यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
गुवाहाटी: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सीमावर्ती राज्यों में रहने वाले प्रत्येक परिवार की नागरिकता की जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि असम सरकार केंद्र सरकार को यह सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले सभी परिवारों की नागरिकता का सत्यापन किया जाए, ताकि अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलावों का सही आकलन किया जा सके। असम समझौते में हुई ऐतिहासिक भूल: सरमा पत्रकारों से बातचीत में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि 1985 के असम समझौते के दौरान केवल असम-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग की मांग को प्राथमिकता दी गई, जबकि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों की सीमाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, "यह एक ऐतिहासिक भूल थी। अगर एक जगह सीमा बंद कर दी जाए और दूसरे हिस्से खुले रहें, तो सुरक्षा उपायों का पूरा लाभ नहीं मिलता।" पश्चिम बंगाल का किया जिक्र मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक राज्य की सीमा का बड़ा हिस्सा खुला रहा, जिसके कारण अवैध आवागमन जारी रहा। उन्होंने कहा कि वर्षों तक सीमा प्रबंधन में कमियों के कारण घुसपैठ को पूरी तरह नहीं रोका जा सका। सीमावर्ती राज्यों में तेजी से हो रहा फेंसिंग का काम सरमा ने कहा कि अब स्थिति बदल रही है और भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि: मेघालय में सीमा फेंसिंग का लगभग 90 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। त्रिपुरा में करीब 60 प्रतिशत काम पूरा हो गया है। मिजोरम में फेंसिंग का कार्य जारी है। पश्चिम बंगाल में भी अब सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू हो गया है। डेमोग्राफी बदलाव की होगी जांच मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की है। असम सरकार इस समिति को सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले हर परिवार की नागरिकता की जांच की जाए। उन्होंने कहा कि नागरिकता सत्यापन और जनसंख्या संरचना में बदलाव का अध्ययन भविष्य में सीमा सुरक्षा को मजबूत करने और अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सीमा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। असम सरकार का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापक नागरिकता सत्यापन से सुरक्षा चुनौतियों की बेहतर पहचान की जा सकेगी और भविष्य की नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों और फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। गृह विभाग के निर्देश पर पुलिस, खुफिया एजेंसियां और केंद्रीय सुरक्षा बल संयुक्त रूप से संवेदनशील इलाकों में जांच अभियान चला रहे हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, खुफिया इनपुट के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों के जरिए संदिग्ध लोगों के रहने की आशंका है। अभियान केवल सीमावर्ती जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कोलकाता समेत प्रमुख शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में भी एक साथ चलाया जाएगा। सीमावर्ती जिलों में विशेष निगरानी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वरिष्ठ पुलिस और खुफिया अधिकारियों के साथ बैठक कर अभियान की रूपरेखा तैयार की है। उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे सीमावर्ती जिलों में विशेष जांच दल (SIT) गठित किए गए हैं, जो स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई गई सीमा सुरक्षा बल (BSF) और राज्य पुलिस ने संयुक्त गश्त बढ़ा दी है। संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, थर्मल इमेजिंग कैमरों और अन्य आधुनिक तकनीकों की मदद से चौबीसों घंटे निगरानी की जा रही है, ताकि अवैध आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। शहरी क्षेत्रों में भी पहचान सत्यापन अभियान कोलकाता, हावड़ा और हुगली के औद्योगिक क्षेत्रों, जूट मिलों और बड़े निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों के पहचान पत्रों की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति फर्जी पहचान के जरिए इन इलाकों में रह सकते हैं। फर्जी दस्तावेज नेटवर्क पर कार्रवाई पुलिस ने उत्तर 24 परगना के सीमावर्ती क्षेत्र से दो आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, दोनों पर अवैध रूप से सीमा पार कराने और फर्जी भारतीय दस्तावेज उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है। उनके कब्जे से कथित तौर पर कई फर्जी मुहरें और दस्तावेज बरामद किए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि अभियान आगे भी जारी रहेगा और अवैध दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 300 अतिरिक्त K-9 वज्र-टी स्वचालित हॉवित्जर तोपों की खरीद की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित सौदे की अनुमानित लागत लगभग 23,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव को जल्द ही रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जा सकता है। यदि इस परियोजना को स्वीकृति मिलती है, तो यह भारतीय सेना के हालिया वर्षों के सबसे बड़े तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में शामिल होगी। नई तोपों की तैनाती पाकिस्तान और चीन से लगने वाली सीमाओं पर की जाएगी, जिससे दोनों मोर्चों पर सेना की फायरपावर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। एलएंडटी को मिल सकता है निर्माण का जिम्मा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर इसका निर्माण कार्य लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को मिल सकता है। कंपनी दक्षिण कोरिया की रक्षा निर्माता कंपनी हनव्हा