पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट पर गुरुवार को दोबारा मतदान जारी है। दक्षिण 24 परगना जिले की 144-फलता सीट के सभी 285 मतदान केंद्रों पर री-पोलिंग कराई जा रही है। पिछली वोटिंग के दौरान ईवीएम में कथित छेड़छाड़ और अनियमितताओं की शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने मतदान रद्द कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला लिया था। सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर मतदाताओं की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। लोग उत्साह के साथ मतदान में हिस्सा ले रहे हैं। वोटों की गिनती 24 मई को होगी। वोटरों ने कहा- इस बार माहौल शांतिपूर्ण मतदाता देबाशीष घोष ने कहा कि इस बार मतदान पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा है और लोग बिना किसी डर के वोट डाल पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली बार विभिन्न राजनीतिक दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से दबाव बनाया गया था। उन्होंने कहा कि पिछली बार लोगों को घर-घर जाकर तय समय पर वोट डालने के लिए कहा जा रहा था और इलाके में डर का माहौल था, लेकिन इस बार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से मतदाता खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बीजेपी ने जीत का किया दावा भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने कहा कि इलाके में मतदान शांतिपूर्ण और उत्सव जैसा माहौल है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी बड़ी जीत दर्ज करेगी। पांडा ने कहा कि लोग आराम से वोट डाल रहे हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी पार्टी डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल करेगी। उन्होंने टीएमसी नेता जहांगीर खान पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्हें पहले ही हार का अंदाजा हो गया था। सुरक्षा के कड़े इंतजाम राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के मुताबिक, इस बार हर मतदान केंद्र पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के आठ जवान तैनात किए गए हैं। पिछली वोटिंग में प्रत्येक बूथ पर केवल चार जवान मौजूद थे। फलता विधानसभा क्षेत्र में कुल 35 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं। इसके अलावा किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 30 क्विक रिस्पांस टीम भी बनाई गई हैं। टीएमसी उम्मीदवार ने छोड़ा मैदान री-पोलिंग से पहले टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव मैदान से हटने का ऐलान कर दिया था। हालांकि पार्टी ने इसे उनका निजी फैसला बताया है। अब इस सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में लंबे समय तक वाम दलों का प्रभाव रहा है, इसलिए मुकाबले में वामपंथी दलों की भूमिका को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहले मतदान में क्या हुआ था? 29 अप्रैल को हुए मतदान के दौरान कई मतदान केंद्रों से ईवीएम पर इत्र और चिपकने वाला टेप लगाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं। इसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीर मानते हुए पूरे निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया था।
West Bengal सरकार ने सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को बड़ी राहत देते हुए भर्ती की अधिकतम आयु सीमा बढ़ाने का फैसला किया है। राज्य के वित्त विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अब विभिन्न श्रेणियों की सरकारी नौकरियों में आवेदन के लिए उम्मीदवारों की अधिकतम आयु सीमा पहले से अधिक होगी। नई व्यवस्था के तहत ग्रुप A पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा 41 वर्ष, ग्रुप B के लिए 44 वर्ष और ग्रुप C तथा D के लिए 45 वर्ष तय की गई है। यह संशोधन पश्चिम बंगाल सर्विसेज (रेजिंग ऑफ एज-लिमिट) रूल्स, 1981 में किया गया है। 11 मई से लागू होंगे नए नियम राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई आयु सीमा 11 मई से प्रभावी मानी जाएगी। यानी इस तारीख के बाद जारी होने वाली सभी भर्ती प्रक्रियाओं में नए नियम लागू होंगे। सरकार का कहना है कि इस फैसले से उन युवाओं को राहत मिलेगी, जो लंबे समय से सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे थे लेकिन भर्ती प्रक्रियाओं और परीक्षाओं में देरी के कारण आयु सीमा पार होने की चिंता से जूझ रहे थे। युवाओं को मिलेगा बड़ा फायदा नई नीति लागू होने के बाद हजारों ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों के लिए पात्र हो जाएंगे, जो पहले अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रतियोगी परीक्षाओं में उम्मीदवारों की संख्या बढ़ सकती है और रोजगार के अवसरों तक पहुंच आसान होगी। सत्ता परिवर्तन के बाद लगातार बड़े फैसले 2026 विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। Suvendu Adhikari के नेतृत्व में बनी नई सरकार प्रशासनिक सुधार और रोजगार के मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं और सरकारी भर्ती से जुड़े फैसले आने वाले समय में राज्य की राजनीति और रोजगार व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। 2026 चुनाव में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में Bharatiya Janata Party ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। वहीं All India Trinamool Congress, जिसने पिछले चुनाव में 212 सीटें जीती थीं, इस बार 80 सीटों पर सिमट गई। नई सरकार बनने के बाद राज्य में प्रशासनिक बदलाव और भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार को लेकर लगातार फैसले लिए जा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल के चर्चित RG Kar मेडिकल कॉलेज रेप और मर्डर केस में सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। मामले में तीन पुलिस अधिकारियों के सस्पेंड होने के बाद पीड़िता के परिवार ने पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़िता की मां ने ममता बनर्जी को “अपराधियों की मुखिया” बताते हुए उनकी गिरफ्तारी की मांग की है। परिवार का आरोप है कि अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदार लोगों को जेल भेजा जाए, तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। बीजेपी