के बाद पहला बड़ा विस्तार भाजपा सरकार के गठन के बाद 9 मई को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ पांच मंत्रियों ने शपथ ली थी। तब से विपक्ष और राजनीतिक हलकों में पूर्ण मंत्रिमंडल के गठन में देरी को लेकर सवाल उठ रहे थे। अब मंत्रिमंडल विस्तार के साथ सरकार प्रशासनिक स्तर पर पूरी क्षमता से काम करने की स्थिति में आ जाएगी। मुख्यमंत्री के साथ पहले चरण में शपथ लेने वाले मंत्रियों में दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, नीशीथ प्रमाणिक, अशोक कीर्तनिया और खुदीराम टुडू शामिल थे। कई बड़े नामों पर नजर मंत्रिमंडल विस्तार से पहले संभावित मंत्रियों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। वरिष्ठ भाजपा नेता और रासबिहारी विधायक स्वपन दासगुप्ता का नाम प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है। उन्हें पहले ही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी दी जा चुकी है, जिससे उनके शिक्षा मंत्री बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके अलावा मानिकतला विधायक तापस रॉय के भी मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। संभावित मंत्रियों की सूची में शंकर घोष, रुद्रनील घोष, डॉ. शारद्वत मुखर्जी, प्रणत टुडू, रूपा गांगुली, कल्याण चक्रवर्ती, चंदना बाउड़ी, जगन्नाथ चट्टोपाध्याय, अशोक डिंडा और सुब्रत मैत्रा जैसे नाम भी चर्चा में हैं। क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन पर फोकस भाजपा नेतृत्व मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तर बंगाल, जंगलमहल, आदिवासी क्षेत्रों, अनुसूचित जाति समुदाय, महिलाओं और दक्षिण बंगाल के प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने पर विशेष ध्यान दे सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मंत्रिमंडल की संरचना से भाजपा की आगामी राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक प्राथमिकताओं की झलक भी मिलेगी। वर्तमान मंत्रियों के पास कौन से विभाग? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पास मुख्यमंत्री कार्यालय के अलावा कई प्रमुख विभागों की जिम्मेदारी है। दिलीप घोष पंचायत एवं ग्रामीण विकास, पशुपालन विकास और कृषि विपणन विभाग संभाल रहे हैं। अग्निमित्रा पॉल महिला एवं बाल विकास तथा नगर विकास विभाग की जिम्मेदारी निभा रही हैं। नीशीथ प्रमाणिक के पास उत्तर बंगाल विकास और खेल विभाग है, जबकि अशोक कीर्तनिया खाद्य विभाग और खुदीराम टुडू पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं अल्पसंख्यक मामलों का प्रभार संभाल रहे हैं। संवैधानिक सीमा के करीब पहुंचेगी सरकार संविधान के अनुसार किसी राज्य में मंत्रियों की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में अधिकतम 44 मंत्री बनाए जा सकते हैं। 35 नए मंत्रियों के शपथ लेने के बाद मंत्रिपरिषद की संख्या 41 हो जाएगी, जिससे सरकार संवैधानिक सीमा के काफी करीब पहुंच जाएगी। भाजपा सरकार की प्रशासनिक दिशा होगी स्पष्ट राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह मंत्रिमंडल विस्तार केवल रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि नई सरकार की प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक संतुलन को भी परिभाषित करेगा। शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी नए मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा कर सकते हैं, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की शीर्ष नेतृत्व टीम अब कानूनी विवादों में घिरती नजर आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ सिलीगुड़ी में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गयी है, जबकि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कोलकाता के भवानीपुर थाने में लिखित शिकायत दर्ज करायी गयी है। दोनों नेताओं पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने और विवादित टिप्पणियों के जरिए सामाजिक तनाव बढ़ाने के आरोप लगाये गये हैं। इन घटनाओं के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। ममता बनर्जी पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप सिलीगुड़ी के साइबर क्राइम थाने में अधिवक्ता रिंकी चटर्जी सिंह की ओर से ममता बनर्जी के खिलाफ FIR दर्ज करायी गयी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ममता बनर्जी ने 2025 की ईद और 2026 विधानसभा चुनाव से पहले हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान ऐसे बयान दिये, जिनसे हिंदू और सनातन धर्म से जुड़े लोगों की भावनाएं आहत हुईं। शिकायतकर्ता का कहना है कि एक संवैधानिक पद पर रह चुकी नेता को ऐसी टिप्पणी करने से बचना चाहिए, जिससे किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाये जाने का संदेश जाये। पुलिस ने गंभीर धाराओं में दर्ज किया मामला पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। इनमें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और सामाजिक शांति भंग करने की कोशिश जैसे आरोप शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, मामले की शुरुआती जांच शुरू कर दी गयी है और आने वाले दिनों में ममता बनर्जी को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में पुलिस की ओर से आधिकारिक बयान अभी सामने नहीं आया है। अभिषेक बनर्जी के सोशल मीडिया पोस्ट पर भी उठा विवाद टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी भी विवादों में घिर गये हैं। भवानीपुर निवासी अर्नबकांति दास ने उनके खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करायी है। यह विवाद अभिषेक बनर्जी के एक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर ‘एंटी-बंगाल गुजराती गैंग’ शब्द का इस्तेमाल किया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस तरह की टिप्पणी विभिन्न समुदायों के बीच तनाव और नफरत फैलाने का कारण बन सकती है। शिकायतकर्ता ने लगाया राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग का आरोप अर्नबकांति दास ने अपनी शिकायत में कहा है कि एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जो सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करें। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की बयानबाजी राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही है और इससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। कोलकाता पुलिस मुख्यालय लालबाजार की ओर से अभी तक FIR दर्ज होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गयी है, लेकिन मामले में प्रारंभिक जांच शुरू होने की जानकारी सामने आयी है। बीजेपी ने कहा- कानून अपना काम कर रहा है इन घटनाओं के बाद बीजेपी ने टीएमसी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि किसी भी नेता को धर्म या समुदाय विशेष के खिलाफ भड़काऊ बयान देने की छूट नहीं दी जा सकती। पार्टी नेताओं ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और अगर किसी ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बयान दिया है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होना स्वाभाविक है। टीएमसी का पलटवार, कहा- विपक्ष दबाना चाहता है आवाज तृणमूल कांग्रेस ने इन कानूनी कार्रवाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनावी हार के बाद बीजेपी अब अदालतों और पुलिस के जरिए ममता बनर्जी और टीएमसी नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। टीएमसी नेताओं का दावा है कि विपक्ष जानबूझकर ऐसे विवाद खड़े कर रहा है ताकि राज्य की राजनीति में तनाव पैदा किया जा सके और पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके। बढ़ सकती हैं टीएमसी नेतृत्व की कानूनी मुश्किलें राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी से जुड़े ये विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं। अभिषेक बनर्जी पहले से ही कुछ साइबर क्राइम मामलों और नगर निगम के नोटिसों का सामना कर रहे हैं। अब ममता बनर्जी के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद टीएमसी की शीर्ष नेतृत्व टीम की कानूनी और राजनीतिक चुनौतियां बढ़ती नजर आ रही हैं। बंगाल की राजनीति में पहले से जारी टकराव के बीच इन घटनाओं ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के बाद सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ते असंतोष और इस्तीफों के बीच मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अब कविता के जरिए अपने विरोधियों और बागी नेताओं को संदेश दिया है। ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर ‘गिरगिटी’ शीर्षक से एक कविता साझा की, जिसे राजनीतिक गलियारों में पार्टी के भीतर ‘रंग बदलने वाले’ नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है। दूसरी ओर बीजेपी सांसद सौमित्र खान के उस दावे ने बंगाल की राजनीति का तापमान और बढ़ा दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि टीएमसी के कई सांसद और विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं। फेसबुक पर साझा की गयी ‘गिरगिटी’ कविता, पार्टी के भीतर मचा सियासी हलचल ममता बनर्जी द्वारा साझा की गई कविता को लेकर बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कविता में ‘गिरगिट’ का प्रतीक इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ऐसे लोगों पर निशाना साधा है, जो परिस्थिति के अनुसार अपना रंग और रुख बदल लेते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कविता सीधे तौर पर उन नेताओं के