कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों और फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। गृह विभाग के निर्देश पर पुलिस, खुफिया एजेंसियां और केंद्रीय सुरक्षा बल संयुक्त रूप से संवेदनशील इलाकों में जांच अभियान चला रहे हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, खुफिया इनपुट के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों के जरिए संदिग्ध लोगों के रहने की आशंका है। अभियान केवल सीमावर्ती जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कोलकाता समेत प्रमुख शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में भी एक साथ चलाया जाएगा। सीमावर्ती जिलों में विशेष निगरानी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वरिष्ठ पुलिस और खुफिया अधिकारियों के साथ बैठक कर अभियान की रूपरेखा तैयार की है। उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे सीमावर्ती जिलों में विशेष जांच दल (SIT) गठित किए गए हैं, जो स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई गई सीमा सुरक्षा बल (BSF) और राज्य पुलिस ने संयुक्त गश्त बढ़ा दी है। संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, थर्मल इमेजिंग कैमरों और अन्य आधुनिक तकनीकों की मदद से चौबीसों घंटे निगरानी की जा रही है, ताकि अवैध आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। शहरी क्षेत्रों में भी पहचान सत्यापन अभियान कोलकाता, हावड़ा और हुगली के औद्योगिक क्षेत्रों, जूट मिलों और बड़े निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों के पहचान पत्रों की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति फर्जी पहचान के जरिए इन इलाकों में रह सकते हैं। फर्जी दस्तावेज नेटवर्क पर कार्रवाई पुलिस ने उत्तर 24 परगना के सीमावर्ती क्षेत्र से दो आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, दोनों पर अवैध रूप से सीमा पार कराने और फर्जी भारतीय दस्तावेज उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है। उनके कब्जे से कथित तौर पर कई फर्जी मुहरें और दस्तावेज बरामद किए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि अभियान आगे भी जारी रहेगा और अवैध दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
त्रिपुरा: केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने त्रिपुरा के भारत-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र का दौरा करते हुए सीमावर्ती इलाकों में किसी भी प्रकार के डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश किसी भी कीमत पर सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संरचना में बदलाव को स्वीकार नहीं करेगा। लंकामुरा सीमा चौकी पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों को संबोधित करते हुए शाह ने घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। सीमावर्ती इलाकों में बदलाव पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति गृह मंत्री ने कहा कि भारत की नीति साफ है—सीमावर्ती राज्यों में किसी भी तरह के अवैध घुसपैठ या डेमोग्राफिक बदलाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ त्रिपुरा तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य सीमावर्ती राज्यों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। शाह ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता से जुड़ा गंभीर विषय बताया। घुसपैठ रोकने के लिए ‘स्मार्ट बॉर्डर’ प्रोजेक्ट शाह ने सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार की नई पहल ‘स्मार्ट बॉर्डर प्रोजेक्ट’ का भी ऐलान किया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना को पायलट आधार पर देश के 7 से 8 संवेदनशील स्थानों पर लागू किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत आधुनिक तकनीक, डिजिटल निगरानी और स्थानीय प्रशासन के बेहतर समन्वय का उपयोग किया जाएगा। सीमा पर किसी भी प्रकार के अवैध अतिक्रमण को रोकने के लिए शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाएगी। सीमा पर अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर गृह मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सीमा क्षेत्रों में कट्टरपंथी गतिविधियों, संदिग्ध वाहनों और फर्जी कंपनियों पर लगातार निगरानी रखी जाए। उन्होंने कहा कि सीमा की सुरक्षा केवल भौतिक चौकसी नहीं, बल्कि तकनीकी और खुफिया तंत्र के माध्यम से भी मजबूत की जाएगी। बीएसएफ जवानों की सराहना और पर्यावरण संदेश