विधायक रत्ना देबनाथ ने भी उठाए सवाल भाजपा विधायक Ratna Debnath ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस केस में कई लोग शामिल हैं, लेकिन अब तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आई है। उन्होंने कहा, “जिस रात पीड़िता के साथ डिनर करने वाले लोगों की जांच तक नहीं हुई। अब तक सिर्फ कॉलेज के प्रिंसिपल को जेल भेजा गया है, जबकि बाकी लोगों की भूमिका पर सवाल बने हुए हैं।” ‘पूरी घटना के पीछे बड़ी साजिश’ पीड़िता की मां ने आरोप लगाया कि इस पूरी घटना के पीछे एक बड़ी साजिश थी। उन्होंने दावा किया कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कॉलेज प्रशासन और उस समय के स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारी इस मामले के लिए जिम्मेदार हैं। परिवार ने पूर्व स्वास्थ्य सचिव नारायणस्वरूप निगम का नाम लेते हुए भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। पिता बोले- ‘शुरुआत से केस दबाने की कोशिश हुई’ पीड़िता के पिता शेखररंजन देबनाथ ने दावा किया कि शुरुआत से ही मामले को दबाने का प्रयास किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने पहले दिन से ही केस को छिपाने की कोशिश की और यह सब कथित तौर पर तत्कालीन सरकार के निर्देश पर हुआ। उनके अनुसार अब धीरे-धीरे मामले की सच्चाई सामने आ रही है। मौजूदा सरकार की कार्रवाई की सराहना हालांकि पीड़ित परिवार ने वर्तमान सरकार की कार्रवाई की सराहना भी की है। परिवार ने कहा कि नई सरकार ने मामले में कदम उठाया है और अब निष्पक्ष जांच की उम्मीद बढ़ी है। उन्होंने मांग की कि इस केस में शामिल सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और परिवार को न्याय मिले। कई पुलिस अधिकारियों पर जांच शुरू पश्चिम Bengal के मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने कहा कि मामले में कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर विनीत कुमार गोयल समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू कर दी गई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, मामले की जांच और शुरुआती कार्रवाई में गंभीर लापरवाही के आरोप सामने आए हैं। ‘पैसे देकर मामला दबाने की कोशिश’ हावड़ा में मीडिया से बातचीत के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि कुछ पुलिस अधिकारियों पर पीड़ित परिवार को पैसे देकर मामला दबाने की कोशिश करने के आरोप भी लगे हैं। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कई अधिकारियों को सस्पेंड किया गया है और पूरे मामले की गहराई से जांच की जा रही है। लगातार बढ़ रहा राजनीतिक विवाद RG Kar मेडिकल कॉलेज केस पहले ही राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब पीड़ित परिवार के नए आरोपों के बाद यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।विपक्ष लगातार पूर्व सरकार पर सवाल उठा रहा है, जबकि जांच एजेंसियां मामले से जुड़े हर पहलू की पड़ताल में जुटी हुई हैं।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने नंदीग्राम विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपते हुए कहा कि नंदीग्राम केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि उनके दिल का हिस्सा है। इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री ने भावुक अंदाज में कहा, “नंदीग्राम मेरे दिल में है। यहां की जनता ने मुझे जो प्यार और विश्वास दिया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। मैं जहां भी रहूं, नंदीग्राम के विकास के लिए हमेशा काम करता रहूंगा।” दो सीटों से जीत के बाद लिया फैसला शुभेंदु अधिकारी ने हालिया विधानसभा चुनाव में भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों से जीत हासिल की थी। संवैधानिक नियमों के तहत उन्हें एक सीट छोड़नी थी, जिसके बाद उन्होंने नंदीग्राम सीट से इस्तीफा देने का फैसला किया। अब इस सीट पर उपचुनाव होने की संभावना है और इसे लेकर राज्य की राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, पार्टी की ओर से अब तक यह साफ नहीं किया गया है कि नंदीग्राम से उपचुनाव में उम्मीदवार कौन होगा। बंगाल की राजनीति का सबसे चर्चित केंद्र रहा नंदीग्राम नंदीग्राम सीट पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से बेहद अहम मानी जाती रही है। इसी सीट से शुभेंदु अधिकारी ने पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को हराकर राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव किया था। उस जीत को बंगाल की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ माना गया था। इसके बाद भाजपा ने राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत की। केंद्र की योजनाओं को लेकर बड़ा बयान इस्तीफे के साथ ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने केंद्र सरकार की योजनाओं को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अब केंद्र की सभी जनकल्याणकारी योजनाओं को पश्चिम बंगाल में प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री की हर योजना का लाभ बंगाल के गरीब, किसान, महिला, युवा और श्रमिक तक पहुंचाना हमारी प्राथमिकता होगी।” मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि राज्य और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाकर विकास परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। नंदीग्राम के विकास का किया वादा शुभेंदु अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि नंदीग्राम के विकास कार्यों में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। भाजपा नेताओं के मुताबिक, क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट जल्द शुरू किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार नंदीग्राम को विकास के मॉडल के रूप में तैयार करना चाहती है। विपक्ष ने उठाए सवाल वहीं, विपक्ष इस इस्तीफे को राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देख रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि नंदीग्राम सीट छोड़ने के पीछे भाजपा की नई राजनीतिक तैयारी हो सकती है। राज्य की राजनीति में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि नंदीग्राम उपचुनाव में कौन उम्मीदवार होगा और क्या यह सीट एक बार फिर बंगाल की राजनीति का बड़ा रणक्षेत्र बनेगी।