लिए संदेश है, जो हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं या टीएमसी छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। ममता बनर्जी ने कविता में लिखा कि गिरगिट तो केवल अपनी आजीविका बचाने के लिए रंग बदलता है, लेकिन कुछ लोग निजी स्वार्थ और राजनीतिक फायदे के लिए पल भर में अपना चरित्र बदल लेते हैं। मुश्किल समय में पार्टी छोड़ने वालों पर ममता का तीखा हमला कविता में ममता बनर्जी ने उन नेताओं पर भी नाराजगी जतायी, जिन पर पार्टी के कठिन दौर में कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़ने का आरोप लग रहा है। उन्होंने संकेतों में कहा कि कुछ नेताओं ने सत्ता और व्यक्तिगत सुविधाओं के लिए अपने आत्मसम्मान और राजनीतिक प्रतिबद्धता से समझौता कर लिया। कविता के अंतिम हिस्से में उन्होंने ‘समय के पहिये’ का जिक्र करते हुए चेतावनी भरे अंदाज में लिखा कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है और गद्दारों को एक दिन अपनी असली कीमत समझ में आ जाती है। बीजेपी सांसद सौमित्र खान का बड़ा दावा, कहा- टीएमसी के कई नेता संपर्क में ममता बनर्जी की कविता के बीच बीजेपी सांसद सौमित्र खान के बयान ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। सौमित्र खान ने दावा किया कि टीएमसी के 20 सांसद और करीब 50 विधायक पार्टी से नाराज हैं और वे बीजेपी के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी आलाकमान की ओर से संकेत मिल जाये, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि टीएमसी का संगठन अंदर से कमजोर हो चुका है और पार्टी में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। टीएमसी में बढ़ते इस्तीफों और नाराजगी ने बढ़ायी नेतृत्व की चिंता हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर कई नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आयी है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के सभी सांगठनिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा सुशांत घोष, अरूप चक्रवर्ती और इंद्रनील सेन जैसे नेताओं ने भी पार्टी के कामकाज और कथित ‘वीवीआईपी कल्चर’ पर सवाल उठाये हैं। बागी नेताओं का आरोप है कि राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों ने जनता के बीच पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व इन मामलों से प्रभावी तरीके से निपटने में विफल रहा है। टीएमसी ने बीजेपी के दावों को बताया अफवाह और राजनीतिक माइंडगेम टीएमसी नेतृत्व ने बीजेपी सांसद सौमित्र खान के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि बीजेपी केवल भ्रम फैलाने और राजनीतिक माइंडगेम खेलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि टीएमसी पूरी तरह एकजुट है और पार्टी के बड़े नेताओं या विधायकों के बीजेपी में जाने की बात निराधार है। सौगत रॉय ने दावा किया कि विपक्ष जानबूझकर पार्टी के भीतर असंतोष का माहौल दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर टीएमसी मजबूत स्थिति में है। 2026 चुनाव के बाद बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में जिस तरह से बयानबाजी, इस्तीफे और दल-बदल की चर्चाएं तेज हुई हैं, उसने राज्य की सियासत को नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ ममता बनर्जी कविता और राजनीतिक संदेशों के जरिए पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बीजेपी लगातार टीएमसी में टूट का दावा कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के सभी 23 जिलों में होल्डिंग सेंटर्स बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का कहना है कि इन केंद्रों का उद्देश्य संदिग्ध घुसपैठियों और नागरिकता जांच के दायरे में आये लोगों को अस्थायी रूप से रखना है, ताकि दस्तावेजों का सत्यापन पूरा किया जा सके। जेल नहीं, ‘सुविधा केंद्र’ के तौर पर तैयार किये गये सेंटर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि होल्डिंग सेंटर्स जेल नहीं हैं। इन्हें ट्रांजिट सुविधा केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां रहने वाले लोगों को भोजन, साफ बिस्तर और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी। सरकार के मुताबिक, इन केंद्रों में किसी भी व्यक्ति को अधिकतम 30 दिनों तक रखा जा सकेगा। इस दौरान उनकी पहचान और दस्तावेजों की जांच की जायेगी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीसीटीवी कैमरे, पुलिस बल और सिविल डिफेंस कर्मियों की तैनाती की गयी है। मालदा और मुर्शिदाबाद में शुरू हुआ ऑपरेशन सीमावर्ती जिलों में इन केंद्रों ने काम करना भी शुरू कर दिया है। मालदा जिले के इंग्लिश बाजार स्थित एक सरकारी प्रशिक्षण केंद्र की एक मंजिल को होल्डिंग सेंटर में बदला गया है। यहां हाल ही में पकड़े