अपने दौरे के दौरान Border Security Force के जवानों की सराहना करते हुए शाह ने कहा कि सीमाओं की सुरक्षा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उन्होंने ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का भी उल्लेख किया और जवानों द्वारा पेड़ लगाने के प्रयासों की सराहना की। शाह ने कहा कि यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक स्वाभाविक जिम्मेदारी होनी चाहिए। सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन पर जोर गृह मंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। यह दौरा भारत की सीमाई सुरक्षा रणनीति और घुसपैठ रोकने के प्रयासों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर नया विवाद सामने आया है। बांग्लादेश ने आरोप लगाया है कि पिछले 24 घंटों में भारत की ओर से लोगों को उसकी सीमा में भेजने के कई प्रयास किए गए, जिन्हें उसकी सुरक्षा एजेंसियों ने विफल कर दिया। करीब 4,000 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर हालात को देखते हुए बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने निगरानी बढ़ा दी है और अवैध प्रवेश के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। झिनाइदाह क्षेत्र की घटना बनी तनाव की वजह बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, झिनाइदाह जिले के सीमा क्षेत्र में कुछ लोगों को कथित रूप से सीमा पार कराने की कोशिश की गई थी। सुरक्षा बलों ने समय रहते हस्तक्षेप कर इस प्रयास को रोकने का दावा किया है। इस घटना ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील सीमा मुद्दों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। शेख हसीना के बाद बदलते रिश्तों पर नया दबाव पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के संबंध नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। ऐसे समय में सीमा से जुड़ा यह विवाद द्विपक्षीय संबंधों के लिए नई चुनौती बन सकता है। ढाका का कहना है कि किसी भी नागरिक की वापसी स्थापित कानूनी और राजनयिक प्रक्रियाओं के तहत होनी चाहिए, न कि एकतरफा कार्रवाई के माध्यम से। दिल्ली में होने वाली बैठक से समाधान की उम्मीद सीमा विवाद के बीच 8 से 11 जून तक नई दिल्ली में दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुखों की बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में अवैध आव्रजन, सीमा सुरक्षा और नागरिकों की वापसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वार्ता दोनों देशों के बीच बढ़ती गलतफहमियों को दूर करने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। सीमाई तनाव के बीच बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सीमा विवाद के समानांतर बांग्लादेश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला है। अवामी लीग की वरिष्ठ नेता Selina Hayat Ivy को जमानत मिलने के बाद रिहा कर दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत देता है। अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर बढ़ी बहस International Crisis Group ने बांग्लादेश सरकार से अवामी लीग पर संभावित प्रतिबंध लगाने के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। संगठन का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक ताकतों की भागीदारी जरूरी है। सीमा सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता दोनों बड़ी चुनौती भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ता तनाव और बांग्लादेश के भीतर जारी राजनीतिक हलचल दोनों देशों के संबंधों पर असर डाल सकती है। अब निगाहें नई दिल्ली में होने वाली वार्ता और ढाका की राजनीतिक दिशा पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा तय कर सकती हैं।
Suvendu Adhikari ने पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया है। राज्य सरकार ने ‘Detect, Delete and Deport’ यानी 3D नीति लागू करते हुए संदिग्ध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों पर कार्रवाई तेज कर दी है। सरकार का दावा है कि अब अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें सरकारी रिकॉर्ड से हटाया जायेगा और फिर सीमा सुरक्षा बल को सौंपकर वापस भेजा जायेगा। मालदा में बना पहला डिटेंशन सेंटर Malda राज्य का पहला जिला बन गया है, जहां अवैध विदेशी नागरिकों के लिए डिटेंशन सेंटर बनाया गया है। यह केंद्र इंगलिश बाजार के चंदन पार्क इलाके में स्थापित किया गया है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, गजोले