चुनाव बाद हिंसा से जुड़ी याचिका पर खुद करेंगी पैरवी पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee गुरुवार को वकील की पोशाक पहनकर Calcutta High Court पहुंचीं। बताया जा रहा है कि वह विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) मामले में खुद अदालत के सामने दलीलें पेश करेंगी। सूत्रों के मुताबिक यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की बेंच में सूचीबद्ध है, जहां ममता बनर्जी कार्यवाही और जांच से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठा सकती हैं। अदालत परिसर में उन्हें वकीलों के पारंपरिक काले चोगे में देखा गया, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर चुकी हैं दलील यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी अदालत में वकील की भूमिका में नजर आई हों। इससे पहले वह एसआईआर मुद्दे को लेकर Supreme Court of India में भी बतौर अधिवक्ता अपना पक्ष रख चुकी हैं। जानकारी के अनुसार, यह याचिका टीएमसी नेता और वरिष्ठ वकील Kalyan Banerjee के बेटे शीर्षान्या बंदोपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी। ममता बनर्जी ने वर्ष 1982 में जोगेश चंद्र कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। बंगाल चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव गौरतलब है कि हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इसके बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर करीब 100 सीटें “छीन” लीं। वहीं, बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलावों की शुरुआत हो गई है। राज्य की पहली कैबिनेट बैठक में कई अहम फैसलों पर मुहर लगी, जिनमें सबसे प्रमुख Ayushman Bharat योजना को राज्य में लागू करना रहा। इस फैसले पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने खुशी जताई और कहा कि पश्चिम बंगाल के लोगों का कल्याण उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अब राज्य के लोगों को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना का लाभ मिलेगा, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग को बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी। पीएम मोदी ने ‘डबल इंजन सरकार’ पर दिया जोर पीएम मोदी ने अपने संदेश में “डबल इंजन सरकार” का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय से विकास योजनाओं की डिलीवरी तेज और निर्बाध होगी। उन्होंने लिखा कि पश्चिम बंगाल के लोगों तक केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाओं का लाभ बिना किसी रुकावट के पहुंचाया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषक इसे केंद्र और राज्य सरकार के बीच नए तालमेल का संकेत मान रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी सरकार के बड़े फैसले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari की अध्यक्षता में हुई पहली कैबिनेट बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए। इनमें आयुष्मान भारत योजना लागू करने के अलावा सीमा सुरक्षा बल को बॉर्डर फेंसिंग के लिए जमीन उपलब्ध कराने का फैसला भी शामिल है। सरकार ने सरकारी नौकरियों के लिए आयु सीमा में पांच साल की छूट देने की घोषणा की है। इसके साथ ही राज्य में Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) लागू करने को भी मंजूरी दी गई। केंद्र की योजनाओं का रास्ता साफ नई सरकार ने कई केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन में आ रही बाधाओं को हटाने का भी फैसला किया है। इनमें PM Vishwakarma Yojana, Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana और Pradhan Mantri Ujjwala Yojana जैसी योजनाएं शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से किसानों, श्रमिकों, कारीगरों और गरीब परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा। आयुष्मान भारत लागू होना क्यों अहम माना जा रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत योजना लागू होना बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव है। पिछले कई वर्षों से राज्य में यह योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई थी। भाजपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान इसे प्रमुख मुद्दा बनाया था और प्रधानमंत्री मोदी ने प्रचार के दौरान वादा किया था कि राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में ही आयुष्मान भारत को मंजूरी दी जाएगी। अब सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि और “डबल इंजन मॉडल” की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है।
Who is Suvendu Adhikari: पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार का दिन ऐतिहासिक बनने जा रहा है. भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद शुभेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. इसके साथ ही बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनने जा रही है. कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी आज उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं. नंदीग्राम से शुरू हुआ ‘जायंट किलर’ का सफर शुभेंदु अधिकारी को बंगाल की राजनीति में ‘जायंट किलर’ कहा जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी दो बड़ी चुनावी जीत हैं. 2021: नंदीग्राम में ममता को दी मात साल 2021 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश को चौंका दिया था. यह चुनाव बंगाल की राजनीति का सबसे चर्चित मुकाबला बना था. 2026: भवानीपुर में फिर हराया इसके बाद 2026 के चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट पर भी हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. भवानीपुर को ममता का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन शुभेंदु ने वहां भी जीत दर्ज कर टीएमसी के अभेद्य किले को ढहा दिया. छात्र राजनीति से शुरू हुआ राजनीतिक सफर 15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के कारकुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक परिवार से आते हैं. उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं. शुभेंदु ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कोंटाई में की और बाद में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए किया. उन्होंने छात्र राजनीति के जरिए अपना राजनीतिक करियर शुरू किया. शुरुआती दौर में वे कांग्रेस छात्र संगठन से जुड़े रहे. 