गये 9 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है। वहीं मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित ‘पद्म भवन’ में दूसरा केंद्र सक्रिय किया गया है। यहां जाली दस्तावेजों के साथ पकड़े गये लोगों को शिफ्ट किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्र में प्रवेश से पहले सभी लोगों का मेडिकल परीक्षण कराया जा रहा है ताकि संक्रमण या बीमारी के खतरे को रोका जा सके। क्या है ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति? राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ अपनी रणनीति को ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नाम दिया है। डिटेक्ट (Detect) : संदिग्ध घुसपैठियों और फर्जी दस्तावेज रखने वालों की पहचान करना। डिलीट (Delete) : अवैध रूप से वोटर लिस्ट या सरकारी रिकॉर्ड में शामिल लोगों के नाम हटाना। डिपोर्ट (Deport) : दस्तावेज सत्यापन के बाद संबंधित व्यक्तियों को बीएसएफ को सौंपना, ताकि उन्हें उनके देश वापस भेजा जा सके। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि उनकी सरकार घुसपैठ के मामले में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम कर रही है। CAA के तहत अल्पसंख्यकों को राहत सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पड़ोसी देशों से भारत आये हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत सुरक्षा प्रदान की जायेगी। विपक्ष ने उठाये सवाल जहां बीजेपी सरकार इस अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्षी दल टीएमसी ने प्रक्रिया को लेकर चिंता जतायी है। टीएमसी का कहना है कि कार्रवाई के दौरान किसी भी भारतीय नागरिक को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार चलायी जा रही है और इसका उद्देश्य केवल अवैध घुसपैठ पर रोक लगाना है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। तृणमूल कांग्रेस की हार और बीजेपी की प्रचंड जीत के बीच 12 साल पुराना एक विवाद फिर चर्चा में आ गया है। वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा ‘माओवादी’ कहे जाने वाली छात्रा तानिया भारद्वाज ने चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “अहंकार की हार” बताया है। तानिया ने कहा कि यह सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की जीत है। उनके मुताबिक, जनता ने उस राजनीति को नकार दिया है जिसमें सवाल पूछने वालों को देशविरोधी या माओवादी जैसे टैग दिए जाते थे। क्या था 2012 का चर्चित विवाद? मई 2012 में कोलकाता के प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय की छात्रा तानिया भारद्वाज ने एक लाइव टॉक शो के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से राज्य में बढ़ते अपराध और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल पूछा था। सवाल सुनते ही ममता बनर्जी नाराज हो गई थीं और उन्होंने तानिया को “माओवादी” करार दे दिया था। इतना ही नहीं, ममता बनर्जी बीच कार्यक्रम से उठकर चली गई थीं। उस समय यह घटना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में रही थी। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक असहमति को दबाने का उदाहरण बताया था। “यह तानाशाही सोच की हार” : तानिया भारद्वाज चुनाव नतीजों के बाद तानिया भारद्वाज ने कहा कि वर्ष 2012 में जो हुआ था, वह सत्ता के बढ़ते अहंकार की शुरुआत थी। उन्होंने कहा कि जब सरकारें सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को बदनाम करने लगती हैं, तो जनता का विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। तानिया ने कहा, “यह जनादेश सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है। यह उस मानसिकता की हार है जो असहमति की आवाज़ को दबाना चाहती थी।” आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले का भी किया जिक्र तानिया भारद्वाज ने अपनी प्रतिक्रिया में आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े विवाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस घटना ने बंगाल के युवाओं और आम जनता को झकझोर दिया था। उनके मुताबिक, राज्य के युवाओं ने इस चुनाव में यह संदेश दिया है कि उन्हें डराकर हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता। उन्होंने कहा कि जनता अब जवाबदेही और सम्मान चाहती है। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद बढ़ी चर्चा विधानसभा चुनाव 2026 में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी ने 208 सीटें जीतकर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का दावा पेश किया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के 15 साल लंबे शासन का अंत हो गया। चुनाव परिणामों के बाद सोशल मीडिया पर तानिया भारद्वाज का पुराना वीडियो और 2012 की घटना फिर वायरल हो रही है। कई लोग उन्हें “लोकतांत्रिक आवाज़” और “बंगाल की साहसी छात्रा” के रूप में पेश कर रहे हैं। “अब किसी छात्र को आतंकवादी नहीं कहा जाएगा” तानिया भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि वे किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में उन्हें यह राहत महसूस हो रही है कि अब शायद कोई छात्र या आम नागरिक सिर्फ सवाल पूछने पर “आतंकवादी” या “माओवादी” नहीं कहलाएगा। उनकी यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में सामने आई है, जब बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव और सत्ता परिवर्तन को लेकर पूरे देश में चर्चा जारी है।
पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की 500 कंपनियां फिलहाल राज्य में तैनात रहेंगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने गृह मंत्रालय से 180 दिनों तक केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखने का आग्रह किया था। केंद्र सरकार ने फिलहाल 20 जून तक इसकी मंजूरी दी है। चुनाव के बाद भी तैनात रखे गए थे केंद्रीय बल विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद पश्चिम बंगाल में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीएपीएफ की 500 कंपनियों को राज्य में तैनात किया गया था। पिछले चुनावों के बाद हुई हिंसक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए इस बार मतदान खत्म होने के बाद भी केंद्रीय बलों को नहीं हटाया गया था। गत सप्ताह राज्य की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद गृह मंत्रालय ने इन बलों को चरणबद्ध तरीके से वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की थी। पहले चरण में 100 कंपनियों यानी करीब 10 हजार जवानों को हटाने का आदेश जारी किया गया था। गृह मंत्रालय ने जारी किया नया आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी नए आदेश के अनुसार, अब 20 जून तक राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रहेगी। आदेश में कहा गया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए विभिन्न बलों की कुल 500 कंपनियां पश्चिम बंगाल में मौजूद रहेंगी। इनमें: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 200 कंपनियां सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 150 कंपनियां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की 50 कंपनियां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की 50 कंपनियां सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 50 कंपनियां शामिल हैं। राज्य सरकार को करनी होगी व्यवस्थाएं गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों की तैनाती के दौरान ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक सपोर्ट और जवानों के ठहरने की व्यवस्था राज्य सरकार को करनी होगी। साथ ही बलों की सभी ऑपरेशनल जरूरतों का भी ध्यान रखने को कहा गया है। पहले चरण में हटनी थीं 100 कंपनियां गृह मंत्रालय ने पहले चरण में 100 कंपनियों को वापस बुलाने का फैसला लिया था। इनमें CRPF की 40, BSF की 30, CISF की 10, ITBP की 10 और SSB की 10 कंपनियां शामिल थीं। आदेश के मुताबिक 15 मई से इन कंपनियों को कानून व्यवस्था ड्यूटी से हटाया जाना था। सुरक्षा समीक्षा के बाद लिया गया फैसला राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हुई समीक्षा बैठक में पश्चिम बंगाल गृह विभाग और केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारी शामिल हुए थे। खुफिया एजेंसियों से भी विशेष रिपोर्ट मांगी गई थी। समीक्षा में बताया गया कि चुनाव के बाद फिलहाल राज्य में स्थिति शांतिपूर्ण है और बड़े राजनीतिक प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं नहीं हुई हैं। वहीं बांग्लादेश सीमा से लगने वाले इलाकों में विशेष निगरानी रखी जा रही है। सीमा सुरक्षा बल घुसपैठ रोकने के लिए लगातार सतर्क है और कई इलाकों में फेंसिंग का काम भी शुरू किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट पर गुरुवार को दोबारा मतदान जारी है। दक्षिण 24 परगना जिले की 144-फलता सीट के सभी 285 मतदान केंद्रों पर री-पोलिंग कराई जा रही है। पिछली वोटिंग के दौरान ईवीएम में कथित छेड़छाड़ और अनियमितताओं की शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने मतदान रद्द कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला लिया था। सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर मतदाताओं की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। लोग उत्साह के साथ मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। वोटों की गिनती 24 मई को होगी। वोटरों ने कहा- इस बार माहौल शांतिपूर्ण मतदाता