एयरोस्पेस के सहयोग से भारत में K-9 वज्र-टी का निर्माण करती है। नई खरीद के बाद भारतीय सेना के लिए ऑर्डर की गई K-9 वज्र तोपों की कुल संख्या 500 से अधिक हो जाएगी। रक्षा अधिकारियों का मानना है कि इससे पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर सेना की परिचालन क्षमता और युद्धक तैयारी को मजबूती मिलेगी। बदलती सुरक्षा चुनौतियों पर सेना का फोकस हाल के वर्षों में भारतीय सेना ने लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने वाली प्रणालियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में मोबाइल और तेज प्रतिक्रिया देने वाली तोप प्रणालियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इसी रणनीति के तहत सेना ऐसी प्रणालियों को प्राथमिकता दे रही है, जो विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में प्रभावी फायर सपोर्ट उपलब्ध करा सकें। क्या है K-9 वज्र की खासियत? K-9 वज्र-टी एक 155 मिमी/52 कैलिबर ट्रैक्ड स्वचालित हॉवित्जर तोप प्रणाली है। यह 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य पर सटीक प्रहार करने में सक्षम है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी "शूट एंड स्कूट" क्षमता है। यानी यह लक्ष्य पर गोले दागने के तुरंत बाद अपनी स्थिति बदल सकती है, जिससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचाव आसान हो जाता है। इसके अलावा यह बख्तरबंद सुरक्षा से लैस है और रेगिस्तानी इलाकों से लेकर ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से संचालन कर सकती है। यही कारण है कि इसे आधुनिक युद्ध प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। 2017 में हुआ था पहला सौदा भारत ने K-9 वज्र तोपों के लिए पहला बड़ा अनुबंध वर्ष 2017 में किया था। उस समय 100 तोपों की खरीद के लिए लगभग 4,500 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था। इनकी आपूर्ति निर्धारित समय से पहले वर्ष 2021 में पूरी कर ली गई थी। बाद में इन तोपों को मुख्य रूप से पाकिस्तान सीमा से लगे रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया, जहां इनके प्रदर्शन को सकारात्मक माना गया। 2023 में मिला दूसरा ऑर्डर K-9 वज्र की परिचालन सफलता को देखते हुए दिसंबर 2023 में भारतीय सेना ने 100 अतिरिक्त तोपों की खरीद को मंजूरी दी थी। इस सौदे की अनुमानित लागत करीब 7,600 करोड़ रुपये थी। इस निर्णय ने स्पष्ट संकेत दिया कि सेना भविष्य की युद्ध रणनीति में इस प्रणाली को महत्वपूर्ण भूमिका देती है। लद्दाख में भी सफल रहे परीक्षण हाल ही में K-9 वज्र के संशोधित शीतकालीन संस्करण का परीक्षण लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में किया गया। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, बेहद कम तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी इस प्रणाली का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। परीक्षण के सफल परिणामों के बाद उत्तरी सीमाओं पर अतिरिक्त K-9 वज्र इकाइयों की तैनाती की योजना को और बल मिला है। तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा प्रस्तावित खरीद भारतीय सेना के व्यापक तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। सेना समानांतर रूप से एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), धनुष तोप और उन्नत पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम जैसी परियोजनाओं पर भी काम कर रही है। रक्षा अधिकारियों का मानना है कि इन आधुनिक प्रणालियों के शामिल होने से भारतीय सेना भविष्य के किसी भी संघर्ष में तेजी से, सटीक और लगातार फायरपावर उपलब्ध कराने में पहले से अधिक सक्षम होगी।
नई दिल्ली: एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल करने के बाद ज्यादातर उम्मीदवार निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख करते हैं, लेकिन सरकारी क्षेत्र में भी MBA प्रोफेशनल्स के लिए कई शानदार अवसर मौजूद हैं। बैंकिंग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs), प्रशासनिक सेवाएं और बीमा क्षेत्र ऐसे विकल्प हैं, जहां न सिर्फ आकर्षक वेतन मिलता है बल्कि नौकरी की स्थिरता और कई अतिरिक्त सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं। आइए जानते हैं MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध चार प्रमुख करियर विकल्पों के बारे में। 1. बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर MBA ग्रेजुएट्स के लिए बैंकिंग क्षेत्र सबसे लोकप्रिय विकल्पों में गिना जाता है। RBI Grade B Officer रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) में ग्रेड बी अधिकारी का पद बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। यहां वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत कार्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां मिलती हैं। अनुमानित शुरुआती वेतन (भत्तों सहित): लगभग ₹1.5 लाख प्रतिमाह अधिक जानकारी: RBI की आधिकारिक वेबसाइट सरकारी बैंकों में PO और SO पद सरकारी बैंकों में प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और स्पेशलिस्ट ऑफिसर (SO) के पदों पर MBA उम्मीदवारों को अवसर मिलते हैं। SEBI और IRDAI जैसे संस्थान वित्तीय रणनीति, निवेश और नियामकीय कार्यों से जुड़े पदों पर भी MBA प्रोफेशनल्स की मांग रहती है। 2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs) देश की प्रमुख सरकारी कंपनियां MBA उम्मीदवारों की भर्ती करती हैं। प्रमुख कंपनियां: ONGC NTPC BHEL GAIL इन संस्थानों में मैनेजमेंट ट्रेनी, HR, मार्केटिंग और ऑपरेशंस जैसे पदों पर नियुक्तियां होती हैं। अनुमानित वार्षिक पैकेज: ₹12 लाख से ₹25 लाख तक 3. UPSC और प्रशासनिक सेवाएं MBA ग्रेजुएट्स संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में भी हिस्सा ले सकते हैं। सिविल सेवा (IAS, IPS, IRS) MBA डिग्री धारक IAS, IPS और IRS जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं। अनुमानित वेतन (भत्तों सहित): ₹80,000 से ₹1 लाख प्रतिमाह Indian Economic Service (IES) आर्थिक नीति और वित्तीय मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पदों के लिए भी MBA उम्मीदवार अवसर प्राप्त कर सकते हैं। 