1995 में वे पहली बार पार्षद बने और धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति में अपनी पहचान मजबूत करते गए. आरएसएस से मिला संगठन और अनुशासन का प्रशिक्षण कम लोग जानते हैं कि शुभेंदु अधिकारी ने युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में भी प्रशिक्षण लिया था. माना जाता है कि इसी दौरान उनके भीतर संगठन क्षमता और अनुशासन की मजबूत नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर उनकी राजनीतिक शैली को आकार दिया. नंदीग्राम आंदोलन ने बना दिया बड़ा चेहरा 2007 का नंदीग्राम आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए इस आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और देखते ही देखते वे बंगाल की राजनीति के बड़े नेता बन गए. इसी आंदोलन ने उन्हें जमीनी नेता की पहचान दिलाई. क्यों टूटा ममता बनर्जी से रिश्ता? एक समय ऐसा था जब शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. वे टीएमसी सरकार में परिवहन और पर्यावरण मंत्री भी रहे. लेकिन समय के साथ दोनों के रिश्तों में दूरी बढ़ने लगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका और परिवारवाद की राजनीति से शुभेंदु नाराज थे. आखिरकार 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया. भाजपा में आने के बाद वे बंगाल में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे. विपक्ष के नेता के रूप में लगातार रहे आक्रामक भाजपा में शामिल होने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने विपक्ष के नेता के रूप में ममता सरकार को लगातार घेरा. एसएससी भर्ती घोटाला, संदेशखाली विवाद और आरजी कर अस्पताल मामले जैसे मुद्दों पर उन्होंने सड़क से लेकर विधानसभा तक आंदोलन किया. कई बार विधानसभा में हंगामे के कारण उन्हें निलंबन का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने खुद को बंगाल में भाजपा के सबसे आक्रामक नेता के रूप में स्थापित किया. बंगाल की राजनीति में नए दौर की शुरुआत भाजपा नेतृत्व लंबे समय से बंगाल में ऐसे चेहरे की तलाश में था, जिसकी जड़ें बंगाल की मिट्टी से जुड़ी हों और जो राज्य की संस्कृति को समझता हो. शुभेंदु अधिकारी इस कसौटी पर पूरी तरह फिट बैठे. अब मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल में भाजपा सरकार को स्थिर और मजबूत बनाना होगी. शुभेंदु की ताजपोशी को सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.
Suvendu Adhikari आज पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. कोलकाता के ऐतिहासिक Brigade Parade Ground में होने वाला यह समारोह राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. पहली बार बंगाल में भाजपा सरकार बनने जा रही है और इसे लेकर कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह दिखाई दे रहा है. घर से रवाना हुए शुभेंदु अधिकारी भगवा कुर्ते में शुभेंदु अधिकारी अपने आवास से शपथ ग्रहण समारोह के लिए रवाना हुए. उनके स्वागत के लिए घर के बाहर बड़े काफिले की व्यवस्था की गई थी. ब्रिगेड ग्राउंड के आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं. पूरे इलाके को कई सुरक्षा सेक्टरों में बांटा गया है और ड्रोन से निगरानी की जा रही है. अमित शाह की मौजूदगी में चुने गए विधायक दल के नेता शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah की मौजूदगी में भाजपा विधायक दल की बैठक हुई थी, जिसमें शुभेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया. भाजपा के 206 नवनिर्वाचित विधायकों ने उनके नाम का समर्थन किया. समारोह में शामिल होंगे पीएम मोदी समेत कई दिग्गज शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री Narendra Modi, अमित शाह और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता शामिल होंगे. इसके अलावा करीब 20 राज्यों के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी कोलकाता पहुंच चुके हैं. Pushkar Singh Dhami, Conrad Sangma, Samrat Choudhary और Rekha Gupta जैसे नेता समारोह में शामिल होने के लिए कोलकाता पहुंचे. भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह उत्तर बंगाल, आरामबाग, गोघाट और गंगासागर समेत कई इलाकों से हजारों भाजपा कार्यकर्ता ब्रिगेड मैदान की ओर रवाना हुए हैं. सियालदह स्टेशन पर भाजपा की ओर से विशेष सहायता शिविर लगाए गए हैं. समर्थक ढोल-नगाड़ों और नारों के साथ समारोह में पहुंच रहे हैं. बंगाल में ‘डबल इंजन’ सरकार का दावा महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम Eknath Shinde ने कहा कि बंगाल में अब डबल इंजन की सरकार चलेगी और राज्य में विकास, रोजगार और बेहतर कानून-व्यवस्था देखने को मिलेगी. वहीं यूपी के डिप्टी सीएम Keshav Prasad Maurya ने इसे “40 साल की काली रात के बाद नया सूर्योदय” बताया. सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे खास शपथ ग्रहण समारोह में बंगाल की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी. पुरुलिया छऊ नृत्य की विशेष प्रस्तुति रखी गई है. कई सांस्कृतिक हस्तियां और उद्योग जगत के बड़े नाम भी समारोह में शामिल होंगे. सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम ब्रिगेड ग्राउंड और आसपास के इलाकों में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं. कार्यक्रम स्थल को 35 सेक्टरों में बांटा गया है. हर सेक्टर की निगरानी आईपीएस अधिकारियों के जिम्मे है. पुलिस ने साफ किया है कि बिना जांच किसी को प्रवेश नहीं मिलेगा. बैग, बोतल और छाते ले जाने पर रोक लगाई गई है. नंदीग्राम और भवानीपुर की जीत बनी सबसे बड़ी ताकत भाजपा नेतृत्व शुभेंदु अधिकारी की इस ताजपोशी को उनकी बड़ी राजनीतिक जीत मान रहा है. पहले Nandigram में और फिर भवानीपुर में Mamata Banerjee को कड़ी चुनौती देने के बाद पार्टी ने उन्हें बंगाल की कमान सौंपने का फैसला किया है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर भी जाएंगे शुभेंदु सूत्रों के मुताबिक शपथ ग्रहण के बाद शुभेंदु अधिकारी Kalighat Kali Temple और Syama Prasad Mukherjee के आवास पर भी जाएंगे. बुधवार को विधानसभा में नवनिर्वाचित विधायकों का शपथ ग्रहण कार्यक्रम होगा.