देबाशीष घोष ने कहा कि इस बार मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा है और लोग बिना किसी डर के वोट डाल पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली बार विभिन्न राजनीतिक दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से दबाव बनाया गया था। उन्होंने कहा कि पिछली बार लोगों को घर-घर जाकर तय समय पर वोट डालने के लिए कहा जा रहा था और इलाके में डर का माहौल था, लेकिन इस बार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से मतदाता खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बीजेपी ने जीत का किया दावा भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने कहा कि इलाके में मतदान शांतिपूर्ण और उत्सव जैसा माहौल है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी बड़ी जीत दर्ज करेगी। पांडा ने कहा कि लोग आराम से वोट डाल रहे हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी पार्टी डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल करेगी। उन्होंने टीएमसी नेता जहांगीर खान पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्हें पहले ही हार का अंदाजा हो गया था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, इस बार हर मतदान केंद्र पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के आठ जवान तैनात किए गए हैं। पिछली वोटिंग में प्रत्येक बूथ पर केवल चार जवान मौजूद थे। फलता विधानसभा क्षेत्र में कुल 35 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं। इसके अलावा किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 30 क्विक रिस्पांस टीम भी बनाई गई हैं। टीएमसी उम्मीदवार ने छोड़ा मैदान री-पोलिंग से पहले टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव मैदान से हटने का ऐलान कर दिया था। हालांकि पार्टी ने इसे उनका निजी फैसला बताया है। अब इस सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में लंबे समय तक वाम दलों का प्रभाव रहा है, इसलिए मुकाबले में वामपंथी दलों की भूमिका को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहले मतदान में क्या हुआ था? 29 अप्रैल को हुए मतदान के दौरान कई मतदान केंद्रों से ईवीएम पर इत्र और चिपकने वाला टेप लगाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं। इसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए पूरे निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया था।
पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने राज्य के मदरसों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। राज्य के अल्पसंख्यक कार्य और मदरसा शिक्षा विभाग ने आदेश जारी कर सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और गैर सहायता प्राप्त मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य कर दिया है। सरकार के नए आदेश के बाद अब राज्य के सभी मदरसों को सुबह की प्रार्थना सभा में ‘वंदे मातरम्’ गाना होगा। इस फैसले को लेकर राज्य में राजनीतिक और शैक्षणिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। पहले स्कूलों के लिए जारी हुआ था आदेश इससे पहले पश्चिम बंगाल के स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों को निर्देश दिया था कि हर दिन कक्षाएं शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम्’ का गायन सुनिश्चित किया जाए। विभाग ने कहा था कि सुबह की प्रार्थना सभा में राष्ट्रगीत गाने से छात्रों में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा मिलेगा। राज्य सरकार का यह कदम केंद्रीय गृह मंत्रालय के उस निर्देश के बाद सामने आया है, जिसमें राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे व्यापक रूप से गाने की बात कही गई थी। नए आदेश में राज्य गीत को लेकर स्थिति साफ नहीं बंगाल में पहले से स्कूलों की सुबह की सभा में ‘बांग्लार माटी बांग्लार जल’ गीत गाना अनिवार्य था। हालांकि नए आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि राज्य गीत को अब भी जारी रखा जाएगा या नहीं। कुछ स्कूल प्रबंधन ने इस फैसले को लागू करने में व्यावहारिक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया है। स्कूल प्रमुखों का कहना है कि राष्ट्रगान पहले से अनिवार्य है और अब ‘वंदे मातरम्’ जोड़े जाने के बाद अगर राज्य गीत भी जारी रहता है तो प्रार्थना सभा का समय काफी बढ़ जाएगा। स्कूलों ने शुरू किया पालन शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार फिलहाल निर्देश केवल ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी किया गया है। विभाग ने साफ किया कि स्कूल प्रार्थना में राष्ट्रगीत को शामिल करना जरूरी होगा, जबकि राज्य गीत पर कोई अलग निर्देश नहीं दिया गया है। कई स्कूलों ने इस आदेश का पालन भी शुरू कर दिया है। जादवपुर विद्यापीठ के प्रधानाध्यापक पार्थ प्रतिम बैद्य ने बताया कि उनके स्कूल में पिछले सप्ताह से राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम्’ गाया जा रहा है। राजनीतिक बहस तेज मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किए जाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर सरकार इसे राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष और कुछ शिक्षा विशेषज्ञ इस फैसले के सामाजिक और प्रशासनिक प्रभावों पर सवाल उठा रहे हैं।