के पांडुआ क्षेत्र से पकड़ी गयी 3 महिलाओं और 6 नाबालिगों समेत कुल 9 संदिग्ध बांग्लादेशियों को यहां रखा गया है। सभी को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच डिटेंशन सेंटर लाया गया। सीसीटीवी और पुलिस निगरानी में रखा गया सेंटर अधिकारियों ने बताया कि डिटेंशन सेंटर में कई स्तर की सुरक्षा व्यवस्था की गयी है। यहां सीसीटीवी निगरानी के साथ 12 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गयी है। इसके अलावा नागरिक सुरक्षा कर्मी और स्वयंसेवक भी मौजूद हैं। भोजन और अन्य जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था भी की गयी है। क्या है ‘Detect, Delete and Deport’ नीति? राज्य सरकार की इस नीति का मकसद अवैध घुसपैठ रोकना और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखना बताया जा रहा है। Detect (पहचान) खुफिया एजेंसियों और जिला प्रशासन की मदद से उन लोगों की पहचान की जायेगी, जो बिना वैध दस्तावेजों के राज्य में रह रहे हैं। Delete (हटाना) जिन लोगों के दस्तावेज वैध नहीं होंगे, उनके नाम मतदाता सूची, राशन कार्ड और अन्य सरकारी रिकॉर्ड से हटाये जायेंगे। Deport (निर्वासन) पकड़े गये लोगों को Border Security Force को सौंपा जायेगा, जो बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल के साथ समन्वय कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया पूरी करेगी। जिलों में बनेंगे होल्डिंग सेंटर राज्य सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में होल्डिंग सेंटर बनाने के निर्देश दिये हैं। इन केंद्रों में उन विदेशी नागरिकों को रखा जायेगा, जो जेल से रिहा हो चुके हैं या अवैध रूप से भारत में रहने के आरोप में पकड़े गये हैं। CAA को लेकर भी सरकार का बड़ा बयान नबान्न में वरिष्ठ अधिकारियों और BSF अधिकारियों के साथ बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि जो लोग Citizenship Amendment Act के दायरे में नहीं आते, उन्हें अवैध घुसपैठिया माना जायेगा। उन्होंने पिछली सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वोट बैंक की राजनीति के कारण वर्षों तक केंद्र के निर्देशों की अनदेखी की गयी। अब राज्य सरकार सुरक्षा के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने की बात कह रही है। सीमा क्षेत्रों में पुलिस को मिले विशेष निर्देश राज्य के गृह सचिव और डीजीपी को सीमावर्ती जिलों के सभी थानों में इस नीति को तत्काल लागू करने का निर्देश दिया गया है। अब स्थानीय पुलिस संदिग्ध विदेशी नागरिकों को हिरासत में लेते ही इसकी जानकारी केंद्रीय एजेंसियों और BSF को देगी, ताकि निर्वासन की प्रक्रिया तेजी से पूरी की जा सके।
पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की 500 कंपनियां फिलहाल राज्य में तैनात रहेंगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने गृह मंत्रालय से 180 दिनों तक केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रखने का आग्रह किया था। केंद्र सरकार ने फिलहाल 20 जून तक इसकी मंजूरी दी है। चुनाव के बाद भी तैनात रखे गए थे केंद्रीय बल विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद पश्चिम बंगाल में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीएपीएफ की 500 कंपनियों को राज्य में तैनात किया गया था। पिछले चुनावों के बाद हुई हिंसक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए इस बार मतदान खत्म होने के बाद भी केंद्रीय बलों को नहीं हटाया गया था। गत सप्ताह राज्य की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद गृह मंत्रालय ने इन बलों को चरणबद्ध तरीके से वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की थी। पहले चरण में 100 कंपनियों यानी करीब 10 हजार जवानों को हटाने का आदेश जारी किया गया था। गृह मंत्रालय ने जारी किया नया आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी नए आदेश के अनुसार, अब 20 जून तक राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती जारी रहेगी। आदेश में कहा गया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए विभिन्न बलों की कुल 500 कंपनियां पश्चिम बंगाल में मौजूद रहेंगी। इनमें: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 200 कंपनियां सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 150 कंपनियां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की 50 कंपनियां भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की 50 कंपनियां सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 