Suvendu Adhikari Mission 60 Percent Vote: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने पार्टी के भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया है. नंदीग्राम में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि भाजपा आने वाले समय में बंगाल में अपना वोट शेयर 46 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जायेगी. बंगाल में विकास की राजनीति का दावा शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अब विकास की राजनीति को नई गति मिलेगी. उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य में ऐसा विकास होगा कि भाजपा का जनाधार तेजी से बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 46 प्रतिशत वोट मिले हैं और आने वाले वर्षों में यह समर्थन 60 प्रतिशत के पार पहुंच सकता है. शुभेंदु ने इसे भाजपा के “दीर्घकालिक राजनीतिक मिशन” का हिस्सा बताया. 10 दिन में छोड़ेंगे एक सीट भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों से जीत दर्ज करने के बाद अब शुभेंदु अधिकारी को नियम के मुताबिक एक सीट छोड़नी होगी. इस पर उन्होंने कहा कि वे अगले 10 दिनों के भीतर एक सीट से इस्तीफा दे देंगे. उन्होंने कहा कि किस सीट को बरकरार रखा जायेगा, इसका फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व करेगा. शुभेंदु ने कहा कि वे दोनों क्षेत्रों की जनता के आभारी हैं और किसी भी क्षेत्र की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटेंगे. “2011 के परिवर्तन का हिस्सा था, अब असली परिवर्तन होगा” अपने संबोधन में शुभेंदु अधिकारी ने 2011 के राजनीतिक बदलाव का भी जिक्र किया, जब उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर वाममोर्चा सरकार को सत्ता से बाहर करने में अहम भूमिका निभायी थी. उन्होंने कहा कि वह 2011 के परिवर्तन का हिस्सा थे, लेकिन अब बंगाल में “वास्तविक परिवर्तन” का दौर शुरू होगा. शुभेंदु ने दावा किया कि भाजपा ऐसा काम करेगी कि राज्य में पार्टी की सरकार “100 साल तक” बनी रहे. कार्यकर्ताओं से शांति बनाये रखने की अपील भाजपा नेता ने पार्टी कार्यकर्ताओं से फिलहाल विजय जुलूस और उत्सव से दूरी बनाये रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि 9 मई को नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद ही आधिकारिक रूप से जश्न मनाया जाये. उन्होंने कार्यकर्ताओं से अनुशासन और शांति बनाये रखने को कहा. साथ ही टीएमसी शासन के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं पर हुए कथित हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी. नंदीग्राम में पूजा और शहीद कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना भी की. इसके अलावा उन्होंने चुनावी हिंसा में मारे गये भाजपा कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार बनने के बाद राज्य के हर वर्ग और क्षेत्र तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाया जायेगा. शुभेंदु के “मिशन-60” बयान के बाद बंगाल की राजनीति में नई बहस शुरू हो गयी है और विपक्षी दलों में हलचल बढ़ गयी है.
SIR Impact on Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हार और जीत के कारणों को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गयी है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के पीछे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में यह दावा किया जा रहा है कि जिन सीटों पर मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाये गये, वहां भाजपा को भारी फायदा मिला. मतदाता सूची में बड़े बदलाव और बदला चुनावी गणित चुनाव आयोग की ओर से चलायी गयी SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ा, जहां तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत माना जाता था. बताया जा रहा है कि बंगाल की 177 ऐसी विधानसभा सीटें थीं, जहां हटाये गये मतदाताओं की संख्या 2021 में टीएमसी की जीत के अंतर से अधिक थी. इन सीटों में से 140 से ज्यादा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गयी है कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया. 15 हजार से ज्यादा नाम हटे, कई मंत्री हारे विश्लेषण के मुताबिक, करीब 50 सीटों पर 15 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे. इन्हीं सीटों पर टीएमसी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा ने इन इलाकों में आक्रामक प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत रणनीति अपनायी, जिसका फायदा उसे चुनाव में मिला. SIR प्रक्रिया से कैसे बदला समीकरण? निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में डिजिटल वेरिफिकेशन, आधार लिंकिंग और रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया गया. इसके तहत मृत और पलायन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे कथित फर्जी मतदान की संभावना कम हुई और चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इसे टीएमसी के चुनावी नेटवर्क पर बड़ा झटका बताया. ममता बनर्जी ने पहले ही जतायी थी आशंका चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे. पार्टी का आरोप था कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाये जा रहे हैं. हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया था. अब चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गयी है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची की सफाई से वास्तविक जनमत सामने आया, जबकि टीएमसी इसे अपने वोट बैंक को कमजोर करने की रणनीति बता रही है. भाजपा को मिला बड़ा फायदा राज्य में भाजपा ने 207 सीटों तक पहुंचकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया, सत्ताविरोधी माहौल और बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ने भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिलहाल बंगाल की राजनीति में SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है.