4. बीमा क्षेत्र में सरकारी नौकरियां LIC और अन्य सरकारी बीमा कंपनियों में MBA प्रोफेशनल्स की अच्छी मांग रहती है। इन संस्थानों में: रिस्क मैनेजमेंट प्रशासन मैनेजमेंट ऑपरेशनल रोल्स जैसे पदों पर भर्ती की जाती है। अनुमानित शुरुआती वेतन: ₹1 लाख से ₹1.25 लाख प्रतिमाह MBA के बाद सरकारी नौकरी क्यों है अच्छा विकल्प? आकर्षक वेतन नौकरी की सुरक्षा पेंशन और अन्य भत्ते करियर में स्थिरता बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में करियर बनाने वाले उम्मीदवारों के लिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। सही तैयारी और उचित परीक्षा चयन के माध्यम से एक सफल और स्थायी करियर बनाया जा सकता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिशों के बीच नेपाल द्वारा भारत-नेपाल सीमा पर चीनी तकनीक आधारित थर्मल निगरानी कैमरे लगाने की खबरों ने नई चर्चा छेड़ दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल उत्तराखंड से सटी सीमा पर आधुनिक थर्मल सर्विलांस सिस्टम स्थापित कर रहा है, जिनका उपयोग दिन और रात दोनों समय गतिविधियों की निगरानी के लिए किया जाएगा। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इन कैमरों के संचालन के लिए चीनी संचार और इंटरनेट ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन दावों की अभी तक भारत या नेपाल की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 2016 से शुरू हुई थी तकनीकी साझेदारी नेपाल और चीन के बीच सीमा निगरानी से जुड़ा तकनीकी सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच वर्ष 2016 में सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को लेकर समझौते हुए थे। इसके बाद 2019 में सीमा क्षेत्रों के सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन के लिए वित्तीय मंजूरी दी गई। झूलाघाट समेत कई सीमावर्ती क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया था, जहां बाद में निगरानी प्रणाली स्थापित करने की योजना बनाई गई। इसी प्रक्रिया के तहत अब थर्मल कैमरों की तैनाती को आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड सीमा के किन क्षेत्रों पर रहेगी नजर? भारत और नेपाल के बीच उत्तराखंड में करीब 275 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारतीय सीमा की सुरक्षा Sashastra Seema Bal (SSB) और नेपाल की ओर से Armed Police Force Nepal संभालती है। भारतीय क्षेत्र में पिथौरागढ़, झूलाघाट, धारचूला, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जैसे इलाके इस सीमा का हिस्सा हैं। वहीं नेपाल की ओर दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और कंचनपुर जिले सीमा से जुड़े हुए हैं। कालापानी विवाद के बाद बढ़ा फोकस विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत-नेपाल के बीच पैदा हुए विवाद के बाद नेपाल ने सीमा क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। इसी दौरान नेपाल ने कई नए बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) स्थापित किए और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों के विस्तार की योजना शुरू की। थर्मल कैमरों की तैनाती को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत ने भी मजबूत की निगरानी व्यवस्था सीमा पार गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत ने भी हाल के वर्षों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है। प्रमुख सीमा बिंदुओं पर डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम, आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण और चौबीसों घंटे गश्त की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार करने वाले लोगों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को और सख्त बनाया गया है। संवेदनशील इलाकों में SSB और स्थानीय पुलिस संयुक्त रूप से निगरानी कर रही है। राजनीतिक बयानबाजी भी बनी चिंता नेपाल की राजनीति में समय-समय पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों को लेकर बयान सामने आते रहे हैं। हाल के महीनों में नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah के कुछ बयानों ने भी चर्चा पैदा की थी, बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया था। रिश्ते सुधारने की कोशिश जारी सीमा पर तकनीकी गतिविधियों के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क भी जारी हैं। नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व और भारतीय अधिकारियों के बीच हाल के महीनों में कई उच्चस्तरीय मुलाकातें हुई हैं। डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। सीमा पर चीन निर्मित निगरानी उपकरणों की तैनाती और संभावित चीनी संचार नेटवर्क के इस्तेमाल की खबरों ने सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर आकर्षित किया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में बनाए गए होल्डिंग सेंटरों में संदिग्ध घुसपैठियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, दिनहाटा और चांगराबांधा स्थित होल्डिंग सेंटरों में कई लोगों को अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने के संदेह में रखा गया है। इन लोगों की पहचान और उनके दस्तावेजों की जांच की जा रही है। दो होल्डिंग सेंटरों में रखे गए 14 संदिग्ध जानकारी के मुताबिक, दिनहाटा नगरपालिका के कम्युनिटी हॉल में बनाए गए होल्डिंग सेंटर में चार लोगों को रखा गया है। वहीं मेखलीगंज क्षेत्र के