50 कंपनियां शामिल हैं। राज्य सरकार को करनी होगी व्यवस्थाएं गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों की तैनाती के दौरान ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक सपोर्ट और जवानों के ठहरने की व्यवस्था राज्य सरकार को करनी होगी। साथ ही बलों की सभी ऑपरेशनल जरूरतों का भी ध्यान रखने को कहा गया है। पहले चरण में हटनी थीं 100 कंपनियां गृह मंत्रालय ने पहले चरण में 100 कंपनियों को वापस बुलाने का फैसला लिया था। इनमें CRPF की 40, BSF की 30, CISF की 10, ITBP की 10 और SSB की 10 कंपनियां शामिल थीं। आदेश के मुताबिक 15 मई से इन कंपनियों को कानून व्यवस्था ड्यूटी से हटाया जाना था। सुरक्षा समीक्षा के बाद लिया गया फैसला राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हुई समीक्षा बैठक में पश्चिम बंगाल गृह विभाग और केंद्रीय एजेंसियों के अधिकारी शामिल हुए थे। खुफिया एजेंसियों से भी विशेष रिपोर्ट मांगी गई थी। समीक्षा में बताया गया कि चुनाव के बाद फिलहाल राज्य में स्थिति शांतिपूर्ण है और बड़े राजनीतिक प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं नहीं हुई हैं। वहीं बांग्लादेश सीमा से लगने वाले इलाकों में विशेष निगरानी रखी जा रही है। सीमा सुरक्षा बल घुसपैठ रोकने के लिए लगातार सतर्क है और कई इलाकों में फेंसिंग का काम भी शुरू किया जा रहा है।
Suvendu Adhikari के मुख्यमंत्री बनते ही West Bengal में कानून-व्यवस्था और सीमा सुरक्षा को लेकर बड़े फैसलों का दौर शुरू हो गया है। अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में शुभेंदु सरकार ने गौ-तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा कदम उठाया। सरकार ने Border Security Force (BSF) को बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी (Fencing) के लिए जमीन हस्तांतरण की मंजूरी दे दी है। सरकार का मानना है कि जब तक सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय गौ-तस्करी और घुसपैठ पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा। गौ-तस्करी के नेटवर्क पर बड़ा प्रहार कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि बंगाल में अब तस्करों और अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान सीमा पर बाड़बंदी का काम लंबे समय तक अटका रहा, जिसकी वजह से तस्करी का नेटवर्क मजबूत होता गया। अब सरकार का दावा है कि BSF को जमीन मिलने के बाद सीमा पर तेजी से बाड़ लगाने का काम पूरा किया जाएगा, जिससे तस्करी के प्रमुख रास्ते बंद हो सकेंगे। ‘नार्को-टेरर’ और तस्करी के गठजोड़ पर नजर राज्य सरकार का कहना है कि गौ-तस्करी से आने वाला पैसा सिर्फ अवैध कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सुरक्षा से जुड़े खतरे भी पैदा हो रहे हैं। इसी को देखते हुए गृह विभाग को निर्देश दिया गया है कि तस्करी में शामिल बड़े नेटवर्क और कथित सरगनाओं पर सख्त कार्रवाई की जाए। सरकार इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान रही है। सीमावर्ती जिलों पर खास फोकस कैबिनेट बैठक में सीमावर्ती जिलों में तेजी से बदलते जनसंख्या पैटर्न को भी गंभीर विषय बताया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा मजबूत करना राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी है। भूमि एवं राजस्व विभाग को निर्देश दिया गया है कि BSF को जमीन सौंपने की प्रक्रिया 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए ताकि बाड़बंदी के काम में और देरी न हो। केंद्र के साथ संयुक्त अभियान की तैयारी राज्य सरकार अब केंद्र सरकार के साथ मिलकर संयुक्त अभियान (Joint Operation) चलाने की तैयारी में भी है। इसके तहत सीमा सुरक्षा, घुसपैठ रोकने और अवैध गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जाएगा। इसके अलावा जनगणना और केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को तेजी से लागू करने का फैसला भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक संदेश भी साफ भाजपा सरकार के इस फैसले को राजनीतिक तौर पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने लगातार सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और गौ-तस्करी को बड़ा मुद्दा बनाया था। अब सत्ता में आने के बाद सरकार ने पहली कैबिनेट में ही इस दिशा में बड़ा फैसला लेकर यह संकेत देने की कोशिश की है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था और सीमा प्रबंधन को लेकर नई नीति अपनाई जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।