हैदराबाद, एजेंसियां। सनराइजर्स हैदराबाद ने पंजाब किंग्स को 33 रन से हराकर IPL 2026 पॉइंट्स टेबल में टॉप स्थान हासिल कर लिया। वहीं, पंजाब को इस सीजन में लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद टीम पहले स्थान से खिसककर दूसरे नंबर पर पहुंच गई। राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में पंजाब ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। इसके बाद हैदराबाद ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 235 रन बनाए। जवाब में 236 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पंजाब की टीम 20 ओवर में 7 विकेट पर 202 रन ही बना सकी। हैदराबाद की ओर से 2 फिफ्टी लगी पहले बैटिंग करने उतरी हैदराबाद के लिए हेनरिक क्लासन और ईशान किशन ने अर्धशतक लगाए। क्लासन ने 43 बॉल पर 69 और ईशान ने 32 बॉल पर 55 रन बनाए। दोनों के बीच तीसरे विकेट के लिए 88 रन की साझेदारी हुई। क्लासन और नीतीश रेड्डी (29*) के बीच चौथे विकेट के लिए 63 रन की साझेदारी हुई। इसके अलावा अभिषेक शर्मा (35) और ट्रैविस हेड (38) ने 55 रन की ओपनिंग पार्टनरशिप की। पंजाब के लिए लॉकी फर्ग्यूसन, विजयकुमार वैशाख, युजवेंद्र चहल को 1-1 विकेट मिला। काम ना आया कोनोली का शतक पंजाब का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। टीम ने फील्डिंग के दौरान 3 कैच छोड़े, जबकि टारगेट का पीछा करते समय लगातार विकेट गंवाती रही। पंजाब के लिए कूपर कोनोली के अलावा कोई बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। कोनोली ने 59 बॉल पर नाबाद 107 रन बनाए। उनके अलावा मार्कस स्टोयनिस ने 28 और सूर्यांश शेडगे ने 25 रन का योगदान दिया। हैदराबाद के लिए पैट कमिंस और शिवांग कुमार ने 2-2 विकेट लिए। नीतीश रेड्डी, ईशान मलिंगा और साकिब हुसैन को 1-1 विकेट मिला। पैट कमिंस प्लेयर ऑफ द् मैच चुने गये।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार शुभेंदु अधिकारी एक बड़े ‘टारगेट अचीवर’ के रूप में उभरे हैं। नंदीग्राम के बाद अब भवानीपुर में भी उन्होंने ममता बनर्जी को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो उनकी पिछली नंदीग्राम जीत (1956 वोट) से कहीं ज्यादा है। जीत के बाद भावुक हुए शुभेंदु अपनी जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने इसे भाजपा कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यह जीत उन 300 कार्यकर्ताओं की है, जिन्होंने राजनीतिक हिंसा में अपनी जान गंवाई। उन्होंने समर्थकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें हिंदू, जैन और सिख समुदायों का भरपूर समर्थन मिला, जिससे यह जीत संभव हो सकी। मोदी-शाह को दिया श्रेय शुभेंदु अधिकारी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विशेष आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया था। वहीं, अमित शाह ने भी जीत के बाद प्रतिक्रिया देते हुए भवानीपुर की जनता को बधाई दी और इसे बदलाव का संकेत बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाजपा की जीत पर कहा कि “बंगाल बदल गया है, एक नए युग की शुरुआत हुई है।” भाजपा कार्यकर्ताओं में जश्न शुभेंदु अधिकारी की जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कोलकाता सहित कई इलाकों में जश्न का माहौल रहा और समर्थक सड़कों पर उतरकर खुशी मनाते नजर आए। राजनीतिक संदेश साफ भवानीपुर जैसी सीट पर जीत को भाजपा के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है। यह न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की मजबूती को दिखाता है, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों का भी संकेत देता है।
कोलकाता/दुर्गापुर : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले सियासी बयानबाजी चरम पर पहुंच गई है। एग्जिट पोल के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी खेमे में उत्साह है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भी आत्मविश्वास भरे दावे करने शुरू कर दिए हैं। 6 मई को शपथ का दावा कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि ममता बनर्जी 6 मई को चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी। कोलकाता नगर निगम के अधिवेशन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस 202 से 225 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। उन्होंने भाजपा के दावों को सिरे से खारिज किया। दुर्गापुर में ‘गुड़-बतासा’ और पहरा दूसरी ओर, दुर्गापुर में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। दुर्गापुर गवर्नमेंट कॉलेज के पास बनाए गए पहरा केंद्र में कार्यकर्ता दिन-रात डटे हुए हैं। गर्मी से बचने के लिए कार्यकर्ता ‘गुड़-बतासा’ खा रहे हैं और राहगीरों को भी बांट रहे हैं। साथ ही, ‘पाचन’ (डंडा) शब्द का इस्तेमाल कर विरोधियों को चेतावनी देने की बात भी सामने आई है, जिससे सियासी माहौल और गरमा गया है। EVM सुरक्षा को लेकर आशंका टीएमसी के स्थानीय युवा नेता अजय देबनाथ का कहना है कि उन्हें EVM से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी वजह से कार्यकर्ता लगातार निगरानी कर रहे हैं और किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं। उन्होंने अणुव्रत मंडल के ‘मॉडल’ का हवाला देते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो ‘पाचन’ का इस्तेमाल भी किया जाएगा। भाजपा का तीखा