चांगराबांधा ट्रक टर्मिनस स्थित होल्डिंग सेंटर में रविवार को दस अन्य लोगों को लाया गया। अधिकारियों का मानना है कि ये सभी लोग बांग्लादेश सीमा के रास्ते अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए हो सकते हैं। हालांकि प्रशासन और पुलिस ने अभी तक हिरासत में लिए गए लोगों की पहचान, उनके भारत आने की तारीख या सीमा पार करने के स्थानों को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है। सीमावर्ती जिला होने से बढ़ी चुनौती कूचबिहार की लगभग 500 किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। सीमा के कुछ हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अभी भी कंटीले तारों की बाड़ नहीं लगाई जा सकी है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसे क्षेत्रों का उपयोग अवैध घुसपैठ और तस्करी के लिए किया जाता रहा है। बढ़ाई गई निगरानी और सुरक्षा प्रशासन ने होल्डिंग सेंटरों में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं। सेंटरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और पुलिस निगरानी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर जिले में और होल्डिंग सेंटर भी बनाए जा सकते हैं। जांच के बाद होगा अगला फैसला प्रशासन फिलहाल सभी संदिग्ध व्यक्तियों के दस्तावेजों और पहचान की जांच कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद उनके संबंध में आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। इस बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के प्रयास जारी हैं।
त्रिपुरा: केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने त्रिपुरा के भारत-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र का दौरा करते हुए सीमावर्ती इलाकों में किसी भी प्रकार के डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश किसी भी कीमत पर सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संरचना में बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा। लंकामुरा सीमा चौकी पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों को संबोधित करते हुए शाह ने घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। सीमावर्ती इलाकों में बदलाव पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति गृह मंत्री ने कहा कि भारत की नीति साफ है—सीमावर्ती राज्यों में किसी भी तरह के अवैध घुसपैठ या डेमोग्राफिक बदलाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ त्रिपुरा तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य सीमावर्ती राज्यों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। शाह ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता से जुड़ा गंभीर विषय बताया। घुसपैठ रोकने के लिए ‘स्मार्ट बॉर्डर’ प्रोजेक्ट शाह ने सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार की नई पहल ‘स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट’ का भी ऐलान किया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना को पायलट आधार पर देश के 7 से 8 संवेदनशील स्थानों पर लागू किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत आधुनिक तकनीक, डिजिटल निगरानी और स्थानीय प्रशासन के बेहतर समन्वय का उपयोग किया जाएगा। सीमा पर किसी भी प्रकार के अवैध अतिक्रमण को रोकने के लिए शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाएगी। सीमा पर अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर गृह मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सीमा क्षेत्रों में कट्टरपंथी गतिविधियों, संदिग्ध वाहनों और फर्जी कंपनियों पर लगातार निगरानी रखी जाए। उन्होंने कहा कि सीमा की सुरक्षा केवल भौतिक चौकसी नहीं, बल्कि तकनीकी और खुफिया तंत्र के माध्यम से भी मजबूत की जाएगी। बीएसएफ जवानों की सराहना और पर्यावरण संदेश अपने दौरे के दौरान Border Security Force के जवानों की सराहना करते हुए शाह ने कहा कि सीमाओं की सुरक्षा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उन्होंने ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का भी उल्लेख किया और जवानों द्वारा पेड़ लगाने के प्रयासों की सराहना की। शाह ने कहा कि यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक स्वाभाविक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन पर जोर गृह मंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। यह दौरा भारत की सीमाई सुरक्षा रणनीति और घुसपैठ रोकने के प्रयासों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर नया विवाद सामने आया है। बांग्लादेश ने आरोप लगाया है कि पिछले 24 घंटों में भारत की ओर से लोगों को उसकी सीमा में भेजने के कई प्रयास किए गए, जिन्हें उसकी सुरक्षा एजेंसियों ने विफल कर दिया। करीब 4,000 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर हालात को देखते हुए बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने निगरानी बढ़ा दी है और अवैध प्रवेश के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। झिनाइदाह क्षेत्र की घटना बनी तनाव की वजह बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, झिनाइदाह जिले के सीमा क्षेत्र में कुछ लोगों को कथित रूप से सीमा पार कराने की कोशिश की गई थी। सुरक्षा बलों ने समय रहते हस्तक्षेप कर इस प्रयास को रोकने का दावा किया है। इस घटना ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील सीमा मुद्दों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। शेख हसीना के बाद बदलते रिश्तों पर नया दबाव पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के संबंध नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। ऐसे समय में सीमा से जुड़ा यह विवाद द्विपक्षीय संबंधों के लिए नई चुनौती बन सकता है। ढाका