West Bengal सरकार ने राज्य की OBC आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया है। नई सूची के अनुसार अब केवल 66 जातियां ही OBC आरक्षण के दायरे में रहेंगी। इसके साथ ही धर्म आधारित वर्गीकरण की व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार का कहना है कि यह फैसला Calcutta High Court के 2024 के आदेश के आधार पर लिया गया है। हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में 77 अतिरिक्त जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया को अवैध और असंवैधानिक बताया था। हालांकि, 2010 से पहले OBC सूची में शामिल जातियों का दर्जा बरकरार रहेगा। साथ ही, पहले से OBC कोटे के तहत नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियों पर भी इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। ममता सरकार की OBC-A और OBC-B व्यवस्था खत्म Mamata Banerjee सरकार ने पहले OBC आरक्षण को दो वर्गों में बांटा था। OBC-A को 10% और OBC-B को 7% आरक्षण दिया जा रहा था। इसी दौरान कई नई जातियों को भी सूची में शामिल किया गया था। इसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2024 में फैसला सुनाया था। कोर्ट के आदेश के बाद 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए थे। नई सूची में किन जातियों को मिला स्थान नई OBC सूची में कपाली, कुर्मी, सुध्राधार, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा, देवांग और गोआला जैसी जातियां शामिल हैं। वहीं पहाड़िया, हज्जाम और चौधुली जैसे तीन मुस्लिम समुदायों को भी सूची में रखा गया है। राज्य मंत्री Agnimitra Paul ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि सरकार OBC ढांचे की नई समीक्षा करेगी। इसके लिए जांच समिति बनाई जाएगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कुछ समूहों को दोबारा सूची में शामिल किया जा सकता है। बंगाल कैबिनेट के 7 बड़े फैसले सरकारी नौकरियों में उम्र सीमा 5 साल बढ़ी राज्य कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा 5 साल बढ़ाने का फैसला किया है। अब ग्रुप-A पदों के लिए उम्र सीमा 41 साल, ग्रुप-B के लिए 44 साल और ग्रुप C-D के लिए 45 साल होगी। यह नियम 11 मई से लागू होगा। भ्रष्टाचार जांच के लिए रिटायर्ड जज की कमेटी सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए Justice Bishwajit Basu की अध्यक्षता में जांच पैनल बनाने को मंजूरी दी है। यह कमेटी सरकारी योजनाओं, निर्माण कार्यों और सेवा वितरण में कथित घोटालों की जांच करेगी। महिलाओं और बच्चियों पर अत्याचार की जांच महिलाओं, बच्चियों, SC-ST और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए Justice Samapti Chatterjee की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी बनाई जाएगी। शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल, ईमेल और व्हाट्सऐप सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। धार्मिक आधार पर मिलने वाला मानदेय बंद राज्य सरकार ने 1 जून से इमाम, मुअज्जिन और पुजारियों को दिए जाने वाले सरकारी मानदेय को बंद करने का फैसला लिया है। अभी तक इमामों को 3000 रुपए और मुअज्जिन तथा पुजारियों को 2000 रुपए मासिक सहायता दी जाती थी। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए कैबिनेट ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ को मंजूरी दी है। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। योजना का लाभ सीधे बैंक खातों में भेजा जाएगा। महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा 1 जून से महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी। हालांकि सरकार ने फिलहाल बसों की संख्या बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। 7वें वेतन आयोग को मंजूरी राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वेतन संशोधन के लिए 7वें राज्य वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ सरकारी कर्मचारियों के साथ नगर निकायों और सरकारी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों को भी मिलेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।