पलटवार टीएमसी की इस सक्रियता पर भाजपा ने कड़ा हमला बोला है। भाजपा जिला प्रवक्ता सुमंत मंडल ने तंज कसते हुए कहा कि अणुव्रत मंडल खुद केंद्रीय एजेंसियों प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के मामलों में उलझे हुए हैं, लेकिन उनके समर्थक अब भी पुरानी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर ‘पाचन’ की राजनीति करनी है तो बंगाल नहीं, कहीं और जाना चाहिए। भाजपा का दावा है कि 4 मई के बाद तृणमूल नेताओं को सत्ता से बाहर होना पड़ेगा। बढ़ता सियासी तापमान नतीजों से पहले ही पश्चिम बंगाल में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। एक ओर टीएमसी सत्ता में वापसी का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर भाजपा बदलाव की बात कर रही है। अब सभी की नजरें 4 मई को आने वाले नतीजों और उसके बाद की सियासी तस्वीर पर टिकी हैं।
सुबह से ही कई जिलों में तनावपूर्ण माहौल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान के दौरान बुधवार सुबह से ही कई इलाकों में हिंसा, तोड़फोड़ और EVM में गड़बड़ी की खबरें सामने आईं। नदिया, हावड़ा, शांतिपुर और भांगर जैसे क्षेत्रों में मतदान के शुरुआती घंटों में ही माहौल तनावपूर्ण हो गया। यह चुनाव राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विवाद के बीच हो रहा है, जिसने पहले से ही राजनीतिक तापमान बढ़ा रखा है। चापड़ा में BJP एजेंट पर हमले का आरोप नदिया जिले के चापड़ा में बीजेपी ने आरोप लगाया कि उसके पोलिंग एजेंट मोशारेफ मीर पर तृणमूल समर्थकों ने हमला किया। बताया गया कि उन्हें लोहे की रॉड से पीटा गया, जिससे वह घायल हो गए। उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। बीजेपी उम्मीदवार सैकत सरकार ने घटना के लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। हावड़ा में EVM खराब, मतदान प्रभावित हावड़ा के एक मतदान केंद्र पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में तकनीकी खराबी की शिकायत मिली। इसके कारण कुछ समय के लिए मतदान प्रक्रिया बाधित रही। हालांकि, चुनाव अधिकारियों ने जल्द ही समस्या का समाधान कर मतदान दोबारा शुरू करा दिया। EVM को लेकर विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच पहले से ही तीखी बहस चलती रही है। एंटाली में प्रियंका तिबरेवाल की अधिकारियों से बहस कोलकाता के एंटाली विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी उम्मीदवार प्रियंका तिबरेवाल की मतदान केंद्र पर चुनाव अधिकारियों और सुरक्षा बलों से तीखी बहस हो गई। उनके पोलिंग एजेंट को बूथ से बाहर निकाले जाने पर विवाद बढ़ गया। प्रियंका ने आरोप लगाया कि मतदान केंद्र के भीतर पक्षपातपूर्ण गतिविधियां हो रही थीं। शांतिपुर और भांगर में भी तनाव शांतिपुर में बीजेपी के चुनावी कैंप में तोड़फोड़ की खबर आई। वहीं, दक्षिण 24 परगना के भांगर में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश से रोके जाने का आरोप लगा। इन घटनाओं ने कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ममता बनर्जी ने केंद्रीय बलों पर लगाए गंभीर आरोप मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्रीय सुरक्षा बलों पर बीजेपी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बाहरी पर्यवेक्षक और केंद्रीय बल मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। ममता ने कहा, "वोट मतदाता डालेंगे, सुरक्षा बल नहीं। इस तरह चुनाव नहीं कराए जा सकते।" 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 92.88 प्रतिशत मतदान हुआ था। दूसरे और अंतिम चरण के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। राज्य की राजनीति में इस बार ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच सीधी और बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।
जलपाईगुड़ी: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) को उत्तर बंगाल में बड़ा झटका लगा है। हल्दिबारी नगरपालिका की पार्षद पूर्वी रॉय प्रधान ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। चुनाव से एक सप्ताह पहले हुए इस घटनाक्रम को भाजपा के लिए क्षेत्र में मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है। टिकट से नाराज़गी बनी वजह मेखलीगंज विधानसभा सीट से परेश चंद्र अधिकारी को फिर से उम्मीदवार बनाए जाने पर पूर्वी रॉय नाराज़ थीं। शिक्षक भर्ती घोटाले में उनका नाम सामने आने के बाद भी टिकट दिए जाने पर उन्होंने सवाल उठाए और पार्टी छोड़ने का फैसला किया। पति पहले ही BJP में शामिल पूर्वी रॉय के पति अर्घ्य रॉय प्रधान, जो मेखलीगंज से पूर्व विधायक रह चुके हैं, हाल ही में भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में भाजपा का झंडा थामा था। अब पूर्वी रॉय ने भी उसी राह पर चलते हुए पार्टी बदल ली। TMC ने बताया ‘स्वार्थी’ तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता अमिताभ बिश्वास ने इस घटनाक्रम को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया। उनका कहना है कि इससे पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा और चुनावी नतीजों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने पति-पत्नी को “स्वार्थी” बताते हुए आरोप लगाया कि वे भविष्य में महिला आरक्षण लागू होने के बाद चुनावी फायदा उठाना चाहते हैं। पूर्वी रॉय ने लगाए गंभीर आरोप वहीं, पूर्वी