का कहना है कि किसी भी नागरिक की वापसी स्थापित कानूनी और राजनयिक प्रक्रियाओं के तहत होनी चाहिए, न कि एकतरफा कार्रवाई के माध्यम से। दिल्ली में होने वाली बैठक से समाधान की उम्मीद सीमा विवाद के बीच 8 से 11 जून तक नई दिल्ली में दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुखों की बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में अवैध आव्रजन, सीमा सुरक्षा और नागरिकों की वापसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वार्ता दोनों देशों के बीच बढ़ती गलतफहमियों को दूर करने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। सीमाई तनाव के बीच बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सीमा विवाद के समानांतर बांग्लादेश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला है। अवामी लीग की वरिष्ठ नेता Selina Hayat Ivy को जमानत मिलने के बाद रिहा कर दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत देता है। अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर बढ़ी बहस International Crisis Group ने बांग्लादेश सरकार से अवामी लीग पर संभावित प्रतिबंध लगाने के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। संगठन का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक ताकतों की भागीदारी जरूरी है। सीमा सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता दोनों बड़ी चुनौती भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ता तनाव और बांग्लादेश के भीतर जारी राजनीतिक हलचल दोनों देशों के संबंधों पर असर डाल सकती है। अब निगाहें नई दिल्ली में होने वाली वार्ता और ढाका की राजनीतिक दिशा पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा तय कर सकती हैं।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने सीमा पर बाड़ लगाने और सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) को लगभग 32 एकड़ जमीन सौंप दी है। यह फैसला लंबे समय से लंबित था और अब राज्य कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे अमल में लाया जा रहा है। राज्य के पंचायत मंत्री दिलीप घोष ने कैबिनेट बैठक के बाद जानकारी देते हुए बताया कि बांग्लादेश सीमा से सटे विभिन्न इलाकों में स्थायी सीमा चौकियों और बाड़बंदी के निर्माण के लिए कुल 31.905 एकड़ भूमि बीएसएफ को हस्तांतरित की गई है। यह जमीन नौ अलग-अलग स्थानों पर स्थित है और इसका उपयोग सीमा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में किया जाएगा। मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार में भी बनेगी नई चौकियां सरकार ने इसके अलावा मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार जिलों में 1.53 एकड़ अतिरिक्त भूमि देने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है। इस जमीन पर तीन नई स्थायी सीमा चौकियां बनाई जाएंगी। वहीं उत्तर दिनाजपुर जिले में 11 स्थानों पर 12.72 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है, जिससे सीमा पर बाड़ लगाने के कार्य में तेजी आएगी। हाईकोर्ट ने जताई थी नाराजगी सीमा सुरक्षा से जुड़ा यह मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ था। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़बंदी के लिए भूमि हस्तांतरण में हो रही देरी पर राज्य सरकार की आलोचना की थी। अदालत ने सीमा सुरक्षा के महत्व को देखते हुए प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत बताई थी। रेल परियोजना को भी मिली राहत कैबिनेट बैठक में एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए जलपाईगुड़ी जिले के नागराकाटा क्षेत्र में 20 एकड़ सरकारी जमीन वन विभाग को सौंपने का फैसला लिया गया। बाद में यह भूमि सेवक-रंगपो रेलवे लाइन परियोजना के लिए उपयोग की जाएगी। सरकार के इस फैसले को सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने और बुनियादी ढांचे के विकास की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इससे सीमा क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के सभी 23 जिलों में होल्डिंग सेंटर्स बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का कहना है कि इन केंद्रों का उद्देश्य संदिग्ध घुसपैठियों और नागरिकता जांच के दायरे में आये लोगों को अस्थायी रूप से रखना है, ताकि दस्तावेजों का सत्यापन पूरा किया जा सके। जेल नहीं, ‘सुविधा केंद्र’ के तौर पर तैयार किये गये सेंटर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि होल्डिंग सेंटर्स जेल नहीं हैं। इन्हें ट्रांजिट सुविधा केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां रहने वाले लोगों को भोजन, साफ बिस्तर और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी। सरकार के मुताबिक, इन केंद्रों में किसी भी व्यक्ति को अधिकतम 30 दिनों तक रखा जा सकेगा। इस दौरान उनकी पहचान और दस्तावेजों की जांच की जायेगी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीसीटीवी कैमरे, पुलिस बल और सिविल डिफेंस कर्मियों की तैनाती की गयी है। मालदा और मुर्शिदाबाद में शुरू हुआ ऑपरेशन सीमावर्ती जिलों में इन केंद्रों ने काम करना भी शुरू कर दिया है। मालदा जिले के इंग्लिश बाजार स्थित एक सरकारी प्रशिक्षण केंद्र की एक मंजिल को होल्डिंग सेंटर में बदला गया है। यहां हाल ही में पकड़े गये 9 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है। वहीं मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित ‘पद्म भवन’ में दूसरा केंद्र सक्रिय किया गया है। यहां जाली दस्तावेजों के साथ पकड़े गये लोगों को शिफ्ट किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्र में प्रवेश से पहले सभी लोगों का मेडिकल परीक्षण कराया जा रहा है ताकि संक्रमण या बीमारी के खतरे को रोका जा सके। क्या है ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति? राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ अपनी रणनीति को ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नाम दिया है। डिटेक्ट (Detect) : संदिग्ध घुसपैठियों और फर्जी दस्तावेज रखने वालों की पहचान करना। डिलीट (Delete) : अवैध रूप से वोटर लिस्ट या सरकारी रिकॉर्ड में शामिल लोगों के नाम हटाना। डिपोर्ट (Deport) : दस्तावेज सत्यापन के बाद संबंधित व्यक्तियों को बीएसएफ को सौंपना, ताकि उन्हें उनके देश वापस भेजा जा सके। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि उनकी सरकार घुसपैठ के मामले में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम कर रही है। CAA के तहत अल्पसंख्यकों को राहत सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पड़ोसी देशों से भारत आये हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत सुरक्षा प्रदान की जायेगी। विपक्ष ने उठाये सवाल जहां बीजेपी सरकार इस अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्षी दल टीएमसी ने प्रक्रिया को लेकर चिंता जतायी है। टीएमसी का कहना है कि कार्रवाई के दौरान किसी भी भारतीय नागरिक को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार चलायी जा रही है और इसका उद्देश्य केवल अवैध घुसपैठ पर रोक लगाना है।
अहमदाबाद, एजेंसियां। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है। गुरुवार को अहमदाबाद दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि पहले पश्चिम बंगाल में हर दिन घुसपैठ होती थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और अवैध घुसपैठिए खुद वापस लौटने लगे हैं। अमित शाह ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने बताया कि राज्य में अवैध रूप से रह रहे लोगों के लिए डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं। शाह ने कहा कि सरकार चाहती है कि जो लोग अवैध तरीके से भारत आए हैं, वे स्वेच्छा से अपने देश लौट जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर लोग खुद वापस जाते हैं तो उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी और सरकार उनकी वापसी में मदद भी करेगी। घुसपैठ रोकने के लिए बनी हाई लेवल कमेटी गृह मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार देशभर से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच के लिए एक हाई लेवल कमेटी का गठन किया गया है। यह कमेटी देश में हो रहे कृत्रिम जनसंख्या बदलावों, उसके कारणों और रोकथाम के उपायों पर अध्ययन करेगी। जरूरत पड़ने पर कानून बनाने की सिफारिश भी की जाएगी। BSF को जमीन सौंपने पर शुभेंदु अधिकारी की तारीफ अमित शाह ने पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से BSF को जमीन सौंपने के फैसले की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य सरकार ने केवल सात दिनों में 600 हेक्टेयर जमीन BSF को सौंप दी। इसके अलावा चिकन नेक इलाके की 121 हेक्टेयर भूमि भी सीमा सुरक्षा के लिए उपलब्ध कराई गई है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद शुरू हुई 3D नीति का असर अब सीमा क्षेत्रों में साफ दिखाई देने लगा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की “Detect, Delete and Deport” यानी “पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो” नीति के बाद अवैध रूप से रह रहे संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों में दहशत का माहौल बताया जा रहा है। उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट स्थित हकीमपुर बॉर्डर पर पिछले दो दिनों में बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर बांग्लादेश लौटने की कोशिश करते दिखाई दिए। इनमें पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। सामान और परिवार के साथ बॉर्डर पर जुटे लोग हकीमपुर सीमा चौकी पर पहुंचे कई लोग अपने साथ घरेलू सामान, बिस्तर, बर्तन और बड़े-बड़े बोरे लेकर पहुंचे हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से अधिकतर लोग कोलकाता, दमदम, न्यूटाउन और डानकुनी जैसे इलाकों में वर्षों से दिहाड़ी मजदूर या घरेलू सहायक के तौर पर काम कर रहे थे। सीमा पर मौजूद लोगों का कहना है कि प्रशासन की सख्ती और निरुद्ध केंद्रों की शुरुआत के बाद उनके बीच डर का माहौल बन गया है। एक व्यक्ति ने कहा, “अगर सरकार हमें यहां रहने नहीं देगी और डिटेंशन सेंटर में भेज देगी, तो हमारे पास वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।” मालदा में शुरू हुआ पहला निरुद्ध केंद्र राज्य सरकार की कार्रवाई के तहत मालदा में पहला निरुद्ध केंद्र शुरू किया गया है। यहां फिलहाल 9 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है। प्रशासन के अनुसार, इन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक केंद्र में रखा जाएगा, जिसके बाद निर्वासन की कार्रवाई की जाएगी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अन्य जिलों में भी ऐसे केंद्र सक्रिय करने की तैयारी चल रही है। बीएसएफ भी बढ़ी भीड़ से सतर्क सीमा सुरक्षा बल (BSF) के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि पिछले दो दिनों में सीमा पार लौटने की कोशिश करने वालों की संख्या अचानक बढ़ी है। अधिकारियों के अनुसार, दस्तावेजों की जांच की जा रही है और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के साथ समन्वय बनाकर आगे की प्रक्रिया तय की जा रही है। बीएसएफ के अधिकारियों का कहना है कि कई लोग खुद ही सीमा चौकी पर पहुंचकर वापस भेजे जाने की मांग कर रहे हैं। जाली दस्तावेज पकड़े जाने का डर सूत्रों के मुताबिक, कई लोगों को यह आशंका है कि यदि घर-घर जांच अभियान चलाया गया तो उनके आधार कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेजों की जांच हो सकती है। इसी डर के चलते कई परिवार जल्द से जल्द सीमा पार लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि प्रशासन अवैध पहचान पत्रों और फर्जी दस्तावेजों की भी जांच कर रहा है। हकीमपुर बॉर्डर पर शरणार्थी शिविर जैसे हालात हकीमपुर सीमा चौकी पर मौजूद तस्वीरों में लोग प्लास्टिक की चादरों के नीचे खुले आसमान में बैठे नजर आ रहे हैं। उनके पास वर्षों की जमा पूंजी और घरेलू सामान से भरे बैग और गठरियां दिखाई दे रही हैं। सीमा क्षेत्र में अचानक बढ़ी भीड़ के कारण प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं। पहले भी दिखा था ऐसा माहौल पिछले वर्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान भी सीमा क्षेत्रों में ऐसी हलचल देखी गई थी। इस बार नई सरकार की सख्ती और 3D अभियान के कारण स्थिति अधिक गंभीर मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार की नई नीति ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अवैध प्रवास के मामलों में अब सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में नई सरकार की ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ नीति के बाद अवैध प्रवासियों के बीच हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है। भाजपा नेताओं और सोशल मीडिया पोस्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर सीमा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग जमा होने लगे हैं। भाजपा ने सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि राज्य में अवैध रूप से रह रहे लोग अब सीमा पार लौटने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि विशेष पहचान प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी ऐसे दृश्य सामने आए थे और अब सरकार की सख्त नीति के बाद फिर से सीमा क्षेत्रों में भीड़ बढ़ने लगी है। होल्डिंग सेंटर और पहचान प्रक्रिया पर जोर रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य सरकार ने मालदा में एक होल्डिंग सेंटर तैयार किया है, जहां कथित अवैध प्रवासियों को रखा जाएगा। इसके बाद उनकी पहचान प्रक्रिया पूरी कर उन्हें संबंधित एजेंसियों के माध्यम से डिपोर्ट करने की कार्रवाई की जाएगी। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि सरकार अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए विशेष अभियान चला रही है। इसके तहत दस्तावेजों की जांच और नागरिकता संबंधी सत्यापन पर जोर दिया जा रहा है। शुभेंदु अधिकारी के बयान से बढ़ी चर्चा हाल ही में एक बैठक के दौरान भाजपा नेता शुवेंदी अधिकारी ने कहा था कि जो लोग नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के दायरे में नहीं आते, उन्हें अवैध घुसपैठिया माना जाएगा और सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा जाएगा। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार हालांकि, सीमा पर जुटी भीड़ और बड़े पैमाने पर लोगों के लौटने के दावों की अब तक प्रशासन की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। विपक्षी दलों ने भी भाजपा के दावों पर सवाल उठाए हैं। इसके बावजूद राज्य में अवैध प्रवास और नागरिकता का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ संकेत दिया कि अब बंगाल में भी असम मॉडल लागू किया जाएगा और बांग्लादेश सीमा पर सख्त निगरानी रखी जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार सीमा पर तेजी से बाड़ लगाने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करेगी। असम की तर्ज पर होगी कार्रवाई असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के दूसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि असम और त्रिपुरा में जिस तरह अवैध घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई हुई है, उसी मॉडल को अब बंगाल में अपनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि देशहित में सीमाओं को सुरक्षित करना बेहद जरूरी है और भाजपा सरकार इस दिशा में कठोर कदम उठाएगी। TMC सरकार पर साधा निशाना सुवेंदु अधिकारी ने पिछली टीएमसी सरकार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि तुष्टीकरण की राजनीति के कारण सीमा सुरक्षा कमजोर हुई। उन्होंने कहा कि कई इलाकों में BSF को बाड़ लगाने के लिए जमीन नहीं दी गई, जिसकी वजह से सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाई। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उनकी सरकार अब इस प्रक्रिया को तेज कर रही है। 45 दिनों में पूरी होगी जमीन हस्तांतरण प्रक्रिया कोलकाता में हुई पहली कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए आवश्यक जमीन 45 दिनों के भीतर केंद्रीय गृह मंत्रालय और BSF को सौंप दी जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार अपराधों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। पूर्वी राज्यों के गठजोड़ पर जोर सुवेंदु अधिकारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “पूर्वोदय अभियान” का जिक्र करते हुए कहा कि पूर्वी भारत के भाजपा शासित राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जाएगा। उन्होंने हिमंत बिस्वा सरमा को अपना “मार्गदर्शक और संकटमोचक” बताते हुए कहा कि असम की विकास और सुरक्षा नीति बंगाल के लिए प्रेरणा बनेगी। राजनीतिक हलकों में बढ़ी चर्चा मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा बता रहा है, जबकि भाजपा इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कदम बता रही है। आने वाले दिनों में सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ का मुद्दा बंगाल की राजनीति का प्रमुख विषय बन सकता है।