रॉय ने पार्टी छोड़ने के पीछे अपनी अलग दलील दी है। उनका कहना है कि वह ऐसे उम्मीदवार के लिए प्रचार नहीं कर सकतीं, जिन पर शैक्षणिक भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। उन्होंने कहा कि “राज्य में हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ है, इसलिए मैं इस फैसले के खिलाफ हूं।” राजनीतिक असर पर नजर हल्दिबारी नगरपालिका की सभी 11 सीटों पर अब तक TMC का कब्जा रहा है। ऐसे में चुनाव से पहले इस तरह का दलबदल स्थानीय राजनीति में हलचल जरूर पैदा कर सकता है। अब देखना होगा कि इस घटनाक्रम का उत्तर बंगाल, खासकर कूचबिहार और मेखलीगंज क्षेत्र के चुनावी समीकरणों पर कितना असर पड़ता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 राज्य की राजनीति के लिए निर्णायक माना जा रहा है। 294 सीटों पर होने वाला यह चुनाव मुख्य रूप से TMC बनाम BJP की सीधी टक्कर बन चुका है। चुनाव शेड्यूल (2 चरण) पहला चरण: 23 अप्रैल 2026 (152 सीटें) दूसरा चरण: 29 अप्रैल 2026 (142 सीटें) मतगणना: 4 मई 2026 प्रक्रिया पूरी: 6 मई 2026 294 सीटों का गणित कुल सीटें: 294 बहुमत का आंकड़ा: 148 सीटें SC सीटें: 68 ST सीटें: 16 सामान्य सीटें: 210 SC आबादी (~23.5%) लगभग 127 सीटों पर असर डालती है क्षेत्रीय समीकरण (Game Changer) उत्तर बंगाल (54 सीटें): निर्णायक भूमिका दार्जिलिंग: गोरखा पहचान मुद्दा जलपाईगुड़ी/अलीपुरदुआर: चाय बागान + आदिवासी वोट मालदा-मुर्शिदाबाद: मुस्लिम बहुल दिनाजपुर: कृषि आधारित क्षेत्र मुख्य मुकाबला TMC (ममता बनर्जी) नारा: “बंगाल बचाओ” फोकस: महिला योजनाएं (लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री) मजबूत संगठन + “बंगाल की बेटी” छवि BJP नारा: “परिवर्तन, सोनार बांग्ला” मुद्दे: भ्रष्टाचार, हिंसा, CAA-NRC चेहरा: मोदी-शाह + शुभेंदु अधिकारी अन्य खिलाड़ी कांग्रेस: अकेले चुनाव वाम मोर्चा + ISF: सीमित प्रभाव लेकिन ये वोट कटवा फैक्टर बन सकते हैं वोटर प्रोफाइल कुल मतदाता: ~7.4 करोड़ पुरुष: 3.60 करोड़ महिला: 3.44 करोड़ पहली बार वोटर: 5.23 लाख 20–29 आयु वर्ग: 1.31 करोड़ चुनाव के बड़े मुद्दे बेरोजगारी और विकास राजनीतिक हिंसा पहचान की राजनीति (CAA/NRC) किसान और ग्रामीण संकट केंद्र vs राज्य टकराव 2021 vs अब (पॉलिटिकल बैकग्राउंड) TMC: 215 सीटें (48%) BJP: 77 सीटें (38%) TMC अभी मजबूत स्थिति में, लेकिन BJP चुनौती दे रही निर्णायक फैक्टर SC/ST वोट (खासकर मतुआ, नमशूद्र) उत्तर बंगाल की सीटें मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण शहरी मध्यम वर्ग का रुख चुनावी हिंसा पर नियंत्रण
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। Election Commission of India ने राज्य में दो चरणों में मतदान कराने का ऐलान किया है, जिसके बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा राज्य की सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बरकरार रखने की कोशिश में है। ऐसे में इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। पहला चरण: कड़ा मुकाबला 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होगा। अगर 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार माना जाए तो इन सीटों में से लगभग 92 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिली थी, जो करीब 60.5 प्रतिशत के बराबर है। वहीं भाजपा ने 59 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जो लगभग 38.8 प्रतिशत हिस्सेदारी बनती है, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। यह इलाका राजनीतिक रूप से मिश्रित माना जाता है। उत्तर, पश्चिम और मध्य पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में तृणमूल और भाजपा दोनों का प्रभाव रहा है। यही वजह है कि इस चरण को भाजपा के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माना जा रहा है, जहां पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। दूसरा चरण: TMC का मजबूत गढ़ दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा, जिसमें 142 सीटों पर मतदान होना है। इन सीटों में से लगभग 123 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, जो करीब 86.6 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाता है। इसके मुकाबले भाजपा को केवल 18 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह क्षेत्र तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। यहीं से ममता बनर्जी को लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी दिलाने में बड़ी मदद मिली थी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्लेषकों का मानना है कि दूसरे चरण में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती तृणमूल के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाना होगा। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है, जिससे पार्टी की पकड़ मजबूत बनी हुई है। दो हिस्सों में बंटा चुनावी मैदान दो चरणों में होने वाला यह चुनाव पश्चिम बंगाल को लगभग दो अलग-अलग चुनावी मैदानों में बांटता नजर आ रहा है। पहले चरण में जहां मुकाबला कड़ा दिखाई देता है, वहीं दूसरे चरण में तृणमूल कांग्रेस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति और चुनावी अभियान इन्हीं चरणों के हिसाब से तय होने की संभावना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।