Suvendu Adhikari के मुख्यमंत्री बनते ही West Bengal में कानून-व्यवस्था और सीमा सुरक्षा को लेकर बड़े फैसलों का दौर शुरू हो गया है। अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में शुभेंदु सरकार ने गौ-तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा कदम उठाया। सरकार ने Border Security Force (BSF) को बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी (Fencing) के लिए जमीन हस्तांतरण की मंजूरी दे दी है। सरकार का मानना है कि जब तक सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय गौ-तस्करी और घुसपैठ पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा। गौ-तस्करी के नेटवर्क पर बड़ा प्रहार कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि बंगाल में अब तस्करों और अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान सीमा पर बाड़बंदी का काम लंबे समय तक अटका रहा, जिसकी वजह से तस्करी का नेटवर्क मजबूत होता गया। अब सरकार का दावा है कि BSF को जमीन मिलने के बाद सीमा पर तेजी से बाड़ लगाने का काम पूरा किया जाएगा, जिससे तस्करी के प्रमुख रास्ते बंद हो सकेंगे। ‘नार्को-टेरर’ और तस्करी के गठजोड़ पर नजर राज्य सरकार का कहना है कि गौ-तस्करी से आने वाला पैसा सिर्फ अवैध कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सुरक्षा से जुड़े खतरे भी पैदा हो रहे हैं। इसी को देखते हुए गृह विभाग को निर्देश दिया गया है कि तस्करी में शामिल बड़े नेटवर्क और कथित सरगनाओं पर सख्त कार्रवाई की जाए। सरकार इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान रही है। सीमावर्ती जिलों पर खास फोकस कैबिनेट बैठक में सीमावर्ती जिलों में तेजी से बदलते जनसंख्या पैटर्न को भी गंभीर विषय बताया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा मजबूत करना राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी है। भूमि एवं राजस्व विभाग को निर्देश दिया गया है कि BSF को जमीन सौंपने की प्रक्रिया 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए ताकि बाड़बंदी के काम में और देरी न हो। केंद्र के साथ संयुक्त अभियान की तैयारी राज्य सरकार अब केंद्र सरकार के साथ मिलकर संयुक्त अभियान (Joint Operation) चलाने की तैयारी में भी है। इसके तहत सीमा सुरक्षा, घुसपैठ रोकने और अवैध गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जाएगा। इसके अलावा जनगणना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को तेजी से लागू करने का फैसला भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक संदेश भी साफ भाजपा सरकार के इस फैसले को राजनीतिक तौर पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने लगातार सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और गौ-तस्करी को बड़ा मुद्दा बनाया था। अब सत्ता में आने के बाद सरकार ने पहली कैबिनेट में ही इस दिशा में बड़ा फैसला लेकर यह संकेत देने की कोशिश की है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था और सीमा प्रबंधन को लेकर नई नीति अपनाई जाएगी।
West Bengal में राजनीतिक बदलाव के बाद अब अवैध घुसपैठ का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है. नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले ही भारत सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाएगी. इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय ने भी अपना रुख साफ कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने कहा कि भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की जा रही है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उन्हें वापस भेजा जाएगा. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए Bangladesh का सहयोग जरूरी है. उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेश की ओर से 2,860 से अधिक नागरिकता सत्यापन आवेदन अब भी लंबित हैं. इनमें कई मामले पांच साल से ज्यादा समय से अटके हुए हैं. भारत ने उम्मीद जताई है कि ढाका जल्द इन आवेदनों का निपटारा करेगा ताकि निर्वासन प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी हो सके. भाजपा के चुनावी वादे के बाद बढ़ी चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कई रैलियों में कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो “घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर किया जाएगा.” अब भाजपा सरकार बनने के बाद इस मुद्दे पर कार्रवाई की संभावना को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. बांग्लादेश ने जताई चिंता इस बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman ने आशंका जताई थी कि भारत बड़ी संख्या में लोगों को बांग्लादेश भेज सकता है. उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो ढाका भी इस पर सख्त कदम उठाएगा. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे. तीस्ता जल संधि पर भी बढ़ी उम्मीद भाजपा की जीत के बाद एक और बड़ा मुद्दा चर्चा में आ गया है – Teesta Water Treaty. बांग्लादेश की सत्तारूढ़ पार्टी बीएनपी के नेताओं का मानना है कि पहले राज्य सरकार के विरोध के कारण यह समझौता आगे नहीं बढ़ पा रहा था. अब नई राजनीतिक परिस्थितियों में इस पर प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है. बीएनपी के सूचना सचिव Azizul Bari Helal ने कहा कि नई सरकार केंद्र के साथ बेहतर तालमेल में काम कर सकती है, जिससे भारत और बांग्लादेश के बीच लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है. क्या होगा आगे? विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दिनों में: अवैध प्रवासियों की पहचान अभियान तेज हो सकता है सीमा प्रबंधन और नागरिकता सत्यापन पर फोकस बढ़ेगा भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए कूटनीतिक समीकरण बन सकते हैं तीस्ता जल समझौते जैसे लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है नई सरकार के गठन के साथ अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य मिलकर इस संवेदनशील मुद्दे पर किस तरह आगे बढ़ते हैं.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।